शुक्रवार, 27 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का तीसरा दिन और तंत्र विद्या

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का तीसरा दिन और तंत्र विद्या : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,27मार्च 2020

             तंत्र शास्त्र के संबंध मे सामान्य जन ही नही प्रबुद्ध जनमामस मे भी अनेक प्रकार की भ्रांतिया है। 'तांत्रिक' शब्द का उच्चारण होते ही मनमानस मे भय आतंक का एक घृणायोग्य चित्र उभरता है जो वास्तविकता से एकदम विपरीत है। वास्तविकता यह है ति तंत्र शब्द संस्कृत धातु 'तन्' से बना है जिसका अर्थ है बढ़ाना, विस्तार करना, तानना। तंत्र का शाब्दिक अर्थ व्यवस्था भी है। मै कौन हूँ? कहॉ से आया हूँ? मेरी नीयति क्या है? मानव व्यवस्था तथा ब्रह्माण्ड के अस्तित्व का रहस्य क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्ति हेतु की गई साधना ही तंत्र है। तंत्र का आध्यात्मिक उद्देश्य जाति धर्म उम्र लिंग आदि के भेदभाव से परे साधक अथवा साधिका को कलुषशून्य बना कर उसके तन मन का शुद्धिकरण कर उसे आध्यात्मिकीकरण की ओर ले जाना है। जहॉ साधक समस्त  बंधन मायामोह से मुक्त हो सब मे आदिशक्ति का प्रतिबिंब देखते हुये स्व से साक्षात्कार करता है। तंत्र का विशेष गुण उसकी साधना मे निहित है। वह न तो उपासना है न प्रार्थना। वह देवी के समक्ष निवेदन याचना या पश्चाताप भी नही है । वह साधना पुरूष एवं प्रकृति का मिलन है, ऐसी साधना जो देह मे पुरूष तत्व को मातृतत्व से मिलाती है।
तंत्रशास्त्र के यथार्थ ,उद्देश्य उसके उदभव  विकास इतिहास सिद्धांत साधना पद्धति एवं विभिन्न तांत्रिक संप्रदायों की ठोस एवं प्रामाणिक जानकारी देती है पं०दुर्गा प्रसाद शुक्ल की पुस्तक " तंत्र विद्या का यथार्थ " जिसे आज हमने नवरात्रि के तीसरे दिन और कोरौना के देशव्यापी लाकडाऊन के चौथे दिन पढ़ा। पं० दुर्गा प्रसाद शुक्ल कादिम्बिनी पत्रिका के उपसंपादक रह चुके है और कादिम्बिनी के दीपावली पर निकलने वाले "यंत्र मंत्र तंत्र विशेषांक " के सर्वेसर्वा भी। इनके संपादित कई विशेषांक आज भी मौजूद है।
    दो वर्ष पूर्व क्रय की गई यह पुस्तक आज हमें सामने दिख गई तो नवरात्रि के अंतराल मे इसे पढ़ भी लिया और पढ़ने के बाद तंत्र विद्या के श्वेत पहलू से प्रथम बार साक्षात्कार हुआ। पं० दुर्गा प्रसाद जी ने स्वयं के अध्ययन व अनुभव से संक्षिप्त परन्तु सरल व सारगर्भित शब्दों मे  तंत्र शास्र के सिद्धान्त और साधना , साधना पद्धति के साथ साथ कौल मत, शैव मत व मातृका मत , चार्वाक दर्शन का स्पष्ट परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त आम्नाय का सिद्धान्त, दसो महाविद्या, तीनों भाव, कमलदल ,चक्रानुष्ठान, पंचमकार, षटचक्र  के साथ साथ श्री चक्र,कुंडलिनी शक्ति , बौद्ध तंत्र, ताओ, रसायन व मनोविज्ञान  के  तंत्रशास्त्र मे अस्तित्व व औचित्य का यथार्थ अनुशीलन किया है। एक गूढ़ व नीरस विषय होने के बावजूद बेहद रोचक ढंग से बिवा लाग लपेट के लिखी हुई यह पुस्तक हमारे मन मे तंत्र शास्त्र को लेकर बनी गुत्थियों को निर्भय ढंग से खोलने मे सक्षम रही है। नवरात्रि के साधना काल मे इस पुस्तक को पढ़ना एक आनंददायक अनुभव रहा।
(बनारस, 27 मार्च 2020, शुक्रवार)
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गुरुवार, 26 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020 गुरूवार

                       नवरात्रि के दूसरे दिन व कोरोनावाईरस के लाकडाऊन के तीसरे दिन  घर मे पड़े पड़े हमने अशोक के. बैंकर की लिखी किताब “दशराजन” पढ़ा। इस किताब ने मुझे उतना प्रभावित नही किया,हॉलाकि रोचक लेखन,कहानी और पात्र.अशोक के. बैंकर ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस पूरी कहानी को पेश किया है. इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमारे प्राचीन इतिहास का अंश है,ये कहानी ऋगवेद से ली गयी है.
      ये कहानी है ३४०० ई. पू. की,जहां एक कबीले के राजा ने अपनी प्रजा और कबीले की रक्षा के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ दस राजाओं और उनकी विशाल सेना का सामना किया था. उस वक़्त कबीले के मुखिया सुदास के पास कोई बाहरी मदद नहीं थी बल्कि उसे एक योजनाबद्ध तरीके से घेरा गया था.अपने पांच नदियों वाले कबीले की रक्षा के लिए सुदास ने हर संभव रणनीति का प्रयोग किया और अपने कबीले की रक्षा की. ये पांच नदियों वाला कबीला आज पंजाब के नाम से जाना जाता है.

केवल एक दिन में सभी आक्रमणकारियों के अंत के साथ ख़त्म हुए इस युद्ध को अशोक के. बैंकर ने बखूबी उतारा है.अघोषित युद्ध,एक साथ आक्रमण और सुदास की रणनीति,उसके सहायकों का साथ,गुरु का साथ से लेकर युद्ध की एक-एक घटना का इतना अच्छा वर्णन है कि आपके सामने पूरा चित्र उतर आता है.नायक सुदास अपने कबीले के हर इंसान यहाँ तक की पशु से भी प्रेम करता है,अपमान की स्थिति में भी संयम बनाये रखता है..शायद यही कारण हो सकता है कि खुद को विशाल शत्रु सेना से घिरा हुआ पाने के बाद भी वो समर्पण की बजाय सामना करने का निर्णय लेता है.
      ललस संभवतः प्राच्य इतिहास के बारे मे ज्यादा जानकारी न होने व रोचक अनुवाद न होने के कारण कथानक थोड़ा  धीमा व ऊबाऊ लगी। इतिहास मे कल्पना को शामिल करते हुये आजकल पुरा संस्कृति व इतिहास पर जो उपन्यास लेखन किया जा रहा है उनके लेखकों मे  अशोक के बैंकर का प्रमुख स्थान है उन्होंने प्रयास भी किया है कि ऐतिहासिक उपन्यासों की भॉति संवाद वर्णन और विवरणात्मक संबंध से वह ऐतिहासिक कालखण्ड व पात्र पाठक के मन मानस मे सजीव हो सके। संभवतः बहुत से पाठकों के लिये लेखक का यह प्रयास अद्वितीय व अद्भुत रहा हो और उनको बांधने मे सक्षम रहा हो । हमारे भारत का इतिहास न जाने ऐसी कितनी कही और कितनी अनकही कहानियों को समेटे खड़ा है, जो हमारे लिये ढेर सारी कल्पनाये , मिथक,  व संबंधों के तालमेल का मिश्रण लिये लेखन का बढ़िया मसाला व गारा चूना बन सकता है। दशराजन इसी तालमेल का सुंदर उदाहरण कहा जा सकता है। जो समय बिताने के लिये उपयोगी माना जा सकता है।
        बहरहाल, एक बार पुन: धन्यवाद मित्र राजीव अष्ठाना Rajeeva Kumar Asthana को, इस लाकडाऊन के वर्तमान कालखण्ड मे सोशल डिस्टेंशिंग आईसोलेशन के तीसरे दिन के लिये अपने लाईब्रेरी से पुस्तक भेंजने के लिये।
(बनारस,२६मार्च २०२०, गुरूवार)
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व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

           बासंतिक नवरात्रि संवत २०७७ वि० के पहले दिन 25मार्च 2020 बुधवार, विश्वव्यापी महामारी कोरोना के चलते देशव्यापी लाकडाऊन मे आज कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की सुप्रसिद्ध कृति भगवान परशुराम को पढ़ कर बस अभी समाप्त किया। ईषा से लगभग १५५० वर्ष पूर्व के कथानक मे आर्यावर्त मे आर्य धर्म के संस्थापन संवर्धन , शुद्धिकरण ,व्यापकता और संस्कार-संस्थापन के पृष्ठभूमि मे हमारे पौराणिक युगपुरूष कालजयी महानायक भगवान परशुराम के व्यक्तित्व पर आधारित यह उपन्यास पौराणिक इतिहास का बोध कराता है। आर्य संस्कृति के ऊषाकाल मे सरस्वती और हपद्वति नदियों के बीच फैले आर्यावर्त मे यदु और पुरू, भरत औरतुत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थी और वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरूषों के आश्रमों मे गुंजरित दिव्य ऋचाये, आर्यधर्म का नियमन व संस्थापन कर रही थी परन्तु दूसरी ओर संपूर्ण आर्यावर्त, नर्मदा से लेकर मथुरा तक अनूप प्रदेश मे शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोहममर्षक अत्याचारों से त्रस्त था।ऐसे मे युवा भार्गव परशुराम हैहयराज  की प्रचंडता को चुनौती देते हुये अपनी आर्यनिष्ठ तेजस्विता, संगठन क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के द्वारा  आर्य संस्कृति के ध्वस्त करने के उसके सपनों को ध्वस्त करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के एक वर्ष पूर्व अप्रैल १९४६ मे प्रकाशित प्रशिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद श्री के एम मुंशी की यह पुस्तक पढ़ते हुये आज भी अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती है।
हमे तो इस कोरोना लाकडाऊन पीरियेड मे इस पुस्तक को पढ़ते हुये धर्म, कर्तव्य, साहस और रणनीति के संदर्भ मे कई कई बार आजकल के दौर मे सड़क पर न निकलने, स्वयं को नियंत्रित करने व अदृश्य कोरोना वाइरस से प्रतिरोध करने की अपनी सरकार की नीतियों को समीचीन व्याख्या व नई परिभाषा मिल रही थी। धन्यवाद मित्र राजीव अस्थाना Rajeeva Kumar Asthana जी को एक अच्छी पुस्तक पढवाने के लिये।
(बनारस,26मार्च 2020,गुरूवार,12.37पूर्वाह्न)
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष ।

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष । व्योमेश चित्रवंश की डायरी,2४ मार्च २०२०, मंगलवार

अपनी मनपसंद दो किताबो को कल देर रात दुबारा पढ कर समाप्त किया। डेल कार्नेगी की किताब पिछली सदी मे 1993 मे खरीद कर पढ़ने के बाद आलमारी में रखी शोभायमान बन गई थी, हालॉकि उसके सिद्धान्त आज भी मेरे व्यवहार मे है। जबकि स्यालकोट सागा 2016 मे आते ही खरीद कर दो दिन तक लगातार पढ़ते हुये मिले रोमांच भरे एहसास के बाद कई लोगों को पढ़वाने के बाद रख दिया था।
जब सब कुछ लाकडाऊन है ऐसे मे खुद को व्यस्त रहने  का मेरे लिये एकमात्र तरीका किताबें पढ़ना ही है। आज  बड़े भाई मित्र राजीवअस्थाना Rajeeva Kumar Asthana वकील साहब ने के एम मुंशी की भगवान परशुराम और अशोक के बैंकर की दशाराजम भेजवाया है। उम्मीद है कि दो दिन की टाईम की खुराकी इससे पूरी हो जायेगी। और कल से नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हो जायेगा तो सोशल मीडिया से कट कर थोड़ा और समय मिलने पर यह खुराकी बढ़ भी सकती है।
कोरोना को भगाना है, कहीं नही जाना है।
घर मे रहना है, किताबें पढ़ना है।😊😊
(बनारस, 24मार्च2020, मंगलवार, 8.00बजे प्रात:)
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शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 फरवरी 2020
       बहुमुखी प्रतिभा की धनी , भरतनाट्यम  कलाकार अपनी छोटी बहन जैसी प्रतिभा श्रीवास्तव की उपन्यासिका The Peaceful Chaos पढ़ने को मिली। आज के भौतिकवादी भागते दौड़ते माहौल और तुरत फुरत रिश्तो को कैश करा लेने वाले माहौल मे कालेज जीवन के रूमानी प्यार पर बेहद मर्मस्पर्शी लिहाज से कहानी को पिरोया है प्रतिभा ने। यह उनकी पहली किताब है, पर स्टोरी प्लाट का चयन, साफ सुथरे शब्दों का प्रयोग और प्रेमकहानी मे निस्वार्थ भावनात्मक दोस्ती को आधार पर लिखी कहानी प्रतिभा के अंदर छुपे गंभीर लेखक का परिचय कराती है। हालॉकि एक झूठे बहाने को ले कर शुरू हुये कहानी जो अंत मे उसे दूसरे पक्ष के सच मे बदल देती है पर थोड़ी और मेहनत की जरूरत थी, मुझे लगता है कि यदि लेखिका ने इसे उपन्यासिका बनाने के बजाय घटनाओं को विस्तार देते हुये उसे उपन्यास का रूप दिया होती तो संभवतः ज्यादा सफल होती। जतिन और आशी के दोस्ती की यह कहानी उनके आपसी मोहब्बत के एहसास के साथ ही परिस्थितिवश समाप्त हो जाती है, बल्कि मै कहूँ कि समाप्त कर दी गई तो गलत नही होगा। पर जिन बुनियादी सवालातों को लेकर इस प्रेमकहानी का अंत बताया गया वह मेरे गले के नीचे सामान्यत: नही उतरती। एक कालेज मे पढ़ने वाले आज के मोबाईल जमाने मे जाति को न जानने का सवाल, फिर कहानी के पीक प्वाइंट पर आशी के बाबा दादी के महत्वपूर्ण भूमिका के बाद उनका एकाएक कहानी से ओझल हो जाना, रेल भगदड़ मे गुम होने वाली पढ़ी लिखी कालेज गर्ल का बलात्कार के पश्चात अस्पताल मे रहने के दौरान कोई पहचान नही होना, गुमशुदगी की एफआईआर के बावजूद पूरी कहानी से पुलिस कीकोई भूमिका मही होना,आशी का गुमनामी मे  गॉव जा कर वापस आ जाना और अस्पताल मे कहानी का अंत कहीं न कहीं मन मे  सवाल खड़े करते है। लगता है कि जल्दबाजी और पहली बार के लेखकीय उत्साह में सब कुछ बड़ी तेजी से समेट दिया है लेखिका ने।
उपन्यासिका के अंत मे प्रतिभा ने कुछ वाजिब सवाल उठाये है आज के समाज यानि हमसे और आपसे, जो मौजूं ही नही जरूरी है जिन पर हमे सौचना होगा, अगर अभी तक नही सोचा तो सोचना पड़ेगा नही तो यूँ ही जतिन और आशी जैसे सरल और साफगोई से जीने वाले लोग सामाजिक बंधनों के इस अबूझ आत्मघाती चक्की मे पीसे जाते रहेगें।
नवोदित लेखिका के रूप मे प्रतिभा सराहना व बधाई की पात्र है, मनोवैज्ञानिक व भावनात्मक तरीके से उनकी उपन्यासिका पठनीय व प्रशंसनीय है।
(बनारस, शिवरात्रि, 21 फरवरी 2020, शुक्रवार)
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना  ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

                  पिछले सप्ताह अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के मित्र ओम प्रकाश राय यायावर का उपन्यास काशी टेल पढ़ा। इस किताब को पढ़ने की काफी दिनों से ईच्छा रहने के बावजूद किन्ही न किन्ही कारणों से यह पढ़ने से छूट जा रही थी। हालॉकि ओम प्रकाश जी ने भी इसके लिये एक बार उलाहना दे डाला, सो अबकी बार किताब उठाई तो पूरा पढ़ने के बाद ही दूसरे काम हाथ मे लिया। फिर किताब के बारे मे सोचते हुये लिखने मे देर हो गई। बहरहाल आज इस काम को भी पूरा करने का मन मिजाज बना के बैठा हूँ। ओम प्रकाश राय बिहार से बनारस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने आये तो औरों की तरह हमारी सर्व विद्या की राजधानी ने दोनो बॉहें फैलाये इन्हे स्वीकार कर लिया अभी वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे ही उच्च अध्ययनरत हैं।बनारस टेल इसी बीएचयू के शिक्षा संकाय की कथा है जिसमे बड़े बेबाकी से आज कल बीएड करने वाले छात्रों के मनस्थिति व परिस्थिति को दिखाते हुये यात्रा करती है, बिहार से  आये निहाल पाणे के साथ, तो रामनगर की आईपीएस मुस्लिम पिता व हिन्दू मॉ की पुत्री सदफ के साथ कमच्छा से गोदौलिया तक, रामनगर सामनेघाट से लंका तक, रेवड़ी तालाब के जय नारायण इंटर कालेज के खाली बीरान मैदान से दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर  चढ़ते उतरते ,बीएचयू की अमराईयों मे टहलते हुये सेण्ट्रल आफिस तक।
कभी सिविलसर्विस और पीसीएस के रिजल्ट मे अपना बड़ा सा घेरा बनाने वाले आक्सफोर्ड आफ ईस्ट के शहर कहे जाने वाले ईलाहाबाद अब प्रयागराज मे पीसीएस की तैयारी करने वाला बिहारी निम्न मध्यवर्गीय आय वाले परिवार का लड़का निहाल पाण्डेय, अपने पिता की उलाहनाओं से अाजिज आकर एक सिक्योर्ड नैकरी मास्टरी के  लिये बीएड करने  बीएचयू  आ जाता है। वहॉ उसकी मुलाकात उच्च आयवर्गीय मुस्लिम परिवार की सदफ से होती है। पहली मुलाकात के बाद दोनो के बीच दोस्ती से थोड़ा बढ़ कर मधुर रिश्ता बन जाता है। चंचल शोख सदफ के संगत मे अपने मे सिमटे रहने वाला निहाल भरपूर कालेज जीवन के दोस्ती का लुत्फ उठाने लगते है। इस दोस्ती ईश्क मोहब्बत के साथ साथ हास्टल जीवन की चुहलबाजिया, बदमासियॉ और बिन्दास अंदाज किताब की रोचकता को जीवन्त करते हैं। कहानी मे ठहराव आता है तो कहानी हाथ से फिसलती जान पड़ती है पर फिर से बिहार के अपने गॉव मे स्कूली शिक्षा मे अलख जगाने की कोशिश कर रहे निहाल पाणे बाबा कहानी के छोर को थाम लेते है।
कुल मिला कर ओम प्रकाश राय ने कथा को रोचक बनाने मे कोई कसर नही छोड़ा है और जो लोग बनारस, पश्चिम बिहार के भूगोल, और संस्कृति से परिचित है उनके लिये कहानी से जुड़ाव व अपनापन लगना स्वाभाविक है। बनारस टेल बेहतरीन कोशिश है इधर आये बनारस , बीएचयू, बिहार से जुड़े उपन्यासों की कड़ी में।
(बनारस, 18फरवरी,2020, मंगलवार)
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मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम और हमारे विधायक जी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11 फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम और हमारे विधायक जी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11 फरवरी 2020

#मेराघर बनारस शहर उत्तरी मे है,

#बिजली का भारीभरकम बिल हम भरते है पर विधायक जी ने खंभो पर स्विच तार लटकवा के स्ट्रीट लाईट के लिये पिछले तीन साल से आश्वासन देते रहे पर आज तक उन खंभो पर स्ट्रीट लाईट नही लगी। विधायक जी क कहने पर नगर निगम द्वारा यह बताया गया कि बजट आने पर खंभो पर बिजली के लट्टू भी टंग जायेगें पर लट्टू को टंगने को कौन कहे उन खंभो के अंधेरे तलेे दो बेजुबान पशुओं एक साड़ व एक भैंस की मृत्यु हो गई, कमाल है कि कि अखिलेश सरकार के आखिरी समय मे कम हुआ बजट आज तक नही आ सका।

#पानी अभी भी हमारे यहॉ सुबह शाम मल्टीकलर मे आता है कभी पीला, कभी मटमैला, कभी हल्की लालिमा लिये हुये,और कभी कभी तो वह सुगंधित तो कभी दुर्गंधित। शिकायत नगरनिगम की चौकी से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक मेरे मोहल्ले वालों ने किया। पर आज भी हम लोग मल्टीकलर्ड और गंधयुक्त पानी पेयजल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। जबकि विधायक जी का यह दूसरा कार्यकाल है।

#सीवर के बारे मे कहना ही क्या? इसे अखिलेश सरकार की महानता कहे कि सरकारी पैसे की बर्बादी। आज तक वरूणापार वाले समझ ही नही पाये कि सीवर उनके लिये बन रहा है या वे सीवर के लिये ही बने हैं। सीवर की टूटी फूटी पाईप तो डाल दी गई पर उसे मेन लाईन से जोड़ा ही नही गया। जोड़ते भी कैसे जब अब तक यही तय नही हो पाया कि मेनलाईन का डाऊनफ्लो कहॉ होगा? हर दिन किसी न किसी सड़क पर लाल पीले फाईबर के बैरिकेट खड़े कर लाल पीले ग्लो साईन कलर वाले कपड़े पहने दो चार आदमी क्या काम करते है , मुझे नही लगता होगा कि उन्हे भी पता होगा। विधायक जी पिछले कार्यकाल मे तो सारा ठीकरा  सपा सरकार और उसकी नीतियों व ठीकेदारी मे भागीदारी सिस्टम को कोसा करते थे। इस कार्यकाल मे वे सीवर जैसी समस्या पर बोलना अपने सम्मान के विरूद्ध समझने लगे और मंत्री बनने के बाद तो क्षेत्र मे सीवर समस्या कहीं उनके एजेण्डे मे दूर दूर तक नही हैं।

#सड़क के मामले मे वरूणापार हमेशा से बद किस्मत रहा। अखिलेश के जमाने मे  किसी वीवीआईपी मूवमेंट के ठीक पहले चटपट छर्री डाल काला कर के अपनी भूमिका पूरी कर ली जाती थी। भला हो मोदी जी का, जो प्रवासी भापतीय सम्मेलन और टीएफसी के नाम पर कुछ सड़को को चलने फिरने व देखने लायक बना दिया। पर आज सीवर, बिजली,पानी के नाम पर ज्यादातर सड़के खुदी हुई हैं।

#सबकासाथसबकाविकास को अपना आधारवाक्य बीजेपी भले मानती हो पर हमारे विधायक, सारी! मंत्री जी नही मानते। उनके द्वारा जो भी कार्य कराये जा रहे है वह सबके लिये नही बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये होती है। नवलपुर मे तुलसीविहार, शिवपुर मे दुर्गा विहार जैसी कालोनियॉ इसी तरह की उदाहरण है। शायद मंत्री जी को भरोसा हो कि बाकी जगहों के वोट तो उनकी थाती है जो मजबूरन कहीं भटक कर कहीं नही जाने वाले।

यह बातें मै बार बार क्यों सोच कहा हूँ पता नहीं, क्योंकि मुझे अपने विधायक , सारी! मंत्री जी से अब कोई उम्मीद नही है, क्योंकि अब तक हम लिखत पढ़त मौखिक रूप से उनसे कई कई बार आश्वासन पा कर निराश हो चुके हैं। पर शायद #दिल्ली के चुनाव परिणामों को देख कर मै बार बार अपने क्षेत्र के #भाजपा विधायक जी की तुलना पुन: जीते हुये प्रत्याशियों से जाने क्यों करने लगा हूँ।
(बनारस, ११फरवरी २०२०, मंगलवार)
#मेराघर बनारस शहर उत्तरी मे है,

#बिजली का भारीभरकम बिल हम भरते है पर विधायक जी ने खंभो पर स्विच तार लटकवा के स्ट्रीट लाईट के लिये पिछले तीन साल से आश्वासन देते रहे पर आज तक उन खंभो पर स्ट्रीट लाईट नही लगी। विधायक जी क कहने पर नगर निगम द्वारा यह बताया गया कि बजट आने पर खंभो पर बिजली के लट्टू भी टंग जायेगें पर लट्टू को टंगने को कौन कहे उन खंभो के अंधेरे तलेे दो बेजुबान पशुओं एक साड़ व एक भैंस की मृत्यु हो गई, कमाल है कि कि अखिलेश सरकार के आखिरी समय मे कम हुआ बजट आज तक नही आ सका।

#पानी अभी भी हमारे यहॉ सुबह शाम मल्टीकलर मे आता है कभी पीला, कभी मटमैला, कभी हल्की लालिमा लिये हुये,और कभी कभी तो वह सुगंधित तो कभी दुर्गंधित। शिकायत नगरनिगम की चौकी से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक मेरे मोहल्ले वालों ने किया। पर आज भी हम लोग मल्टीकलर्ड और गंधयुक्त पानी पेयजल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। जबकि विधायक जी का यह दूसरा कार्यकाल है।

#सीवर के बारे मे कहना ही क्या? इसे अखिलेश सरकार की महानता कहे कि सरकारी पैसे की बर्बादी। आज तक वरूणापार वाले समझ ही नही पाये कि सीवर उनके लिये बन रहा है या वे सीवर के लिये ही बने हैं। सीवर की टूटी फूटी पाईप तो डाल दी गई पर उसे मेन लाईन से जोड़ा ही नही गया। जोड़ते भी कैसे जब अब तक यही तय नही हो पाया कि मेनलाईन का डाऊनफ्लो कहॉ होगा? हर दिन किसी न किसी सड़क पर लाल पीले फाईबर के बैरिकेट खड़े कर लाल पीले ग्लो साईन कलर वाले कपड़े पहने दो चार आदमी क्या काम करते है , मुझे नही लगता होगा कि उन्हे भी पता होगा। विधायक जी पिछले कार्यकाल मे तो सारा ठीकरा  सपा सरकार और उसकी नीतियों व ठीकेदारी मे भागीदारी सिस्टम को कोसा करते थे। इस कार्यकाल मे वे सीवर जैसी समस्या पर बोलना अपने सम्मान के विरूद्ध समझने लगे और मंत्री बनने के बाद तो क्षेत्र मे सीवर समस्या कहीं उनके एजेण्डे मे दूर दूर तक नही हैं।

#सड़क के मामले मे वरूणापार हमेशा से बद किस्मत रहा। अखिलेश के जमाने मे  किसी वीवीआईपी मूवमेंट के ठीक पहले चटपट छर्री डाल काला कर के अपनी भूमिका पूरी कर ली जाती थी। भला हो मोदी जी का, जो प्रवासी भापतीय सम्मेलन और टीएफसी के नाम पर कुछ सड़को को चलने फिरने व देखने लायक बना दिया। पर आज सीवर, बिजली,पानी के नाम पर ज्यादातर सड़के खुदी हुई हैं।

#सबकासाथसबकाविकास को अपना आधारवाक्य बीजेपी भले मानती हो पर हमारे विधायक, सारी! मंत्री जी नही मानते। उनके द्वारा जो भी कार्य कराये जा रहे है वह सबके लिये नही बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये होती है। नवलपुर मे तुलसीविहार, शिवपुर मे दुर्गा विहार जैसी कालोनियॉ इसी तरह की उदाहरण है। शायद मंत्री जी को भरोसा हो कि बाकी जगहों के वोट तो उनकी थाती है जो मजबूरन कहीं भटक कर कहीं नही जाने वाले।

यह बातें मै बार बार क्यों सोच कहा हूँ पता नहीं, क्योंकि मुझे अपने विधायक , सारी! मंत्री जी से अब कोई उम्मीद नही है, क्योंकि अब तक हम लिखत पढ़त मौखिक रूप से उनसे कई कई बार आश्वासन पा कर निराश हो चुके हैं। पर शायद #दिल्ली के चुनाव परिणामों को देख कर मै बार बार अपने क्षेत्र के #भाजपा विधायक जी की तुलना पुन: जीते हुये प्रत्याशियों से जाने क्यों करने लगा हूँ।
(बनारस, ११फरवरी २०२०, मंगलवार)
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