अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
शुक्रवार, 23 सितंबर 2022
व्योमवार्ता/एक बाप का फैसला
व्योमवार्ता/सिखाता नही कर के दिखाता हूं
व्योमवार्ता/हमारा भी एक जमाना था....
रविवार, 11 सितंबर 2022
#व्योमवार्ता : पिता का समाज व पुत्रों के नाम पत्र
रविवार, 7 अगस्त 2022
व्योमवार्ता/महान भारत के महान राष्ट्रपति डॉ0ए0पी0जे0अब्दुलकलाम
#समाज_जिसमे_हम_रहते_हैं.....
(श्री अब्दुल कलाम से महान राष्ट्रपति ना हुआ है,ना ही भविष्य में हो सकता है,उनकी सज्जनता एवम् महानता से जुड़ा एक संस्मरण भारत के राष्ट्रपति के पूर्व एडीसी ले0कर्नल अशोक_किनी के शब्दों मे)
राष्ट्रपति भवन में शंकराचार्य जी
राष्ट्रपति भवन में शंकराचार्य जी की यह पहली यात्रा थी। राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम शंकराचार्य जी को उचित सम्मान देना चाहते थे। उन्होंने मुझे (मैं राष्ट्रपति जी का ADC था) अपने कार्यालय में बुलाया और मुझसे पारंपरिक प्रोटोकॉल के बारे में पूछा। मैंने उनसे कहा, "मैं राष्ट्रपति भवन के द्वार पर शंकराचार्य जी का स्वागत करूंगा और उन्हें अंदर लाऊंगा।"
कुछ मिनटों के गहन सोच के बाद उन्होंने मुझसे पूछा, "क्या होगा यदि मैं स्वागत करूं? तो मैंने कहा, "श्रीमान, आप संत के सम्मान को राष्ट्रपति के #सम्मान से ऊपर कर देंगे।
वो मुस्कराए। उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा। फिर मैंने ऑफिस के अंदर उन्हें बताया, "सर, मैं उन्हें यहां लाऊंगा। उनकी मृगछाल इस सोफे पर बिछाऊंगा और उनसे बैठने का अनुरोध करूंगा। आप राष्ट्रपति जी अपने सोफे कुर्सी पर बैठे रहेंगे।"
उन्होंने फिर मुझसे दूसरी बार पूछा, "क्या होगा यदि मैं उन्हें अपने सोफे की सीट पर बैठा दूं?"
मैंने फिर कहा, "सर, आप संत को राष्ट्रपति से अधिक सम्मान देंगे।"
वह फिर मुस्कुराए और मुझे कोई आदेश नहीं दिया। तीस मिनट के बाद जब शंकराचार्य जी आने वाले थे तो कुछ सेकंड पहले मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब मैंने डॉ अब्दुल कलाम को गेट पर अपने पीछे खड़ा देखा। मैं तुरंत पीछे गया और डॉ. अब्दुल कलाम के पीछे खड़ा हो गया। वह वहां व्यक्तिगत रूप से एक माला और फूलों के साथ शंकराचार्य जी का #स्वागत करने के लिए खड़े थे। हमने शंकराचार्य जी का स्वागत किया। राष्ट्रपति भवन के गलियारों से गुजरते हुए हम सीधे कार्यालय में गए।
मैं आगंतुकों के लिए निश्चित सोफे पर शंकराचार्य जी की मृगछाल बिछा रहा था तो जिसकी हमने पहले चर्चा की थी। डॉ अब्दुल कलाम ने मुझे मृगछाल को अपने सोफे की कुर्सी पर बिछाने का निर्देश दिया। इस सरल, विनम्र और महान भाव से मैं स्तब्ध रह गया। हमने शंकराचार्य जी को फल और फूलों की टोकरी भेंट की।
भेंट के बाद मैंने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं चाहता था कि भारत के राष्ट्रपति की सोफा सीट को संत की आध्यात्मिक शक्ति का आशीर्वाद मिले ताकि जो कोई भी राष्ट्रपति बाद में यहां बैठे, उन्हें भी संतों का आशीर्वाद प्राप्त हो।"
मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु राष्ट्रपति कलाम के इन विचारों की प्रशंसा की और कहा
"सर, आप न केवल एक महान वैज्ञानिक हैं बल्कि इस वेष में एक संत भी हैं।"
हमेशा की तरह उन्होंने अपनी एक सार्थक मुस्कान दी।
क्या आप एक महान देश के राष्ट्रपति की इस तरह की सज्जनता की कल्पना कर सकते है,क्या सभी महान पुरषों में एवम् देश के बड़े लोगो में भी इतनी सज्जनता नहीं होनी चाहिए......शायद ऐसा नहीं है, हम सब को ही इस प्रकरण से कुछ ना कुछ अवश्य सीखना ही चाहिए!
(काशी,7अगस्त 2022,रविवार)
#व्योमवार्ता
#डा0ए0पी0जे0अब्दुलकलाम http://chitravansh.blogspot.com
शनिवार, 6 अगस्त 2022
व्योमवार्ता/यह भी जाने.......
गुरुवार, 4 अगस्त 2022
व्योमवार्ता/ भूली हुई यादें....
व्योमवार्ता/ भूली हुई यादें.....
रविवार, 24 जुलाई 2022
व्योमवार्ता / समाज जिसमें हम रहते है......
#समाज_जिसमे_हम_रहते_हैं.....
आज कल #सोशल_मीडिया पर #जीएसटी लगाने के समर्थन में एक पोस्ट चल रही है।
*जीएसटी से कैसे बचें
*सरकार को मत कोसिये.. बल्कि दिमाग से काम करिये और जीएसटी से बचिये।*
१.जब भी बाहर जाओ पानी की बोतल अपने साथ घर से लेकर जाओ... बाहर की शॉप से पैक बोतल नहीं खरीदों।
२.यात्रा के समय अपने साथ चावल या पुलाव ले जाओ, बाहर होटल या माल से खाना खाना बंद कीजिए।
३.जो भी घर की किचन का समान, सब्जी -भाजी खरीदनी हो घर के पास के छोटे दुकान वालों या रेहड़ी वालो से खरीदें,, सुपर मार्केट में जाना बंद कीजिए।
४.शनिवार-इतवार को बड़े मॉल में जाना बंद कीजिए, इसके बजाय अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के घर जाईये, आपसी सम्बन्ध मजबूत कीजिये।
५.बड़े बड़े मल्टीप्लेक्स inox, pvr जैसे सिनेमाघर के बजाए सिंगल स्क्रीन सिनेमा पर जाकर पिक्चर देखिए..उनपर GST नही है।
६.सुबह-शाम को व्यायाम के बाद घर पर आकर चाय-कॉफ़ी पीजिए..hotels पर नही।
७.अगर कही बाहर घूमने जाते भी है तो किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर ठहरिये... रिसॉर्ट्स/ होटल/लॉज में मत ठहरिए।
8- पैक दुध दही, छाँछ, खरीदने के वजाय तबैले से दुध ख़रीदे उसी से घर मे ही दही और छाछ बनाये!
9-कोई भी पैक अनाज न ख़रीदे अनाज खुल्ले भी मिलते है वो यूज़ करें!
*Government ने ये इसलिए किया है कि हम सब अपने पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को महत्व ज्यादा दे सकें!*
*सकारात्मक सोचिए, सकारात्मक सोच से आप कुछ भी बदल सकते हैं! जन हित में जारी!!*
कुछ लोग इसे #मोदी समर्थकों व #भाजपा #आईटी_सेल का पैंतरा बता रहे है तो कुछ लोग मुखर #आलोचना कर रहे हैं। परंतु आलोचना व #समर्थन से परे हो कर इस पोस्ट के #तर्कों से होने वाले प्रभाव को देखा जाये तो कहीं न कहीं वह #भारतीय #अर्थव्यवस्था के #सादे_जीवन_उच्च_विचार के निकट ले जाता है।
आज के #भौतिकवादी व्यवस्था मे #बाजार के हमारे जीवन के प्रत्येक क्षणों मे #घुसपैठ को देखते हुये निश्चित ही इसे पूर्णत: व्यवहारिक होने की कल्पना करना भी बेमानी है पर अगर इन तर्कों को व्यवहारिक जीवन मे अपना कर जीवन मे थोड़ा सा ही सही पर संतोष और सुख पाया जा सकता है तो अपनाने में क्या बुराई है?
(काशी, 24जुलाई 2022, रविवार)
#व्योमवार्ता
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मंगलवार, 19 जुलाई 2022
व्योमवार्ता/ समाज जिसमें हम रहते है.....
व्योमवार्ता/ समाज जिसमे हम रहते है....
व्योमवार्ता/ समाज जिसमे हम रहते है....
#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं
*रिटायरमेंट के बाद का दर्द*
छत्तीसगढ़ के शहर कोरबा में बसे नेहरू नगर में एक आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान-परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। *एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था - मैं रायपुर में इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो बिलासपुर में बसना चाहिए था- और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया* - आपने कभी *फ्यूज बल्ब* देखे हैं? बल्ब के *फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है कि बल्ब किस कम्पनी का बना हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी?* बल्ब के फ्यूज़ होने के बाद इनमें से कोई भी बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है। लोग ऐसे *बल्ब को कबाड़ में डाल देते हैं है कि नहीं! फिर जब उन रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति में सिर हिलाया* तो बुजुर्ग फिर बोले - रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो जाती है। हम कहां काम करते थे, कितने बड़े/छोटे पद पर थे, हमारा क्या रुतबा था, यह सब कुछ भी कोई मायने नहीं रखता। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने ठाकुर जी बैठे हैं, एस .सी .सी.एल .के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे मरकाम साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो देवांगन.. जी इसरो में चीफ थे। *ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब - करीब एक जैसे ही हो जाते हैं*, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं तो कोई उपयोगिता नहीं। *उगते सूर्य को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं करता।* कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते हैं कि *रिटायरमेंट के बाद भी उनसे अपने अच्छे दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे नेम प्लेट लगाते हैं - रिटायर्ड आइएएस/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज आदि - आदि। अब ये रिटायर्ड IAS/IPS/PCS/तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/डाक्टर / अध्यापक.. कौन.. कौन-सी पोस्ट होती है भाई?माना कि आप बहुत बड़े आफिसर थे, *बहुत काबिल भी थे, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती थी पर अब क्या? अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि मायने रखती है कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे थे...आपने कितनी जिन्दगी को छुआ... *आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी...समाज को क्या दिया,जाति बन्धुओं के कितने काम आएं* लोगों की मदद की..या सिर्फ घमंड मे ही सूजे हुए रहे. .पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन
..............सबको फ्यूज होना है।
(काशी 19जुलाई 2022, मंगलवार)
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गुरुवार, 7 जुलाई 2022
जरा याद करो कुर्बानी......
मंगलवार, 28 जून 2022
व्योम वार्ता / वे चिट्ठीयां.........
गुरुवार, 16 जून 2022
व्योमवार्ता/ आखिर अंतर फिर भी रह ही गया....
गुरुवार, 21 अप्रैल 2022
व्योमवार्ता/कायस्थों का खान-पान : व्योमेश चित्रवंश की डायरी
शनिवार, 19 मार्च 2022
चटगांव बंगाल हिंदू एनक्लेव : एक संभावना.......(कैप्टन आर विक्रम सिंह के कलम से)
शुक्रवार, 18 मार्च 2022
व्योमवार्ता /काँन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझे..
बुधवार, 16 मार्च 2022
व्योमवार्ता : काश्मीर फाईल्स के बहाने.......
गुरुवार, 16 दिसंबर 2021
काशी विश्वनाथधाम का स्थापना संघर्ष
शुक्रवार, 5 नवंबर 2021
व्योमवार्ता/आज के दीवाली का सच
बुधवार, 15 सितंबर 2021
व्योमवार्ता/ श्रीमद्भागवदगीता का व्यवहारिक पक्ष
सोमवार, 13 सितंबर 2021
व्योमवार्ता/धरती के भगवान (भाग-8)
व्योमवार्ता/धरती के भगवान (भाग-8) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13सितंबर2021
आज चर्चा उन चिकित्सकों की जो आज भी चिकित्सा धर्म के प्रति अपने समर्पण से वास्तव मे धरती के भगवान कहे जा सकते हैं। ये नव दधिचि बिना प्रचार प्रसार के अपने मरीजों की सेवा करते हुये हिप्पोक्रित्ज के शपथ को आज भी अपने जीवनर्या मे शामिल किये हैं। ऐसे ही एक युवा और समर्पित चिकित्सक है काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान मे मेडिसिन के प्रोफेसर डा० दीपक गौतम। डा० दीपक मेडिसिन विभाग के लगभग सभी ओपीडी मे अपनी सेवा दे चुके है चाहे वह किशोर चिकित्सा हो या जरायु चिकित्सा या माडर्न जनरल मेडिसिन, पर हर विभाग से दूसरे विभाग मे जाने के बाद भी उनके पुराने मरीजों की फेहरिस्त उनसे जुड़ी ही रहती है। डा० गौतम के बार बार विभाग बदलने के पीछे संस्थान की अंदरूनी राजनीति भी हो सकती है पर इससे उनके चिकित्सा धर्म पर कोई साईड इफेक्ट नही पड़ता। अपने चैम्बर मे भीड़ भरे पर तनाव मुक्त माहौल मे सबसे मुस्करा कर सबकी समस्यायें सुनते सबको सामान्य भाव से सबको समझाते रहते है। कोई तनाव नही कोई उलझन नही चेहरे पर एक आत्मसंतोष व मन मे सेवा भाव ही सामने बैठे मरीज के मन मे आत्मविश्वास भर देता है।
डॉ०दीपक गौतम के सेवा भाव का कायल मै पांच साल पहले हुआ। मेरी माँ के पाटस्पाईन के सर्जरी के बाद उन्हे मेडिसिन वार्ड मे भरती करना पड़ा था। डा० दीपक गौतम जी के देखरेख मे उन्हे प्राईवेट वार्ड मे भरती कराया गया। जो लोग बीएचयू हास्पीटल से परिचित होगें उन्हे मालूम होगा कि सर सुन्दर लाल अस्पताल का प्राईवेट वार्ड अस्पताल के बिलकुल किनारे है ठीक आईएमएस के सामने। मेडिसिन वार्ड से प्राईवेट वार्ड की अच्छी खासी दूरी। मिलने वाले और परिचितजन पूछते थे कि यहां प्राईवेट वार्ड मे क्यों भरती करा दिये यहां तो डाक्टर आते ही नही है।वार्ड से ही चले जाते है। यह सुन कर हम भी पहले दिन काफी परेशान हुये पर यह परेशानी मेरे लिये मात्र इसलिये नही खड़ी हुई क्योंकि मेरी माँ की चिकित्सा डॉ०दीपक गौतम कर रहे थे। दिन भर मे कम से कम चार बार स्वयं आने और हर दो घंटे पर अपने रेजिडेंट डाक्टरों को भेजने मे उनसे किसी दिन कोताही या लापरवाही हुई हो याद नही। ऐसा नही ये सिर्फ मेरी माँ के साथ हुआ हो बल्कि अपने हर मरीज के बारे मे उनकी जिम्मेदारी और फीडबैक लेना डा० दीपक गौतम का स्वभाव है।
मॉ के डिस्चार्ज होने के दो महीने के बाद एक बार उनकी रिपोर्ट लेकर डा० दीपक गौतम जी को दिखाना था। मै कचहरी से होकर अपने मित्र सूर्यभान जी के साथ समय से निकलने के बावजूद शहर के जाम मे उलझ कर जब तक उनके ओपीडी पहुंचा। ओपीडी बंद हो चुके काफी देर चुकी थी और वे निकल चुके थे। मैने उनके मोबाइल नंबर पर एक बार संपर्क करने का प्रयास यह सोच कर किया कि संभवतः संस्थान मे मिल जायें तो मुझे फिर से पूरे शहर का चक्कर काट कर आना नही पड़ेगा। मोबाइल मिलते ही उन्होने बताया कि वे तो आवास पर पहुँच चुके है। मैने कोई बात नही कहते हुये फोन काट दिया। तभी पुन: उनका कालबैक आया "आप कहां पर है और कहां जाना है? " मेरे बताने पर कि अब हास्पीटल से निकल रहा हूँ, उन्होने पूछा कि "किधर से आप जायेगें।आप बृजइंक्लेव मेरे आवास पर आ सकते है तो आपको दूबारा नही आना होगा।" आश्चर्य यह कि तब तक मै उनके लिये एक अननोन नंबर ही था, जिसे वे शायद पहचानते भी नही थे। जब मै उनके बताये लेन मे बृजइंक्लेव पहुंचा तो वे लेन मे खड़े मेरा इंतजार कर रहे थे।उन्होने न सिर्फ रिपोर्ट देख कर दवाओं मे परिवर्तन किया बल्कि घर मे अकेले रहने होने के बावजूद स्वयं चाय बना कर भी हम लोगों को पिलाये।मेरे धन्यवाद देने पर वे और विनम्र हो गये, "अरे ये तो मेरा काम ही है। आपको केवल इसके लिये दूबारा इतनी दूर से आना पड़ता। "
रास्ते मे लौटते समय हम और सूर्यभान जी यही बात कर रहे थे कि आज के चिकित्सा स्वार्थ के धंधे मे यह चिकित्सा धर्म बिरले ही देखने को मिलता है।ऐसा अनुभव मात्र हमारे साथ ही नही औरों के साथ भी हुआ है। जो भी डा० दीपक गौतम के यहां गया उनका कायल बन कर ही लौटा। यहीं कारण है कि उनके मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है और अपने मरीजों की सेवा मे ही अपना सुख पाने वाले डॉ०दीपक गौतम के प्रशंसको का सूकून भी।
आज भी ऐसे ही डाक्टरों से चिकित्सा धर्म की प्रतिष्ठा बनी हुई है जो आधुनिक दधिचि, चरक और सुश्रुत के रूप मे सेवा भाव मे लगे हुये है। धन्यवाद #डॉ०दीपक_गौतम।
#धरती_के_भगवान
#व्योमवार्ता
#मानवगिद्ध
काशी, 13सितंबर 2021,सोमवार