शनिवार, 11 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / लाकडाऊन मे एक जिम्मेदार कानूनपसंद नजरबंद शहरी की डायरी

व्योमवार्ता/ लाकडाऊन में एक जिम्मेदार कानूनपसंद नजरबंद शहरी की डायरी

लाकडाऊन की जीवनचर्या
(दि० 10अप्रैल 2020,शुक्रवार)

पूर्वाह्न ७.३० बजे, चाय, नित्यक्रिया,
सोशल मीडिया पर ज्ञान प्राप्त किया
८.०० ध्यान,पूजन
८.३० अखबार,
९.०० रामायण साथ मे प्राणायाम
१०.०० भोजन, एक झपकी
११.००व्योमकेश बख्शी
१२.०० मध्याह्न महाभारत
अपराह्न १ से २बजे
अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़े
एक दो किताबें और पलटे
२से ४ लेखन
४ से ६ कुछ इधर उधर किये, चाय, टीवी समाचार
६ से ७ मित्रों से मोबाईल पर वार्ता,
७ से ८ महाभारत, साथ मे भोजन
८से ९ छत पर टहले
९ से १० रामायण
१० से १०.१५ तक चाणक्य की प्रतीक्षा
१०.१५ से १०.३० तक दूरदर्शन को चाणक्य का समय बदलने पर गरियाये और टि्वट कर शिकायत
१०.३०से ११ टीवी समाचार
११ से ११.३० सोशल मीडिया पर ज्ञान बॉटे
११.३० से पूर्वाह्न १.४४ तक यूट्यूब पर पुरानी फिल्म "एक रूका हुआ फैसला" देखे।
१.४४ से२बजे तक कल के बारे मे टाईमपास प्रोग्राम सोचते हुये सो गये।

एक नजरबंद कैदी के लिये इससे बेहतर  कोई अन्य कार्यक्रम हो या सुधार की गुंजाईस हो तो सुझाईयेगा।🙏
(बनारस, ११अप्रैल २०२०,शनिवार)
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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / पीएम-केयर्स और प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष मे सानता एवं अंतर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

व्योमवार्ता/ क्या है PM-CARES और PMNRF? जानिए दोनों के बीच की समानताएं और अंतर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 6अप्रैल 2020
                 पीएम केयर के घोषणा होते ही मोदी विरोध मे अनायास व अनर्गल सवाल उठाने वालों ने यह सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष के रहने पर पीएम केयर की क्या जरूरत थी ? प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क ने Apr 03, 2020 को अपने एक लेख मे दोनो के अंतर को बताने का प्रयास किया है।
                   पूरा विश्व कोरोना वायरस के महामारी से जूझ रहा है। भारत भी इस महामारी से बचने के लिए कई उपाय किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से PM-CARES में दान देने की भी अपील की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब PM-CARES की बात की है तो अब इसको लेकर चर्चा यह है कि आखिर इस PM-CARES की क्या आवश्यकता है जबकि पहले से ही प्रधानमंत्री राहत कोष है। लोग प्रधानमंत्री राहत कोष में क्यों ना दान करें? PM-CARES में क्यों दान करें? आज हम आपको PM-CARES और PMNRF के बारे में बताएंगे और यह भी बताएंगे कि आखिर इन दोनों के बीच क्या अंतर है?
               सबसे पहले बात प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) की करते हैं। यह राहत कोष से 1948 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य भारत के विभाजन के दौरान और उसके ठीक बाद पाकिस्तान से विस्थापित लोगों को सहायता करना था। प्रधानमंत्री राहत कोष के संसाधनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से बाढ़, तूफान या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में मारे गए लोगों और उनके परिवार वालों की मदद के लिए किया जाता है। इसके अलावा दुर्घटनाओं और दंगों से भी पीड़ितों को तत्काल मदद के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष का इस्तेमाल किया जाता है। प्रधानमंत्री राहत कोष का इस्तेमाल चिकित्सीय उपचार प्रदान करने के लिए भी किया जाता है। फंड में पूरी तरह से सार्वजनिक योगदान होता है और इसे कोई बजटीय समर्थन नहीं मिलता है। फंड के कॉर्पस को विभिन्न रूपों में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों और अन्य एजेंसियों के साथ निवेश किया जाता है। संवितरण प्रधान मंत्री के ही अनुमोदन से किए जाते हैं।
          प्रधानमंत्री राहत कोष के बारे में एक बात गौर करने वाली है कि यह संसद द्वारा गठित नहीं किया गया है। विभाजन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि विस्थापितों के मदद के लिए सरकार प्रयास कर रही है परंतु यह पर्याप्त नहीं है और इसीलिए इनकी मदद के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है। इसी के तहत एक राष्ट्रीय कोष की स्थापना की गई। खास बात यह भी है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का गठन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था हालांकि इसके प्रबंध समिति ने हमेशा कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को शामिल किया गया है। हम यह बताते हैं कि जब फंड को बनाया गया था तो कौन-कौन से लोग इसके प्रबंध समिति में शामिल थे।
i) प्रधान मंत्री
ii) भारत की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष।
iii) उप प्रधान मंत्री।
iv) वित्त मंत्री।
v) टाटा ट्रस्टीज़ का एक प्रतिनिधि।
vi) फिक्की द्वारा चुने जाने वाले उद्योग और वाणिज्य का प्रतिनिधि।
           हालांकि बाद में समय-समय पर इसमें नए सदस्यों को जोड़ा गया है। 1985 में एक ऐसा समय आया जब इस फंड प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री को सौंप दिया गया। प्रधानमंत्री को यह भी अधिकार दिया गया कि वह जिसे चाहे उसे फंड का सचिव बना सकते हैं जिस पर फंड के बैंक खातों को संचालित करने का अधिकार होगा। यानि कि यह फंड पूरे तरीके से PMO के द्वारा संचालित किया जाने लगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह निर्णय तब लिया गया था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री होने के नाते इस फंड के प्रभारी थे।
                   अब बात PM-CARES की करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सार्वजनिक योगदान के लिए PM-CARES फंड का गठन किया है। इसके तहत मिलने वाले दान को कोरोना वायरस से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस फंड के अन्य सदस्यों में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री को शामिल किया गया है। इसके अलावा विज्ञान, स्वास्थ्य, कानून और सार्वजनिक क्षेत्रों में अच्छे काम करने वाले लोगों को भी इसके सदस्य के रूप में नियुक्ति की गई है। इस फंड के गठन के साथ ही प्रसिद्ध हस्तियों के साथ-साथ आम लोगों ने भी लाखों की संख्या में अपने योगदान किए हैं। हालांकि एक सवाल बार-बार उठता रहा कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष होने के बावजूद भी पीएम के अंत की शुरुआत क्यों की गई? एक पत्रिका ने दावा किया है कि पीएम के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक है। अतः यह कहना भी गलत नहीं होगा कि PM-CARES प्रधानमंत्री राहत कोष की तुलना में अधिक पारदर्शी है। PM-CARES में सलाहकार बोर्ड की स्थापना का भी प्रावधान है जिसमें चिकित्सा व्यवसाई और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों, शिक्षाविदों, अर्थशास्त्रियों और वकीलों को रखा जा सकता है।
                  PM-CARES को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। कांग्रेस जहां इसे पारदर्शी नहीं बता रही है वहीं भाजपा का कहना है कि कांग्रेस इससे इसलिए नाखुश है क्योंकि इसमें कांग्रेस अध्यक्ष के लिए कोई जगह नहीं है।
साभार: प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
(बनारस,6अप्रैल 2020, सोमवार)
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#प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/ जीत जायेगें हम, सब अगर संग है....

व्योमवार्ता /जीत जाएंगे हम-सब अगर संग हैं : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 5अप्रैल 2020

जापान में पुरानी कथा है।
एक छोटे से राज्य पर एक बड़े राज्य ने आक्रमण कर दिया।
उस राज्य के सेनापति ने राजा से कहा कि आक्रमणकारी सेना के पास बहुत संसाधन है हमारे पास सेनाएं कम है संसाधन कम है हम जल्दी ही हार जायेंगे बेकार में अपने सैनिक कटवाने का कोई मतलब नहीं। इस युद्ध में हम निश्चित हार जायेंगे और इतना कहकर सेनापति ने अपनी तलवार नीचे रख दिया।
अब राजा बहुत घबरा गया अब क्या किया जाए, फिर वह अपने राज्य के एक बूढे फकीर के पास गया और सारी बातें बताई।
फकीर ने कहा उस सेनापति को फौरन हिरासत में ले लो उसे जेल भेज दो। नहीं तो हार निश्चित है।
यदि सेनापति ऐसा सोचेगा तो सेना क्या करेंगी।
आदमी जैसा सोचता है वैसा हो जाता है।
फिर राजा ने कहा कि "युद्ध कौन करेगा?"
फकीर ने कहा," मैं",
वह फकीर बूढ़ा था, उसने कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा था और तो और वह कभी घोड़े पर भी कभी चढ़ा था। उसके हाथ में सेना की बागडोर कैसे दे दे।
लेकिन कोई दूसरा चारा न था।
वह बूढ़ा फकीर घोड़े पर सवार होकर सेना के आगे आगे चला।
रास्ते में एक पहाड़ी पर एक मंदिर  था। फकीर सेनापति वहां रुका और सेना से कहा कि पहले मंदिर के देवता से पूछ लेते हैं कि हम युद्ध में जीतेंगे कि हारेंगे।
सेना हैरान होकर पूछने लगी कि देवता कैसे बतायेंगे और बतायेंगे भी तो हम उनकी भाषा कैसे समझेंगे।
बूढ़ा फकीर बोला,"ठहरो मैंने आजीवन देवताओं से संवाद किया है मैं कोई न कोई हल निकाल लूंगा।"
फिर फकीर अकेले ही पहाड़ी पर चढा और कुछ देर बाद वापस लौट आया।
फकीर ने सेना को संबोधित करते हुए कहा कि "मंदिर के देवता ने मुझसे कहा है कि यदि रात में मंदिर से रौशनी निकलेगी तो समझ लेना कि दैविय शक्ति तुम्हारे साथ है और युद्ध में अवश्य तुम्हारी जीत हासिल होगी।"
सभी सैनिक साँस रोके रात होने की प्रतीक्षा करने लगे। रात हुई और उस अंधेरी रात में मंदिर से प्रकाश छन छन कर आने लगा ।
सभी सैनिक जयघोष करने लगे और वे युद्ध स्थल की ओर कूच कर गए ।
21 दिन तक घनघोर युद्ध हुआ फिर सेना विजयी होकर लौटीं।
रास्ते में वह मंदिर पड़ता था।
जब मंदिर पास आया तो सेनाएं उस बूढ़े फकीर से बोली कि "चलकर उस देवता को धन्यवाद दिया जाए जिनके आशीर्वाद से यह असम्भव सा युद्ध हमने जीता है।"
सेनापति बोला," कोई जरूरत नहीं ।"
सेना बोली ,"बड़े कृतघ्न मालूम पड़ते हैं आप जिनके प्रताप से आशीर्वाद से हमने इस भयंकर युद्ध को जीता उस देवता को धन्यवाद भी देना आपको मुनासिब नही लगता।"
तब
उस बूढ़े फकीर ने कहा , "वो दीपक मैंने ही जलाया था जिसकी रौशनी दिन के उजाले में तो तुम्हें नहीं दिखाई दिया पर रात्रि के घने अंधेरे में तुम्हे दिखाई दिया।
तुम जीते क्योंकि तुम्हे जीत का ख्याल निश्चित हो गया।
विचार अंततः वस्तुओं में बदल जाती है।
विचार अंततः घटनाओं में बदल जाती है।"
                   मोदी जी दिया जलाने की बात कर रहे हैं वह वस्तुतः उपरोक्त प्रक्रिया का ही प्रयोग है। क्योंकि यह निश्चित है कि बाह्य संसाधनों के बल पर कोरोना से आप नहीं जीत सकते , अमेरिका का उदाहरण आपके सामने है। अमेरिका एक ताकतवर परंतु डरा हुआ मुल्क है। इतिहास गवाह है वह युद्ध अपनी धरती पर नहीं लड़ता कि उसके लोग मारे जायेंगे।   आधुनिक काल के इतिहास में यह पहला युद्ध है जिसे उसको अपनी धरती पर लड़ना पड़ रहा है।*
*यह वह मुल्क है जहां एक बार 6 घंटे बिजली आपूर्ति ठप्प हो गई थी तो सैकड़ों लोग डिप्रेशन से मर गए थे। अतः हे भारत के अदम्य जिजीविषा से भरे हमारे बहनों एवं भाईयों हम यह युद्ध आधी जीत चुके हैं हमारे यहां कोरोना पीड़ितो की मृत्यु दर कम है वही मृत्यु को प्राप्त हो रहे है जिन्हें कोई अन्य बीमारी हो या जो जीवन से निराश हो चुके हैं। अतः हे भारत के महामानव आपका कोरोना कुछ नहीं बिगड़ेगा , आपके लिए कोरोना सिजनल फ्लू जैसा बनकर रह जायेगा।*
*बस कुछ सावधानियां बरतें। सामाजिक दूरी बनाए रखें। गाईडलाइन का फाँलो करे। अपने आत्मविश्वास को मजबूत करें अभी बहुत कुछ करना है।
साभार : सोशल मीडिया
(बनारस, 5अप्रैल 2020, रविवार)
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/ वे विरोध मे हैं....... (कविता): व्योमेश चित्रवंश की कोरोना लाकडाऊन मे लिखी कविता, 3अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/
वे विरोध में हैं.............
(कोरोना लाकडाऊन मे लिखी कवितायें)

वे विरोध मे हैं,
क्योंकि विरोध उनका सत्ता से है,
क्योंकि विरोध उनका मोदी से है,
उनका काम है विरोध करना,
क्योंकि विरोध करना उनकी फितरत है,
भले ही वह उनके हित मे न हो,
भले ही वह काम उनके लिए ही हो,
भले ही वह मुल्क और कौम के लिये हो,
परउन्हे विरोध करना है,
क्यों? शायद वे खुद भी नही जानते,
अपने विरोध का मौजूं कारण,
वे कहते है निजाम बदनीयत है,
पर कैसे? उन्ह खुद भी नही मालूम,
क्योंकि उन्हे जान कर भी कुछ नही करना है,
बस विरोध की बातें करनी है उन्हे,
क्यों? वे जानना भी नही चाहते,
उन्हें खुद की नीयति का भी नही पता,
पर वे खुश है विरोध कर,
अंधकूप मे बने रहने में,
बस विरोध करना है,
इसलिये वे विरोध में हैं......

(बनारस,3अप्रैल 2020, शुक्रवार) http://chitravansh.blogspot.in

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/ कितने बौने हो गये है हम....: व्योमेश चित्रवंश की कवितायें, 2अप्रैल 2020, गुरूवार

कितने बौने हो गये है हम........

कोरोना,
बंद है सब कुछ,
गॉव से लेकर शहर महानगर तक,
छोटे से वेटिकन ले लेकर बड़े अमेरिका रूस तक,
सूनसान सड़के बंद बाजार,
खड़ी गाड़ियों के थमे हुये पहिये,
परास्त होती विश्व की महाशक्तियॉ,
घूटने टेकते वैज्ञानिक और चिकित्सक,
छोटे से बहुत छोटे सूक्ष्म अति सूक्ष्म,
ऑखों को नजर न आने वाले,
नन्हे से विषाणु से,
आईना दिखा रहे है हमें,
मंहगें उपकरण आलीशान मकान,
आरामदेह सुरक्षित वातानुकूलित गाड़ियाँ,
पल भर मे सब कुछ नेस्तनाबुत करने का,
दावा करने वाले मिसाईल व परमाणु बम,
आज नतमस्तक हैं हम प्रकृति के आगे,
तोड़ कर प्रकृति की वर्जनायें,
हवाहवाई हो गई है,
प्रकृति को दी जाने वाली हमारी चुनौतियां,
अंततः कितने और कितने बौने हो गये है,
खुद हम......

(बनारस, 02अप्रैल 2020, गुरूवार)
चैत्र रामनवमी,संवत २०७७ वि०
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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/ ओम प्रकाश राय यायावर की आपका रसिया : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 31 मार्च 2020, मंगलवार

व्योमवार्ता/ ओम प्रकाश राय यायावर की आपका रसिया

         कल फेसबुक के आभासी  मित्र छोटे भाई ओम प्रकाश राय यायावर ने अपनी नई नवेली कृति आपकी रसिया भेजा । एक ही बैठकी मे पूरा पढ़ गया बस इसलिये नही कि आजकल कोरोना लाकडाऊन के चलते फुरसत है बल्कि इसलिये भी कि पुस्तक बड़े प्यारे कथानक को सीधे साधे ताने बाने मे बुनती हुई एक प्यारा सी प्रेमकहानी प्रस्तुत करती है। यायावर का नायक इस बार भी गॉव का, कहना न होगा उनके अपने बिहार के एक गॉव का सीधा सरल पढ़ा लिखा जिन्दगी मे  एक अदद रोजगार की तलाश मे भला युवक है जिसे  जाने अनजाने प्यार हो जाता है पर प्यार ते टेढ़ी मेढ़ी चक्करदार गलियों मे घूमते हुये भी कहानी बड़ी सीधे साधे सरल अंदाज मे चलती है और नायक नायिका बार बार नजदीक आ कर भी नियति के बिडंबना से एक होने के लिये मिलते मिलते भी छूट जाते हैं कहानी का कथानक अंत मे एक रोचक अप्रत्याशित मोड़ पर ला कर नायक नायिका के साथ पाठक को भी खड़ा कर देता है। कहानी का आखिरी नतीजा बता देना न सिर्फ़ लेखक अनुज ओम प्रकाश राय यायावर Om Prakash Rai Yayavar के साथ बल्कि उपन्यास के किसलय और काव्या के साथ भी बेईमानी होगी।   
          ओम प्रकाश राय यायावर ने अापकी रसिया को ईमानदारी भरे लेखन के साथ बखूबी से अंजाम दिया है। बधाई सधे लेखन के लिये।
(बनारस,३१मार्च २०२०, मंगलवार)
#आपकारसिया
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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का तीसरा दिन और तंत्र विद्या

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का तीसरा दिन और तंत्र विद्या : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,27मार्च 2020

             तंत्र शास्त्र के संबंध मे सामान्य जन ही नही प्रबुद्ध जनमामस मे भी अनेक प्रकार की भ्रांतिया है। 'तांत्रिक' शब्द का उच्चारण होते ही मनमानस मे भय आतंक का एक घृणायोग्य चित्र उभरता है जो वास्तविकता से एकदम विपरीत है। वास्तविकता यह है ति तंत्र शब्द संस्कृत धातु 'तन्' से बना है जिसका अर्थ है बढ़ाना, विस्तार करना, तानना। तंत्र का शाब्दिक अर्थ व्यवस्था भी है। मै कौन हूँ? कहॉ से आया हूँ? मेरी नीयति क्या है? मानव व्यवस्था तथा ब्रह्माण्ड के अस्तित्व का रहस्य क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्ति हेतु की गई साधना ही तंत्र है। तंत्र का आध्यात्मिक उद्देश्य जाति धर्म उम्र लिंग आदि के भेदभाव से परे साधक अथवा साधिका को कलुषशून्य बना कर उसके तन मन का शुद्धिकरण कर उसे आध्यात्मिकीकरण की ओर ले जाना है। जहॉ साधक समस्त  बंधन मायामोह से मुक्त हो सब मे आदिशक्ति का प्रतिबिंब देखते हुये स्व से साक्षात्कार करता है। तंत्र का विशेष गुण उसकी साधना मे निहित है। वह न तो उपासना है न प्रार्थना। वह देवी के समक्ष निवेदन याचना या पश्चाताप भी नही है । वह साधना पुरूष एवं प्रकृति का मिलन है, ऐसी साधना जो देह मे पुरूष तत्व को मातृतत्व से मिलाती है।
तंत्रशास्त्र के यथार्थ ,उद्देश्य उसके उदभव  विकास इतिहास सिद्धांत साधना पद्धति एवं विभिन्न तांत्रिक संप्रदायों की ठोस एवं प्रामाणिक जानकारी देती है पं०दुर्गा प्रसाद शुक्ल की पुस्तक " तंत्र विद्या का यथार्थ " जिसे आज हमने नवरात्रि के तीसरे दिन और कोरौना के देशव्यापी लाकडाऊन के चौथे दिन पढ़ा। पं० दुर्गा प्रसाद शुक्ल कादिम्बिनी पत्रिका के उपसंपादक रह चुके है और कादिम्बिनी के दीपावली पर निकलने वाले "यंत्र मंत्र तंत्र विशेषांक " के सर्वेसर्वा भी। इनके संपादित कई विशेषांक आज भी मौजूद है।
    दो वर्ष पूर्व क्रय की गई यह पुस्तक आज हमें सामने दिख गई तो नवरात्रि के अंतराल मे इसे पढ़ भी लिया और पढ़ने के बाद तंत्र विद्या के श्वेत पहलू से प्रथम बार साक्षात्कार हुआ। पं० दुर्गा प्रसाद जी ने स्वयं के अध्ययन व अनुभव से संक्षिप्त परन्तु सरल व सारगर्भित शब्दों मे  तंत्र शास्र के सिद्धान्त और साधना , साधना पद्धति के साथ साथ कौल मत, शैव मत व मातृका मत , चार्वाक दर्शन का स्पष्ट परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त आम्नाय का सिद्धान्त, दसो महाविद्या, तीनों भाव, कमलदल ,चक्रानुष्ठान, पंचमकार, षटचक्र  के साथ साथ श्री चक्र,कुंडलिनी शक्ति , बौद्ध तंत्र, ताओ, रसायन व मनोविज्ञान  के  तंत्रशास्त्र मे अस्तित्व व औचित्य का यथार्थ अनुशीलन किया है। एक गूढ़ व नीरस विषय होने के बावजूद बेहद रोचक ढंग से बिवा लाग लपेट के लिखी हुई यह पुस्तक हमारे मन मे तंत्र शास्त्र को लेकर बनी गुत्थियों को निर्भय ढंग से खोलने मे सक्षम रही है। नवरात्रि के साधना काल मे इस पुस्तक को पढ़ना एक आनंददायक अनुभव रहा।
(बनारस, 27 मार्च 2020, शुक्रवार)
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गुरुवार, 26 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020 गुरूवार

                       नवरात्रि के दूसरे दिन व कोरोनावाईरस के लाकडाऊन के तीसरे दिन  घर मे पड़े पड़े हमने अशोक के. बैंकर की लिखी किताब “दशराजन” पढ़ा। इस किताब ने मुझे उतना प्रभावित नही किया,हॉलाकि रोचक लेखन,कहानी और पात्र.अशोक के. बैंकर ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस पूरी कहानी को पेश किया है. इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमारे प्राचीन इतिहास का अंश है,ये कहानी ऋगवेद से ली गयी है.
      ये कहानी है ३४०० ई. पू. की,जहां एक कबीले के राजा ने अपनी प्रजा और कबीले की रक्षा के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ दस राजाओं और उनकी विशाल सेना का सामना किया था. उस वक़्त कबीले के मुखिया सुदास के पास कोई बाहरी मदद नहीं थी बल्कि उसे एक योजनाबद्ध तरीके से घेरा गया था.अपने पांच नदियों वाले कबीले की रक्षा के लिए सुदास ने हर संभव रणनीति का प्रयोग किया और अपने कबीले की रक्षा की. ये पांच नदियों वाला कबीला आज पंजाब के नाम से जाना जाता है.

केवल एक दिन में सभी आक्रमणकारियों के अंत के साथ ख़त्म हुए इस युद्ध को अशोक के. बैंकर ने बखूबी उतारा है.अघोषित युद्ध,एक साथ आक्रमण और सुदास की रणनीति,उसके सहायकों का साथ,गुरु का साथ से लेकर युद्ध की एक-एक घटना का इतना अच्छा वर्णन है कि आपके सामने पूरा चित्र उतर आता है.नायक सुदास अपने कबीले के हर इंसान यहाँ तक की पशु से भी प्रेम करता है,अपमान की स्थिति में भी संयम बनाये रखता है..शायद यही कारण हो सकता है कि खुद को विशाल शत्रु सेना से घिरा हुआ पाने के बाद भी वो समर्पण की बजाय सामना करने का निर्णय लेता है.
      ललस संभवतः प्राच्य इतिहास के बारे मे ज्यादा जानकारी न होने व रोचक अनुवाद न होने के कारण कथानक थोड़ा  धीमा व ऊबाऊ लगी। इतिहास मे कल्पना को शामिल करते हुये आजकल पुरा संस्कृति व इतिहास पर जो उपन्यास लेखन किया जा रहा है उनके लेखकों मे  अशोक के बैंकर का प्रमुख स्थान है उन्होंने प्रयास भी किया है कि ऐतिहासिक उपन्यासों की भॉति संवाद वर्णन और विवरणात्मक संबंध से वह ऐतिहासिक कालखण्ड व पात्र पाठक के मन मानस मे सजीव हो सके। संभवतः बहुत से पाठकों के लिये लेखक का यह प्रयास अद्वितीय व अद्भुत रहा हो और उनको बांधने मे सक्षम रहा हो । हमारे भारत का इतिहास न जाने ऐसी कितनी कही और कितनी अनकही कहानियों को समेटे खड़ा है, जो हमारे लिये ढेर सारी कल्पनाये , मिथक,  व संबंधों के तालमेल का मिश्रण लिये लेखन का बढ़िया मसाला व गारा चूना बन सकता है। दशराजन इसी तालमेल का सुंदर उदाहरण कहा जा सकता है। जो समय बिताने के लिये उपयोगी माना जा सकता है।
        बहरहाल, एक बार पुन: धन्यवाद मित्र राजीव अष्ठाना Rajeeva Kumar Asthana को, इस लाकडाऊन के वर्तमान कालखण्ड मे सोशल डिस्टेंशिंग आईसोलेशन के तीसरे दिन के लिये अपने लाईब्रेरी से पुस्तक भेंजने के लिये।
(बनारस,२६मार्च २०२०, गुरूवार)
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व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

           बासंतिक नवरात्रि संवत २०७७ वि० के पहले दिन 25मार्च 2020 बुधवार, विश्वव्यापी महामारी कोरोना के चलते देशव्यापी लाकडाऊन मे आज कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की सुप्रसिद्ध कृति भगवान परशुराम को पढ़ कर बस अभी समाप्त किया। ईषा से लगभग १५५० वर्ष पूर्व के कथानक मे आर्यावर्त मे आर्य धर्म के संस्थापन संवर्धन , शुद्धिकरण ,व्यापकता और संस्कार-संस्थापन के पृष्ठभूमि मे हमारे पौराणिक युगपुरूष कालजयी महानायक भगवान परशुराम के व्यक्तित्व पर आधारित यह उपन्यास पौराणिक इतिहास का बोध कराता है। आर्य संस्कृति के ऊषाकाल मे सरस्वती और हपद्वति नदियों के बीच फैले आर्यावर्त मे यदु और पुरू, भरत औरतुत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थी और वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरूषों के आश्रमों मे गुंजरित दिव्य ऋचाये, आर्यधर्म का नियमन व संस्थापन कर रही थी परन्तु दूसरी ओर संपूर्ण आर्यावर्त, नर्मदा से लेकर मथुरा तक अनूप प्रदेश मे शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोहममर्षक अत्याचारों से त्रस्त था।ऐसे मे युवा भार्गव परशुराम हैहयराज  की प्रचंडता को चुनौती देते हुये अपनी आर्यनिष्ठ तेजस्विता, संगठन क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के द्वारा  आर्य संस्कृति के ध्वस्त करने के उसके सपनों को ध्वस्त करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के एक वर्ष पूर्व अप्रैल १९४६ मे प्रकाशित प्रशिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद श्री के एम मुंशी की यह पुस्तक पढ़ते हुये आज भी अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती है।
हमे तो इस कोरोना लाकडाऊन पीरियेड मे इस पुस्तक को पढ़ते हुये धर्म, कर्तव्य, साहस और रणनीति के संदर्भ मे कई कई बार आजकल के दौर मे सड़क पर न निकलने, स्वयं को नियंत्रित करने व अदृश्य कोरोना वाइरस से प्रतिरोध करने की अपनी सरकार की नीतियों को समीचीन व्याख्या व नई परिभाषा मिल रही थी। धन्यवाद मित्र राजीव अस्थाना Rajeeva Kumar Asthana जी को एक अच्छी पुस्तक पढवाने के लिये।
(बनारस,26मार्च 2020,गुरूवार,12.37पूर्वाह्न)
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