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रविवार, 7 अगस्त 2022

व्योमवार्ता/महान भारत के महान राष्ट्रपति डॉ0ए0पी0जे0अब्दुलकलाम

#समाज_जिसमे_हम_रहते_हैं.....

(श्री अब्दुल कलाम से महान राष्ट्रपति ना हुआ है,ना ही भविष्य में हो सकता है,उनकी सज्जनता एवम् महानता से जुड़ा एक संस्मरण भारत के राष्ट्रपति के पूर्व एडीसी ले0कर्नल अशोक_किनी के शब्दों मे)

राष्ट्रपति भवन में शंकराचार्य जी

राष्ट्रपति भवन में शंकराचार्य जी की यह पहली यात्रा थी। राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम शंकराचार्य जी को उचित सम्मान देना चाहते थे। उन्होंने मुझे (मैं राष्ट्रपति जी का ADC था) अपने कार्यालय में बुलाया और मुझसे पारंपरिक प्रोटोकॉल के बारे में पूछा। मैंने उनसे कहा, "मैं राष्ट्रपति भवन के द्वार पर शंकराचार्य जी का स्वागत करूंगा और उन्हें अंदर लाऊंगा।"

           कुछ मिनटों के गहन सोच के बाद उन्होंने मुझसे पूछा, "क्या होगा यदि मैं स्वागत करूं? तो मैंने कहा, "श्रीमान, आप संत के सम्मान को राष्ट्रपति के #सम्मान से ऊपर कर देंगे।
  वो मुस्कराए। उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा। फिर मैंने ऑफिस के अंदर उन्हें बताया, "सर, मैं उन्हें यहां लाऊंगा। उनकी मृगछाल इस सोफे पर बिछाऊंगा और उनसे बैठने का अनुरोध करूंगा। आप राष्ट्रपति जी अपने सोफे कुर्सी पर बैठे रहेंगे।"
उन्होंने फिर मुझसे दूसरी बार पूछा, "क्या होगा यदि मैं उन्हें अपने सोफे की सीट पर बैठा दूं?"
   मैंने फिर कहा, "सर, आप संत को राष्ट्रपति से अधिक सम्मान देंगे।"
वह फिर मुस्कुराए और मुझे कोई आदेश नहीं दिया। तीस मिनट के बाद जब शंकराचार्य जी आने वाले थे तो कुछ सेकंड पहले मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब मैंने डॉ अब्दुल कलाम को गेट पर अपने पीछे खड़ा देखा। मैं तुरंत पीछे गया और डॉ. अब्दुल कलाम के पीछे खड़ा हो गया। वह वहां व्यक्तिगत रूप से एक माला और फूलों के साथ शंकराचार्य जी का #स्वागत करने के लिए खड़े थे। हमने शंकराचार्य जी का स्वागत किया। राष्ट्रपति भवन के गलियारों से गुजरते हुए हम सीधे कार्यालय में गए।
             मैं आगंतुकों के लिए निश्चित सोफे पर शंकराचार्य जी की मृगछाल बिछा रहा था तो जिसकी हमने पहले चर्चा की थी। डॉ अब्दुल कलाम ने मुझे मृगछाल को अपने सोफे की कुर्सी पर बिछाने का निर्देश दिया। इस सरल, विनम्र और महान भाव से मैं स्तब्ध रह गया। हमने शंकराचार्य जी को फल और फूलों की टोकरी भेंट की।
          भेंट के बाद मैंने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं चाहता था कि भारत के राष्ट्रपति की सोफा सीट को संत की आध्यात्मिक शक्ति का आशीर्वाद मिले ताकि जो कोई भी राष्ट्रपति बाद में यहां बैठे, उन्हें भी संतों का आशीर्वाद प्राप्त हो।"
     मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु राष्ट्रपति कलाम के इन विचारों की प्रशंसा की और कहा
"सर, आप न केवल एक महान वैज्ञानिक हैं बल्कि इस वेष में एक संत भी हैं।"
हमेशा की तरह उन्होंने अपनी एक सार्थक मुस्कान दी।

       क्या आप एक महान देश के राष्ट्रपति की इस तरह की सज्जनता की कल्पना कर सकते है,क्या सभी महान पुरषों में एवम् देश के बड़े लोगो में भी इतनी सज्जनता नहीं होनी चाहिए......शायद ऐसा नहीं है, हम सब को ही इस प्रकरण से कुछ ना कुछ अवश्य सीखना ही चाहिए!
(काशी,7अगस्त 2022,रविवार)
#व्योमवार्ता
#डा0ए0पी0जे0अब्दुलकलाम  http://chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 6 अगस्त 2022

व्योमवार्ता/यह भी जाने.......

समाज जिसमे हम रहते हैं.....
यह भी जाने......

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में झंडा फहराने में क्या अंतर है ?
15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है, जिसे *ध्वजारोहण कहा जाता है क्योंकि यह 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री जी ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में Flag Hoisting (ध्वजारोहण) कहा जाता है।
जबकि
 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है, संविधान में इसे Flag Unfurling (झंडा फहराना) कहा जाता है।

15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।
जबकि
 26 जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं

स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से ध्वजारोहण किया जाता है।
जबकि
गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर झंडा फहराया जाता है।
(काशी,6अगस्त 2022,शनिवार)
#व्योमवार्ता

मंगलवार, 28 जून 2022

व्योम वार्ता / वे चिट्ठीयां.........

वे चिट्ठियाँ.......

वो चिट्ठियाँ कहाँ खो गईं,
जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे,
कुशलता की कामना से शुरू होते थे,
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे…
और बीच में लिखी होती थी जिन्दगी..
नन्हें के आने की खबर,
माँ की तबीयत का दर्दं,
और पैसे भेजने का अनुनय,
अपनी गाय गौरी व कुत्ते शेरू के हाल
फसलों के खराब होने की वजह।
कितना कुछ सिमट जाता था,
एक नीले से कागज में,
जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती,
और अकेले में आँखों से आँसू बहाती।
माँ की आस थीं ये चिट्ठियाँ,
पिता का सम्बल थीं ये चिट्ठियाँ,
बच्चों का भविष्य थीं ये चिट्ठियाँ,
और गाँव का गौरव थीं ये चिट्ठियाँ…
डाकिया चिट्ठी लाएगा
कोई बाँच कर सुनाएगा
देख-देख कर चिट्ठी को,
कई-कई बार छू कर चिठ्ठी को,
अनपढ़ भी अपनों के
एहसासों को पढ़ लेते थे
अब नही आती वे चिट्ठीयां,
न ही रहता है डाकिये भैया का इंतजार
जो सिर्फ चिट्ढी ही नही लाते थे 
बल्कि ले आते थे रिश्तों की गरमाहट
मन की ढेरों संवेदनायें
और चिट्ठियों के संग ढेर सारी खुशियाँ
अपनों संग बीतने वाली सुख दुख की आशंकायें

अब तो स्क्रीन पर अँगूठा दौड़ता है,
और अक्सर ही दिल तोड़ता है,
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो,
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है,
सब कुछ सिमट गया छै इंच में,
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में,
जज्बात सिमट गए मैसेजों में,
चूल्हे सिमट गए गैसों में,
और इंसान सिमट गया पैसों में...!!
(वाराणसी,28जून2022,मंगलवार)
http://chitravansh.blogspot.com

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

व्योमवार्ता/ यह RIP RIP रिप रिप क्या है,

व्योमवार्ता/ यह RIP RIP रिप रिप क्या है?: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 अगस्त 2018, शुक्रवार

            हमनें अक्सर देखा है कि किसी के भी मृत्यु की खबर जैसे ही आती है तो अधिकतर लोग RIP लिखकर भेजने लगते हैं ।आजकल सोशल मीडिया पर RIP का प्रयोग तो अच्छे अच्छे पढ़े लिखे लोग भी बिना इसके सही अर्थ को जाने बिना सही भाव को समझे करते हैं। एक दूसरे को देख के RIP लिखने कहने की होड़ लग जाती है लाइन लग जाती है।

आखिरकार ये *"RIP"* है क्या ?
आजकल देखने में आया है कि किसी मृतात्मा के प्रति RIP लिखने का *"फैशन"* सा चल पड़ा है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि कान्वेंटी दुष्प्रचार तथा विदेशियों की नकल के कारण हमारे युवाओं को धर्म की मूल अवधारणाएँ या तो पता ही नहीं हैं, अथवा विकृत हो चुकी हैं।

RIP शब्द का अर्थ होता है *"Rest in Peace" (शान्ति से आराम करो )* यह शब्द उनके लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया हो। क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी *"जजमेंट डे"* अथवा *"क़यामत का दिन"* आएगा उस दिन कब्र में पड़े ये सभी मुर्दे पुनर्जीवित हो जाएँगे। अतः उनके लिए कहा गया है, कि उस क़यामत के दिन के इंतज़ार में *"शान्ति से आराम करो"।*

लेकिन सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है इसलिये हिन्दू शरीर को जला दिया जाता है, अतः उसके *"Rest in Peace"* का सवाल ही नहीं उठता। सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर किसी दूसरे नए जीव/ काया/ शरीर/ नवजात में प्रवेश कर जाती है। उस आत्मा को अगली यात्रा हेतु गति प्रदान करने के लिए ही श्राद्धकर्म की परंपरा निर्वहन एवं शान्तिपाठ आयोजित किए जाते हैं।

अतः किसी हिन्दू मृतात्मा हेतु *"विनम्र श्रद्धांजलि", "श्रद्धांजलि", "आत्मा को सदगति प्रदान करें"* जैसे वाक्य विन्यास लिखे जाने चाहिए। जबकि किसी मुस्लिम अथवा ईसाई मित्र के परिजनों की मृत्यु उपरांत उनके लिए *"RIP"* लिखा जा सकता है।

होता भी यह है कि श्रद्धांजलि देते समय भी हम शॉर्टकट (?) अपनाने की आदत से हममें से कई मित्र हिन्दू मृत्यु पर भी *"RIP"* ठोंक आते हैं। यह विशुद्ध *"अज्ञान और जल्दबाजी"* है, इसके अलावा कुछ नहीं।

          अतः आप सभी कोशिश करें कि भविष्य में यह गलती ना हो एवं हम लोग *"दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि"* प्रदान करें ना कि उसे "RIP" लिखें.
निवेदन है कि अगली बार लिखने से पहले विचारें.
(बनारस, 17 अगस्त 2018, शुक्रवार)
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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

भगतसिंह : कुछ अधखुले पन्ने > व्योमेश चित्रवंश की डायरी 17अक्टूबर2016

दिल से न निकलेगी मर कर भी वतन की उल्फत
मेरी मिट्टी से भी खूशबू ए वतन आयेगी ।
           
              आजकल राजशेखर व्यास की लिखी किताब भगतसिंह: कुछ अधखुले पन्ने पढ़ रहा हूँ। बेहद बेबाकी और ईमानदारी से भगतसिंह पर लिखी गई इस शोधपरक किताब  ने सही अर्थों मे यह साबित किया है कि जीवनीकारों औऱ इतिहासकारों ने सही मायने मे भगत सिंह के साथ न्याय नही किया। भगतसिंह  की सच्ची और संपूर्ण कहानी लिखने वाला कभी न कभी कोई होगा भी? कभी कभी लगता है कि अगर भगतसिंह कुछ और समय जीवित रह गये होते  तो अपनी आत्मकथा स्वयं कहते। भगतसिंह जैसी शख्सियत बार बार नही होती। ऐसे लोग सदियों युगों मे एकाध बार होते है, सच है कि भगतसिंह ने स्वयं मृत्यु का वरण किया ताकि हम सब सुख से जी सके। पर यह हमारा दुर्भाग्य भी है कि हम भगतसिंह के बारे मे ज्यादा नही जानते बल्कि उतना ही जानते है जितना जनाया गया है। यह भगतसिंह ही नही बल्कि हमारे इतिहास के साथ, हमारे सम़य काल के साथ एक छल है जिसे साजिशन रचा गया और हमे जानबूझ कर अपने इस युगदृष्टा महान भारतीय , जांबाज क्रान्तिकारी के इतिहासबोध से परे रखा गया।
अपने समय के सभी क्रांतिकारियों मे भगतसिंह निसंदेह सर्वश्रेष्ठ चिंतक,विचारक व दृष्टा थे। वे सिर्फ आदर्शवादी भावुक व्यक्ति ही नही वरन यथार्थवादी विचारक थे और इसीलिये उन्होने आजादी के  बाद के भारत की परिकल्पना आजादी मिलने के लगभग डेढ़ दशक पहले ही कर ली थी जबकि उनके समकालिको के पास ऐसी कोई दृष्टि या सोच नही थी। यही वजह है कि भगतसिंह  आज भी सामयिक व प्रासंगिक है। आज भगतसिंह को महज कामरेड या सरदार के रूप मे देखने व मानने वालो को निकट दृष्टिदोष से पीड़ित ही कहा जायेगा कि उन्हे भगतसिंह एक समग्र भारतीय के रूप मे नजर नही आते।
   २६ सितंबर १९०७ को बंगा गॉव के चक नं० १०५, जरानेवाला तहसील जिला लायलपुर ( वर्तमान मे पाकिस्तान) मे जन्म लेने वाले भगतसिंह कुल २३ साल ५ महीने २६ दिन की उम्र पूरी कर २३ मार्च १९३१ को लाहौर सेण्ट्रल जेल मे अंग्रेजो द्वारा फॉसी की नियमविरूद्ध सजा को पूरा करने के लिये राजगुरू व सुखदेव के साथ फॉसी पर झूल गये। अंग्रेजी शासन से तो न्याय की आशा नही की जा सकती थी पर हम भारतीयों व हमारे देश के नेताओं ने क्या भगतसिंह के साथ न्याय किया? यह राजशेखर जी ने बहुत ही संतुलित ढंग से लिखा है। जब भगतसिंह फॉसी के पहले जेल मे थे तो नेताजी, मोतीलाल नेहरू, रफी अहमद किदवई, जवाहर लाल नेहरू उनसे मिलने गये पर गॉधी जी नही गये, यह सवाल मुझे पूरे समय कचोटता रहता है कि क्या एक ही उद्देश्य को पाने के लिये दो विचारधाराओं के बीच इतना अंतर स्वाभाविक हो सकता है अथवा यह गॉधी जी के छद्म महात्मावाद की एक पराकाष्ठा है। ऐसा ही सवाल गॉधी इरविन समझौते वार्ता के दौरान इरविन से अति मधुर संबंध मे बँध चुके गॉधी जी के स्वभाव व जिद पर पुन: उठता है कि जब पूरा देश यह चाहता था कि गॉधी जी भगतसिंह के सजामाफी हेतु इरविन से कहे वहॉ गॉधी द्वारा माफी की बात करने के बजाय केवल फॉसी के तारीख पर वह भी समझौते के लिहाज से हामी भरना मेरे मन मे उनकी महानता के प्रति सवाल उठाते हैं। जबकि इसके पहले गॉधी खुद ही अपील कर स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे की सजा माफ करा चुके थे, तो क्या गॉधी जी की सारी करूणा व सारी प्रेम व सहिष्णुता कुछ विशेष लोगो के लिये ही थी? क्या यह तुष्टिकरण व अंध महात्मावाद की स्वार्थपरक दबाव वाले राजनीति की शुरूआत नही थी ? ये सवाल किताब पढ़ने के दौरान भी व बाद मे भी मुझे उलझाते रहते है। हो सकता है कि मै गलत होऊँ पर मेरे सवाल अपने जगह वाजिब है जिनका जबाब तमाम महानताओं के रेत के बनते बिगड़ते टीलो के समान बदस्तूर कायम है।
         हालॉकि मुझे नही लगता कि किसी तरह की सजामाफी को भगतसिंह स्वीकार करते क्योंकि भगतसिह के उनके पिता जी द्वारा  फॉसी से बचाने के लिये दिये गये हलफनामे की जिस तरह से भर्त्सना उन्होने की थी व उनके लिखे लेखो मे देश व अपने मिशन के प्रति कटिबद्धता से यह स्पष्ट जाहिर होता है कि भगतसिंह अंग्रेजो के किसी भी एहसान को स्वीकार करने को शायद ही तैयार होते।
         कुछ इसी तरह की साजिश भगतसिंह के लेखन सामग्री के साथ भी हुई। मात्र २३ वर्ष की अल्पायु मे हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिस भाषा के मर्मग्य चिंतक व विचारक भगतसिंह ने फॉसी की कोठरी मे बैठे बैठे भीअनेक पत्र, लेख,दस्तावेज व पर्चे लिखे साथ ही साथ कई पुस्तक व पुस्तिकाये लिखी व कई विदेशी भाषा की पुस्तको का अनुवाद भी किया। बताते है जब उन्हे फॉसी पर चढ़ना था तो कालकोठरी से निकलने तक वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उनकी जेल मे लिखी पुस्तकों मे Idea of socialism, the door to death, autobiography, the revolutionary movement of india with short biographic sketch of the revolutionaries आदि थी। पर वे पुस्तके आम भारतीयो के हाथों तक पहुँचने के बजाय तितिर बितिर हो गई, बल्कि जानबूझ कर तितिर बितिर  कर दी गई। दुर्भागयत: इसमे भी हमारे कुछ बड़े नेताओ व  भगतसिंह के कुछेक बेहद करीबी माने जाने वालो का हाथ रहा। यह भगतसिंह के आम भारतीय के प्रति स्वीकार्यता व लोकप्रियता है जिसे प्रखर न होने देने के लिये चंद लोग हमेशा शंकालु रहे कि कही जन जन मे बसे इस देदिप्तमान सूर्य भगतसिंह के आगे उनकी छवि ऩ धूमिल हो जाये।
      फिर भी आज आजादी के लगभग ८ दशको के बाद भी भगतसिंह उतने ही प्रासंगिक व सामयिक लगते है तो उसके पीछे वजह उनके विचारो की ताजगी ही है, वर्तमान मे देश मे जो अफरातफरी दिख रही है  उसके बीच भगतसिंह याद आये बिना रह भी नही सकते। ये दूसरी बात है कि इतिहास ने उनके साथ न्याय नही किया क्योंकि इतिहास के नियन्ताओ ने समय के शिला पर उसे स्पष्ट सच लिखने की अनुमति ही नही दिया। आज जब पाकिस्तान पर सेना द्वारा किये गये सर्जिकल आपरेशन के बाद हमारे अपने नेताओं द्वारा आरोप प्रत्यारोप सबूत सेहरा को लेकर बेमतलब की बहस जारी है तो ऐसे मे भगत सिंह और भी महत्वपूर्ण हो जाते है तभी तो भगतसिंह ने कहा था
जिन्हे मर जाना चाहिये,
वे धरती पर बोझ बने हुये है
जिन्हे जिंदा रहना चाहिये
वो हर पल शहीद हो रहे हैं।

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मेरी अपनी पीड़ा

मेरी व्यक्तिगत पीड़ा

(पिछले कई महीनो से नेट के मोहजाल ने मेरे पढ़ने के वक्त पर डाका डाल रखा है। चाह के भी नही पढ़ पाता हूँ अपनी पसंदीदा किताबों को, वे पड़ी रहती है कई कई दिन मेरे पढ़ने की मेज पर। जब भी उन पर निगाह पड़ती है तभी मोबाईल मे बजती घंटियॉ व आभाषी दुनिया के नोटिफिकेसन मेरा ध्यान खींच लेते है, और मेज पर पड़ी हुई किताबे कई दिनो तक इंतजारी के बाद फिर से आलमारी मे चली जाती हैं।
आज किताबो पर विचार करते समय बरबस ही गुलजार साहब की कविता याद आ गई, जो आज मेरी अपनी पीड़ा है।)

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,
बड़ी हसरत से तकती हैं.......
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं !
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं,
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्प्यूटर के पर्दों पर,
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें,
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है !
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं,
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है !
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं,
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़,
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते !
जबां पर जो ज़ायका आता था सफ़ा पलटने का,
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है !
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है,
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे,
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर,
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से !
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी,
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल,
और महके हुए रुक्के,
किताबें मँगाने, गिरने-उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे,
उनका क्या होगा..............
वो शायद अब नहीं होंगे !!
                                     -  गुलज़ार

रविवार, 28 अगस्त 2016

एक अप्रसंगिक कहानी

एक अप्रसंगिक कहानी

गली मे एक परकटी पतंग के लिये दो बच्चे काफिर व सज्जन आपस मेे लड़ रहे थे, सज्जन का तर्क  था कि पतंग मेरी है पर काफिर का मानना था कि अब सज्जन यहॉ नही रहता तो पतंग उसकी क्यो होगी? काफिर जो शकल व अकल से ही काईयॉ दिख रहा था एकाएक भाग कर गली के मोड़ पर अपने घर मे घुस गया और छत पर चढ़ के तीन चार ईंटे सज्जन पर चला दिया। सज्जन को काफी चोटें आई उसका सिर फट गया वह भाग कर बचने को पेड़ के पीछे छिप गया। वह भी काफिर को सबक सिखाना चाहता था पर उसे मौका नही मिल रहा था। एकाएक उसे अपने कमर मे खोंसे गुलेल की याद आई। बस फिर क्या था उसने पेड़ की आड़ से मौका पाते ही छत पर से झॉक रहे काफिर पर निसाना साधा और गुलेल की कंकड़ी सीधे काफिर के बॉयी ऑख से जरा सी नीचे लगी। काफिर के समझ मे आ गया कि चोट क्या होती है?
पर यह क्या ? काफिर के बुक्का फोड़ कर रोते ही उसके घर वाले आ के सज्जन को बुरा भला कहने लगे। उनके पक्ष मे कुछ सेकूलर मीडिया चैनल भी आ गये। और तो और  दूसरे गॉव मोहल्ले के लोग जिन्होने कभी ये गली देखी भी नही थी, न ही उन्हे झगड़े का कारण पता था वे भी काफिर के लिये अपना माथा पीटने लगे, उनके साथ की महिलाये अपना सिंधूर पोछ पोछ के सज्जन के गुलेल पर सवाल उठाते हुये अपना विधवा प्रलाप करने लगी। दूसरे गॉव के सरपंच ने सवाल उठाया कि इस गॉव व गली मे गुलेल जैसे खतरनाक खिलौने बिल्कुल प्रतिबंधित होने चाहिये। बेचारा सज्जन सोच रहा था कि अगर उसके मॉ बाप को काफिर के खानदान के लोगो ने यह गली छोड़ने को मजबूर नही किया होता तो आज उसके तरफ से भी को ई बोलने वाला होता। वह इन सभी शकलो को पहचान रहा था, इनमे से तब कोई भी सज्जन के परिवार के बेदखली पर बोल नही रहा था। तब इन सेकूलर चैनलो व रांडपन व विधवा प्रलाप कर रही महिलाओ व अपने को गमजदा दिखा रहे मानवाधिकार वादी भी नही दिखे थे।
बहरहाल बात बच्चो के गाली से शुरू हुई गली से निकलते हुये अदालत तक जा पहुँची। फिर मानवाधिकारवादियों ने सज्जन के गुलेल जैसे खतरनाक हथियार को गॉव की उस गली मे प्रतिबँधित करने हेतु सबसे बड़े अदालत मे सवाल उठाय। अर्जी डाली।
सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दिया कि भले सज्जन काफिर के फेके गये ईंट पत्थर से मर गया होता पर उसे गुलेल जैसे खतरनाक खिलौने से काफिर की बॉयी ऑख पर निसाना बिलकुल नही साधना चाहिये , उसे इस सेकूलर देश की न्याय व्यवस्था मानवाधिकार के हित मे ऐसे किसी किस्म के खिलौने से खेलने की अनुमति नही दी जा सकती।
नन्हा सज्जन बेचारा हैरान परेशान है उसका गुलेल छीन लिया गया है। उसे नही मालूम कि मानवाधिकार क्या है, सेकूलरिज्म क्या है? काफिर को जरा सा चोट लगते ही दूसरी गली मोहल्ले मे रहने वाले सच से अनजाने लोग क्यो कुकुर की तरह भौ भौ और सियार की तरह हुऑ हुऑ क्यो करने लगते है? और देश की अदालत कभी उसके बारे मे क्यो नही सोचती बल्कि सियारो की हुऑ हुऑ सुन मरते हुये लाशो पर गिद्घ की तरह मडराते हुये केवल सड़ॉध ही क्यो सूँघ पाते है।

कहानी अब बदल रही है, सज्जन भी अब इसके पीछे की राजनीति समझने लगा है क्योकि जंगल के पार से कहीं कोने मे बसे सताये लोगो की मिली जुली आवाजे उसे सुनाई पड़ने लगी है। सज्जन को भरोसा हो रहा है कि अब इन नासपीटे कुकुरो के सेकूलरी भौभौ व मानवाधिकारनवादी विधवा प्रलाप कर रहे सियारो के हुऑ हुऑ से उसकी आवाज देर तक नही दबाई जा सकती भले ही फारेन फंडो पर पलने वाले चारित्रिक भ्रष्ट मीडिया वाले इस सियापे मे  ऱूदाली क्रंदन करते रहें।
             - व्योमेश चित्रवंश, 28 अगस्त 2016

शनिवार, 23 जुलाई 2016

ट्रौमा सेण्टर के पार्किंग ठेकेदार खुद मे ही माफिया है।: व्योमेश चित्रवंश की डायरी ,19 जुलाई 2016

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल मे ही अपने सभी चिकित्सालयो मेे पार्किग सुविधा निशुल्क कर दिया उसके लिये बेहद जरूरी व वाजिबकारण बताते हुये यह कहा गया कि अस्पताल मे मरीजो की सुविधा के लिये सुविधाओं को निशुल्क अथवा बेहद मामूली शुल्क पर किया जाना चाहिये।
      वहीं दूसरी तरफ बीएचयू ट्रौमा सेण्टर मे अगर आप सीधे व सरल स्वभाव के है तो पार्किग वाला आपसे मनमाने तौर पर पार्किंग शुल्क वसूल करेगा और काऱण पूछने पर आप के साथ जबरदस्ती व गुंडई करने को बिलकुल स्वतंत्र है। उस पर से बड़ा तुर्रा यह कि वह माफिया है अगर आपको गाड़ी नही खड़ी करनी है तो मत खड़ी करिये। पार्किंग से मिलने वाले रसीद मे व्यौरा कुछ और ही दर्ज है।
पार्किंग स्थल की हालत यह है कि पूरे पार्किंग एरिया मे कीचड़ भरा है। जरा सा पानी बरसने पर वहॉ घुटने भर पानी भर जाता है। गलती से आपकी दूपहिया रह गयी तो फिर स्टार्ट  होने के लिये भगवान मालिक है।
यदि आपने अपनी गाड़ी भूलवश नो पार्किंग एरिया मे खड़ा कर दिया है तो हास्पिटल मैनेजमेण्ट सिस्टम बार बार एनाउंसमेण्ट कर आपको  इस गलती के लिये याद दिलाता रहेगा जब तक आप उसे पार्क करने जायेगे तब तक पार्किग वाले आपकी गाड़ी पंचर भी कर सकते है। और पूछने पर वही जबाब कि वे माफिया है कुछ भी कर सकते हैं।
जब हमने पार्किंग के कर्मचारियो की शिकायत ट्रौमा सेण्टर के सिक्यूरिटी सिस्टम से किया तो उन बेचारो ने अपनी बेबसी बताते हुये कहा कि साहब वे  माफिया लोग हैं वीसी व ओएसडी के खासमखास है हम कॉन्टैक्ट ड्यूटी वाले उन्है कैसे रोक सकते है?
कल रात को ११,३० बजे पार्क की हुई गाड़ी को आज सुबह ६ बजे निकालने पर पार्किंग कर्मचारी द्वारा ३०/- मॉगने पर फिर किचकिच हुई मैने जब शिफ्ट वाईज चार्ज पूछा तो कर्मचारी ने सरलता से गणित समझाया कि रोज 2000/- रूपये वीसी को व3000/- रूपये ओएसडी को देने के बाद हमारे भी बालबच्चो को पालने  के लिये खर्च निकालना पड़ता है।
पता नही कर्मचारी कितना सच बोल रहा था पर अगर इसमे रत्ती भर भी सच्चाई है तो यह पूज्य महामना के परित्राणाम दुखतप्तम्  जैसे पवित्र विचारों की सरेआम हत्या है जिसके प्रतिे बीएचयू के पूर्व छात्र रहे हम जैसे लोग प्रतिकार करते हैं।

अपनों के अव्यवस्था से जूझता ट्रौमा सेण्टर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जुलाई 2016

तीन दिन से ट्रौमा सेण्टर बीएचयू मे हूँ और  एक नेक नीयत से शुरू की गई व्यवस्था को उसके अपनो द्वारा जानबूझ कर ध्वस्त होते हुये देख रहा हूँ। बनारस के लिये एक अनुपम भेंट को ध्वस्त करने वाले कोई और नही यही के कर्मचारीगण हैं। ज्यादातर कॉन्ट्रैक्ट सेलरी पर रखे गये कर्मचारियों का आपस मे कोई तालमेल नही है, ऐसे मे उनसे मरीजो की तीमारदारी की उम्मीद करना बेमानी है।
स्थिति यह है कि अगर आपने एक स्टाफ नर्स को कुछ करने को बोला है तो दूसरी स्टाफनर्स आपके ऊपर ध्यान नही ही दे सकती भले ही आप कितने भी पीड़ा या परेशानी मे क्यों न हो?
      वरिष्ठ चिकित्सको को इन तीन दिनो मे हमने वार्ड का विजिट करते हुये शायद ही देखा, पर उनके अंडर मे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रेजिडेण्ट्स डाक्टर्स जरूर मौजूद मिलते दिखते थे। पर उनका आपसी व्यवहार  इतना तल्ख व अमानवीय होता है जो सामान्य स्तर पर भी उचित नही कहा जा सकता ।  हम लोगो के वार्ड मे तमिलनाडु का एक लड़का डाक्टर है, फर्स्ट ईयर रेजिडेण्ट, नाम देना उचित नही होगा, जब से हम आये है उस बंदे क लगातार काम पर देखा है २४ घंटे रात दिन। बेहद सुलझा और मेहनती। हम मजाक मे उससे पूछते भी है कि डाक्टर साहब आप सोते कब हो, बेचारा मुस्करा के जबाब देता है, सोते कहॉ है सर जी, दोपहर मे दो घंटे रेस्ट करते है तो पूरे वार्ड मे शोर हो जाता है। ऐसे बेचारे जूनियर डाक्टर को उसके सीनियर्स इस बुरी तरह लताड़ लगा के मॉ बहन की गाली देते है कि हम लोगो को सुन कर नागवार लगता है। मजा यह है कि गलती किसी की भी हो , डॉट उसी बेचारे जूनियर रेजिडेण्ट को सुननी है। चाहे वह नर्स ने किया हो चाहे मरीज ने या खुद सीनियर ने पर डॉट जूनियर को इसलिये पड़नी है कि उसने देखा क्योंं नही अथवा बताया क्यो नही।
एक बार तो उस जूनियर रेज्डेण्ट को अनायास डॉट व गाली गलौज सुनते हुये देख मुझसे नही रहा गया मैने उस जूनियर से इतना सब कुछ सहने का कारण पूछा तो उसने बेहद मासूमियत से जबाब देते हुये कहा कि छोड़िये न सर। कौन सा ये लोग जिन्दगी भर हमारे सीनियर बने रहेगें?  पर मै स्वयं एक व्यवसायगत पेशे का हिस्सा होकर भी यह समझ पाने मे असमर्थ हूँ कि अपने जूनियर्स को सिखाने का यह कौन सा तरीका है जहॉ उसे व्यक्तिगत प्रताड़ना व सार्वजनिक बेईज्जती सहते हुये इस तरह की व्यवसायिक जानतारियॉ सिखनी पड़ती है?
बहरहाल बात अव्यवस्था की हो रही थी । कहने को तो ट्रौमा सेण्टर व सुपर स्पेशियल्टी हास्पिटल  बना दिया गया पर दोनो के रखरखाव की व्यवस्थाये परले सिरे से ही नदारद है। न तो सेण्टर मे साफ सफाई की पूरी व्यवस्था है न ही बिजली पानी की। एक फ्लोर पर लगभग ६० मरीजो के बीच एक वाटर कूलर। तीन सामान्य शौचालय दो बेसिन वे भी साफ सफाई से कोसो दूर। कहने को तो औपचारिकताओं के नाम पर कई बार झाडू पोछा किया जाता है पर वह केवल गैलरी के फर्श पर ही नजर आता है।

बदहाल बीएचयू ट्रौमा सेण्टर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी

बीएचयू ट्रौमा सेण्टर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 18 सितंबर 2015 को किया था यह वही समय था जब मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत जोर शोर से हो चुकी थी। देश मे स्वच्छ भारत का असर दिखने भी लगा है पर मोदी जी द्वारा उद्घाटित ट्रौमा सेण्टर की सफाई व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ज्यादातर वाटर वेसिन गंदगी से पटे और जाम पड़े हैं। ज्यादातर लैट्रीन के कमोड्स व सीट बदरंग व गंदे है। वाटर कूलर पर धूल व गंदगी का अंबार लगा है।कुछ सर्विस मास्टर क्लीनर की वर्दी वाले सफाईकर्मी साफसफाई करते नजर आते रहते है पर उनके कामो की देख रेख करने वाला कोई नही। स्थिति यह है कि चौथे मंजिल पर आर्थोपेडिक वार्ड में वेसिन की टोटियॉ रस्सी से बॉधी गई है और बाथरूम की हालत यह है कि आप उसका प्रयोग करना तो दूर वहॉ खड़े तक नही हो सकते। हमने इस संबन्ध मे जब आन ड्यूटी नर्सेज से बात किया तो उनका सीधा जबाब था कि यह देखना उनकी ड्यूटी मे नही हैं। मौजूदा डाक्टर्स तो ज्यादातर प्रथम वर्ष के रेजिडेण्ट है जो स्वयं अपने सीनियर्स के व्यवहार व थोपे गये कार्यो से त्रस्त है वे बेचारे इस संबन्ध मे क्या बता पायेगें।
    हमने इस संबन्ध मे ट्रौमा सेण्टर के विशेष कार्याधिकारी व उप चिकित्सा अधीक्षक से मिल कर शिकायत करने की कोशिश की पर वे दोनो अधिकारी हमे अपने कमरे मे नही मिले।
   पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के साथ साथ छत्तीसगढ व झारखण्ड के लिये एम्स जैसा एकमात्र जीवनदायी माने जाने वाले बीएचयू के अत्याधुनिक ट्रौमासेण्टर की बदहाली को बढ़ाने मे कुछ निहित शक्तियॉ अपने स्वार्थवश बदनाम व ध्वस्त करने मे लगी है क्या उनके मायाजाल से आमजन के बनाये ट्रौमासेण्टर मुक्त हो सकेगा?