आज इस ख्वाब को चलो सच में सजाया जाए
हम गरीबो का भी एक देव बनाया जाए.
देव ऐसा जो चडावे पे न बिक जाए
बस्तिया छोड़ कें महलो में ना वो बस जाये
हम उसक सुने, उससे कहे अपने गम
मन का दुःख दर्द जिसे जा के सुनाया जाए।
उसका मन्दिर मरमरका ना हो कच्चा हो
वह कुछ और भले हो ना मगर सच्चा हो
सोने चंडी की नही, मूरत तो भी क्या है गम
खेत की माटी से उसकी मूरत को बनाया जाए।
हम गरीबो की रोटी में जो खुश हो ले
हमारे टूटे हुए बर्तन में जो पानी पी ले
हमारे टूटे हुए झोपडी में सो जाए जो
ऐसे ही देव को मन्दिर में बसाया जाए।
जो हर शाम हर मेहनतकश को रोटी दे दे
दिन के थके हारे को रातो को एक छत दे दे
और कुछ न दे तो वो हमको सलामत रखे
अपने उस देव से बस ये ही मनाया जाए।
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
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शुक्रवार, 12 सितंबर 2008
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