यू पी कालेज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
यू पी कालेज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 3 अगस्त 2020

व्योमवार्ता/ यादें यूपी कालेज की...(७)

यादें यूपी कालेज की...(७) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, ३अगस्त २०२०

 छात्रसंघ चुनाव हो चुका था, हम लोग गोरखपुर विश्वविद्यालय के नियमानुसार दोसाला से तीन साला बीए के पार्ट 1 मे तकनीकी रूप से डाल दिये गये थे पर व्यवहारिक रूप से ढेर सारी परेशानियॉ, उहापोह, सिलेबस की दिक्कतें चल रही थी। लगभग सात आठ महीना पुराने सिलेबस को पढ़ने के बाद दो ढाई महीने मे नये सिलेबस को पढ कर परीक्षा देना खड़े पहाड़ पर चढ़ने जैसा था। हम लोगों के साथ कक्षा कर रहे ओल्ड स्टूडेंट के लिये और भी मुश्किल था, उनका बीए दो साल के बजाय अब चार साल मे पूरा होने वाला था। इसमे कई ऐसे भी थे जिनका नया नया विवाह हुआ था और उनकी पत्नी विद्यापीठ या कानपुर, फैजाबाद जैसे विश्वविद्यालय से बीए पढ़ रही थी, उन बेचारों को लग रहा था कि जब तक वे बीए करेगें तब उनकी पत्नी बीए पास कर एमए भी कर लेगी। पति बीए पत्नी एमए भारतीय पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार मे तब यह डूब मरने की बात थी। ओल्ड स्टूडेंट्स वे होते थे जिन्हे परीक्षा मे असफल होने पर कालेज के नियमानुसार निकाल दिया जाता। वे अगले साल पुन: वही परीक्षा व्यक्तिगत परीक्षार्थी के  रूप मे देते और पास होने पर अगले साल फिर से प्रवेश ले नियमित छात्र बन जाते। ऐसे छात्रो को गुरूजन उनके आग्रह पर नियमित छात्रो के साथ कक्षाएँ करने की अनुमति दे देते थे। बीए तीनसाला कोर्स को न लागू करने के लिये आपस मे विचार कर हम लोगों ने एक प्रार्थना पत्र अपने प्रिंसपल डॉ०ओ पी एस सेंगर को देने का निश्चय किया। सेंगर साहब द्वारा लाईब्रेरी वाले प्रकरण मे निर्णय से मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ था। जब हम अपना एप्लीकेशन ले कर प्रिंसपल साहेब के पास गये तो नियम कानून के पक्के सेंगर साहब ने  इसे यूनिवर्सिटी का विशेषाधिकार बताते हुये हम लोगों की बातें सुनने से ही स्पष्ट इंकार कर दिया। नीचे आने पर  ओल्ड स्टूडेंट्स ने राय दिया कि हम लोगों को डीएम को पत्रक देना चाहिये वहॉ से वह मुख्यमंत्री राज्यपाल तक चला जायेगा और सत्र पुन: दोसाला हो जायेगा। उन लोगों ने कई जगहों का नाम लेकर उदाहरण दिया कि ऐसा फलॉ ढेकॉ जगहो पर हो चुका है। उनके अनुभव व उदाहरण से प्रभावित हो कर हमने तुरंत प्रिंसपल का नाम काट कर उस पर जिलाधिकारी वाराणसी लिखा और कचहरी चल पड़े। शुरूआत मे कालेज गेट से निकलते समय हम लोग लगभग १५०-६० रहे होगें पर कचहरी पहुंचते पहुंचते १५-१६ रह गये थे। डीएम आफिस के सामने नीम के चबूतरे पर बैठे हम लोग डीएम साहब की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी एक वकील साहब आ कर हम लोगों से हमारे जुटने का कारण व समस्या पूछने लगे। उन्होने हम लोगों का पूरा सहयोग देने की बात कहते हुये बड़े गर्व से बताया कि वे भी यू पी कालेज के छात्र रहे हैं। पर वकील साहब का सपोर्ट हम लोगो के लिये कुछ ज्यादा ही भारी पड़ा। हुआ यूं कि उन्होने रोज कचहरी मे अड़ी जमाने वाले संकठा सर और गणेश सर को जा कर हम लोगों की तारीफ करते हुये सारी बात बताई तो वे दोनो लोग वास्तविकता जानने वहीं डीएम साहब के आफिस के सामने नीम वाले चबूतरे पर ही चले आये। तब तक मेरे साथ वालो की संख्या १५-१६ से ५-६ हो गई थी। जब संकठा सर हमारे पास आये और सारी बात समझा तो   बस एक ही वाक्य मे उन्होने हमे  वापस जाने का निर्णय सुना दिया। हम लोग कुछ कहने को सोचे पर उनके गंभीर चेहरे पर बड़ी बड़ी ऑखों मे दिख रहे नाराजगी से हमे लग गया कि हम लोगों से कुछ गलती हो गई है। दूसरे दिन सुबह संकठा सर की प्रिंसिपल्स आफ इकोनामिक्स की  पूरी क्लास नैतिकता,सिद्धान्त, सदाचार, शिकषकों के मान सम्मान,विद्यालय के गौरव और यूनिवर्सिटी के नियम कानून पर ही चलती रही और हम सिर झुका कर सुनते रहे। मजा यह कि इस पूरे प्रकरण के रायदेहिन्दान ओल्ड स्टूडेंट्स मौका और वारदात दोनो से गायब रहे।
जनवरी के घोर कुहरे भरी ठण्ड मे एक दिन जब हम सुबह ७ बजे  ठिठुरते हुये इकोनामिक्स के क्लास मे पहुंचे तो सारे डेस्कों पर "नगीना" छपे हुये छोटे छोटे पोस्टर लगे हुये थे। तब लहुराबीर के प्रकाश सिनेमा मे रिषी कपूर और श्रीदेवी की ब्लाकब्लस्टर फिल्म नगीना चल रही थी जिसे हमारे क्लास के कुछ सहपाठियों ने सामूहिक रूप से देखा था। यह नगीना काण्ड उस वर्ष काफी चर्चित रहा। संकठा सर के क्लास मे आने से पहले ही हम लोगों ने फटाफट उन छोटे पोस्टरों को उखाड़ कर फेंक दिया कि पुन: एक दिन की कक्षा मे अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों की बलि सदाचार और शिष्टाचार की भेंट न चढ़ जाये।
उसी साल की एक और शरारत,फीस की अगली किस्त जमा करनी थी, तभी शुल्कमु्क्ति के लिये आवेदन निकला। सबकी देखा देखी हमने भी फार्म भर दिया। लालच यह था कि फीस के पैसे बच जायेगें तो वह अपना होगा। साप्ताहिक सिनेमा देखने वाले कार्यक्रम जारी रखने मे उससे आसानी रहेगी। हम लोग हर बुधवार को कालेज के बाद १२से ३ वाला शो देखने जाया करते। एक साईकिल पर दोहरी ताकि स्टैंड का पैसा बचे और अमेरिकन स्टाईल मे टिकट। अमेरिकन स्टाईल मे एक लड़के को सभी अपने अपने हिस्से का पैसा दे देते थे और वह एक साथ सबका टिकट लेता था। लौटते रास्ते मे एक समोसा और लौंगलता का पैसा अलग से।  हालॉकि घर से फीस का पूरा पैसा मिल चुका था पर दोस्तों के सोहबत मे फीसमाफी का फार्म भरने की बात घर पर हमने नही बताया। फीसमाफी के लिये इंटरव्यू होता था जिसमे छात्र से उसके पिछले अंक, पारिवारिक स्थिति, चाल चरित्र आदि पर विचार कर फीस माफ की जाती थी, एक बार फीसमाफी के बाद बाकी के साल भी माफी बनी रहती। इंटरव्यू लेने वाले गुलाब सिंह सर थे। वे हमारे अर्थशास्त्र के शिक्षक होने के नाते अच्छे तरह जानते पहचानते थे। जब उन्होने फार्म मे मेरे गॉव का नाम देखा तो गॉव सहित परिवार और बाबा चाचा के बारे मे पूछने लगे। असलियत पता चली कि वे मेरे क्षेत्र के ही रहने वाले थे और मेरे पूरे परिवार को जानते थे, तो उन्होने सीधे कह दिया कि "तुम्हे फीसमाफी की जरूरत नही है, तुम पूरी फीस दे सकते हो।" अब यह मेरे लिये झटका था क्योंकि मेरे अधिकांश मित्रों की फीसमाफी हो चुकी थी। मैने कोई चारा न देख आखिरी अस्त्र दागा, " सर , फीस तो घर से आ गई थी, पर वह हमने खर्च कर दिया है। ऐसे मे फीस माफी नही हुई तो मुझे आप से उधार लेना पड़ेगा।" गुलाब सर ने मुझे नीचे से ऊपर दो बार देखा फिर मुस्कराते हुये बोले, "ठीक है, इस बार माफ कर दे रहा हूँ पर अगली बार ऐसा नही करूगॉ।"
मै खुशी खुशी इंटरव्यू वाले कमरे से बाहर आया और  इस फीसमाफी की खुशी मे बुधवार  के साप्ताहिक सिनेमा के अतिरिक्त शुक्रवार को  हमने अपने पैसे से नान अमेरिकन स्टाईल मे "मेरा हक" दोस्तों के साथ देखा और समोसा लौंगलता तो सिनेमा के पैकेज मे शामिल था ही।

http://chitravansh.blogspot.in

रविवार, 19 जुलाई 2020

व्योमवार्ता / यादें यू पी कालेज की (६) :जब बिना कुछ किये एक साल पीछे हो गये हम सब

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की ..(६): व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १९ जुलाई २०२०

जब बिना कुछ किये एक साल पीछे हो गये हम सब

       वार्षिक समारोह बीतने के बाद पूरे कालेज मे पढ़ाई की गंभीरता छा गई। हम नवप्रवेशी छात्रों मे तो पहली बार कालेज मे परीक्षा देने का एक खौफ भी था। अभी तक शिक्षकों के दिये हुये नोट्स और टीपों पर पढ़ते आ रहे हम लोगों को अधिकांश विषयों मे अपने से नोट्स बना कर पढ़ना था। विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ अप्रैल के दूसरे सप्ताह से प्रस्तावित थी। खेलवार , शौकवार, विषयवार दोस्तों की कटेगरी अलग अलग बन चुकी थी। इस बीच कालेज सेण्ट्ल लाईब्रेरी मे विषय से परे आचार्य रजनीश की एक पुस्तक 'सपना यह संसार' निर्गत कराने के लिये मेरी लाईब्रेरी काउण्टर पर शुरू हुई झिकझिक इतनी बढ़ी कि बात वहॉ से चल कर कला संकायाध्यक्ष डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी तक पहुंच गई, तब तक वे मुझे अच्छे से पहचानने लगे थे। उन्होने मुझे  पुस्तकालय से छात्रों के लिये पाठ्य संबंधी पुस्तक निर्गत किये जाने के  नियम को समझाने का प्रयास किया पर मै अपने जिद पर अड़ा था कि अगर वे पुस्तकें विशेष हैं तो वे विशेष श्रेणी मे रखते हुये कारण सहित नाट फार स्टूडेंट्स के निर्देश सहित रखी जायें। मेरे न मानने पर उन्होने नियमों का हवाला देते हुये स्पष्टत: मना कर दिया और दबे शब्दों मे धमकी भी दी कि पढ़ने आये हो नेतागिरी मत करो। पर मै इस शिकायत को लेकर प्राचार्य डॉ०ओम प्रताप सिंह सेंगर के पास चला गया। सेंगर साहब कृषि वैज्ञानिक थे वे अपने विषय में प्रखर होने के साथ बेहद सुलझे, नियम कानून के सख्त पाबंद व्यक्ति थे। पहनावे मे बेहद साधारण स्लेटी हाफ शर्ट, डार्क ब्लू पैंट और पैरों मे सैण्डिल पहने , हाथ मे एक बड़ी डायरी लिये आकर्षक  प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी ऋषितुल्य सेंगर साहब प्राचार्य आवास से कालेज तक सदैव पैदल ही चल कर आते थे। कालेज परिसर के अंदर वे या तो पैदल चलते या साइकिल से , पर उनके गरिमामयी व्यक्तित्व के समक्ष देखने वालों का सिर श्रद्धा से झुक जाता था। सेंगर साहब ने मेरी पूरी बात सुनी और मेरे दिये गये प्रार्थनापत्र पर स्पष्ट शब्दों मे स्वयं लिखा "Library is the centre of knowledge for any Institution and Books for All is the basic principle of Library Science. Issue the Books to students as per rules. Only rares and restricted books shall not be issued. "  मै वह आदेश लेकर अपने विजयपत्र के रूप मे ले जा कर जानबूझकर डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी को दिखाया। पर उन्होने बिना कोई  प्रतिक्रिया व्यक्त किये मुस्कराते हुये मेरे बारे मे ,पढ़ाई , शौक , भविष्य की योजना के बारे मे पूछते हुये कालेज के बाद दो बजे अपने ढिठोरी महाल स्थित घर आने को कहा। अपने घर कैलाश के भौगोलिक स्थिति को बताते हुये जब उन्हे पता चला कि उनके पड़ोसी और आदरणीय शोभनाथ लाल जी मेरे नाना है तो वे बहुत खुश हुये । जब दोपहर दो बजे मै उनके घर गया तो चाय पानी कराने के पश्चात वे मुझे ले कर एलटी कालेज अर्दलीबाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय गये और वहॉ मेरा परिचय तत्कालीन पुस्तकालयाध्यक्ष प्रद्युम्न कुमार गौड़ से करवा कर स्वयं मेरा सदस्यता आवेदनपत्र भर सदस्यता शुल्क रू० ६०/- अपने पास से जमा किया और कहा कि अब तुम्हे जितनी किताबे कोर्स से ईतर पढ़नी हो यहॉ से पढ़ो पर उससे तुम्हारे पढ़ाई पर असर नही आना चाहिये। आज भी विश्वनाथ सर द्वारा  बनवायी गई राजकीय जिला पुस्तकालय की सदस्यता मेरे पास बरकरार है और राजकीय जिला पुस्तकालय का मेरे जीवन निर्माण मे बहुत बड़ा योगदान है। उसी लाईब्रेरी मे मेरा परिचय कालेज के मित्रों पवन और समीर श्रीवास्तव से हुआ।
दिसंबर मे जाड़ा पड़ना शुरू हो गया था। सुबह सुबह अपने हाथों को रगड़ते हुये हम लोग संकठा सर के ७ बजे वाली क्लास के लिये पहुंच जाते।  मफलर और टोपी लगाने का फैशन नही था। तब  विंडचीटर, लेदर और थर्मोवुल वाले जैकेट का चलन नही हुआ था। स्वेटर कोट मे ठण्ड से लाल और गीली हो रही नाक को पोछते, गरमाते जब तक हम लोग पहुंचते तब तक बारह किमी दूर से अपनी लाल जावा से संकठा सर उपस्थित रहते। याद नही कि वे कभी जाड़ा गर्मी बरसात मे भी ७ बजे वाली क्लास मे पॉच मिनट लेट हुये हो। छात्रसंघ के चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। तब छात्रसंघ चुनाव मे अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और कक्षा प्रतिनिधियों के लिये बैलट पेपर आधारित चुनाव होते थे। चुनाव से पूर्व प्रत्याशियों का परिचय समारोह कला संकाय के ऊपर वाले बालकनी मे आयोजित हुआ। हम छात्र मतदातागण विज्ञान भवन की छत से लेकर नीचे मैदान तक खड़े बैठे प्रत्याशियों का परिचय भाषण सुनते थे। प्रथम वर्ष के छात्र अध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री पद के लिये चुनाव नही लड़ सकते थे।अपने अपने पद हेतु प्रत्याशीगण  जोर आजमाईश कर रहे थे पर कालेज का अनुशासन न परंपरा सर्वोपरि थी। कोई शोर गुल नारेबाजी नही। किसी भी दीवार पर प्रचार नही। कक्षाओं के दौरान प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ आते और पढ़ाते हुये शिक्षक से अनुमति ले कर अपनी बात रख चुपचाप निकल जाते। तब वर्तमान प्रशासनिक भवन नही हुआ करता था बल्कि उसके स्थान पर बहुत खूबसूरत कई प्रजातियों वाले कई रंग वाले गुलाब के फूलो की बड़ी क्यारी हुआ करती थी।(उसके बारे मे फिर कभी) प्रिंसपल का कमरा विज्ञान भवन के पोर्च के ठीक ऊपर वाला था। और उसके बाहर बॉयी ओर एकाउण्ट सेक्शन और दॉयी ओर प्रशासनिक  खण्ड ।दोनो के बाहर साईड  निकले पतले खुले गलियारे मे एक तरफ पीरियेड वाला घण्टा वाला छोटा सा कमरा इसी तरह  दूसरी ओर छोटा सा कमरा। जिनके ऊपर पानी की टण्किया थी जिनसे ओवर फ्लो होकर हमेशा पानी गिरता रहता था।हम लोग पहले साल के होने के कारण इस चुनाव मे मात्र दर्शक और मतदाता की ही भूमिका मे थे। चुनाव व मतगणना एक ही दिन होजाती थी। मतगणना के दूसरे दिन कालेज मे छुट्टी होती और अगले दिन खुलने पर पूरे कालेज मे जीते हुये प्रत्याशी के तरफ से समोसा लालपेड़ा बँटता था।उस वर्ष के चुनाव मे इंद्र देव शाही अध्यक्ष पद पर विजयी हुये थे। महामंत्री का याद नही।
      चुनाव के बाद  कालेज फिर से पठन पाठन मे गंभीरता से लग गये। एक दिन सुबह कालेज जाने पर पता चला कि हम लोगों का दो साल वाला स्नातक अब तीन साल का हो गया। रातों रात हम लोग पढ़ाई मे बिना किसी गलती के एक साल डिमोट कर दिये गये थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  के सुझाव पर उत्तर प्रदेश सरकार के  त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लागू करने के  फैसले को  इसी साल लागू कर दिया था जबकि काशी विद्यापीठ और संस्कृत विश्वविद्यालय मे अभी भी दो वर्षीय पाठ्यक्रम ही चला रहे थे। हम लोग पूरी तरह से उहापोह मे थे , न तो सिलेबस निर्धारित हुआ था न कोई स्पष्ट दिशा निर्देश। अध्यापक स्वयं अनिश्चित थे। ऐसे मे कालेज प्रशासन ने निश्चय किया कि छात्रों मे बिना कोई भय व संशय का मनोभाव पैदा किये पढ़ाये जा रहे कोर्स को जारी रखा जाये।
पर संशय का मनोभाव तो हम सब मे आ चुका था और हम एक ही सुबह में बीए प्रिवियस के बजाय बीए पार्ट-1 के छात्र बन गये थे।😱😱
http://chitravansh.blogspot.com
क्रमश:.......
अगले अंक में : पहले साल की कुछ छूटी छोटी बातें और परीक्षा

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की.....(५) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

संस्थापन समारोह का अखिल भारतीय कविसम्मेलन
व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की (५) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १७ जुलाई २०२०

           तीन दिन बाद समापन समारोह मे २५ नवंबर की रात मे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होना था। तब इस तरह के समारोहों के लिये कालेज गेस्ट हाऊस , द्वितीय छात्रावास और पुराने लाईब्रेरी भवन के बीच बड़े मैदान मे विशाल पाण्डाल लगाया जाता था।  आज भी कार्यक्रम निम्मित बना पक्का चबूतरा वहॉ मौजूद है।  पूरा पण्डाल खचाखच भर जाता था न सिर्फ छात्रों से बल्कि कालेज के अगल बगल १-२ किलो मीटर मे रहने वाले परिवारों से, महिला बच्चों के साथ लोग कालेज के कार्यक्रमों को देखने को आते थे और कवि सम्मेलन के दिन तो पूछो मत, लगता था पूरे बनारस की भीड़ इकट्ठी हो गई हो। मेरे ख्याल से वरूणा पार का यह तब का सबसे बड़ा साहित्यिक समारोह होता था। उसी पाण्डाल मे बने मंच से हमें पहली बार डॉ० गोपाल दास नीरज, डॉ० शंभुनाथ सिंह, भूषण त्यागी, सूड़ फैजाबादी, कैलाश गौतम, श्री कृष्ण तिवारी के साथ चकाचक बनारसी को सुनने का मौका मिला। गीतकार पं० श्रीकृष्ण तिवारी जी मंच संचालन कर रहे थे। जिन कवियों का हमने अब तक मात्र नाम सुना था वे हम लोगों के सामने मंच पर साक्षात विराजमान थे।इसी मंच पर हमने डॉ०शंभुनाथ सिंह के गांभीर्यपूर्ण स्वरों मे

"देश है हम मगर राजधानी नही
हम बदलते हुए भी न बदले कभी
लड़खड़ाए कभी और सँभले कभी
हम हज़ारों बरस से जिसे जी रहे
ज़िन्दगी वह नई या पुरानी नहीं ।
हम न जड़-बन्धनों को सहन कर सके,
दास बनकर नहीं अनुकरण कर सके,
बह रहा जो हमारी रगों में अभी
वह ग़रम ख़ून है लाल पानी नहीं ।

और
"समय की शिला पर मधुर चित्र कितने,
किसी ने बनाये किसी ने मिटाये ,
किसी ने लिखी ऑसूओं की कहानी,
किसी ने पढा सिर्फ़ दो बूं पानी।
इसी मे गये बीत दिन जिंदगी के,
गयी धुल जवानी, गयी मिट निशानी
.....शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

तथा डॉ० गोपाल दास नीरज की थरथराती आवाज में

"स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।"

और
दीप को अपना बनाने को पतंगा जल रहा है,
बूंद बनने को समुन्दर का हिमालय गल रहा है,
प्यार पाने को धरा का मेघ है व्याकुल गगन में,
चूमने को मृत्यु निशि-दिन श्वास-पंथी चल रहा है,
है न कोई भी अकेला राह पर गतिमय इसी से
मैं तुम्हारी आग में तन मन जलाना चाहता हूं।
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं॥

सुना। हमारे कला संकाय के डीन डॉ० विश्वनाथ प्रसाद ने भी अपनी कविता पढ़ी थी, "जीभ पर ताले दिये, चुप थे नही अच्छा किया, चीखते तुम भी सड़क पर आ गये अच्छा किया"। भूषण त्यागी, हलचल मिर्जापुरी, सूंड़ फैजाबादी, राजशेखर, कमल नयन मधुकर , सावित्री गौड़ की कवितायें तो मुझे अब याद नही है पर पं० हरिराम द्विवेदी के भोजपूरी गीत "

कविता के रस होला सँझिया बिहनवाँ
गउवाँ के गितियन में बसैला परनवाँ
गीतन से करैलें सिंगार हो ,
बाबा मोर आवैं बखरिया॥" 

और कैलाश गौतम की "गॉव गया था गॉव से भागा" के बाद "अमवसा क मेला" की कुछ पंक्तियॉ आज भी याद आते ही मन मुस्करा उठता है,

"एही में चम्पा-चमेली भेंटइली.
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली.
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें,
दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें.
असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अबतक पठवलू.
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं,
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं.
हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानऽ
हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानऽ.
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की.
मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो.
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै."

शायद उसी साल डॉ० बुधिनाथ मिश्र भी आये थे, यह तो पक्का याद नही, पर उनकी कविता

"एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो!
सपनों की ओस गूँथती कुश की नोक है
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
इस अँधेर में कैसे नेह का निबाह हो।

वाली कविता पंक्ति मुझे आज भी याद है। इन कविताओं ने मेरे साहित्यिक रूचि की नींव रखी जो मुझे बरबस ही हिन्दी साहित्य की ओर खींचती गई और भविष्य मे मेरे जीवन मे साहित्य से कोई सरोकार न होते हुये भी बड़ी काम की साबित हुई। कवि गोष्ठी की मनभावन लहरों मे जब श्रोतागण पूरे तरह डूब उतरा रहे थे तो इन श्रोताओं मे पीछे बैठे छात्र श्रोताओं का अपना अलग अंदाज था जो मेरे लिये अप्रत्याशित, नवीन और मजेदार था। जब किसी कवि की सराहना करती होती तो पीछे के छात्र श्रोताओं से एक स्वर मे काशी की पहचान वाला बाबा भोलेनाथ का स्वर उठता " हर हर महाााा देव " और इस लपेटें मे कभी कभार नये, छोटे, कम चर्चित मझोले कवि आ जाते तो पीछे से बनारस की पहचान शंख घोष मे कोरस होता " भाग भाग ......के" थोड़ी देर की देखा देखी के बाद हम नये छात्र श्रोता भी इस कोरस मे अपना योगदान देने लगे। जब कई छोटे मंझोले कविगण बनारसी शंखघोष के बहाव मे नही चल पाये तो संचालक पं० श्रीकृष्ण तिवारी जी द्वारा काशिका के मशहूर हास्यकवि चकाचक बनारसी को इस शोर को शांत कराने के लिये बुलाया गया। चकाचक जी ने आते ही पहले काशिका बोली मे छात्रों से संवादसंबंध स्थापित किया और फिर  अपनी हँस हँस कर लोटपोट करा देने वाली रचना सुनाई,

बदरी के बदरा पिछयउलेस,
सावन आयल काऽ।
खटिया चौथी टांग उठेउलस,
सावन आयल काऽ।
मेहराये के डर से माई लगल छिपावै अमहर,
भईया के बहका फुसला के भउजी भागल नइहर,
सांझै छनी सोहारी दादा तोड़ लियइलन कटहर,
बाऊ छनलन ललका दारू बनके बड़का खेतिहर,
बुढ़िया दादी कजरी गईलेस,
सावन आयल काऽ।
गुद्दड़ क चौउथी मेहररूआ मेंहदी सुरूक लियाईल,
सास क ओकरे कानी अंगुरी सड़-सड़ के बस्साइल,
झिंगुरी के घर भुअरी बिल्ली तिसरे बार बियाइल,
रामभजन क नई पतोहिया झूलै के ललचाईल,
धनुई फिर गोदना गोदवउलेस,
सावन आयल काऽ।
चमरउटी कऽ उलटल पोखरी मचल हौऽ छूआछूत,
खेलत हौऽ धरमू पंडित कऽ बेवा धईलेस भूत,
ननकू के ननका के मुंह पर मकरी देहलस मूत,
छींकत हौ जमिदार क बिटिया गईल खुले में सूत,
पटवारी के दमा सतउलेस,
सावन आयल काऽ।
सांझ के अहिराने में गड़गड़ गड़गड़ बजल नगाड़ा,
कलुआ गनगनायके नचलेस लगल किजइसे जाड़ा,
ओकरे साथे अन्हऊ पंडित नचलन तिरछा आड़ा,
लोटा लेके दउड़त हंउवन उखड़ल ओनकर नाड़ा,
उन्हें गांव भर दवा बतउलेस,
सावन आयल काऽ।
मुखिया के बखरी पर भर-भर चीलम उड़ल खमीरा,
उनके पिछवारे मेघा के लपक के धईलेस कीरा,
एक कोठरी में मुखियाइन के उठल कमर में पीरा,
लगत हौऽ राजा कजरी होई बाजल ढोल मजीरा,
पुरुवा भक दे गैस बुझउलेस,
सावन आयल काऽ।
अभी हम लोग हँसते और हर हर महादेव का हुंकारा भरते कुर्सी पर सीधे भी नही हुये थे कि  चकाचक चचा ने माहौल का रूख पहचान प्रासंगिक कविता सुनाया

जवन पटाका मारब सरऊ मुंह से फेकबा प्रान
तब  तू होश मे अईबा बच्चू जगजीत सिंह चौहान।

बाद मे श्रोताओं के मॉग पर उनकी ई राजा काशी हौ वाली कविता का पाठ तो होना ही था।

मचर मचर पुरवटवा बोले,सरर सरर फगुनहटी |
चरर चरर चमरौधा बोले,झलके लाल लंगोटी |
- ई राजा काशी हौ
ठहर ठहर के पान घुलाव,बगली दाब बंसौटी |
लहर लहर के राग अलाप,छान छान के बूटी |
-ई राजा काशी हौ
लहर लहर केशरिया छानब,ई तन अइसे छूटी |
लाख सुरहतिंन घेरैं बाकी ,बँधले रहब लंगोटी |
-ई राजा काशी हौ
चना चबेना गंगाजल हौ,गमछा अउर लंगोटी |
संतोषी जिउ मिलिहें तोके खा खा नून और रोटी |
-ई राजा काशी हौ

चकाचक जी के हर छंद के बाद 'ई राजा' बोलते ही श्रोताओं की भीड़ साथ देती "काशी हौ"। किसी स्थानीय कवि के लिये श्रोताओं का यह उन्माद अद्भुत था। चकाचक जी जब बैठने को हुये तो भीड़ उन्हे बैठाने को तैयार नही थी और उन्हे अपनी एक और कविता का पाठ करना ही पड़ा,

"का रे तेजुवा खोल केवाड़ी,आयल हौ जजमान चकाचक //
तीरथ बरत करै वाला हौ,चौचक में रूपया वाला हौ
तनी दाब के खींच रे सरवा,सुच्चामाल गले वाला हौ
सौ पचास क आपन गोटी,सच्चे में बैठे वाला हौ
और देख भड़के न पावे,हफ्तन से ठाले ठाला हौ
आज लगत हौ की खुश हउवन,अपनन पर भगवान चकाचक //
एहरओहर मतदेख होजजमान,भनाभन बढ़ते आव
बाबा क दरबार इहाँ हौ,बत्तीस गंडा इहाँ चढ़ाव
माई क भण्डार इहाँ हौ,सोरह गंडा इहाँ चढ़ाव
छोट मोट देवी देवतन पर,पंचपंच गंडा रक्खत आव
अब त बस हमही रह गइली ,दस क पत्ती एहर बढ़ाव
,बाबा के छाया में अइला,होई हो कल्याण चकाचक //
देख रे ऊ यात्री भटकल हौ,बढ़के तनी बोलाव
मेहररुआ टौटेक हौ,अपने कोठरी में ठहराव
यात्री के तू रगड़ के बूटी,विधी से आज छनाव
रगड़ के बीया चार धतूरा क ओम्मन घोरवाव
छनते सरवा गिर जाई तब,मेहररुआ हथियाव
काशी में त होत रहेला,तन मन धन क दान चकाचक //
का रे तेजुवा खोल केवाड़ी,आयल हौ जजमान चकाचक //...
       बाद के वर्षों मे चकाचक बनारसी मेरे रिश्तेदार निकले और उनसे रम्मन चाचा वाला संबंध जीवन पर्यन्त बना रहा।इसी तरह पं० हरिराम द्विवेदी से आकाशवाणी मे बना चचा भतीजा वाला संबंध और डॉ० शंभुनाथ सिंह जी से स्नेहिल दुलार पाने का सौभाग्य भी मिला। ऊपर से कठोर व सख्त दिखने वाले और अंदर से स्नेह और आशीष उड़ेलने वाले नारियल सदृश व्यक्तित्व के धनी डॉ० शंभुनाथ सिंह जी कब राजू भैया @rajeev के बाबूजी के साथ मेरे लिये भी बाबूजी बन गये पता ही नही चला। बाद के वर्षों मे राजीव भैया ने उनकी स्मृति में साहित्य, समाज और पुरातत्व के लिये समर्पित वाराणसी के प्रतिष्ठित डॉ०शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन से हमें जोड़ा जो आज तक बरकरार है और राजीव भैया आज भी मेरे बड़े भाई की भूमिका मे सदैव मेरे लिये उपलब्ध रहते है।
यह सारी उपलब्धियॉ यूपी कालेज की ही देन है जो मुझ अकिंचन को संभवतः कहीं और प्राप्त होना संभव नही थी।
http://chitravansh@blogspot.com
क्रमश: ......
अगले अंक मे : छ: माह पढ़ने के बाद बीए का त्रिवर्षीय हो जाना और छात्र संघ चुनाव