गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मेरी अपनी पीड़ा

मेरी व्यक्तिगत पीड़ा

(पिछले कई महीनो से नेट के मोहजाल ने मेरे पढ़ने के वक्त पर डाका डाल रखा है। चाह के भी नही पढ़ पाता हूँ अपनी पसंदीदा किताबों को, वे पड़ी रहती है कई कई दिन मेरे पढ़ने की मेज पर। जब भी उन पर निगाह पड़ती है तभी मोबाईल मे बजती घंटियॉ व आभाषी दुनिया के नोटिफिकेसन मेरा ध्यान खींच लेते है, और मेज पर पड़ी हुई किताबे कई दिनो तक इंतजारी के बाद फिर से आलमारी मे चली जाती हैं।
आज किताबो पर विचार करते समय बरबस ही गुलजार साहब की कविता याद आ गई, जो आज मेरी अपनी पीड़ा है।)

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,
बड़ी हसरत से तकती हैं.......
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं !
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं,
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्प्यूटर के पर्दों पर,
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें,
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है !
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं,
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है !
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं,
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़,
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते !
जबां पर जो ज़ायका आता था सफ़ा पलटने का,
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है !
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है,
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे,
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर,
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से !
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी,
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल,
और महके हुए रुक्के,
किताबें मँगाने, गिरने-उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे,
उनका क्या होगा..............
वो शायद अब नहीं होंगे !!
                                     -  गुलज़ार

रविवार, 28 अगस्त 2016

एक अप्रसंगिक कहानी

एक अप्रसंगिक कहानी

गली मे एक परकटी पतंग के लिये दो बच्चे काफिर व सज्जन आपस मेे लड़ रहे थे, सज्जन का तर्क  था कि पतंग मेरी है पर काफिर का मानना था कि अब सज्जन यहॉ नही रहता तो पतंग उसकी क्यो होगी? काफिर जो शकल व अकल से ही काईयॉ दिख रहा था एकाएक भाग कर गली के मोड़ पर अपने घर मे घुस गया और छत पर चढ़ के तीन चार ईंटे सज्जन पर चला दिया। सज्जन को काफी चोटें आई उसका सिर फट गया वह भाग कर बचने को पेड़ के पीछे छिप गया। वह भी काफिर को सबक सिखाना चाहता था पर उसे मौका नही मिल रहा था। एकाएक उसे अपने कमर मे खोंसे गुलेल की याद आई। बस फिर क्या था उसने पेड़ की आड़ से मौका पाते ही छत पर से झॉक रहे काफिर पर निसाना साधा और गुलेल की कंकड़ी सीधे काफिर के बॉयी ऑख से जरा सी नीचे लगी। काफिर के समझ मे आ गया कि चोट क्या होती है?
पर यह क्या ? काफिर के बुक्का फोड़ कर रोते ही उसके घर वाले आ के सज्जन को बुरा भला कहने लगे। उनके पक्ष मे कुछ सेकूलर मीडिया चैनल भी आ गये। और तो और  दूसरे गॉव मोहल्ले के लोग जिन्होने कभी ये गली देखी भी नही थी, न ही उन्हे झगड़े का कारण पता था वे भी काफिर के लिये अपना माथा पीटने लगे, उनके साथ की महिलाये अपना सिंधूर पोछ पोछ के सज्जन के गुलेल पर सवाल उठाते हुये अपना विधवा प्रलाप करने लगी। दूसरे गॉव के सरपंच ने सवाल उठाया कि इस गॉव व गली मे गुलेल जैसे खतरनाक खिलौने बिल्कुल प्रतिबंधित होने चाहिये। बेचारा सज्जन सोच रहा था कि अगर उसके मॉ बाप को काफिर के खानदान के लोगो ने यह गली छोड़ने को मजबूर नही किया होता तो आज उसके तरफ से भी को ई बोलने वाला होता। वह इन सभी शकलो को पहचान रहा था, इनमे से तब कोई भी सज्जन के परिवार के बेदखली पर बोल नही रहा था। तब इन सेकूलर चैनलो व रांडपन व विधवा प्रलाप कर रही महिलाओ व अपने को गमजदा दिखा रहे मानवाधिकार वादी भी नही दिखे थे।
बहरहाल बात बच्चो के गाली से शुरू हुई गली से निकलते हुये अदालत तक जा पहुँची। फिर मानवाधिकारवादियों ने सज्जन के गुलेल जैसे खतरनाक हथियार को गॉव की उस गली मे प्रतिबँधित करने हेतु सबसे बड़े अदालत मे सवाल उठाय। अर्जी डाली।
सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दिया कि भले सज्जन काफिर के फेके गये ईंट पत्थर से मर गया होता पर उसे गुलेल जैसे खतरनाक खिलौने से काफिर की बॉयी ऑख पर निसाना बिलकुल नही साधना चाहिये , उसे इस सेकूलर देश की न्याय व्यवस्था मानवाधिकार के हित मे ऐसे किसी किस्म के खिलौने से खेलने की अनुमति नही दी जा सकती।
नन्हा सज्जन बेचारा हैरान परेशान है उसका गुलेल छीन लिया गया है। उसे नही मालूम कि मानवाधिकार क्या है, सेकूलरिज्म क्या है? काफिर को जरा सा चोट लगते ही दूसरी गली मोहल्ले मे रहने वाले सच से अनजाने लोग क्यो कुकुर की तरह भौ भौ और सियार की तरह हुऑ हुऑ क्यो करने लगते है? और देश की अदालत कभी उसके बारे मे क्यो नही सोचती बल्कि सियारो की हुऑ हुऑ सुन मरते हुये लाशो पर गिद्घ की तरह मडराते हुये केवल सड़ॉध ही क्यो सूँघ पाते है।

कहानी अब बदल रही है, सज्जन भी अब इसके पीछे की राजनीति समझने लगा है क्योकि जंगल के पार से कहीं कोने मे बसे सताये लोगो की मिली जुली आवाजे उसे सुनाई पड़ने लगी है। सज्जन को भरोसा हो रहा है कि अब इन नासपीटे कुकुरो के सेकूलरी भौभौ व मानवाधिकारनवादी विधवा प्रलाप कर रहे सियारो के हुऑ हुऑ से उसकी आवाज देर तक नही दबाई जा सकती भले ही फारेन फंडो पर पलने वाले चारित्रिक भ्रष्ट मीडिया वाले इस सियापे मे  ऱूदाली क्रंदन करते रहें।
             - व्योमेश चित्रवंश, 28 अगस्त 2016

शनिवार, 23 जुलाई 2016

ट्रौमा सेण्टर के पार्किंग ठेकेदार खुद मे ही माफिया है।: व्योमेश चित्रवंश की डायरी ,19 जुलाई 2016

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल मे ही अपने सभी चिकित्सालयो मेे पार्किग सुविधा निशुल्क कर दिया उसके लिये बेहद जरूरी व वाजिबकारण बताते हुये यह कहा गया कि अस्पताल मे मरीजो की सुविधा के लिये सुविधाओं को निशुल्क अथवा बेहद मामूली शुल्क पर किया जाना चाहिये।
      वहीं दूसरी तरफ बीएचयू ट्रौमा सेण्टर मे अगर आप सीधे व सरल स्वभाव के है तो पार्किग वाला आपसे मनमाने तौर पर पार्किंग शुल्क वसूल करेगा और काऱण पूछने पर आप के साथ जबरदस्ती व गुंडई करने को बिलकुल स्वतंत्र है। उस पर से बड़ा तुर्रा यह कि वह माफिया है अगर आपको गाड़ी नही खड़ी करनी है तो मत खड़ी करिये। पार्किंग से मिलने वाले रसीद मे व्यौरा कुछ और ही दर्ज है।
पार्किंग स्थल की हालत यह है कि पूरे पार्किंग एरिया मे कीचड़ भरा है। जरा सा पानी बरसने पर वहॉ घुटने भर पानी भर जाता है। गलती से आपकी दूपहिया रह गयी तो फिर स्टार्ट  होने के लिये भगवान मालिक है।
यदि आपने अपनी गाड़ी भूलवश नो पार्किंग एरिया मे खड़ा कर दिया है तो हास्पिटल मैनेजमेण्ट सिस्टम बार बार एनाउंसमेण्ट कर आपको  इस गलती के लिये याद दिलाता रहेगा जब तक आप उसे पार्क करने जायेगे तब तक पार्किग वाले आपकी गाड़ी पंचर भी कर सकते है। और पूछने पर वही जबाब कि वे माफिया है कुछ भी कर सकते हैं।
जब हमने पार्किंग के कर्मचारियो की शिकायत ट्रौमा सेण्टर के सिक्यूरिटी सिस्टम से किया तो उन बेचारो ने अपनी बेबसी बताते हुये कहा कि साहब वे  माफिया लोग हैं वीसी व ओएसडी के खासमखास है हम कॉन्टैक्ट ड्यूटी वाले उन्है कैसे रोक सकते है?
कल रात को ११,३० बजे पार्क की हुई गाड़ी को आज सुबह ६ बजे निकालने पर पार्किंग कर्मचारी द्वारा ३०/- मॉगने पर फिर किचकिच हुई मैने जब शिफ्ट वाईज चार्ज पूछा तो कर्मचारी ने सरलता से गणित समझाया कि रोज 2000/- रूपये वीसी को व3000/- रूपये ओएसडी को देने के बाद हमारे भी बालबच्चो को पालने  के लिये खर्च निकालना पड़ता है।
पता नही कर्मचारी कितना सच बोल रहा था पर अगर इसमे रत्ती भर भी सच्चाई है तो यह पूज्य महामना के परित्राणाम दुखतप्तम्  जैसे पवित्र विचारों की सरेआम हत्या है जिसके प्रतिे बीएचयू के पूर्व छात्र रहे हम जैसे लोग प्रतिकार करते हैं।

अपनों के अव्यवस्था से जूझता ट्रौमा सेण्टर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जुलाई 2016

तीन दिन से ट्रौमा सेण्टर बीएचयू मे हूँ और  एक नेक नीयत से शुरू की गई व्यवस्था को उसके अपनो द्वारा जानबूझ कर ध्वस्त होते हुये देख रहा हूँ। बनारस के लिये एक अनुपम भेंट को ध्वस्त करने वाले कोई और नही यही के कर्मचारीगण हैं। ज्यादातर कॉन्ट्रैक्ट सेलरी पर रखे गये कर्मचारियों का आपस मे कोई तालमेल नही है, ऐसे मे उनसे मरीजो की तीमारदारी की उम्मीद करना बेमानी है।
स्थिति यह है कि अगर आपने एक स्टाफ नर्स को कुछ करने को बोला है तो दूसरी स्टाफनर्स आपके ऊपर ध्यान नही ही दे सकती भले ही आप कितने भी पीड़ा या परेशानी मे क्यों न हो?
      वरिष्ठ चिकित्सको को इन तीन दिनो मे हमने वार्ड का विजिट करते हुये शायद ही देखा, पर उनके अंडर मे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रेजिडेण्ट्स डाक्टर्स जरूर मौजूद मिलते दिखते थे। पर उनका आपसी व्यवहार  इतना तल्ख व अमानवीय होता है जो सामान्य स्तर पर भी उचित नही कहा जा सकता ।  हम लोगो के वार्ड मे तमिलनाडु का एक लड़का डाक्टर है, फर्स्ट ईयर रेजिडेण्ट, नाम देना उचित नही होगा, जब से हम आये है उस बंदे क लगातार काम पर देखा है २४ घंटे रात दिन। बेहद सुलझा और मेहनती। हम मजाक मे उससे पूछते भी है कि डाक्टर साहब आप सोते कब हो, बेचारा मुस्करा के जबाब देता है, सोते कहॉ है सर जी, दोपहर मे दो घंटे रेस्ट करते है तो पूरे वार्ड मे शोर हो जाता है। ऐसे बेचारे जूनियर डाक्टर को उसके सीनियर्स इस बुरी तरह लताड़ लगा के मॉ बहन की गाली देते है कि हम लोगो को सुन कर नागवार लगता है। मजा यह है कि गलती किसी की भी हो , डॉट उसी बेचारे जूनियर रेजिडेण्ट को सुननी है। चाहे वह नर्स ने किया हो चाहे मरीज ने या खुद सीनियर ने पर डॉट जूनियर को इसलिये पड़नी है कि उसने देखा क्योंं नही अथवा बताया क्यो नही।
एक बार तो उस जूनियर रेज्डेण्ट को अनायास डॉट व गाली गलौज सुनते हुये देख मुझसे नही रहा गया मैने उस जूनियर से इतना सब कुछ सहने का कारण पूछा तो उसने बेहद मासूमियत से जबाब देते हुये कहा कि छोड़िये न सर। कौन सा ये लोग जिन्दगी भर हमारे सीनियर बने रहेगें?  पर मै स्वयं एक व्यवसायगत पेशे का हिस्सा होकर भी यह समझ पाने मे असमर्थ हूँ कि अपने जूनियर्स को सिखाने का यह कौन सा तरीका है जहॉ उसे व्यक्तिगत प्रताड़ना व सार्वजनिक बेईज्जती सहते हुये इस तरह की व्यवसायिक जानतारियॉ सिखनी पड़ती है?
बहरहाल बात अव्यवस्था की हो रही थी । कहने को तो ट्रौमा सेण्टर व सुपर स्पेशियल्टी हास्पिटल  बना दिया गया पर दोनो के रखरखाव की व्यवस्थाये परले सिरे से ही नदारद है। न तो सेण्टर मे साफ सफाई की पूरी व्यवस्था है न ही बिजली पानी की। एक फ्लोर पर लगभग ६० मरीजो के बीच एक वाटर कूलर। तीन सामान्य शौचालय दो बेसिन वे भी साफ सफाई से कोसो दूर। कहने को तो औपचारिकताओं के नाम पर कई बार झाडू पोछा किया जाता है पर वह केवल गैलरी के फर्श पर ही नजर आता है।

क्या मै देवता नही हूँ? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

मुझे भी मेरे अपने बहुत प्यार करते है, वे हमे गुरू शिष्य, मित्र, अधिवक्ता, सहयोगी,अग्रज व अनुज के साथ अन्य ढेरो सम्बंधो के नाम पर पूजते है, स्नेह व सम्मान देते हैं। ऐसे मे किसी ने मेरे किसी भी नैतिक अनैतिक वाजिब गैरवाजिब कार्यों के खिलाफ कोई टिप्पणी किया और कल देश जलने लगे तो इसमे उनका कोई दोष नही है, न ही मेरी कोई जिम्मेदारी होगी।
    ध्यान ऱखियेगा।

( नोट :- यह मेरी अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है, इसे किसी नेता नेती के राजनैतिक विचारों से जोड़ कर देखने की कोई आवश्यकता नही।)

बदहाल बीएचयू ट्रौमा सेण्टर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी

बीएचयू ट्रौमा सेण्टर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 18 सितंबर 2015 को किया था यह वही समय था जब मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत जोर शोर से हो चुकी थी। देश मे स्वच्छ भारत का असर दिखने भी लगा है पर मोदी जी द्वारा उद्घाटित ट्रौमा सेण्टर की सफाई व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ज्यादातर वाटर वेसिन गंदगी से पटे और जाम पड़े हैं। ज्यादातर लैट्रीन के कमोड्स व सीट बदरंग व गंदे है। वाटर कूलर पर धूल व गंदगी का अंबार लगा है।कुछ सर्विस मास्टर क्लीनर की वर्दी वाले सफाईकर्मी साफसफाई करते नजर आते रहते है पर उनके कामो की देख रेख करने वाला कोई नही। स्थिति यह है कि चौथे मंजिल पर आर्थोपेडिक वार्ड में वेसिन की टोटियॉ रस्सी से बॉधी गई है और बाथरूम की हालत यह है कि आप उसका प्रयोग करना तो दूर वहॉ खड़े तक नही हो सकते। हमने इस संबन्ध मे जब आन ड्यूटी नर्सेज से बात किया तो उनका सीधा जबाब था कि यह देखना उनकी ड्यूटी मे नही हैं। मौजूदा डाक्टर्स तो ज्यादातर प्रथम वर्ष के रेजिडेण्ट है जो स्वयं अपने सीनियर्स के व्यवहार व थोपे गये कार्यो से त्रस्त है वे बेचारे इस संबन्ध मे क्या बता पायेगें।
    हमने इस संबन्ध मे ट्रौमा सेण्टर के विशेष कार्याधिकारी व उप चिकित्सा अधीक्षक से मिल कर शिकायत करने की कोशिश की पर वे दोनो अधिकारी हमे अपने कमरे मे नही मिले।
   पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के साथ साथ छत्तीसगढ व झारखण्ड के लिये एम्स जैसा एकमात्र जीवनदायी माने जाने वाले बीएचयू के अत्याधुनिक ट्रौमासेण्टर की बदहाली को बढ़ाने मे कुछ निहित शक्तियॉ अपने स्वार्थवश बदनाम व ध्वस्त करने मे लगी है क्या उनके मायाजाल से आमजन के बनाये ट्रौमासेण्टर मुक्त हो सकेगा?

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

एक और सॉझ ढल गई.....

और
एक और सॉझ ढल गयी
आहिस्ता आहिस्ता
आँखों मे उदास सपने लिये
कभी खुली आँखों में तो
कभी बंद पलकों में
पर सभी सपनों का रंग
फीका फीका एक जैसा
दर्द और पीड़ा से भरा
पर उस विवसता के पीछे
एक अकुलाहटऔर बेचैनी
कुछ करने की कुछ कर गुजरने की
पर मन ही सब कुछ नही होता
क्योंकि मन को तन का
वास्तविक बोध नही होता
कसमसाहट में बंद पलको के
कोरों मे सिमट आई नमी
बावजूद मानस केअन्तर से
उठती है आवाज
यह अंधेरा छँट रहा है
कल आने वाली सुबह के लिये.......
       -व्योमेश १४.०७.१३ रविवार

(यह कविता मैने जुलाई २०१३ मे लिखा था, जब पैर टूटने पर प्लास्टर लगवा कर पूरी तरह बिस्तर पर पड़ा था। मन मे आशा को जगाने के लिये कवि कर्म ही मेरा विश्वास था।)

गुरुवार, 19 मई 2016

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

है जुड़ी वरूणा हमारी आस्था के गीत से
और काशी की संजोई साधना की रीति से
लोक के अनुराग की शुभरागिनी के प्रण सी
पीढीयो से गा रहा यह शहर वाराणसी।
राग रंजित कामनायें,रास रस की प्रीति से।
है जुड़ी........
पंचक्रोसी की परिधि मे जो तुम्हारा नाम है
है वही महिमा सनातन  लोक का सम्मान है
प्रकृति को तुमने सँवारा है नरम नवनीत से
है बसी.....
गति तुम्हारी देख ऑखे आज डबडब हो रही
देख अवजल का मिलन निष्ठा बिचारी को रही
यह समय सहमा हुआ कुछ कह न सके अतीत से
है जुड़ी.....

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

मंगलवार, 17 मई 2016

हमारी वरूणा अभियान (३): व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17मई2016 मंगलवार

हमारी वरूणा अभियान: दिल मे आवाज एक उठी थी कभी (३),

                         और तीन दिन बाद ही रविवार आ गया। जिन थोड़ा से  मित्रों को हम सूचना दे पाये थे वे उत्साह से लबालब थे। लेकिन श्रमदान के नाम पर हमारी कोई तैयारी नही थी। हमे पूर्व मे श्रमदान का कोई अनुभव भी नही था। बहर हाल हम श्रमदान के नियत समय ३ बजे सायं से लगभग डेढ़ घंटे पहले ये सोच कर शास्त्री घाट पहुँचे कि चल कर वहॉ जरूरत के पुताबिक व्यवस्था किया जायेगा। पर यह क्या? हमारे पहुँचने के पहले ही ज्यादातर श्रमदाता वहॉ पहुँच चुके थे। यानि समय से डेढ़ दो घंटे पहले ही। उनमे अधिकांसत: यूपी कालेज के छात्र थे जो डॉ० कुलदीप जी के आवाह्न पर मॉ वरूणा के लिये कुछ करने का जज्बा लेकर आये थे। मीरापुर बसहीं के सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय के अजय यादव जी एवं उनके सहयोगी, प्रिन्स कम्प्यूटर एकाडमी के मनोज जी व उनके छात्र, अशोक पाण्डेय, अजीत व दिनेश सिंह की अंकित व अंकुर विश्वकर्मा के साथ जीनियस कोचिंग की पूरी टीम, प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र मढ़वा लमही के राजीव, जितेन्द्र, दिलीप व प्रमोद जी, वरूणा तट पर रहने वाले लक्ष्मन सिंह प्रवक्ता,हम लोगो के प्रेरक डॉ० अरविन्द भैया , मुसीर भाई ,हम सबका प्रिय के के श्रीवास्तव उर्फ कृष्ण जैसे लगभग साठ सत्तर की संख्या मे लोग जुट चुके थे। हमारे साथी सूर्यभान सिंह विह्वल थे कि उनका प्रण साकार रूप ले रहा है। आज तक की हमारी जानकारी मे शायद यह पहला श्रमदान रहा होगा जो अपने नियत समय से पौन घंटा पहले ही शुरू हो गया। हमे लोगो ने मात्र दो फावड़े और दो टोकरी की व्यवस्था की थी। सच कहे तो हमे चार छ: से अधिक श्रमदाताओं के जुटने की उम्मीद भी नही थी। पर हमारे सारे अनुमानो को ध्वस्त करते हुये इन स्वैच्छिक श्रमदाताओं की भीड़ जब वरूणा मे सफाई के लिये उसकी तो हमारे व सूर्यभान की ऑखो मे खुशी के ऑसू आ गये। अरविंद भैया ने हमे विश्वास दिलाया कि प्रचार प्रसार से दूर अच्छे काम करने वालो की आज भी कोई कमी नही है। सत्तर की संख्या के लिये दो फावड़े और दो टोकरी नही के बराबर थी। हम लोगो के अनुभवहीनता व कयास को देखने कर डॉ० कुलदीप ने तुरंत अपने कालेज के फार्म हाउस से छ: फाचड़े, तीन बेलचे व दो पॉचा व छ: टोकरियॉ मंगवाया। अरविंद भैया भी अपने घर से दो टोकऱी व एक फावड़े की व्यवस्था की। फिर भी उत्साह व संख्या के सामने ये संसाधन कम ही थे। जिन लोगो को फावड़े, पॉचे टोकरियॉ नही मिली वे सीधे ही वरूणा मे उतर गये और वरूणा के पेटे से ढेर के ढेर पालिथीन व कूड़े निकलने लगे। अद्भुत दृश्य आज भी ऑखो के सामने है। लोगो का उत्साह देख उस समय एक दुर्घटना मे बुरा तरह घायल हो कर स्वास्थ्य लाभ कर रहे खुद किसी तरह वैसाखी के सहारे वरूणा तट तक आये डॉ० कुलदीप व लमही के हमारे दिव्यांग मित्र एक हाथ से जीवन यापन करने वाले प्रमोद मौर्य भाई भी केवल खड़े हो कर दर्शक की भूमिका निभाने को तैयार नही थे। कुलदीप भाई ने टोकरी सँभाली तो प्रमोद नदी के पेटे मे घुसी हाथ से ही करता निकालने लगे। वरूणा मे कचरे की स्थिति यह थी कि सीढ़ीयो तक केवल प्लास्टिक की बोरियो मे कूड़े व पालिथीन मे भरे कचरे से पटी थी। जीवनदायिनी कही जाने वाली वरूणा स्वयं जीवन के लिये शुद्ध सॉस के लिये कराह रही थी। हम लोगो को नदी मे साफ सफाई करते देख  एक दो स्थानीय तो एक दो अन्य राहगीर भी आ गये व हमारे प्रयास को जान कर अपनी सहयोग दिया।शाम के  साढ़े पॉच बजे तक हम लोग लगभग तीन कुन्तल से अधिक कचरा व पालिथीन वरूणा के पेटे से निकाल चुके थे।जबकि अभी हम नदी मे मुश्किल से दो मीटर या उससे थोडा सा कम अधिक ही घुस पाये थे। 
    अब हमारे सामने दूसरी समस्या यह थी कि नदी के पेटे से निकाले गये कूड़े कचरे को निस्तारित कहॉ किया जाय? अंतत: यह तय हुआ कि फिलहाल इस कचरे व कूड़े को पालिथीन से अलग कर हमे लोग पुराने पुल के नीचे कचहरी छोर पर एक किनारे ऱख दें और दूसरे दिन नगरनिगम से मिल कर उसके निस्तारण के लिये व अगले श्रमदान मे उनसे एक कूड़ागाड़ी अथवा व्यवस्था के लिये अनुरोध किया जाये। 
सूरज ढलने वाला था पर वरूणा पुत्रों के उत्साह मे कोई कमी नही थी। अंतत: हमे अरविन्द भैया व कुलदीप भाई के माध्यम से बार बार आज का काम बंद किये जाने का अनुऱोध करना पड़ा तब जा कर पहले दिन का श्रमदान समाप्त हुआ । कचहरी पर कुलदीप भाई के सौजन्य से पहलवान की चाय के साथ अगले रविवार को पुन: मिलने के विश्वास के साथ  अक अच्छी शुरूआत के पहले दिन का समापन हुआ।
        इसी श्रमदान के दौरान हमारी कई नये साथियो से मुलाकात हुई जो आज तक हमारे सहयोग मे सदैव तत्पर रहते है और बिना प्रचार प्रसार के वरूणा के पुनरूद्धार के बारे मे सिद्दत से सोचते महसूस करने के साथ ही कुछ करने के बारे मे सोचते है। ऐसे ही लोगो मे कृष्ण के के, अंकुर व अंकित , राजीव मढ़वा जैसे बच्चे थे जिनकी निष्ठा व समर्पण के माध्यम से हमारी वरूणा अभियान को बहुत बल मिला, जिसकी चर्चा आने वाले दिनो में।            (क्रमश:)
http:hamarivarunavaranasi.blogspot.com                                                        व   http://chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 14 मई 2016

हमारी वरूणा अभियान: दिल मे आवाज एक उठी थी कभी (२)

           यूँ ही चर्चा करते करते अक्टूबर का महीना  आ चुका था। हम लोगो के साथ कुछेक मित्र भी जुड़ने लगे थे। सबसे पहला सहयोग हमे हम लोगो के बड़े भाई उदय प्रताप इण्टर कालेज वाराणसी के भूगोल के प्रवक्ता व एनसीसी अधिकारी डॉ० अरविंद कुमार सिंह व दूरदर्शन भदोही के संवाददाता हमारे पत्रकार मित्र संजय श्रीवास्तव का मिला । इन दोनो व्यक्तियों ने हमारी पूरी समस्या, यात्रा वृतान्तव समाधान पर हमारा दृष्टिकोण सब ध्यान से सुनने के साथ एक कार्य योजना बनाने पर बल दिया। वैचारिक सहयोगी के रूप मे हमारे मित्र गण हमसे जुड़ते जा रहे थे पर हमारे पास संसाधनो के नाम पर कुछ भी नही थी।अगर साथ मे पूँजी थी तो मित्रों का हमारे प्रति विश्वास की, शक्ति थी तो हमारी संकल्प शक्ति की और विश्वास था कि हम बनारस की जीवनदायिनी रही मॉ वरूणा के लिये कुछ अवश्य करेगें। हम रोज शाम टहलते हुये वरूणा तट पर आ जाते थे। वकालत की शुरूआत थी तो मुवक्किल व चैम्बर का झंझट भी कम ही था। यदि किसी ने मिलने के लिये कहा भी तो उसे वरूणा तट शास्त्री घाट पर ही बुला लिया। मिलने जुलने वालो मित्रों को भी वह स्थान पता था तो वे भी वही आ जाते थे और हम अनायास ही घाट किनारे देर तक बैठे रहते। आपस मे योजनाये बनाते । नये लोगो को अपने बातो विचारो से अवगत कराते । और जाने अनजाने रोज दो चार की संख्या मे अपने सहयोगी व समर्थको का ईजाफा करते।
                            इसी दौरान एक महत्वपूर्ण घटना हुई जिसने हमारे  विचारो को एक झटके के साथ ही धरातल पर ला दिया । हुआ यूँ कि नवरात्रि समाप्त हुआ था। लोग अपने घरों मे रखे कलस, पूजन सामग्री, फूलमाला एवं पूजन सामग्री के अवशेष बड़े बड़े पालिथीन पैकेटो मे भर कर लाते और मॉ वरूणा को प्रणाम कर पूरा पूजन अवशेष पालिथीन सहित ही नदी मे फेंक देते। शाम को हमारे रहने के दौरान हमने लोगो ने किसी को प्यार से किसी को मनुहार से हाथ जोड़ कर ऐसा करने से रोकते हुये उनकी श्रद्धा को प्रणाम करने के साथ पालिथीन न फेकते हुये सामग्री को पालिथीन से बाहर निकाल कर एक किनारे रखने का अनुऱोध प्रारंभ किया। ज्यादातर लोग हमारी बातो से सहमत होते थे। कुछेक बहस भी करते थे। कुछ मन मे गाली देते हुये चले जाते थे पर हमने अपना प्रयास जारी रखा। ऐसे ही एक सॉझ पुराने वाले पुल पर एक कार  खड़ी कर दो सज्जन उतरे और डिग्गी खोल दो बड़ी प्लास्टिक की बोरी निकाल कर नदी मे फेकने की मंसा से बढ़े ही थे कि सूर्यभान ने उन्हे टोंकते हुये अवशिष्ट सामग्री को बोरी से बाहर निकाल कर फेकने के लिये कहा , इस पर वो दोनो व्यक्ति उग्र हो गये और उन्होने सूर्यभान के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया। फिर सूर्यभान की भी ठकुरैती जगी और उन्होने सीधे चैलेंज किया कि अब मेरे रहते आप इस बोरी को वरूणा मे ऩही फेक सकते। बात बढ़ गई और गुस्से मे सूर्यभान ने कहा कि यह मेरी वरूणा मॉ है मै यहॉ अपने उपस्थिति मे मॉ का ऑचल नही गंदा करने दूगॉ। हम लोगो के दबाव व सूर्यभान के गुस्से के चलते वे दोनो लोग नदी मे बिना अवशिष्ट डाले ही चले गये पर सूर्यभान का गुस्सा शांत नही हुआ था। हम सब नीचे आये और एकाएक सूर्यभान वरूणा मे एकदम तीन चार कदम अंदर घुस कर वरूणा जल हाथ मे ले कर यह कसम खा बैठे कि आज से मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य वरूणा पुनरूद्धार व इसे पुनर्जीवित करना होगा।
      सूर्यभान के प्रण के साथ ही यह तय हुआ कि अब यह लड़ाई वैचारिक न होकर वास्तविक धरातल पर चलने चाहिये।
    इसी समय हमारी मुलाकात उदय प्रताप कालेज के तत्कालीन कृषि छात्र अशोक कुमार पाण्डेय व दिनेश सिंह के माध्यम से डॉ० कुलदीप सिंह जी से हुई। डॉ० कुलदीप सिंह यूपी कालेज मे असिस्टेंट प्रोफेसर है । उम्र मे हमसे छोटे कुलदीप भाई ने पूरा बात सुनते ही कहा कि भैया अपनो व जीवजन्तुओ के लिये तो सब बहुत करते है पर नदी तालाब पेड़ के लिये कुछ करना ज्यादा जरूरी है क्योकि ये हमे जीवन तत्व हमेसा देते है चलिये हम लोग श्रमदान करते है। दूसरो के लिये नही कम से कम हमे तो इस बात का संतोष रहेगा कि हमने अपने हिस्से का एक छोटा प्रयास वरूणा के लिये किया। और उसके अगले रविवार से वरूणा तट पर श्रमदान प्रारंभ हुआ।
                                                      (क्रमश:)
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