सोमवार, 20 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ आज की सुबह नीरज जी के नाम

आज रिमझिम बारिस की सुबह चित्रांश गोपाल दास  नीरज जी के नाम

आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा,
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा।

मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का,
मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का,
लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण,
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।

खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में,
मैंने भर-भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में,
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया,
जैसे मैं जी लिया किसी से,क्या इस तरह जिया जाएगा।

काजल और कटाक्षों पर तो, रीझ रही थी दुनिया सारी,
मैंने किंतु बरसने वाली, आँखों की आरती उतारी,
रंग उड़ गए सब सतरंगी, तार-तार हर साँस हो गई,
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो, ज़्यादा नहीं सिया जाएगा।

जब भी कोई सपना टूटा, मेरी आँख वहाँ बरसी है,
तड़पा हूँ मैं जब भी कोई, मछली पानी को तरसी है,
गीत दर्द का पहला बेटा, दुख है उसका खेल-नखिलौना,
कविता तब मीरा होगी जब,हँसकर ज़हर पिया जाएगा।         

                                 --डॉ० गोपाल दास नीरज
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20 जुलाई 2020
(बिष साथ बिष बिष😢)

रविवार, 19 जुलाई 2020

व्योमवार्ता / यादें यू पी कालेज की (६) :जब बिना कुछ किये एक साल पीछे हो गये हम सब

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की ..(६): व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १९ जुलाई २०२०

जब बिना कुछ किये एक साल पीछे हो गये हम सब

       वार्षिक समारोह बीतने के बाद पूरे कालेज मे पढ़ाई की गंभीरता छा गई। हम नवप्रवेशी छात्रों मे तो पहली बार कालेज मे परीक्षा देने का एक खौफ भी था। अभी तक शिक्षकों के दिये हुये नोट्स और टीपों पर पढ़ते आ रहे हम लोगों को अधिकांश विषयों मे अपने से नोट्स बना कर पढ़ना था। विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ अप्रैल के दूसरे सप्ताह से प्रस्तावित थी। खेलवार , शौकवार, विषयवार दोस्तों की कटेगरी अलग अलग बन चुकी थी। इस बीच कालेज सेण्ट्ल लाईब्रेरी मे विषय से परे आचार्य रजनीश की एक पुस्तक 'सपना यह संसार' निर्गत कराने के लिये मेरी लाईब्रेरी काउण्टर पर शुरू हुई झिकझिक इतनी बढ़ी कि बात वहॉ से चल कर कला संकायाध्यक्ष डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी तक पहुंच गई, तब तक वे मुझे अच्छे से पहचानने लगे थे। उन्होने मुझे  पुस्तकालय से छात्रों के लिये पाठ्य संबंधी पुस्तक निर्गत किये जाने के  नियम को समझाने का प्रयास किया पर मै अपने जिद पर अड़ा था कि अगर वे पुस्तकें विशेष हैं तो वे विशेष श्रेणी मे रखते हुये कारण सहित नाट फार स्टूडेंट्स के निर्देश सहित रखी जायें। मेरे न मानने पर उन्होने नियमों का हवाला देते हुये स्पष्टत: मना कर दिया और दबे शब्दों मे धमकी भी दी कि पढ़ने आये हो नेतागिरी मत करो। पर मै इस शिकायत को लेकर प्राचार्य डॉ०ओम प्रताप सिंह सेंगर के पास चला गया। सेंगर साहब कृषि वैज्ञानिक थे वे अपने विषय में प्रखर होने के साथ बेहद सुलझे, नियम कानून के सख्त पाबंद व्यक्ति थे। पहनावे मे बेहद साधारण स्लेटी हाफ शर्ट, डार्क ब्लू पैंट और पैरों मे सैण्डिल पहने , हाथ मे एक बड़ी डायरी लिये आकर्षक  प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी ऋषितुल्य सेंगर साहब प्राचार्य आवास से कालेज तक सदैव पैदल ही चल कर आते थे। कालेज परिसर के अंदर वे या तो पैदल चलते या साइकिल से , पर उनके गरिमामयी व्यक्तित्व के समक्ष देखने वालों का सिर श्रद्धा से झुक जाता था। सेंगर साहब ने मेरी पूरी बात सुनी और मेरे दिये गये प्रार्थनापत्र पर स्पष्ट शब्दों मे स्वयं लिखा "Library is the centre of knowledge for any Institution and Books for All is the basic principle of Library Science. Issue the Books to students as per rules. Only rares and restricted books shall not be issued. "  मै वह आदेश लेकर अपने विजयपत्र के रूप मे ले जा कर जानबूझकर डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी को दिखाया। पर उन्होने बिना कोई  प्रतिक्रिया व्यक्त किये मुस्कराते हुये मेरे बारे मे ,पढ़ाई , शौक , भविष्य की योजना के बारे मे पूछते हुये कालेज के बाद दो बजे अपने ढिठोरी महाल स्थित घर आने को कहा। अपने घर कैलाश के भौगोलिक स्थिति को बताते हुये जब उन्हे पता चला कि उनके पड़ोसी और आदरणीय शोभनाथ लाल जी मेरे नाना है तो वे बहुत खुश हुये । जब दोपहर दो बजे मै उनके घर गया तो चाय पानी कराने के पश्चात वे मुझे ले कर एलटी कालेज अर्दलीबाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय गये और वहॉ मेरा परिचय तत्कालीन पुस्तकालयाध्यक्ष प्रद्युम्न कुमार गौड़ से करवा कर स्वयं मेरा सदस्यता आवेदनपत्र भर सदस्यता शुल्क रू० ६०/- अपने पास से जमा किया और कहा कि अब तुम्हे जितनी किताबे कोर्स से ईतर पढ़नी हो यहॉ से पढ़ो पर उससे तुम्हारे पढ़ाई पर असर नही आना चाहिये। आज भी विश्वनाथ सर द्वारा  बनवायी गई राजकीय जिला पुस्तकालय की सदस्यता मेरे पास बरकरार है और राजकीय जिला पुस्तकालय का मेरे जीवन निर्माण मे बहुत बड़ा योगदान है। उसी लाईब्रेरी मे मेरा परिचय कालेज के मित्रों पवन और समीर श्रीवास्तव से हुआ।
दिसंबर मे जाड़ा पड़ना शुरू हो गया था। सुबह सुबह अपने हाथों को रगड़ते हुये हम लोग संकठा सर के ७ बजे वाली क्लास के लिये पहुंच जाते।  मफलर और टोपी लगाने का फैशन नही था। तब  विंडचीटर, लेदर और थर्मोवुल वाले जैकेट का चलन नही हुआ था। स्वेटर कोट मे ठण्ड से लाल और गीली हो रही नाक को पोछते, गरमाते जब तक हम लोग पहुंचते तब तक बारह किमी दूर से अपनी लाल जावा से संकठा सर उपस्थित रहते। याद नही कि वे कभी जाड़ा गर्मी बरसात मे भी ७ बजे वाली क्लास मे पॉच मिनट लेट हुये हो। छात्रसंघ के चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। तब छात्रसंघ चुनाव मे अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और कक्षा प्रतिनिधियों के लिये बैलट पेपर आधारित चुनाव होते थे। चुनाव से पूर्व प्रत्याशियों का परिचय समारोह कला संकाय के ऊपर वाले बालकनी मे आयोजित हुआ। हम छात्र मतदातागण विज्ञान भवन की छत से लेकर नीचे मैदान तक खड़े बैठे प्रत्याशियों का परिचय भाषण सुनते थे। प्रथम वर्ष के छात्र अध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री पद के लिये चुनाव नही लड़ सकते थे।अपने अपने पद हेतु प्रत्याशीगण  जोर आजमाईश कर रहे थे पर कालेज का अनुशासन न परंपरा सर्वोपरि थी। कोई शोर गुल नारेबाजी नही। किसी भी दीवार पर प्रचार नही। कक्षाओं के दौरान प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ आते और पढ़ाते हुये शिक्षक से अनुमति ले कर अपनी बात रख चुपचाप निकल जाते। तब वर्तमान प्रशासनिक भवन नही हुआ करता था बल्कि उसके स्थान पर बहुत खूबसूरत कई प्रजातियों वाले कई रंग वाले गुलाब के फूलो की बड़ी क्यारी हुआ करती थी।(उसके बारे मे फिर कभी) प्रिंसपल का कमरा विज्ञान भवन के पोर्च के ठीक ऊपर वाला था। और उसके बाहर बॉयी ओर एकाउण्ट सेक्शन और दॉयी ओर प्रशासनिक  खण्ड ।दोनो के बाहर साईड  निकले पतले खुले गलियारे मे एक तरफ पीरियेड वाला घण्टा वाला छोटा सा कमरा इसी तरह  दूसरी ओर छोटा सा कमरा। जिनके ऊपर पानी की टण्किया थी जिनसे ओवर फ्लो होकर हमेशा पानी गिरता रहता था।हम लोग पहले साल के होने के कारण इस चुनाव मे मात्र दर्शक और मतदाता की ही भूमिका मे थे। चुनाव व मतगणना एक ही दिन होजाती थी। मतगणना के दूसरे दिन कालेज मे छुट्टी होती और अगले दिन खुलने पर पूरे कालेज मे जीते हुये प्रत्याशी के तरफ से समोसा लालपेड़ा बँटता था।उस वर्ष के चुनाव मे इंद्र देव शाही अध्यक्ष पद पर विजयी हुये थे। महामंत्री का याद नही।
      चुनाव के बाद  कालेज फिर से पठन पाठन मे गंभीरता से लग गये। एक दिन सुबह कालेज जाने पर पता चला कि हम लोगों का दो साल वाला स्नातक अब तीन साल का हो गया। रातों रात हम लोग पढ़ाई मे बिना किसी गलती के एक साल डिमोट कर दिये गये थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  के सुझाव पर उत्तर प्रदेश सरकार के  त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लागू करने के  फैसले को  इसी साल लागू कर दिया था जबकि काशी विद्यापीठ और संस्कृत विश्वविद्यालय मे अभी भी दो वर्षीय पाठ्यक्रम ही चला रहे थे। हम लोग पूरी तरह से उहापोह मे थे , न तो सिलेबस निर्धारित हुआ था न कोई स्पष्ट दिशा निर्देश। अध्यापक स्वयं अनिश्चित थे। ऐसे मे कालेज प्रशासन ने निश्चय किया कि छात्रों मे बिना कोई भय व संशय का मनोभाव पैदा किये पढ़ाये जा रहे कोर्स को जारी रखा जाये।
पर संशय का मनोभाव तो हम सब मे आ चुका था और हम एक ही सुबह में बीए प्रिवियस के बजाय बीए पार्ट-1 के छात्र बन गये थे।😱😱
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क्रमश:.......
अगले अंक में : पहले साल की कुछ छूटी छोटी बातें और परीक्षा

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की.....(५) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

संस्थापन समारोह का अखिल भारतीय कविसम्मेलन
व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की (५) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १७ जुलाई २०२०

           तीन दिन बाद समापन समारोह मे २५ नवंबर की रात मे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होना था। तब इस तरह के समारोहों के लिये कालेज गेस्ट हाऊस , द्वितीय छात्रावास और पुराने लाईब्रेरी भवन के बीच बड़े मैदान मे विशाल पाण्डाल लगाया जाता था।  आज भी कार्यक्रम निम्मित बना पक्का चबूतरा वहॉ मौजूद है।  पूरा पण्डाल खचाखच भर जाता था न सिर्फ छात्रों से बल्कि कालेज के अगल बगल १-२ किलो मीटर मे रहने वाले परिवारों से, महिला बच्चों के साथ लोग कालेज के कार्यक्रमों को देखने को आते थे और कवि सम्मेलन के दिन तो पूछो मत, लगता था पूरे बनारस की भीड़ इकट्ठी हो गई हो। मेरे ख्याल से वरूणा पार का यह तब का सबसे बड़ा साहित्यिक समारोह होता था। उसी पाण्डाल मे बने मंच से हमें पहली बार डॉ० गोपाल दास नीरज, डॉ० शंभुनाथ सिंह, भूषण त्यागी, सूड़ फैजाबादी, कैलाश गौतम, श्री कृष्ण तिवारी के साथ चकाचक बनारसी को सुनने का मौका मिला। गीतकार पं० श्रीकृष्ण तिवारी जी मंच संचालन कर रहे थे। जिन कवियों का हमने अब तक मात्र नाम सुना था वे हम लोगों के सामने मंच पर साक्षात विराजमान थे।इसी मंच पर हमने डॉ०शंभुनाथ सिंह के गांभीर्यपूर्ण स्वरों मे

"देश है हम मगर राजधानी नही
हम बदलते हुए भी न बदले कभी
लड़खड़ाए कभी और सँभले कभी
हम हज़ारों बरस से जिसे जी रहे
ज़िन्दगी वह नई या पुरानी नहीं ।
हम न जड़-बन्धनों को सहन कर सके,
दास बनकर नहीं अनुकरण कर सके,
बह रहा जो हमारी रगों में अभी
वह ग़रम ख़ून है लाल पानी नहीं ।

और
"समय की शिला पर मधुर चित्र कितने,
किसी ने बनाये किसी ने मिटाये ,
किसी ने लिखी ऑसूओं की कहानी,
किसी ने पढा सिर्फ़ दो बूं पानी।
इसी मे गये बीत दिन जिंदगी के,
गयी धुल जवानी, गयी मिट निशानी
.....शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

तथा डॉ० गोपाल दास नीरज की थरथराती आवाज में

"स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।"

और
दीप को अपना बनाने को पतंगा जल रहा है,
बूंद बनने को समुन्दर का हिमालय गल रहा है,
प्यार पाने को धरा का मेघ है व्याकुल गगन में,
चूमने को मृत्यु निशि-दिन श्वास-पंथी चल रहा है,
है न कोई भी अकेला राह पर गतिमय इसी से
मैं तुम्हारी आग में तन मन जलाना चाहता हूं।
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं॥

सुना। हमारे कला संकाय के डीन डॉ० विश्वनाथ प्रसाद ने भी अपनी कविता पढ़ी थी, "जीभ पर ताले दिये, चुप थे नही अच्छा किया, चीखते तुम भी सड़क पर आ गये अच्छा किया"। भूषण त्यागी, हलचल मिर्जापुरी, सूंड़ फैजाबादी, राजशेखर, कमल नयन मधुकर , सावित्री गौड़ की कवितायें तो मुझे अब याद नही है पर पं० हरिराम द्विवेदी के भोजपूरी गीत "

कविता के रस होला सँझिया बिहनवाँ
गउवाँ के गितियन में बसैला परनवाँ
गीतन से करैलें सिंगार हो ,
बाबा मोर आवैं बखरिया॥" 

और कैलाश गौतम की "गॉव गया था गॉव से भागा" के बाद "अमवसा क मेला" की कुछ पंक्तियॉ आज भी याद आते ही मन मुस्करा उठता है,

"एही में चम्पा-चमेली भेंटइली.
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली.
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें,
दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें.
असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अबतक पठवलू.
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं,
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं.
हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानऽ
हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानऽ.
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की.
मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो.
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै."

शायद उसी साल डॉ० बुधिनाथ मिश्र भी आये थे, यह तो पक्का याद नही, पर उनकी कविता

"एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो!
सपनों की ओस गूँथती कुश की नोक है
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
इस अँधेर में कैसे नेह का निबाह हो।

वाली कविता पंक्ति मुझे आज भी याद है। इन कविताओं ने मेरे साहित्यिक रूचि की नींव रखी जो मुझे बरबस ही हिन्दी साहित्य की ओर खींचती गई और भविष्य मे मेरे जीवन मे साहित्य से कोई सरोकार न होते हुये भी बड़ी काम की साबित हुई। कवि गोष्ठी की मनभावन लहरों मे जब श्रोतागण पूरे तरह डूब उतरा रहे थे तो इन श्रोताओं मे पीछे बैठे छात्र श्रोताओं का अपना अलग अंदाज था जो मेरे लिये अप्रत्याशित, नवीन और मजेदार था। जब किसी कवि की सराहना करती होती तो पीछे के छात्र श्रोताओं से एक स्वर मे काशी की पहचान वाला बाबा भोलेनाथ का स्वर उठता " हर हर महाााा देव " और इस लपेटें मे कभी कभार नये, छोटे, कम चर्चित मझोले कवि आ जाते तो पीछे से बनारस की पहचान शंख घोष मे कोरस होता " भाग भाग ......के" थोड़ी देर की देखा देखी के बाद हम नये छात्र श्रोता भी इस कोरस मे अपना योगदान देने लगे। जब कई छोटे मंझोले कविगण बनारसी शंखघोष के बहाव मे नही चल पाये तो संचालक पं० श्रीकृष्ण तिवारी जी द्वारा काशिका के मशहूर हास्यकवि चकाचक बनारसी को इस शोर को शांत कराने के लिये बुलाया गया। चकाचक जी ने आते ही पहले काशिका बोली मे छात्रों से संवादसंबंध स्थापित किया और फिर  अपनी हँस हँस कर लोटपोट करा देने वाली रचना सुनाई,

बदरी के बदरा पिछयउलेस,
सावन आयल काऽ।
खटिया चौथी टांग उठेउलस,
सावन आयल काऽ।
मेहराये के डर से माई लगल छिपावै अमहर,
भईया के बहका फुसला के भउजी भागल नइहर,
सांझै छनी सोहारी दादा तोड़ लियइलन कटहर,
बाऊ छनलन ललका दारू बनके बड़का खेतिहर,
बुढ़िया दादी कजरी गईलेस,
सावन आयल काऽ।
गुद्दड़ क चौउथी मेहररूआ मेंहदी सुरूक लियाईल,
सास क ओकरे कानी अंगुरी सड़-सड़ के बस्साइल,
झिंगुरी के घर भुअरी बिल्ली तिसरे बार बियाइल,
रामभजन क नई पतोहिया झूलै के ललचाईल,
धनुई फिर गोदना गोदवउलेस,
सावन आयल काऽ।
चमरउटी कऽ उलटल पोखरी मचल हौऽ छूआछूत,
खेलत हौऽ धरमू पंडित कऽ बेवा धईलेस भूत,
ननकू के ननका के मुंह पर मकरी देहलस मूत,
छींकत हौ जमिदार क बिटिया गईल खुले में सूत,
पटवारी के दमा सतउलेस,
सावन आयल काऽ।
सांझ के अहिराने में गड़गड़ गड़गड़ बजल नगाड़ा,
कलुआ गनगनायके नचलेस लगल किजइसे जाड़ा,
ओकरे साथे अन्हऊ पंडित नचलन तिरछा आड़ा,
लोटा लेके दउड़त हंउवन उखड़ल ओनकर नाड़ा,
उन्हें गांव भर दवा बतउलेस,
सावन आयल काऽ।
मुखिया के बखरी पर भर-भर चीलम उड़ल खमीरा,
उनके पिछवारे मेघा के लपक के धईलेस कीरा,
एक कोठरी में मुखियाइन के उठल कमर में पीरा,
लगत हौऽ राजा कजरी होई बाजल ढोल मजीरा,
पुरुवा भक दे गैस बुझउलेस,
सावन आयल काऽ।
अभी हम लोग हँसते और हर हर महादेव का हुंकारा भरते कुर्सी पर सीधे भी नही हुये थे कि  चकाचक चचा ने माहौल का रूख पहचान प्रासंगिक कविता सुनाया

जवन पटाका मारब सरऊ मुंह से फेकबा प्रान
तब  तू होश मे अईबा बच्चू जगजीत सिंह चौहान।

बाद मे श्रोताओं के मॉग पर उनकी ई राजा काशी हौ वाली कविता का पाठ तो होना ही था।

मचर मचर पुरवटवा बोले,सरर सरर फगुनहटी |
चरर चरर चमरौधा बोले,झलके लाल लंगोटी |
- ई राजा काशी हौ
ठहर ठहर के पान घुलाव,बगली दाब बंसौटी |
लहर लहर के राग अलाप,छान छान के बूटी |
-ई राजा काशी हौ
लहर लहर केशरिया छानब,ई तन अइसे छूटी |
लाख सुरहतिंन घेरैं बाकी ,बँधले रहब लंगोटी |
-ई राजा काशी हौ
चना चबेना गंगाजल हौ,गमछा अउर लंगोटी |
संतोषी जिउ मिलिहें तोके खा खा नून और रोटी |
-ई राजा काशी हौ

चकाचक जी के हर छंद के बाद 'ई राजा' बोलते ही श्रोताओं की भीड़ साथ देती "काशी हौ"। किसी स्थानीय कवि के लिये श्रोताओं का यह उन्माद अद्भुत था। चकाचक जी जब बैठने को हुये तो भीड़ उन्हे बैठाने को तैयार नही थी और उन्हे अपनी एक और कविता का पाठ करना ही पड़ा,

"का रे तेजुवा खोल केवाड़ी,आयल हौ जजमान चकाचक //
तीरथ बरत करै वाला हौ,चौचक में रूपया वाला हौ
तनी दाब के खींच रे सरवा,सुच्चामाल गले वाला हौ
सौ पचास क आपन गोटी,सच्चे में बैठे वाला हौ
और देख भड़के न पावे,हफ्तन से ठाले ठाला हौ
आज लगत हौ की खुश हउवन,अपनन पर भगवान चकाचक //
एहरओहर मतदेख होजजमान,भनाभन बढ़ते आव
बाबा क दरबार इहाँ हौ,बत्तीस गंडा इहाँ चढ़ाव
माई क भण्डार इहाँ हौ,सोरह गंडा इहाँ चढ़ाव
छोट मोट देवी देवतन पर,पंचपंच गंडा रक्खत आव
अब त बस हमही रह गइली ,दस क पत्ती एहर बढ़ाव
,बाबा के छाया में अइला,होई हो कल्याण चकाचक //
देख रे ऊ यात्री भटकल हौ,बढ़के तनी बोलाव
मेहररुआ टौटेक हौ,अपने कोठरी में ठहराव
यात्री के तू रगड़ के बूटी,विधी से आज छनाव
रगड़ के बीया चार धतूरा क ओम्मन घोरवाव
छनते सरवा गिर जाई तब,मेहररुआ हथियाव
काशी में त होत रहेला,तन मन धन क दान चकाचक //
का रे तेजुवा खोल केवाड़ी,आयल हौ जजमान चकाचक //...
       बाद के वर्षों मे चकाचक बनारसी मेरे रिश्तेदार निकले और उनसे रम्मन चाचा वाला संबंध जीवन पर्यन्त बना रहा।इसी तरह पं० हरिराम द्विवेदी से आकाशवाणी मे बना चचा भतीजा वाला संबंध और डॉ० शंभुनाथ सिंह जी से स्नेहिल दुलार पाने का सौभाग्य भी मिला। ऊपर से कठोर व सख्त दिखने वाले और अंदर से स्नेह और आशीष उड़ेलने वाले नारियल सदृश व्यक्तित्व के धनी डॉ० शंभुनाथ सिंह जी कब राजू भैया @rajeev के बाबूजी के साथ मेरे लिये भी बाबूजी बन गये पता ही नही चला। बाद के वर्षों मे राजीव भैया ने उनकी स्मृति में साहित्य, समाज और पुरातत्व के लिये समर्पित वाराणसी के प्रतिष्ठित डॉ०शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन से हमें जोड़ा जो आज तक बरकरार है और राजीव भैया आज भी मेरे बड़े भाई की भूमिका मे सदैव मेरे लिये उपलब्ध रहते है।
यह सारी उपलब्धियॉ यूपी कालेज की ही देन है जो मुझ अकिंचन को संभवतः कहीं और प्राप्त होना संभव नही थी।
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क्रमश: ......
अगले अंक मे : छ: माह पढ़ने के बाद बीए का त्रिवर्षीय हो जाना और छात्र संघ चुनाव

व्योमवार्ता /यादें यू पी कालेज की ......(४)

#व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की...(४):व्योमेश चित्रवंश की डायरी

        अक्टूबर नवंबर में दशहरा दीवाली दोनो को मिला कर एक लंबी छुट्टी कालेज मे होती थी। नवप्रवेशी छात्रों विशेषकर दूर से आये छात्रों के लिये यह पहला मौका होता था घर वापस जा के कालेज के दिनचर्या को मिस करते हुये घर परिवार मे जीवन बिताने का। पर हमें लगता है कि ज्यादातर छात्रों के लिये यू पी कालेज का माहौल भूला पाना ज्यादा भारी होता था। दीवाली की छुट्टी खत्म होते ही कालेज पूरी तरह से भर जाता। तब तक सभी अपने अपने ढंग से समय बिताने का जरिया भी खोज लेते। खेल से जुड़े हुये बनारस के हाकी का मक्का कहे जाने वाले शानदार मैदान मे गौरीशंकर मास्टसाब और रामललित सर Ram Lalit Singh के छत्रछाया में, तो क्रिकेट खेलने वाले रणंजय सर के साथ। बास्केटबाल नाथन सर के देखरेख मे तो बालीबाल गुलाब सर के साथ। तब बास्केटबॉल कोर्ट स्विमिंगपुल के सामने पुराने लाईब्रेरी के पीछे हुआ करता था और लड़कियों के लिये रानी मुरार कैम्पस में। एनसीसी के लड़के खुद को रंगरूट के नये ड्रेसअप मे फिट कर के गिरधर सिंह सर, रामसुधार सर Ramsudhar Singh, रामयाद सर और नीलकमल मैडम Neelkamal Singhके कमान मे ड्रिल करते नजर आते थे। तब यू पी कालेज ग्राउण्ड भारतीय हाकी का एक अभिन्न अंग हुआ करता था जहॉ पद्मश्री स्व० मो०शाहिद, नईम, नागेन्द्र सिंह मिण्टू, आर पी सिंह, सुनील सेठ ,शैलेन्द्र सिंह, स्व० विवेक सिंह, प्रशान्त वगैरह डेली प्रैक्टिस को आते थे। तो क्रिकेट मे आज के उत्तर प्रदेश के अम्पायर आर पी गुप्ता, मशहूर अथलीट गुलाब सिंह, अर्जुन सिंह भी शाम को यू पी कालेज मैदान आ ही जाते थे।
                  हम जैसे सख्त अनुशासन को न मानने वालों के लिये सबसे मुफीद जगह एनएसएस थी। बनारसी मिश्रा सर, गणेश सिंह सर , महेन्द्र प्रताप सर के सानिध्य मे हम लोग सप्ताह मे दो दिन सेवा कार्य कम करते कामचोरी ज्यादा। प्राय: हमें और राकेश को सेवा कार्य के बाद प्रोत्साहन प्रसाद के रूप मे समोसा और लालपेड़ा बॉटने की जिम्मेदारी मिलती और हम बड़े ईमानदारी से अपने खास दोस्तों को दो के बदले तीन समोसा और एक की जगह दो लालपेड़ा बॉटने मे कभी भी बेईमानी नही करते थे। बाद मे बॉटने के मेहनताने के रूप मे भी हमारा दो  अतिरिक्त समोसे और दो लालपेड़े पर हक बनता ही था। हम लोग कभी कभी खेल के मैदान मे भी हाथ आजमा लेते थे। हाकी उठाये और चल पड़े मैदान में, पर उसमे कभी नियमितता नही रहने से नियमित खिलाड़ी नही बन सके।कभी  किट पहन के मैदान मे गये तो क्रिकेट खेल लिये, कभी खाली टीशर्ट और लोवर मे गये तो बालीबाल। पर इसका परिणाम यह हुआ कि मैदान के खिलाड़ियों से हमारी अच्छी खासी दोस्ती हो गई। अखिलेश द्वय Akhilesh Singh,Akhilesh Singh, सूर्यभानSuryabhan Singh, राजनRajan Singh, चंद्रबलीChandrabali Singh, स्व०जफर, मार्कण्डेयMarkanday Singh, संजय गुप्ता, मनोज, संजय पाण्डेयSanjay Pandey, रविशंकर सिंह, महेश भैयाMahesh Singh, स्व० रामकुमार, प्रदीप गुप्ता,  संजीवSanjeev Singh, बद्रीविशाल , विजय, महेन्द्र, अजीत और भी कईयों खिलाड़ी हम लोगों के मित्र मण्डली मे बनें तो उनमे से ज्यादातर आज भी संपर्क मे हैं। जो छात्र इन तीनों यानि खेल, एनसीसी और एनएसएस से छूटे उनके लिये शाम बिताने के लिये गेट , महावीरमंदिर और अर्दलीबाजार हुआ करता था। कुछ पढ़ाकू लड़के राजकीय जिला पुस्तकालय मे भी बैठा करते।
       हम हरफनमौला मिजाज के लोग सभी ग्रुपों मे शामिल थे, एनसीसी ,एनएसएस से लेकर खेल के मैदानी दोस्तों तक में। पर आखिर मे हम भी इन तीनों से परे महावीर मंदिर, अर्दलीबाजार पर शाम बिताने वालों मे शामिल हो गये। पर इन दोनों जगहों से भी अलग हमने एक और अन्य जगह तलाशा अपनी अड़ी के लिये वह थी कालेज गेट पर स्व० शरद जायसवाल की ज्ञानप्रसार केन्द्र। तब ज्ञानप्रसार दो दुकानों को मिला कर एक बड़ी दुकान हुआ करती थी उन दोनो दुकानों के जोड़ने वाली गली मे रखे स्टूल से लेकर काउंटर तक हम  ग्रुप मेम्बरान जम जाते और साहित्य से लेकर राजनीति, प्रतियोगिता, खेल, सिनेमा , समाज की बातें होने लगती। जय प्रकाश भाई, समीर कुमार सिंह, प्रेम नारायणPrem Narain Singh, संजय कटिहार, राजीव विश्वास, संतोष सिंह बब्बूSantosh Singh , स्व० संजय श्रीवास्तव, निर्भय सिन्हा गठरी उस बैठकी के नियमित सदस्य थे। प्राय: वहीं अपना क्रिकेट का अभ्यास कर सूर्यभान, संजय पाण्डेय, मनोज और हाकी खेल कर मार्कण्डेय, संजय गुप्ता अखिलेश आ जाते तो हम लोग अर्दली बाजार निकल लेते।
अर्दली बाजार मे जितेन्द्र दीपू, मुशीरMushir Uddin, गप्पूSanjay Kumar Srivastava, चंदूManoj Srivastava, अरविन्दArvindps Srivastava, शफी, राकेश, राजेशRajesh Srivastava, पिंकू, विनय पहले से कुंये के पास जमे रहते वहीं सड़क पर दुनिया जहॉ की बाते कर आठ बजे तक हमारी वापसी होती थी। फिर रात खाना खा कर एक घण्टे दूरदर्शन पर राष्ट्रीय समाचार ओर आधेघण्टे का सीरियल देख सो जाना क्योंकि अब हम लोगों ने अपने को सेक्शन ए मे बदलवा दिया था तो हमारी कक्षाएँ सुबह सात से शुरू हो ११.३० तक खतम हो जाती थी। सुबह उठना पड़ता था तो हम जल्दी सो जाते थे। पढ़ाई का काम कालेज से आने के बाद दोपहर मे होता था। हमारी पढ़ाई और पढ़ाई के तौर तरीके से कभी घर वालों को ऐतराज नहीं था तो वे लोग हस्तक्षेप भी नही करते थे।
          दिवाली की छुट्टी से वापस आते ही १० नवंबर सोमवार से कक्षायें पूरे रौ मे गंभीरतापूर्वक चलने लगी उसी दिन यह सूचना लगाई गई कि कालेज का संस्थापन वार्षिक समारोह २३,२४और २५ नवंबर को है। इसमे जो छात्र सहभागिता करने को इच्छुक हों वे संबधित शिक्षकों को अपना नाम नोट करवा दें। हम नें भी कला संकाय डेलीगेसी इंचार्ज डॉ० राम सुधार सिंह सर Ram Sudhar Singhके पास जा कर वाद विवाद प्रतियोगिता के लिये अपना नाम लिखवा दिया। वाद विवाद का विषय था "औद्योगीकरण पर्यावरण के मूल्य पर नही किया जा सकता।" मैने अपना नाम विषय के विपक्ष मे लिखवाया था और विपक्ष मे बोलने वाला मै एकमात्र प्रस्तावित सहभागी था। जहॉ अन्य छात्र इसके लिये जबर्दस्त तैयारी कर रहे थे वहीं मै बिना कुछ किये लगभग निश्चिंत था। मेरी निश्चिंतता रामसुधार सर के लिये चिंता का सबब बनती जा रही थी। उन्होने कई बार मुझसे कहा कि "तुम अपना भाषण लिख कर मुझे दे दो", पर मेरी समस्या यह थी कि मैने तब तक कुछ लिखा ही नही था तो रोज टालमटोल करता जा रहा था। बात जब डीन और हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ० विश्वनाथ सर के पास पहुंची तो मेरे लचर रवैये को देख  उन्होने भी मेरे ऊपर भरोसा न करने और मुझे हटा कर मेरे बदले किसी और छात्र को मौका देने का सलाह दिया। बहरहाल मुझे हटा  कर किसी अन्य को यह मौका दे दिया गया। संयोगवश उसी वर्ष पं० नारायण गुरू पंचगंगा घाट पर देव दीपावली मनाने की तैयारी कर रहे थे। कुछ संपर्कों द्वारा मेरा जुड़ाव उनसे हुआ तो हम कुल १७ लोग पूरे मनोयोग से उस अनूठे कार्यक्रम की तैयारी मे प्राणपण से जुट गये। चार दिन बाद कार्तिक पूर्णिमॉ,१६ नवंबर रविवार को देवदीपावली कार्यक्रम होना था। हम लोगों ने सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान महाराज बनारस डॉ० विभूति नारायण सिंह को उस कार्यक्रम मे आमंत्रित किया था। तब दीये से लेकर तेल बाती, घाट माला फूल , स्वागत सारी व्यवस्थायें हमी लोगो को करना था। भैरोनाथ से दीये खरीदकर १०१ दीपों को प्रज्वलित कर हम लोगों ने कार्यक्रम का सफल शुभारंभ किया। देवदीपावली #devdeepavali के आयोजन की व्यस्तता मे मै कालेज के कार्यक्रम को लगभग भूल ही चला था। पिछले चार दिनों से कालेज मे पढ़ने के बाद भाग कर  पंचगंगा घाट जाना और कम से कम पॉच से छ: बार घाट की खड़ी सीढ़ीयों पर ऊपर नीचे की कवायद ने ईधर से मुंह मोड़ रखा था। रामसुधार सर को अपना वक्तव्य लिख कर न देने के पीछे यह भी कारण था। वहॉ से  फुरसत पाते ही हम  अपने नियमित दिनचर्या पर आ गये थे। वार्षिक संस्थापन कार्यक्रमो की शुरूआत २० नवंबर से होना था और उसी क्रम मे २१ की शाम को डिग्री कालेज वाद विवाद प्रतियोगिता इण्टर कालेज के हाल मे आयोजित थी। तब आज वाला मल्टीपर्पज आडोटोरियम हाल नही बना था। इण्टर कालेज के पुराने भवन वाला सेण्ट्रल हाल ही साल भर बैडमिंटन कोर्ट और वार्षिक आयोजनों मे इनडोर कंपटीशन के लिये काम मे आता था। जब २१ नवंबर की शाम हम कार्यक्रम देखने पहुंचे तो इण्टर कालेज की वाद विवाद प्रतियोगिता चल रही थी एवं डिग्री कालेज के लिये सहभागियों के नाम पंजीकृत कराने की घोषणा हो चुकी थी। तभी हाल मे मुझे देखते ही राम सुधार सर ने बुलवाया और पूछा कि "तुम्हारा विपक्ष मे बोलने वाला भाषण तैयार है न? " मेरे लिये ये आश्चर्यजनक था क्योंकि मेरी जानकारी मे मेरा नाम  सहभागी सूची से हटा दिया गया था। फिर भी मेरे लिये यह खुद को कालेज पटल पर साबित करने का पहला मौका था तो चुनैतियों से जूझने का आदी मैने तत्काल सहमति दे दी। बस मेरा नाम कला संकाय द्वारा विषय के विपक्ष मे बोले जाने वाले सहभागी रूप मे शामिल हो गया। कला संकाय का क्रम सबसे बाद मे पड़ा था। हमसे पहले न्यू हास्टल के चारों ब्लाक सहित शेष दोनो डिग्री कालेज के छात्रावास, विज्ञान और कृषि संकाय वाले बोल चुके थे। अपनी बारी आने पर मैने अपने सभी विपक्षी खेमे वाले वक्ताओं का जीस्ट लेकर निर्धारित समय मे बोलना शुरू किया। लगभग आधे वक्तव्य सामाप्ति पर छात्रावास वालों को मेरे मे कुछ संभावना दिखी तो उन्होने शोर शराबा मचाते हुये हूट करना शुरू कर दिया। पर मै बिना घबराये अपनी बात पूरी की। मै पहला सहभागी था जो निर्धारित समय मे अपनी पूरी बात रख पाया था क्योंकि इसके पूर्व के सभी प्रतिभागी समय बीतने के बाद भी बोलते रहे थे और अपनी समय सीमा पार कर चुके थे। मुझे कालेज के प्रतियोगिता मे पहली बार द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ ।बाद मे यह जानकारी मिली की बीए द्वितीय वर्ष वाले सज्जन जिन्हे कला संकाय के तरफ से बोलना था वे एक सप्ताह से अपना भाषण रटने के बावजूद मौके पर गायब हो गये। इस प्रतियोगिता ने मुझे मेरे विषय से हट कर हिन्दी वाले अध्यापकों विशेषकर रामसुधार सर का प्रिय बना दिया।
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क्रमश:........
अगले अंक मे संस्थापन समारोह का अखिल भारतीय कवि सम्मेलन......