गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

जरा झॉकिये इन ऑखों मे गौर से : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28अप्रैल 2016, गुरूवार

  28 अप्रैल 2016, गुरूवार


जरा झॉकिये इन ऑखों मे गौर से 

इस 42 से 48 डिग्री तापमान में सड़कें जल रहीं..गर्म हवा और लूह से हाल बेहाल है.
वहीं कुछ लोग हैं जो बिना धूप-छाँव की परवाह किये सड़क पर अपने काम में लगे हैं... धूप में जल रहे हैं...कन्धे पर फटा गमछा..और पैरों में टूटी चप्पल पहने धीरे से पूछ रहे.."कहाँ चलना है भइया..आईपी मॉल."?
आइये तीस रुपया ही दिजियेगा।"
इसी बीच कोई आईफोन धारी आता है अपने ब्युटीफुल गरलफ्रेंड के साथ..और अकड़ के कहता है.."अरे..हम जनवरी में आये थे तब बीस रुपया दिए थे बे....कइसे तीस रुपया होगा"
चलो पच्चीस लेना"
गर्लफ्रेंड मुस्कराती है..मानों उनके ब्वायफ़्रेंड जी ने 5 रुपया नहीं 5 करोड़ डूबने से बचा लिया हो..वो हाथ पकड़ के रिक्शे पर बैठतीं हैं..और बहुत ही प्राउड फील करती हैं...
यही ब्वायफ़्रेंड जी जब केएफसी ,मैकडोनाल्ड और पिज़्ज़ा हट में उसी गर्लफ्रेंड के साथ कोल्ड काफी पीने जाते हैं.तो बैरा को 50 रुपया एक्स्ट्रा देकर चले आते हैं..
वही गर्लफ्रेंड जी अपने बवायफ्रेंड जी की इस उदारता पर मुग्ध हो जातीं हैं...वाह..कितना इंटेलिजेंट हैं न.
इस गर्मी में कई बार ये सब सोचकर मैं असहिष्णु होने लगता हूँ..
आदमी कितनी बारीक चीजें इग्नोर कर देता है..जाहिर सी बात है की जो बैरा को पचास दे सकता है..वो किसी गरीब बुजुर्ग रिक्शे वाले को दस रुपया अधिक भी तो दे सकता है..
लेकिन सामन्यतया आदमी का स्वभाव इतना लचीला नहीं हो पाता..
क्योंकि अपने आप को दूसरे की जगह रखकर किसी चीज को देखने की कला हमें कभी नहीँ सिखाई गयी।
और आज सलेक्टिव संवेदनशीलता के दौर में ये सब सोचने की फुर्सत किसे है.
कई बातें हैं...बस यही कहूंगा की..इस प्रचण्ड गर्मी में रिक्शे वालों से ज्यादा मोल भाव मत करिये..
जब बैरा को पचास देने से आप गरीब नहीं होते तो रिक्शे वाले को पांच रुपया अधिक देने से आप गरीब नहीं हो जायेंगे..
हो सकता है..आपके इस पैसे से वो आज अपनी चार साल की बेटी के लिये चॉकलेट लेकर जाए...तब बाप-बेटी की ख़ुशी देखने लायक होगी न। कल्पना करियेगा जरा।
जरा सडक़ों पर आइए..एक दिन पेप्सी कोक मत पीजिये...मत जाइये.केएफसी,मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट।
देखिये न कोई गाजीपुर का लल्लन,कोई बलिया का मुनेसर, कोई सीवान का खेदन..अपना घर-दुआर छोड़ बेल का शरबत, दही की लस्सी,आम का पन्ना, और सतुई बेच रहा है..एक सेल्फ़ी उस लस्सी वाले के साथ भी तो लिजिये।
जरा झांकिए इनकी आँखों में एक बार गौर से...
इसके पीछे..इनकी माँ बहन बेटा बेटी की हजारों उम्मीदें आपको उम्मीद से घूरती मिलेंगी..
केएफसी कोक और मैकडोनाल्ड का पैसा पता न कहाँ जाता होगा.. लेकिन आपके इस बीस रुपया के लस्सी से.और दस रुपया के बेल के शरबत से .5 रुपये के नींबू पानी से किसी खेदन का तीन साल का बबलुआ इस साल पहली बार स्कूल जाएगा.
किसी मुनेसर के बहन की अगले लगन में शादी होगी.
किसी खेदन की मेहरारू कई साल बाद अपने लिए नया पायल खरीदेगी..
क्या है की हम आज तक लेने का ही सुख जान पाएं हैं..खाने का ही सुख महसूस कर पाये हैं.
लेकिन इतना जानिये की लेने से ज्यादा देने में आनंद है।
खाने से ज्यादा खिलाने में सुख है।
इतनी गर्मी में इतनी सी संवेदना बची रहे..
हम इन्सान बने रहेंगे।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

बैंक का एक कटु अनुभव : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22अप्रैल 2016, शुक्रवार

22 अप्रैल 2016, शुक्रवार
बैंक का एक कटु अनुभव
          आज एक परिचित के साथ काशी गोमती संयुक्त ग्रामीण बैंक मीरापुर बसहीं शाखा, वाराणसी मे जाना हुआ। परिचित को कुछ पैसा निकालना था ताकि वे अपने बच्चो की फीस समय से जमा कर सकें। मुश्किल यह था कि नये सरकारी नियमो के अनुसार इस सप्ताह  में केवल दो दिन बैंक खुले थे। पहले महावीर जयन्ती फिर हजरल अली जयन्ती और चौथा शनिवार। बैंक मे भीड़ ठसाठस भरी थी और काउंटर पर बैठी दो महिला कर्मचारियो मे से एक तो हर बात पर दूसरी वाली मैडम से इंस्ट्रक्शन ले कर काम कर रही थी, शायद नई रही हो। पर दूसरी मैडम ग्राहको को भी लगातार तेज तेज आवाज मे इंस्ट्रक्शन ही दे रही थी। उनके लहजे मे व्यवसायिकता के बजाय डिक्टेटरशिप ज्यादा थी। बेचारी एक अधेड़ महिला ग्राहक ने अपने बारी की स्थिति जानने की कोशिस क्या किया, मैडम जी आपे से बाहर । अब वो बेचारी अधेड़ महिला यह जान ही नही पा रही थी कि उन्होने ऐसी क्या गलती कर दिया जिसके लिये उनकी पोती की उम्र की मैडम जी उन पर भड़क रही है? मुझसे आदतन नही रहा गया तो मैने पूछ ही लिया कि आखिर इस बात को सम्मानित व सांस्कारिक लहजे मे भी  कहा जा सकता है और यह शाखा अगर हैवी टर्नओवर की बैक ब्रॉच मानी जाती है तो उसमे कही हम ग्राहको का योगदान है। आप का होना हमारी मजबूरी नही है बल्कि ध्यान रखिये कि हमारा यहॉ न होना आपके लिये समस्या बन सकती है। मैडम जी ने पहले एक्सरे वाले निगाहो से हमे घूरा फिर पूछा आप बताइये आप क्यो खड़े है हम आपका काम कर देते है?
         मेरे यह बताने पर कि हम तो इस शाखा के ग्राहक ही नही बस परिचित के साथ आ गये है, मैडम जी की निगाहे मुझ पर उपेक्षित जैसे हो गयी। मुँह से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनकी नजरो मे हमे खुद के प्रति वितृष्णा साफ नजर आयी, "जाने कहॉ कहॉ से आ जाते है" वाली। और वे अपनी सीट छोड़ कर कैश केबिन मे बैठी अपनी सहकर्मी के पास जा बैठी। विलंब होने के कारण मेरे परिचित ने कहा कि चलिये अब शाम को देखेगें। कुछ जरूरी काम निपटा के हम लोग वापस ३.२५ पर वापस आये तो बैंक के शटर मे ताला लगा था, खटखटाने पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने अंदर वाले शीसे के दरवाजे से हमे झॉका और बताया कि अब सोमवार को आइये, बैंक बंद हो चुका है। हमने दरियाफ्त किया कि अभी तो ३.२५ हो रहे है । कामकाज तो ३.३० तक लिखा हुआ है। चतुर्थ श्रेणी महोदय ने बेहद रूखेपन से जबाब दिया कि हम बैंक अपनी घड़ी से खोलते बंद करते है, आपकी घड़ी से नही। हमारी घड़ी मे साढ़े तीन बज गया है।
       अब हमारे पास कोई उत्तर ही नही था उन माननीय के जबाब का? परिचित बोले चलिये चला जाय, यहॉ ऐसी ही व्यवस्था चलती रहती है। मुझे किसी बैंक मे ही देखे महात्मा गॉधी के प्रचार वाली होर्डिंग याद आ रही थी कि ग्रहक हमारे लिये भगवान है ,अब अगर ऐसा व्यवहार बैंक कर्मियों का ग्राहक के प्रति है  तो ये क्या कहा जायेगा।
सारे प्रकरण को दूसरे नजरिये से भी देखते है। मीरापुर बसहीं शाखा अरेक्षाकृत दूसरी शाखाओ से ज्यादा भीड़भाड़ वाली शाखा है जहॉ अधिकतर कर्मचारी महिला है, छुट्टीयॉ के बाद बैंक खुलने से ग्राहको का थोड़ा दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। आजकल के गर्मी के हालात मे चिढचिढाहट भी स्वाभाविक है पर क्या कुर्सी पर बैठ जाने के बाद हमारे अंदर की इतनी आदमियत भी नही रहनी चाहिये कि सामने खड़े अपने सम्मानित ग्राहक के उम्र व मजबूरी का भी लिहाज न करें? यह एक सोचनीय सवाल है।
आजकल बैंक वाले कहते है कि आप एटीएम कार्ड ले लो। पर क्या सभी  समस्यायो का जबाब सिर्फ एटीएम कार्ड है । मेरी व्यक्तिगत जानकारी मे अब तक जितने भी धोखाधड़ी की घटनाये एटीएम कार्ड के द्वारा हुई उनमे आज तक किसी भी जालसाज या अपराधी को नही पकड़ा जा सका। और तो और बैंक भी इस जालसाजी को पकड़ने मे कोई सकारात्मक रूख नही दिखाता। औरो की बात जाने दें मेरे पास कम से कम तीन चार बार फोन के द्वारा मेरा एटीएम पिन जानने के लिये फोन आये, हर बार मैने अपने बैंक को, पुलिस को और फेसबुक के पोस्ट के माध्यम से लोगो को उक्त फोन नंबर की व सारी घटना की जानकारी दिया पर न तो कभी बैंक ने न ही पुलिस ने उन नंबरो के छानबीन का प्रयास व कार्यवाही किया।
  जहॉ तक छुट्टीयों की हालत है बैंक अब उत्तर प्रदेश सरकार के परिषदीय विद्यालय जैसे हो गये हैं, हर छोटी छोटी बात पर छुट्टीयॉ । हर दूसरे व चौथे शनिवार की बंदी का औचित्य अभी तक हम नही समझ सके। अगर यही छुट्टीयॉ दूसरे शनिवार के बजाय पहले या तीसरे को होती तो दूसरे शनिवार को बंदी की सुविधा प्राप्त करने वाले ढेरो राजकीय कर्मचारी, अधिवक्ता एव अन्य लोग बैंक मे अपने कामकाज को उस दिन कर लेते लिहाजा तीसरे सोमवार को बैंक पर पड़ने वाला दबाव निश्चित ही थोड़ी कम होता।
पर हमारे देश मे नियमो को लागू करने से पूर्व कभी भी उनका व्यवहारिक औचित्य समझने का प्रयास ही नही किया जाता। परिणाम भीड़ व अव्यवस्था सिर्फ बैंक ही नही और जगह भी दिखती है। इसीलिये यहॉ दादी मॉ की उम्र की महिला अपने तीसरी पीढ़ी के उम्र वाली कर्मचारी से अनायास की डॉट खाती है और मुस्तंडा जैसा नवयुवक अपने संबंधो का अनुचित लाभ उठाते हुये काउंटर के अंदर बैठ अपना काम आसानी से करा लेता है व दूसरो के काम को प्रभावित करता है।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

हमारी वरूणा अभियान, एक आवाज दिल मे उठी थी कभी (१) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08मई 2016, रविवार

                     वो शायद सन२००३ का रक्षा बंधन था, जब मै अपनी पौने चार साल की बिटिया को लेकरअपने चाचा जी के मकान पर मानस नगर दुर्गाकुण्ड जा रहा था.बाईक पर उसे नींद ना आये  इसलिये उससे बाते भी करता जा रहा था, वह बचपन से बेहद जिग्यासु व बातूनी होने के साथ किसी भी विषय के बारे मे ढेर सारे सवाल पूछना उसकी आदत रही है, मैने उसे वरूणा पुल से गुजरते हुये वाराणसी के नामकरण के बारे मे बताया तो उसने  वाराणसी नाम के दूसरे भाग अस्सी नदी के बारे मे पूछा, इसलिये मै उसे दिखाने के गरजसे दुर्गाकुण्ड से अपनी बाईक अस्सी लंका वाले रास्ते पर पुराने पुल की ओर बढ़ा दिया, तब रविन्द्रपुरी पुल नही बना था. वहॉ जा के मैने बेटी को बीएचयू मे पढ़ने के दौरान रोज आने जाने का रास्ता व अस्सी नदी दिखाया, अस्सी  नदी उसी समय धीरे धीरे नाले से नाली का रूप लेने लगी थी, बिटिया को पुल के नीचे दूर दूर तक नदी के बजाय नाली दिखने पर जिग्यासा होना स्वाभाविक था, उसने पलटते ही मुझसे सवाल किया कि लेकिन यहॉ नदी कहॉ है? उसके सवाल के जबाब मे जब मैने कनु के बाल मन को बताया कि अगल बगल रहने वालो ने नदी पाट कर उसे समाप्त कर दिया, आदतन दूसरा सवाल हाजिर था कि जब नदी पाटी जा रही थी तो आप लोगो ने उसे रोका क्यों नही ? बात उस समय आयी गयी हो गई, कार्यक्रम से लौटते समय वरूणा पुल पर कनु का एक दूसरा सवाल कि" वरूणा को कब पाटा जायेगा?'' बेहद मासूमियत से पूछे गये इन दोनो सवालो का जबाब मेरे पास वाकई नही था. लेकिन इन दोनो बेहद मासूम सवालो ने मुझे झकझोर डाला. कई कई राते ये दोनो सवाल मुझे परेशान करते रहे. बहुत सोच विचार कर मैने अपने दिल की बात और विचारो को अपने मित्र सूर्यभान सिंह के साथ बॉटा. फिर हम दोनो मित्रो की शाामे वहीं वरूणाकिनारे शास्त्री घाट पर बितने लगी. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री बनारस के सपूत  स्व० लाल  बहादुर शास्त्री के नाम पर नया नया शास्त्री घाट बना था, उक्त  घाट को बनवाने मे तत्कालीन मंत्री व क्षेत्रीय विधायक वीरेन्द्र सिंह  जी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.वीरेन्द्र सिंह के प्रयासो से ही घाट पर वरूणा महोत्सव की शुरूआत हुई थी . जिसके दो आयोजन हो चुके थे. हम दोनो  लोग नये विचार करते और उनके कार्यान्यवन के संभावनाओ पर सोचते . सबसे पहले वरूणा को जानने व समझने की बात उठी, फिर हम लोगो ने बाईक उठाया और वरूणा की भौगोलिक रचना समझने के लिये हम लोग फूलपुर इलाहाबाद वरूणा ताल तक गये.वहॉ फैले विशाल पर लगभग तीन चौधाई से अधिक सूख चुका वरूणा ताल काे देख कर लगा कि किसी तरह हमने प्राकृतिक अविरल व संचरण व्यवस्था मे हस्तक्षेप कर अपनी खुद की समस्यायो बढ़ा रखा है। बाईक से वरूणा के संग यात्रा के दौरान हमने यह महसूस किया कि इस तरह वरूणा किनारे सड़को पर चलने से हम अपने उद्देश्य के प्रतिष्ठित सही न्याय नही कर पायेगें लिहाजा यह तय हुआकि वरूणा तट पर पदयात्रा कर के ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठी करनी पड़ेगी। मित्र सूर्यभान जी  की लंबी टॉगो ने यह काम बखूबी से किया । हम लोगो के पास सूर्यभान जी के दो बार के पदयात्रा के बाद वरूणा के संबध मे काफी व्यवहारिक जानकारियॉ थी। वरूणा की पीड़ा, उसके तटवासियो की पीड़ा, समस्या व उसकी संभावित समाधान की एक सूची थी।  पर  समस्या यह था कि इन व्यवहारिक समाघान को किसी तरह धरातल पर लाया जाय। क्योकि हम लोगो के पास न तो सामर्थ्य था न ही अधिकार ।
कुछ और मित्रों को हम लोगो ने अपने सरकारो मे शामिल किया तो उनके इनुभव, संबंधो व विचारो का लाभ मिलने के साथ ही हमारे सामर्थ्य का विस्तार हुआ।तय हुआ कि वरूणा के भौगोलिक अध्ययन के साथ वरूणा का सांस्कृतिकर्मी पौराणिक व ऐतहासिक महत्व व वानस्पतिक प्रभाव के साथ पारिस्थितिकी अध्ययन भी किया जाये।
अगली रणनीति इस संबंध मे बनने लगी ।

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

बड़े शहरो मे रोजगार व बच्चों से दूर होते बृद्धजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16 अप्रैल 2016 शनिवार


16 अप्रैल 2016, शनिवार।

बड़े शहरो मे रोजगार व बच्चों से दूर होते बृद्धजन

एक प्रयास ईमानदारी से हो तो हमारी काफी कुछ समस्याये दूर हो सकती है।  कल हम लोगों के बुजुर्गवार सुरेन्दर चाचा जी से बातचीत हो रही थी। उन्होने पूछा कि ठीक है बनारस मे सिक्स लेन रोड, इंटरनल रिंगरोड, एक्सटर्नल रिंगरोड, मेट्रो रेल, इंटरनेशनल हाईक्लास हवाईअड्डा बन रहा है , अच्छी बात है पर इससे आमजन को क्या फायदा होगा? नौजवान इन यातायात माध्यमो का उपयोग दिल्ली बंगलोर हैदराबाद पूणे जैसे इम्लायमेंट हब शहरो मे आने जाने के लिये करेगें पर इस शहर का आम बनारसी (जो बच्चे को पाल पोस इसलिये रहा है कि वे बुढ़ापे मे उसके साथ रहेगें) किस लाभ मे रहेगा? बनारस मे रहने वाले लोगो की हालत उस गॉव के लोगो जैसी होती जा रही है जहॉ के लोग शहरीकरण के भुलावे मे अड़ोस पड़ोस के शहरो की ओर भाग रहे हैं। और बनारस जैसे शहर के लोग इन इम्लायमेंट हबसिटी की ओर। वहॉ के लोग अमेरिका इंगलैण्ड आष्ट्रेलिया। यह क्रम आगे भी चलता रहता दिख रहा है।
सुरेन्द्र चाचा जी उद्योग विभाग से अवकासप्राप्ति के पश्चात बनारस मे ही रहते हैं। दोनो बेटियॉ दिल्ली मे तो  बेटा इनके साथ ही बनारस में। बेटा हनी भी बेहद सांस्कारिक व सभ्य। फिलहाल खाली। इसलिये नही कि उसमे योग्यता की कमी है, बल्कि इसलिये कि बनारस शहर ने अभी उसे उपयुक्त अवसर नही दिया है। हनी का ड्रीमप्रोजेक्ट पाईपलाईन मे है और उसके प्रयासो से शीघ्र ही साकार होगा।
लगे हाथ बात कल की भी ।अखबार मे एक खबर थी कि समाज मे बृद्धजन की संख्या बढ़ी है पर परिवार के साथ रहने वाले बुजुर्गों की संख्या मे गिरावट आयी है। देखा जाय तो दोनो समस्यायो के मूल एक ही जगह से जुड़े है। एक पढ़ा लिखा नौजवान बेहद बुझे मन से अपने शहर, अपने मॉ बाप, दोस्तो को छोड़ कर बड़े शहर मे धक्के खाने, संघर्ष करने, कदम दर कदम धोखा खा के भी खुद की पहचान बनाने इस लिये जाने को मजबूर होता है क्योकि उसे अपने बेहद अपने शहर मे रोजगार के लिये कोई मौका ही नही मिलता। अब औरों की देखादेखी नये शहर मे एक संघर्ष के बाद वह लोन ईएमआई पर दो या तीन कमरे का फ्लैट, एसी गाड़ी, अच्छी ब्रांडेड लाईफ स्टाईल , ऱिसार्ट मे छुट्टीयॉ, एयर टिकट, ट्रेन मे प्रीमियम क्लास या एसी क्लास जौसी सुविधाये तो पाता है पर इस परफ्यूम्ड व कलर्ड लाईफस्टाईल के लिये जिन अंधियारे को वह ढँकते तोपते है वह उनकी मजबूरी भी है और बहाना भी। नतीजा बीपी सुगर कैलोस्ट्राल थायराईड हाईपरटेन्सन और इन सब का परिणाम अल्पायु।
बहरहाल मुद्दे से न भटकते हुये बात सुरेन्द्र चाचाजी के सुझाव की। उनका मानना है कि यदि सरकार छोटे छोटे शहरों मे रोजगार के बेहतरी के लिये इंतजाम करें तो बच्चो को अपने बूढ़े मॉ बाप को छोड़ कर जाने की जरूरत ही क्या है? बात को स्थानीय स्तर पर व्यवहारिक रूप से देखते है पिछले बीस पचीस वर्षो से बनारस व आसपास जैसे शहर मे कोई कल कारखाना नही लगाया गया बल्कि जो कल कारखाने थे उन्हे भी बंद कर दिया गया। औराई चीनी मिल, कालीन कारखाने, बनारसी साड़ी बुनकरी, कंक्रीट स्लीपर कारखाना खालिसपुर, खिलौना उद्योग, एशिया साइकिल कारखाना , शंकरगढ़ सीसा कारखाना, चावल मिल , कुकिंग कोल कारखाना एक के बाद एक बंद होते गये। मजदूर, बुनकर, वर्कर बेरोजगार होते गये। आज बनारस व आसपास के युवको के पास मार्केटिंग व ईंस्योरेंस के अलावा कोई काम ही नही है ऐसे मे उनकी मजबूरी है कि वे अपने रोजी रोटी के लिये बड़े शहरो का रूख करते है।
अगर सरकार मनरेगा, पीएमआरवाई जैसे घोटालों से भरपूर व बेहद खर्चिली योजनाओ के बजाय प्रतिवर्ष एक विधानसभा क्षेत्र मे २ से ५ हजार लोगो को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली क्षेत्रिय जरूरत व संसाधनो पर एक कारखाना लगाये तो प्रतिवर्ष लगभग १० से २५ हजार लोगो की आजीविका आराम से चलायी जा सकेगी और शहरो की तरफ पलायन रूकेगा।
बड़ा सवाल यह है क्या हमारी सरकार ईमानदारी से इस दिशा मे कोई कदम उठाने को इच्छुक होगी?

चैत्र नही बल्कि चित्रमास : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16 अप्रैल 2016, शनिवार

16अप्रैल 2016, शनिवार
चैत्र नही बल्कि चित्रमास

यह मास चित्रमास है जो अपभ्रंश होकर चैत्रमास हो गया है| यह मास चित्रगुप्तजी के नाम से है| इसी चित्रमास के पूर्णिमा को चित्र (चित्रा) नक्षत्र में ब्रह्माजी जी द्वारा 11000 साल की तपस्या करने के उपरांत उनकी काया से श्री चित्रगुप्तजी भगवान मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में उज्जैन की क्षिप्रा नदी के तट पर प्रकट हुए थे| उज्जैन में ही काफी पौराणिक चित्रगुप्त मंदिर भी है, जहाँ प्रसाद के रूप में कलम, दवात चढ़ाया जाता है जिससे प्रसन्न होकर श्री चित्रगुप्त भगवान अपने भक्तो को मनवांछित फल प्रदान करते है| साथ ही कायस्थ के चार तीर्थो में उज्जैनी नगरी में बसा श्री चित्रगुप्त भगवान का ये मंदिर पहले नंबर पर आता है|

"""""चित्रमास की पूर्णिमा चित्र पूर्णिमा अर्थात् चित्रगुप्त पूर्णिमा कही जाती है|"""""

चित्रगुप्त पूर्णिमा से ही उज्जैन में महाकुम्भ प्रारम्भ हो रहा है| कांचीपुरम् चेन्नई में चित्रगुप्तजी का प्राचीन मंदिर है| पूरे दक्षिण भारत में 21 अप्रैल चित्र पूर्णिमा के दिन को चित्रगुप्तजी का प्रकटोत्सव के रूप में मनाया जाता है और चित्र पूर्णिमा से वैशाख पूर्णिमा तक यम नियम का पालन किया जाता है| इस मास में केतु ग्रह की शान्ति करायी जाती है क्योंकि केतु ग्रह के अधिदेवता चित्रगुप्तजी हैं| इस पूरे मास को चित्रगुप्तजी के नाम से ही चितरई मास कहा जाता है|

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

सोचियेगा जरूर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 अप्रैल 2016, शुक्रवार

सोचियेगा जरूर।

ये पढ़ना जरूरी है और पढ़ाना भी..........

कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया.
करीब 7 बजे होंगे,
शाम को मोबाइल बजा ।
उठाया तो उधर से रोने की आवाज़....
मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?
उधर से आवाज़ आई..
आप कहाँ हैं और कितनी देर में आ सकते हैं ?
मैंने कहा:-"आप परेशानी बताइये..!"
और "भाई साहब कहाँ हैं...?माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन
उधर से केवल एक रट कि आप आ जाइए, मैंने आश्वाशन दिया कि कम से कम एक घंटा लगेगा.जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा.
देखा तो भाई साहब (हमारे मित्र जो जज हैं) सामने बैठे हुए हैं.
भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं,13 साल का बेटा भी परेशान है. 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है.
मैंने भाई साहब से पूछा
कि आखिर क्या बात है.
भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे.
फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार कराके लाये हैं, मुझे तलाक देना चाहते हैं,
मैंने पूछा -ये कैसे हो सकता है. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है.
लेकिन मैंने बच्चों से पूछा दादी किधर हैं,
बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है.
मैंने घर के नौकर से कहा
मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ,
कुछ देर में चाय आई. भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं पिलाने की.
लेकिन उन्होंने नहीं पिया. और कुछ ही देर में वो एक मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे. बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ.
पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली. कि मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती. ना तो ये उनसे बात करती थी
और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी. नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे.
माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे.
मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की.
जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी. दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ . लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं.
उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ. पिछले 3 दिनों से मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ, जो उसने केवल मेरे लिए उठाये.
मुझे आज भी याद है जब..
मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती.
एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था. उसका शरीर गर्म था, तप रहा था. मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है.
लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया. मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए. कहते-कहते रोने लगे..
और बोले--जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे. हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं,आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, जो उनकी आदत, उनकी बीमारी,उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते,
जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ.
आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ.
जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ,
सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ.
और अगर इतना सबकुछ कर के माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है, तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा. माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी. माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी.
जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे. बातें करते करते रात के 12:30 हो गए. मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा.
उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे. मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे.
भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे.
बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला. भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ,
चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,
भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ,
उस चौकीदार ने कहा:-
"जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,
औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब।
इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया.
अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी.
उसने बड़े कातर शब्दों में कहा:-
"2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?"
मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये. ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं.
अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ.
केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है.
मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए
लेकिन जब मैंने कहा हमलोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी.
आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए.
उनकी भी आँखें नम थीं.
कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये.
सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे .......
लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं कोअपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे.घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.
👩🏻 भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है ये समझ गई थीं.
मैं भी चल दिया. लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे.
👵🏻 माँ केवल माँ है. 👵🏻
उसको मरने से पहले ना मारें.

माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें , अगर वह कमज़ोर हो गई  तो हमारी संस्कृति की रीढ़ कमज़ोर हो जाएगी , बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं

अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, बात को प्रभावी ढंग से समझायें , कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें, अगर माँ की आँख से आँसू गिर गए तो ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा , यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर सुकून नहीं होगा , सुकून सिर्फ माँ के आँचल में होता है उस आँचल को बिखरने मत देना

(यह एक फॉरवर्ड msg था जो श्री संजय अग्रवाल ने नवनीत सिकेरा ips डीआईजी लखनऊ के IIT Roorkee के व्हाट्सप्प ग्रुप पर किया था । सिकेरा जी के आग्रह पर हम इसे आगे बढ़ा रहे हैं और इस सच कहानी को हमारे वर्तमान परिवेस मे आगे बढ़ाना भी चाहिये।)

महाश्मसान मे नगरवधुओं द्वारा नृत्याभिषेक : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15अप्रैल 2016, शुक्रवार

15 अप्रैल 2016, शुक्रवार

श्मसान मे नगरवधुओं द्वारा नृत्याभिषेक

                     श्री श्री 1008 बाबा महाश्मशान नाथ जी मणिकर्णिका घाट के त्रिदिवशीय श्रृंगार महोत्सव के अन्तिम दिन कल नवरात्रि के सप्तमी तिथि को प्राचीन काल से चली आ रही गणिकाओं के नृत्य की परम्परा को जीवंत किया आज की नगर वधुओं ने, ऐसी मान्यता और कहा जाता है कि जब दशाश्वमेध घाट पर राजा जयसिंह द्वारा मान महल का निर्माण कराया जा रहा था तो उसी समय राजा जयसिंह द्वारा महाश्मशान नाथ जी के मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया गया था चूकिं हिन्दूओं में ऐसा चलन है कि हर शुभ कार्य में संगीत जरूर होता है तो उस समय राजा को अपने समकक्ष ऐसा कोई संगीतकार नहीं मिला जो महामशान पर आकर संगीत प्रस्तुत कर सके कारण उस समय का छुआछूत व जातीय परम्परा का होना तब काशी की नगर वधुओं को इस बात की जानकारी हुई कि उनके आराध्य के सामने कोई संगीतकार नहीं आना चाहता है तो उन्हें इस बात का काफी मलाल हुआ और अपने संदेश वाहक से नगर वधुओं ने तत्काल यह संदेश राजा जयसिंह को भिजवाया कि अगर आप को ऐतराज ना हो तो अपने आराध्य बाबा को हम काशी की गणिकाएं नृत्याजलीं व गीतांजलि के माध्यम से दरबार सजाना चाहते हैं जिसे राजा ने त्वरित स्वीकार करते हुए निमंत्रण भिजवा दिया कि काशी की गणिकाएं ही सजाएंगी बाबा महाश्मशान नाथ जी का दरबार और एक नई परम्परा का होगया श्री गणेश, तब से आज तक यह महफिल सजने लगी महामशान पर काशी के अदभुत, अद्वितीय, अलोकिक, अविस्मरणीय त्योहारों की तरह, और नगर वधुओं में यह मान्यता घर कर गई थी कि एक दिन सब को चार कधें पर बाबा महाश्मशान नाथ जी के गोद मणिकर्णिका जाना ही है तो क्यों न अपने दुर्भाग्य को जो इस जन्म में मिला है नाचने वाली के रूप में उसे जीभर कर जी ले व जीते जी बाबा से अपने दुख भी बाट आए जिससे अगला जन्म तो ऐसा ना मिले, और शुरु हो गई एक परम्परा, जो आज भी बदस्तूर जारी है कि बिना किसी निमंत्रण और बुलावे के देश के कोने कोने से चली आ जाती है ये नगर वधुएं  जिन्हें भी यह जानकारी मिलती है।
# नोट : आशुतोष तिवारी जी बनारस के बनारसियत को जीने वाले एक बेहतरीन फोटोग्राफर है। यह फोटो व जानकारी उन्होने ही उपलब्ध करायी है।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

संवेदनहीनता या सियासत: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 14 अप्रैल 2016गुरूवार

14 अप्रैल 2016,गुरूवार

संवेदनहीनता या सियासत

       आज सुबह उठते ही घर व मोहल्ले मे हल्की अफरा तफरी दिखी। पहले तो यह सोचा कि आज महाष्टमी के व्रत व पूजन के कारण यह सरगरमी हो, पर मामला दूसरा था। पता चला कि आज सुबह से पूरे इलाके मे पानी की सप्लाई ही गोल है। वैसे दो दिन से बिजली व्यवस्था भी छिन्नभिन्न है। पहले तो यह बताया गया था कि बनारस मे विद्युत वितरण उपकेन्द्रो का उन्नकिकरण हो रहा है इस वजह से मंगलवार को विद्युत आपूर्ति बाधित होने की संभावना थी पर बुधवार को तो हद ही हो गयी सुबह से गयी बिजली रानी शाम के ६ बजे आई तो पर पल मे रत्ती पल मे मासा की तरह उन्होने जो रंग दिखाना शुरू किया कि यह ऑखमिचौनी का खेल रात के डेढ़ बजे तक चलता रहा।
बहरहाल बात आज सुबह की। पानी की आपूर्ति न होने से हर कोई परेशान । लोग बाग अपने अपने दरवाजे पर खड़े होकर पड़ोसियो से दरयाफ्त करते रहे कि पानी आया कि नही? जिन लोगो के यहॉ समर्सेबुल व पंप है वे भी लाचार दिख रहे थे कि बिजली भी नही आखिर पंप चले भी तो कैसे?
कुछ लोगो ने लगभग एक किलोमीटर दूर लालपुर पानी टंकी जा कर दरयाफ्त किया तो वहॉ से जो जबाब मिला उसे सुन दरियाफ्ती भाई लोग और भी परेशान । उन्हे कोई वाजिब वजह नही सूझ रहा था कि वे अपना सिर टंकी पर दे मारे या सामने मौजूद सरकारी कर्मचारियो का सिर फोड़ डाले। कारण जो वजह  कर्मचारियो द्वारा बताया जा रहा था, वो बनारसी भाषा मे ' विशुद्ध चुतियापा' था और जिसे करने को हर बनारसी अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है। टंकी पर यह बताया गया कि कल बिजली के तार को उल्टा जोड़ दिया गया था इसलिये पानी टंकी मे चढ़ नही सका। अब उसे ठीक किया जा रहा है। बिजली आते ही पानी चढ़ा कर सप्लाई दे दी जायेगी। अब आप समझते रहिये कि कई कई बरस से काम कर रहे पंप कर्मचारियो को अभी तक यह ही नही मालूम कि सही तार कौन सा है? या कल से उल्टे तार को जोड़े जाने के जानकारी के बावजूद क्या वो आज तक इंतजार कर रहे थे कि जब सुबह पब्लिक आ के उनका 'बहिनिया- मतरिया करेगी तब वे उसे ठीक करने का सोचेगें?
हमारा नवरात्रि ब्रत चलने के कारण फिलहाल हम इस भागदौड़ से अलग है पर लगे हाथ मैने सोचा कि एक सच्चे मोहल्लेवासी का फर्ज थोड़ा बहुत मुझे भी निभाना चाहिये। मैने फेसबुक पर अपने इलाके की दुर्दशा अपडेट किया साथ ही वाट्सऐप्प पर जल संस्थान के सचिव, नगरनिगम के आयुक्त, अपने विधायक, कुछेक मीडियाकर्मियो, कुछेक सोशल साईट्स ग्रुपों व दोचार सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस बात की सूचना दी पर फालतू व वाहियात जोक्स को शेयर करने वाले किसी भी ग्रुप ने इस समस्या पर संवेदनशील होने की आवश्यकता नही समझी। माननीय विधायक रविन्द्र जायसवाल जी ने न तो मेरा फोन उठाया न तो संदेश देखने की भी जहमत उठाई और जल कल के सचिव साहब संदेश पढ़ कर उसे फाईलो की तरह ही दरकिनार कर दिये जबकि समस्या का मूल संबध उनही से था। बल्कि नगर आयुक्त डा० हरि प्रताप साही जी के बारे मे व उनकी त्वरित जिम्मेदार कार्यपद्धति पर हम अब तक जो सुनते आये थे, उसका परिचय मिला। डा० साही साहब ने पूरे प्रकरण के विषय मे जानकारी लेकर उसका समाधान कराते हुये हमे १०.१८ बजे संदेश " सर उपरोक्त इलाके मे पानी की supply नतनिदाइ टंकी से होती है रात्रि मे बिजली कटौती की वजह से टंकी भर नही पाई है। सुबह से tubewell बिजली आने पर चालू है।" भी प्रेषित किया।
  यही नही हमने इस संदेश को ट्विटर के माध्यम से मुख्यमंत्री लगायत मीडियाहाऊसो तक भी भेजा था प्रत्यूषा के आत्महत्या , कन्हैया के स्वागत जैसे महत्वपूर्ण सवालो पर जूझने वाली मीडिया के पास आमजन की समस्या के बारे मे चर्चा करने को समय कहॉ?
यह तो रही आमजन के प्रति संवेदनहीनता, लगे हाथ सियासत की भी चर्चा कर लें।
समाजवादी पार्टी की पिछले तीन सालो के अवधि के दौरान हम लोग प्राय: हर हिन्दू त्यौहारो पर बिजली व पानी की समस्यायो से दो चार होते है। दशहरा ,दिवाली, शिवरात्रि, बसंतपंचमी, मौनी अमावस्या, रामनवमी के अवसर पर पानी बिजली की आपूर्ति अवशय ही अवरोधित हो रही है। पहले हमे यह संयोग लगता था, पर अब हर किसी के कहने पर हमे भी यह सियासत लगता है।
क्या हमारी राजनीति व व्यवस्था का स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि अब हम त्यौहारो व खुशियो पर भी राजनीतिक शतरंज के सियासती दॉव चलने लगे है?