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गुरुवार, 19 मई 2016

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

है जुड़ी वरूणा हमारी आस्था के गीत से
और काशी की संजोई साधना की रीति से
लोक के अनुराग की शुभरागिनी के प्रण सी
पीढीयो से गा रहा यह शहर वाराणसी।
राग रंजित कामनायें,रास रस की प्रीति से।
है जुड़ी........
पंचक्रोसी की परिधि मे जो तुम्हारा नाम है
है वही महिमा सनातन  लोक का सम्मान है
प्रकृति को तुमने सँवारा है नरम नवनीत से
है बसी.....
गति तुम्हारी देख ऑखे आज डबडब हो रही
देख अवजल का मिलन निष्ठा बिचारी को रही
यह समय सहमा हुआ कुछ कह न सके अतीत से
है जुड़ी.....

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

व्योमेश की कविताये: आज इस ख्वाब को सच में....

आज इस ख्वाब को चलो सच में सजाया जाए
हम गरीबो का भी एक देव बनाया जाए.
देव ऐसा जो चडावे पे न बिक जाए
बस्तिया छोड़ कें महलो में ना वो बस जाये
हम उसक सुने, उससे कहे अपने गम
मन का दुःख दर्द जिसे जा के सुनाया जाए।
उसका मन्दिर मरमरका ना हो कच्चा हो
वह कुछ और भले हो ना मगर सच्चा हो
सोने चंडी की नही, मूरत तो भी क्या है गम
खेत की माटी से उसकी मूरत को बनाया जाए।
हम गरीबो की रोटी में जो खुश हो ले
हमारे टूटे हुए बर्तन में जो पानी पी ले
हमारे टूटे हुए झोपडी में सो जाए जो
ऐसे ही देव को मन्दिर में बसाया जाए।
जो हर शाम हर मेहनतकश को रोटी दे दे
दिन के थके हारे को रातो को एक छत दे दे
और कुछ न दे तो वो हमको सलामत रखे
अपने उस देव से बस ये ही मनाया जाए।