शनिवार, 20 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ इस अंधेरी रात मे दीपक जलाना कब मना है .....: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20जुलाई 2019

कर्मपथ पत्रिका के स्वाधीनता दिवस विशेषांक हेतु उनके विशेष आग्रह पर

इस अंधेरी रात में दीपक जलाना कब मना है.......

                                         
                                   -व्योमेश चित्रवंश, एडवोकेट

14 -15 अगस्त 1947 की अर्धरात्रि में हमारी स्वाधीनता का अरुणोदय हुआ ।स्वर्ण विहान आया और हमारे देश के इतिहास मे एक अद्भुत अनुभूति पूर्व शब्द जुड़ गया, स्वतंत्रता, स्वाधीनता  और स्वायत्तता । तब से  आज तक गंगा जाने कितना जल प्रवाह समुंद्र को दे बैठी । समय निरंतर अविराम भाव से कालखण्ड पर अपने छाप छोड़ता रहा । इतिहास नई करवटें  लेते हुए हमारी खुद की सत्ता व्यवस्था अपनी पैनी दृष्टि गड़ाए रहा।खुद को नया करने की होड़ में और साल दर साल  बीतते बीतते 72 वर्ष हो गए । यूँ ही इतिहास की दृष्टि से किसी राष्ट्र के  जीवन में 72 वर्ष का कार्यकाल बहुत लंबा नहीं होता किन्तु जिस झंझावात की वजह से इन दशकों में बदलाव आए । सदियॉ वर्षों मे ही सिमट आई ।रातो रात पुश्त दर पुश्त संग संग रहने वाले हम अपनों ने अपनी ही देव भूमि पर एक रेखा खींच  डाली अपनों के भूमि पर देशों के मध्य दूरियां बढ़ती गई फिर दो से तीन देश, अपनो से जूझते , अपनों से परेशान, विकास की लंबी यात्रा पर चलने वाले मुसाफिर , जिसके पास सब कुछ होते हुये भी कुछ नहीं और कुछ नही होते हुये भी सब कुछ ।

समीचीन होगा कि इन 72 वर्षों की उपलब्धियों का, सफलता-असफलता का लेखा-जोखा तैयार किया जाए और देखा जाए कि हमारे राष्ट्र निर्माताओं के कितने सपने साकार हुए और कितने राख हो गए ? हमने इन72 वर्षों मे क्या खोया क्या पाया ? हम कहां से चले थे और कहां पहुंचे?

 जहॉ तक व्यक्तिगत रूप से हमारा  मानना है कि स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि हमारा संविधान है । हम इस विशालतम आबादी वाले विविधता भरे और तरह तरह से विखंडित और विभाजित  देश के लिए एक सर्वमान्य संविधान बना कर  पिछले लगभग छ दशकों से अनेक विकट समस्याओं के बावजूद देश की एकता अखंडता और लोकतंत्र को सुरक्षित रख सके तो यह हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि है और यह हमारे  संवैधानिक व्यवस्था की ही देन है ।

         पर आज जब हम चारों ओर देखते हैं  तो राजनीतिक व्यवस्था चरमराती  हुई दिखाई देती है । परिस्थितियां विषम है, संकटमय है। लगता है हम आज विनाश  की कगार पर खड़े हैं ऐसे अंधे मोड़ पर ,जहां से कोई रास्ता कहीं जाता ही नहीं।हमारी गणना संसार के 10 सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्रों में है। दुनिया भर में किसी अन्य देश में इतने निरक्षर लोग नहीं बसते जितने हमारे यहाँ हैं। गरीबी की रेखा के नीचे लोगों की तादाद भी भारत में सबसे ज्यादा है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? हमी मे से अधिसंख्य लोगों का मानना है कि दोष राजनीतिक व्यवस्था का है। वहीं दूसरे लोग कहते हैं दोष वस्तुतः व्यवस्था को चलाने वालों का है ये ही निकम्मे और निष्ठाहीन निकले। लेकिन क्या ऐसे ही दूसरे पर उंगली उठा देने से हम खुद को बचा सकते हैं ? हो सकता है दोष व्यवस्था का भी हो और व्यवस्था चलाने वालों का भी, पर सबसे अधिक दोषी तो 'हम' है यानि "हम भारत के लोग" ।

 जब भारत अंग्रेजी दासता से मुक्त हुआ और राष्ट्रीय आंदोलन के कर्णधार स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने बैठे तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी विभिन्न प्रकार से विभाजित-विखंडित "हम भारत के" लोगो को किस प्रकार एक सूत्र में पिरो कर एक राष्ट्र का निर्माण किया जाय? संविधान निर्माता चाहते थे कि एक लंबे समय तक गुलामी का दंश झेलने वाले भारतवर्ष में राष्ट्रीयता की चेतना जगे, साम्प्रदायिक भेदभाव व जातिवाद समाप्त हो, देश का आर्थिक विकास हो, गरीबी मिटे और सामाजिक न्याय का वातावरण तैयार हो। संविधान निर्माताओं ने एकता भाईचारा और बराबरी के सपने सजोंये थे और चाहा था भारतीय गणतंत्र में हर गॉव, हर घर और हर झोपड़ी में, हर खेत और खलिहान में स्नवधीनता के बिहान का अनुभव हो, खुशहाली आए, गरीबी बेकारी भूखमरी और अशिक्षा मिटे। चारों ओर आपसी प्रेम और शांति का वातावरण हो। गांधी जी ने हर ऑख के हर आंसू पोछने का आदर्श रखा था तो नेहरू ने संविधान सभा में प्रतिज्ञा की थी कि जब तक आंसू है, गरीबी है ,पीड़ा है ,तब तक आजादी पाने का काम पूरा नही होगा। उनका विश्वास था कि हमारा संविधान भूखे को रोटी और नंगो को कपड़ा देने के साथ  ऐसी व्यवस्था  कायम करेगा जिसके अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार अधिक से अधिक ऊंचे उठने के पूरे के पूरे अवसर मिल सकेंगे ।अगर यह संविधान नहीं कर सका तो वह नेहरू के अनुसार मात्र कागजों का पुलिंदा ही होगा 

              आज हम सब जानते हैं संविधान निर्माताओं के सपने पूरे नहीं हुए हम लोग आज भी उनके कल्पना के राष्ट्र नहीं बन सके। वास्तविकता तो ये है कि पिछले दो दशकों से हमारा समाज जितना विखंडित व विभाजित आज है उतना पहले कभी नही था। नक्शे पर खींची रेखाओं से कहीं  अधिक भयावह होती हैं मन और भावनाओं में पड़ी दरारें।  आज हम जुड़ने के बजाय बिखरे हैं । राष्ट्रीयता व एकता की बातें पुरानी पड़ गई है और जाति धर्म  भाषा क्षेत्रियता संप्रदाय के आधार पर अब नई पहचान बनने लगी है। हमारी नई पीढ़ी के लिये राष्ट्रीयता व देशप्रेम का मतलब घर मे टीवी के सामने बैठ कर क्रिकेट मैच मे भारत के लिये हुर्रै चिल्लाना ही रह गया है। राष्ट्रगान की पहचा व कीमत उनके लिये रोज स्कूली प्रार्थना के बाद गाये जाने वाली महज एक औपचारिकता भर है। वे रामायण महाभारत गीता के राम कृष्ण और अन्य भारतीय महापुरूषों राणा प्रताप, शिवाजी, गांधीजी, नेताजी, भगत सिंह के  बजाय हैरीपाटर और निंजा हथौड़ी को जानते है। नैतिक शिक्षा, नैतिक मूल्य, प्रकृति प्रेम, प्रकृति पूजा जैसे शब्द उनके लिये वर्णमाला के संयोग भर है। परिणाम भी सामने आने लगे है, आज औसतन हर तीसरे बच्चे के ऑख पर चश्मा, शारीरिक कमजोरी, मानक के विपरीत शारीरिक गठन प्रत्यक्ष दिखते है तो परोक्ष रूप से पारिवारिक अशांति, परिवार विघटन, एकल परिवार, एक दूसरे से आगे बढ़ने की अंधी अंतहीन दौड़, कमाने के लिये बड़े शहरों  विदेशों मे गये बच्चो के इंतजार मे बेबस बूढ़ी ऑखे, व्यक्तिगत तनाव, मधुमेह, हृदय दौर्ब्लयता, रक्तचाप, मानसिक विकार जैसी समस्यायें आम हो गई हैं। वोटबैंक बनाने के लिये जातीय व धार्मिक तुष्टिकरण, आरक्षण जैसे विभेदकारी नीति से  प्रतिभा का अवमूल्यन जैसे कारकों ने जातिगत विभेद की खाईं को और चौड़ा किया है। मेरी बिरादरी की मेरी सरकार वाली मान्यता के चलते मन के अंदर तल रहे यह विभाजनकारी प्रभाव सड़कों पर भी दिखने लगे है। ऐसे समय मे अपने संविधान के उद्देश्यों का मूल्यांकन करने पर हमे चंहुओर निराशा ही दिखती है।

                       एक समय था अपनी सारी कमियों, कमजोरियों, मफलिसी और गुलामी के बावजूद अपने को भारतीय कहने में गर्व महसूस करते थे एक हिंदुस्तानी होने का गर्व। किंतु आज स्थिति यह है कि हिन्ददुस्तान में हिंदुस्तानी को छोड़ बाकी सभी मिल जाते हैं पंजाबीी कश्मीरी राजस्थानी मराठी उड़िया, तमिल तेलगू बिहारी,आसामी और ढेरों , पर एक भारतीय को ढूंढने के लिए दिन में भी लालटेम लेकर निकलना पड़ेगा ।आज हम अल्पसंख्यको के कल्याण की बात करते हैं पर सच्चाई तो यह है कि असली अल्पसंख्यक तो  "भारतीय" नामधारी प्राणी हो गया है। आज हममे से कोई यह कहने की हिम्मत क्यो नहीं जुटा पा रहा है कि हमें हिंदू मुस्लिम ,सिख ईसाई , हिन्दी-गैर हिन्दी मे बांटने की कोशिश कर रहा है अर्थात जो भी देेेश को तोड़ने की कोशिश कर रहा है वह देश का दुश्मन है। हर नेता यह सब जानते हुये भी बस इसलिए नहीं कहता क्योकि सच यह है कि आज भारत और भारतीयता के नारे के सहारे कोई वोटबैंक नही बनते हैं बल्कि आज समाज मे वैमनस्यता फैलाकर जाति धर्म भाषा वादी फूट फैला कर फूट के जहर डालकर वोट बैंक बनते हैं तब जाकर संसद और विधानसभा में स्थान मिलते हैं सरकारें बनती हैं और संसदीय लोकतंत्र चलता है।

            पहले अंग्रेजों के लिए कहा जाता था उनकी कूटनीति थी "फूट डालो शासन करो" । किन्तु आज के अधिकांश नेता भी तो वही कुछ कर रहे हैं। सच तो यह  लगता है कि राष्ट्र निर्माण की आवश्यकताओं में और पश्चिमी शैली के लोकतंत्र में सत्ता में आने या बने रहने की शर्तों मे ही परस्पर विरोधाभास है क्योंकि आज जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं या ,दूसरे शब्दों में जिसे हम ढो रहे हैं वह हमारे परिवेश के लिए नहीं, थी, गांधी के सपनों के व्यवस्था तो कदापि नहीं थी। वह डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ,अंबेडकर की कल्पना का प्रसाद भी नहीं थी।उसे लोकनायक जयप्रकाश नारायण नेताओं का भी समर्थन नहीं था। जो संविधान बना वह भारतीय मानस के  सपने का संविधान नहीं था , वह तो अंग्रेजी वातावरण में पले बढ़े, पढ़े लिखे  और अंग्रेजों सभ्यता और पश्चिमी राजनीतिक संस्थाओं से अभिभूत अभिजात वर्ग के कुछ लोगों का आदर्श मात्र था। वस्तुतः लोकतांत्रिक व्यवस्था तो देश के अंतर्मन से प्रस्फुटित होनी चाहिए ,लोगों के बीच से ही उपजनी पनपनी चाहिए ।यहां के लोगों के विचारों मनोभावनाओं,आदर्शों ,मान्यताओं और अनुभवों के अनुरूप नैसर्गिक रूप से विकसित होनी चाहिए ।

अब वक्त आ गया है कि हमें अपनी आस्था का मूल्यांकन करना चाहिए अपने परिस्थिति के अनुरूप व्यापक बदलाव किया जाना चाहिए ।

व्यवस्था के बाद हमें स्वयं को देखना आवश्यक है कि अब तक दूसरों पर उंगलियां उठाते उठाते हमारी उंगलियां भी थकने लगी हैं। सुधार हमें अपने आप से करना है । यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति बोध नही कराएंगे तो आने वाली पीढ़ी की उंगलियों को अपने पर उठने से नहीं रोक पाएंगे ।

        बातें बहुत हो चुकी अब करने का समय आ चुका है। हर एक को अपने अपने स्थान से ही  राष्ट्रीय  पुनर्जागरण के यज्ञ में लगना होगा ।देश के जवान  अगर सीमा पर मुस्तैद हैं तो देश के किसान को भी उनके लिए खेतं मे मुस्तैद होना होगा। यदि अध्यापक नई पीढ़ी को दिशा दे रहे हैं  तो डॉक्टर , वकील को भी समाज को  सही दिशा देने और आदर्श बनने की जरूरत है। कहने का अर्थ यह है कि हम जहां है वहीं से राष्ट्रीय बोध को दृष्टिगत रख अपने कार्य मे लग जायें और नई पीढ़ी, उसकी तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि वह आने वाले भविष्य के लिये नियामक ही वरन वर्तमान से भविष्य तक ले जाने की वाहक भी है। नयी पीढ़ी को अपने आने वाले भविष्य के संरक्षण संवर्धन और शुभदायक बनाने के लिये स्वयं के साथ देश के प्राकृतिक संसाधनों , सिद्धान्तो और मूल्यों को संरक्षित रखना होगा ताकि उन्हे वे सौगात के तरह अपनी आने वाले पीढ़ी को भेंट कर सके।

 (लेखक विधिव्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता है)

संपर्क: शैलनिकेत, शिव 3/18 बी-4एन, शारदा विहार, मीरापुर बसहीं, वाराणसी -221003,

मो० 9450960851, http://chitravansh.blogspot.in 

सोमवार, 1 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ जून 2019 में पढ़ी गई किताबें : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30जून 2019

व्योमवार्ता / जून 2019 में पढ़ी किताबें :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30जून 2019

       आज जून 2019 के आखिरी रात डायरी के इस पृष्ठ को लिखते हुये खुशी महसूस कर रहा हूँ। अप्रैल तक अपने पढ़ने की आदत छूटने से मन मे एक बेचैनी महसूस कर रहा था सोशल मीडिया और मोबाईल ने पढ़ने की आदत को समाप्त तो नही पर बहुत कम कर दिया था, लिहाजा पिछले जन्मदिन को यह संकल्प लिया कि प्रत्येक सप्ताह एक किताब अवश्य पढ़ूगॉ। मई मे लिया गया  यह संकल्प इस माह भी आशुतोष अवढर दानी की कृपा से सफलतापूर्वक संपूर्ण हुआ। प्रभु की कृपा हैऔर खुद को बहुत संतोष अनुभव हो रहा है।
इस महीने कुल चार किताबें हमने पढ़ा जिनमे से तीन तो वर्ष भर पूर्व से खरीदने के बाद आलमारी की शोभा बनी हुई थी। आश्विन संघी की the rozabal line , प्रभात बांधुल्या की बनारस वाला ईश्क, आशुतोष राणा की मौन मुस्कान की मार और शारदेन्दु बंधोपाध्याय की व्योमकेश बख्शी की रहस्यमयी कहानियॉ जाने कब से आलमारी से ताकते हुये हमारा इंतजार कर रही थी।
                     दि रोजाबल लाईन वर्ष 2015 मे दशहरे की छुट्टीयों मे दिल्ली रहने के दौरान लिया था, पचास साठ पेज पढ़े भी फिर किताब धरा गई तो उसका नंबर ही नही आया, हालॉकि उसके बाद आश्विन सांघी की आई किताबों कृष्णा की, चाणक्या चैंट, प्राईवेट इंडिया,दि स्यालकोट सागा, 13 स्टेप्स टू ब्लडी गुडलक को हमने आनलाईन मंगा कर पढ़ लिया था, पर रोजाबल लाईन बेचारी बेकसूर होते हुये भी मेरे पुस्तक संग्रह मे आश्विन सांघी के प्रथम पुस्तक व स्वयं उनकी लिखी हुई प्रथम पुस्तक हो कर भी हसरतों से हमे देखा करती थी। आखिरकार जून के संकल्प मे यह पढ़ ली गई। अकसर हमे आश्चर्य होता है आश्विन सांघी के लेखन क्षमता पर कि वह एक सफल व्यापारी होते हुये भी कैस विभिन्न विषयों की विविधताओं को समेटे इतनी जबर्दस्त रचनायें कर लेते है, उनके लेखन मे विज्ञान धर्म इतिहास मिथक अध्यात्म राजनीति का अद्भुत सामंजस्य रहस्य व रोमांचक कल्पनाओं से जुड़ा रहता है कि आप पूरी किताब पढ़ते समय यह तय ही नही कर पाते कि हम उपन्यास पढ़ रहे है कि विशेष शोधपरक तथ्य। रोजाबल लाईन की कहानी ईसा से २००० वर्ष पूर्व से प्रारंभ हो सन २०१२ तक के कालखण्ड के बिखरे मिथकों को ले कर पिरोई गई है जिसमे गौतम बुद्ध से लेकर जीसस क्राईस्ट और मोहम्मद से होते हुये ओसामा बिन लादेन तक के पात्रों को समेटते हुये रहस्य, षडयंत्र, अपऱाध का तानाबाना है, शुरूआती पृष्ठों मे बिखरे कालखण्ड के मिथक समेटने मे परेशानी होती है पर बाद मे किताब आपको पूरी तरह बॉधने मे सफल रहती है और अपने सवाल कि क्या जीसस भारत आये थे और भारत मे ही उनकी मृत्यु काश्मीर मे हुई थी। कश्मीर का रोजाबल दरगाह किसी मुस्लिम धर्मावलंबी की नही बल्कि जीसस क्राईस्ट की कब्र है । यह स्थापित करने मे लगभग सफल रहती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है किताब के साथ दिये गये संदर्भ सूची जिसमे प्रमाण सहित २०९ संदर्भों का उल्लेख है, वे कहानी को अपने प्रामाणिकता व मूल तक पहुँचाने मे सहायक है। एक और बात जो इस किताब के बारे मे याद रखने लायक है वह यह कि प्रचलित धारा व मान्यताओं के विपरीत लिखे इस कथानक को आश्विन संघी भी पहली बार प्रकाशित करते समय अपने नाम से छपवाने की हिम्मत नही कर सके थे और द रोज़ाबाल लाइन, 2007 में एक छद्‌मनाम शॉन हेगिन्स से स्वयं प्रकाशित करवाया था। इस सिद्धांत पर आधारित यह धर्म शास्त्रीय थ्रिलार कि जीज़स की मृत्यु कश्मीर में हुई थी, बाद में उनके अपने नाम से 2008 में वैस्टलैंड से प्रकाशित हुआ और वैस्टसैलर बन गया और कई महीनों तक राष्ट्रीय वैस्टसैलर सूचियों में बना रहा।
अश्विन व्यवसाय से उद्यमी हैं लेकिन रोमांच विधा में ऐतिहासिक उपन्यास लिखना अश्विन का जुनून और शौक़ है। सांघी ने कैथीड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल, मुंबई, और सेंट ज़ेवियर कॉलेज, मुंबई से शिक्षा प्राप्त की थी और येल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की और क्रिएटिव राइटिंग में पीएचडी किया है।
अश्विन के लेखन व रोजाबल लाईन के बारे समीक्षकों के विचार देखें तो  अश्विन हम सब को विभिन्न दशकों में दुनिया की सैर पर ले जाते हैं तो धर्म, इतिहास और राजनीति के प्रति सांघी का रुझान स्पष्ट झलकता है। तुलनात्मक धर्म, ख़तरनाक रहस्यों और रोमांचकारी कथानक का मेल एक रहस्यपूर्ण उपन्यास रचता है। हमारे लिए रोज़ाबाल वंशावली जो सर्वश्रेष्ठ प्रतिफल समेटे है, वह है आश्चर्यों का ख़ाज़ाना जो इसमें भरा है, जिस प्रकार से इतिहास प्रस्तुत किया जाता है... आनंददायक, हैरान कर देने वाली साधारण बातों के रूप में। इस तरह सांघी आतंकवादी हमलों, गुप्त समाजों, मारे गए प्रोफ़ेसरों, संभ्रमित पादरियों और आकर्षक घातक महिलाओं का ज़बर्दस्त मिश्रण परोसते हैं। एक पंक्ति मे कहें तो रोज़ाबाल वंशावली वह वाक़ई मज़ेदार सवाल पूछती है—अगर ऐसा होता तो?”
           प्रभात बांधुल्या की बनारस वाला ईश्क किताब का शीर्षक देख कर पढ़ने को जी किया। हमने यह स्वीकार करने मे कभी गुरेज नही किया कि बनारस हमारी कमजोरी है। बनारस वाला ईश्क गया से बीएचयू पढ़ने आये एक युवा युगल की इश्किया किस्सागोई है, जिसे मसालेदार और चटकदार बनाने के लिये उसमे छात्र राजनीति का छौंका लगाया गया है। बिहार के मगधी टच जुड़े डायलॉग अच्छे लगते है और प्रेमकहानी को ईश्क प्यार और मोहब्बत के रूमानी लहरों से बिड़ला हास्टल, छित्तूपुर, लंका तक की सैर कराते है । कहानी बनारस से बाहर निकलते ही ठहर सी जाती है जब ठकुराईन के रोड हादसे मे मरने के साथ ही जैसे रूक जाती है। हॉलाकि प्रभात कहानी को खींच कर क्लाईमेक्स तक पहुँचाने की कोशिस करते है और कुछ हद तक कामयाब भी रहे है पर कहानी मे वह जान नही आ पाती है । कुल मिला जुला कर  छात्र जीवन के ईश्क प्रेम व मोहब्बत पर अच्छा उपन्यास है जो पढ़ने के बाद निराश नही करता।
          अभिनेता आशुतोष राणा की लिखी मौन मुस्कान की मार  को पढ़ने की प्रेरणा मेरी छात्र जीवन की छोटी बहन प्रज्ञा मोहले ने दी। प्रज्ञा जबलपुर से है और आशुतोष जी की पड़ोसन व फैन है। प्रज्ञा स्वयं भी साहित्यिक अध्यासु है और हिन्दी साहित्य मे बीएचयू से डाक्टरेट है, यह अलग बात है कि अब वह साहित्यिक क्षेत्र के बजाय जबलपुर के सांस्कृतिक गतिविधियाें मे अधिक क्रियाशील है। बहरहाल बात मौन मुस्कान के मार की। आशुतोष के साहित्यिक प्रतिभा के हम सभी तब से कायल है जब हमने उनकी कविता "हे भारत के राम जगो, मै तुम्हे जगाने आया हूँ " पहली बार सुनी थी। आशुतोष हिन्दी फिल्मों के उन अभिनेताओं मे से है जो मजे हुये विशुद्ध कलाकार है और साहित्यिक व सांस्कृतिक जागरूकता उनके रगों मे बसी है। हमे नही मालूम कि आशुतोष की इससे पहले भी कोई किताब आई थी कि नही पर मौन मुस्कान की मार एक सधी हुई लेखनी का परिणाम लगती है। आशुतोष ने  अपने अगल बगल के पात्रों को अपने शहर के बुंदेलखंडी बोली मे चुटीले व्यंग्यो को पिरो कर अपने मौन मुस्कान की मार को तेज धार दी है जो पढ़ने वाले को बुंदेलखंड की दुनिया मे ले जा कर गुदगुदाती है, और घटना से संबंधित कथानक व पात्रों को अपने आस पास के लोगों मे और अपने जीवन व परिवेश मे खोजने के लिये मजबूर करती है। अपनी बात से शुरू भूमिका से ही आशुतोष का प्रभाव परिलक्षित हने लगता है जो भक्क जी महराज, विष्पाद गुधौलिया, बीसीपी उर्फ भग्गू पटेल, रामरवा लपटा महाराज, यश व राज का चक्कर, मौन मुस्कान की मार  और शार्टकट कटशार्ट तक की कहानियॉ हमे अपने स्थानीय छोटे शहरों के परिवेश से जोड़ती है जहॉ एक सहसंबधता का रिश्ता आज भी दिखता है । इन व्यंग्य रचनाओं को पढ़ते हुये हम अगर भाषा बदल दे तो वह हमे अपनी और बनारस, कानपुर, गोरखपुर जैसो अपने शहरो की अपनी सी कहानी दिखती है। पढ़ के मजा आया कि अपने अास पास के लोगो से जुड़ी छोटे छोटे संस्मरणों को इतना शानदार स्वस्थ व्यंग्य का रूप दिया जा सकता है। निश्चित ही मौन मुस्कान की मार पढ़ने के बाद आशुतोष की आने वाली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी।
       शारदेन्दु बंद्योपाध्याय की व्योमकेश बख्शी की रहस्यमय कहानियॉ  हम सबलके लिये नई नही है। दूरदर्शन पर अपने शुरूआती दिनो मे हमने इस भारतीय जासूसी धारावाहिक को देखा था, एक ऐसा जासूस जो स्वयं को जासूस कहने के बजाय सत्यान्वेषी कहलाना पसंद करता था और उसका किरदार किसी पश्चिमी डिटेक्टिव पात्रो की नकल  न हो कर मूल भारतीय चरित्र था। व्योमकेश की एक दो कहानियॉ अभी तक याद हने के बावजूद जब व्योमकेश बख्शी की रहस्यमय कहाँनियॉ  नजरो के सामे पड़ी तो उसे पढ़ने का लोभ संवरण नही कर पाया। कुल १३० पृष्ठों मे ५ कहानियॉ सत्यान्वेषी, ग्रामोफोन पिन, तरनतुला का जहर , वसीयत का जंजाल, विपदा का संहार कुछ मंहगी लगती है पर आज भी एक बैठकी मे पूरी किताब पढ़ लेने का मोह बनाये रखती है। आज हमारे देश मे ऐसे साफ सुथरे रहस्य रोमांच से भरे आकर्षक कथानक वाले उपन्यासों की कमी खलती है।
कमी तो पढ़ने वालो की भी खलती है , हम अभी हाल मे ही इसी ख्याल को लफ्जों मे कह बैठे " आलमारी की किताबें हसरतों से देखती है हमें, बदल रहे है शौक अब जमाने के।"
(बनारस, 30 जून 2019, रविवार)
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मंगलवार, 25 जून 2019

व्योमवार्ता/ हम सब दोषी है मुजफ्फरपुर के मासूमों की मौत के लिये :व्योमेश चित्रवंश की डायरी,

व्योमवार्ता/ हम सब दोषी है मुजफ्फरपुर के मासूमों की मौत के लिये :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 25 जुलाई 2019

यह पोस्ट आदरणीय सुलखान सिंह  पूर्व पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश के  द्वारा डॉ० तहसीलदार सिंह जी की पोस्ट के हवाले से लिखी गई है, जिसका जोर है कि हम अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर और यथासंभव सरकार पर डालकर अपनी उदासीनता और अकर्मण्यता के अपराध-बोध से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। डा. तहसीलदार सिंह की पोस्ट का भी यही शिक्षा बिन्दु है।

"पढ़िए इसको, और शर्म महसूस करिए। सिर्फ सरकार को गाली देकर हमारा कर्तव्य पूरा नहीं होता, चाहे हम कितना भी ये समझें।
मुजफ्फरपुर हमारे सामूहिक शर्म का उत्सव है, जिसे हम मनाना नहीं चाहते।"
रिपोर्ट कहती है कि चमकी बुखार से वे ही बच्चे पीड़ित हैं जिन्हें उचित पोषण नहीं मिला। चमकी बुखार उन्हीं बच्चों पर ज्यादा असर डाल रहा है जो कुपोषित हैं। सरकार स्कूलों में मध्याह्न भोजन देती है, आंगनबाड़ी द्वारा पोषाहार बंटवाती है, हर विपन्न परिवार को प्रतिमाह राशन उपलब्ध कराती है। इस कार्य के लिए हर जिले में अरबों रुपये खर्च होते हैं। फिर भी बच्चे कुपोषित हैं। इन अरबों रुपयों में सैकड़ों अफसरों, कर्मचारियों की हिस्सेदारी है... इनमें कोई शर्मिंदा होना नहीं चाहता।
मुजफ्फरपुर में मरने वाले बच्चों में 80% लड़कियां हैं। मतलब साफ है कि बच्चियां बच्चों से अधिक कुपोषण की शिकार हैं। आप सौ बार नकारिये, पर यह सच्चाई है कि ग्रामीण निम्नवर्ग लड़कियों के साथ निर्लज्ज भेदभाव करता है।
किसी बूढ़े को यदि एक रसगुल्ला मिले तो वह घर ला कर नाती को ही देता है, नतिनी को नहीं... घर में यदि आधा किलो मीट बने तो लड़कियों के हिस्से में केवल ग्रेवी आती है, मांस नहीं... वैसे निर्लज्ज माँ-बाप को शर्म आनी चाहिए न? पर नहीं आ रही।
गाँव में यह कहा जाता रहा है कि यदि पड़ोसी भूखा है तो दूसरे पड़ोसी के लिए खाना खाना रक्त पीने जैसा होता है। मुजफ्फरपुर के गाँवों में ही असंख्य लोगों ने रक्त पिया है। उन्हें भी शर्म नहीं आ रही...
मरने वालों में अधिकांश बच्चे अनुसूचित वर्ग के हैं। पर रुकिये! अनुसूचित वर्ग के टोले में सरकारी सुविधाओं को पहुँचाने के लिए और देखरेख करने के लिए सरकार ने उसी वर्ग से टोला-सेवक और आंगनबाड़ी सेविकाओं की नियुक्ति की है।
मतलब समझ रहे हैं? मतलब यह है कि अनुसूचितों का हिस्सा खाने में अनुसूचित भी पीछे नहीं। उन गरीब बच्चों का हिस्सा छीन कर खाने वालों को शर्म आनी चाहिए न? पर नहीं आ रही।
सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि राज्य में कोई भूखा नहीं रहे/कुपोषित नहीं रहे। इसकी जिम्मेवारी हर पंचायत के मुखिया और प्रखण्ड के BDO की है। सरकार इसके लिए अकूत धन देती है, और किसी भी पंचायत से वह राशि वापस नहीं जाती। सब जगह खर्च हुई दिखाई जाती है।
फिर भी बच्चे भूखे रहे, कुपोषित रहे... पर मुजफ्फरपुर के उन पंचायतों के मुखियाओं को शर्म नहीं आ रही होगी, वहाँ के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को शर्म नहीं आ रही होगी...
मीडिया स्वयं को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहती है। मुजफ्फरपुर में देश के सबसे प्रसिद्ध चैनल की सबसे प्रसिद्ध कर्मी पहुँचती है और टीआरपी के लिए डॉक्टर को झाड़ते हुए पूछती है, "यहाँ बेड क्यों नहीं लगे हैं?" यह पत्रकार भूल चुकी है कि डॉक्टर का काम चिकित्सा है, बेड लगवाना नहीं। ये काम तो सरकार का है। फिर भी, जो प्रश्न सत्ता से पूछे जाने चाहिए, वे प्रश्न डॉक्टर से पूछे जा रहे हैं और प्रश्नकर्ता को शर्म नहीं आ रही...
पूरे मुजफ्फरपुर में एक दो नहीं, पचासों ट्रस्ट, और N.G.O काम कर रहे हैं। वे सरकार से करोड़ो रूपये पाते भी हैं। जनता की भलाई के लिए काम करने के उनके हजार दावे होंगे, लेकिन जिले में फैले कुपोषण पर उन्हें भी शर्म नहीं आ रही...
जो माँ-बाप अपने लिए दो समय का पौष्टिक भोजन नहीं कमा पाते, वे छह-छह, आठ-आठ बच्चों को जन्म देते हैं। वे एक बार भी नहीं सोचते कि ये बच्चे कहाँ रहेंगे, क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे। शर्म क्या उन्हें नहीं आनी चाहिए? पर नहीं आ रही...
जिस राज्य के बच्चे कुपोषण से मर रहे हों, वहाँ के शासक को शर्म से मर जाना चाहिए। पर लोकतंत्र में सत्ता को शर्म नहीं आती...
इस देश का पूरा सिस्टम सड़ चुका है। हम सब अपने अंदर की भारतीयता को लात मार चुके हैं।

भाई जी, मुजफ्फरपुर के लिए केवल सरकार दोषी नहीं, पूरा समाज दोषी है। हम सब दोषी हैं, हमारी विकृत मानसिकता दोषी है, मीडिया दोषी है, लड़के लड़की में फर्क करने की परंपरा दोषी है, भ्रष्टाचार करने की आदत दोषी है, पालने की हैसियत ना होने के बावजूद बच्चे पैदा करने की सोच दोषी है, बस हमें शर्म नहीं आ रही।

सोचते हैं कि बस सरकार ही शर्म करले।"
(बनारस,25 जून 2019,मंगलवार)
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शनिवार, 15 जून 2019

व्योमवार्ता/गोस्वामी तुलसी दास का अखाड़ा संकट मोचन मंदिर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15जून 2019

व्योमवार्ता/तुलसी दास का अखाड़ा संकटमोचन मंदिर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15जून 2019, शनिवार
                बनारस का संकट मोचन मंदिर अपने श्रद्धालुओं के लिये एक आस्था व विश्वास का जीवन्त केन्द्र है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि किसी भी प्रकार का संकट  हो महाबली हनुमानजी उसको दूर कर देते है। मन मे  बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो की गुहारी लगाते भक्तजन संकटमोचन बाबा को एक भगवान के रूप मे कम अपना संरक्षक अपने बल के रूप मे ज्यादा मानते हैं। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसी दास ने संकट मोचन मंदिर को अॉखाड़े के रूप मे स्थापित किया था और अखाड़े के महन्त की यह परंपरा लगातार चलती ई रही है। यहॉ के अखाड़े के पीठ प्रमुख अर्थात महन्त अपने जीवन निर्वाह के लिये मंदिर पर निर्भर नही रहते बल्कि वे अपने गुण, विद्वता व कौशल से अपना व अपने परिवार का खर्च चलाते है। इसी कारण यहॉ के महन्त संगीत, विज्ञान, तकनीकी जैसे विषयों से जुड़े रहे हैं। वर्तमान महन्त प्रो० विश्वम्भर नाथ मिश्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर है।
                संकटमोचन मंदिर का इतिहास विलक्षण घटनाओं से भरा पड़ा है उन्ही मे एक घटना यहॉ के महंत स्वामीनाथ द्वारा विश्व प्रशिद्ध पहलवान राममूर्ति को कुश्ती मे पटकनी देने से है जो गोस्वामी तुलसी दास के अखाड़े संकटमोचन मंदिर की महत्ता बताती है। घटना का जिक्र आप बनारसी हैं सोशल मीडिया मंच से लिया गया है।
                           90 वर्षीय शिव पहलवान बताते हैं “भइया दस जिला में महन्त स्वामीनाथ जइसन लड़वैया कोई नाहीं रहल।का जाँघ रहल, सीना और बाँह को कटाव…….ओह! पूछ मत………….”। तब बनारस में एक बहुत जबर्दस्त दंगल हुआ था। महन्त स्वामीनाथ बनाम राममृर्ति पहलवान का। राममूर्ति पहलवान तब देश के प्रमुख पहलवान थे। उनके लड़ने की हिम्मत जुटाना बहुत कठिन था।
              राममूर्ति बनारस में आये और उन्होंने चुनौती दी। सारे बनारसी पहलवानों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी थी। लेकिन बनारस की आन-बान-शान की खातिर महन्त स्वामीनाथ जी ने चुनौती को स्वीकारा। पूरे बनारस में तहलका मच गया। स्वामीनाथ जी के पिता तुलसीराम जी ने पुत्र की नादानी पर सिर पकड़ लिया। कुश्ती के चौबीस घंटे पूर्व वे संकट मोचन जी में हनुमान जी के सामने फाँसी का फन्दा गले में डालकर खड़े हो गये और हनुमान जी से बोले- “अगर हार भइल तो फाँसी लगालेब। तुलसी दास जी के अखाड़े के अपने जीअत न हारे देब”।
              स्वामीनाथ जी ने बड़ी जीवंतता से रिआज किया। तुलसी मन्दिर स्थित ‘गुफा के हनुमान जी’ की एक पैर पर खड़े होकर 48 घंटे आराधना की। मुकाबले के दिन पूरा बनारस उमड़ पड़ा था। प्रश्न यह था कि “बनारस को इज्ज्त बची की नाहीं।” राममूर्ति पहलवान शेर की तरह अखाड़े में घूम रहे थे। महन्त स्वामीनाथ जी जैसे ही अखाड़े में उतरे दर्शकों की साँसे टंग गईं। उस्ताद ने मुकाबला शुरू होने की आज्ञा दी एक सेकेण्ड के लिए दोनों ने ताकत आजमाइश की। अभी राममूर्ति अपने को स्थापित करते कि महन्त जी ने ‘धोबिया पाट’ मारा और देश का सिरमौर चारो खाने चित्त हो गया। काशी के लोगों ने महन्त जी को फूलों से लाद दिया। राममूर्ति दुबारा लड़ने की मिन्नत करते रहे, लेकिन जुलूस बनारस की सड़कों पर घूम रहा था। तुलसीराम जी फाँसी का फन्दा हटाकर हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े, खुशी से घंटो रोते रहे। आखिर रोते क्यों न! हनुमान जी ने पूरे बनारस की लाज रख ली थी। कहते हैं कि वह कुश्ती स्वामीनाथ जी ने नहीं, हनुमान जी ने स्वयं लड़ी थी। 95 वर्षीय छोटी गैबी के मल्लू गुरू बताते हैं कि “वइसन दंगल बनारस में कब्बौ नाहीं भइल”। स्वामीनाथ जी ने बनारस की नाम रख ली थी। शिव पहलवान बताते हैं कि तब स्वामीनाथ जी की कुश्ती में तूती बोलती थी। उन्होंने भीमभवानी को भी पटका था, जो राममूर्ति का प्रधान शिष्य था। तभी से अखाड़ा स्वामीनाथ बड़ा सिद्ध अखाड़ों में गिना जाता है।
(बनारस, 15 जून 2019, शनिवार)
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शुक्रवार, 14 जून 2019

व्योमवार्ता/ बस यूँ ही मन में ख्याल आया: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 14जून2019, शुक्रवार

बदल रहे हैं वक्त के साथ नये जमाने के शौक,
आलमारी मे बंद किताबें हसरतों से निहारती है हमें।
-व्योमेश चित्रवंश, 14जून 2019, बनारस
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सोमवार, 10 जून 2019

व्योमवार्ता: सुबह ए बनारस की शुरूआत कचौड़ी जलेबी के साथ: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 10जून 2019

व्योमवार्ता/ सुबह ए बनारस की शुरूआत कचौड़ी जलेबी के साथ : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,10जून 2019, सोमवार

      सुबह ए बनारस की शुरूआत गंगा मईया के घाट से से चल कर मोहल्ले के कचौड़ी जलेबी की दुकानों से होते हुये पान जमा के पूरी होती है। जब पेट मे तर माल पड़ता है, तो मन मिजाज चंगा और चोला मस्त रहता है। आइए विपुल नागर जी से आज जानते हैं बनारस के राजसी नाश्ते कचौड़ी-जलेबी का थोड़ा इतिहास और भूगोल।
आटे की लोई में में पीसी हुई उड़द की दाल की थोड़ी मसालेदार पीठी भर कर उसे बेल कर देसी घी की कढ़ाई में तैराना और फिर गरमागरम सब्ज़ी के साथ परोसना। इस शानदार कचौड़ी के साथ केसरिया जलेबी। ये है बनारस का राजसी नाश्ता।
अगर इतिहास को थोड़ा खँगालें तो कचौड़ी शब्द बना मूल संस्कृत शब्द कच और पूरिका के मेल से। सम्भावना है कि कचपूरिका घिसते घिसते कचपूरीया हुआ होगा और फिर कचउरिया।  संस्कृत में कच का मतलब होता है बाँधना या बंधन। असल में पहले कचौड़ी पूरी के आकार की ना होकर मोदक के आकर की हुआ करती थी जिसमें आटे या मैदे की लोई में ख़ूब सारा मसाला  भर कर बाँध दिया जाता था इसलिए उसे कचपूरिका कहा जाता था। वहीं दूसरी ओर आपको जान कर आश्चर्य होगा कि जलेबी मूल रूप से अरबी भाषा का एक शब्द है और अरब से आयी इस मिठाई को जलाबिया कहा जाता है जिससे शब्द मिला जलेबी। वहीं दूसरी ओर जलेबी को भारतीय व्यंजन मानने वाले इतिहासकार और शोधकर्ता भी हैं। उनके अनुसार इसे पुराने समय में कुंडलिका या जल वल्लिका कहा जाता था। सच्चाई जो भी हो स्वाद इसका बेमिसाल है।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!
बनारस में कचौड़ियों की एक से बढ़कर एक दुकानें हैं। सुबह से ही इन दुकानों पर कचौड़ी और सब्ज़ी बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और उठने लगती है आपको अपनी ओर खींचने वाली सुगंध। ठठेरी बाज़ार में राम भंडार की कचौड़ी की कचौड़ी के अलावा विश्वेश्वरगंज के विश्वनाथ साव, चेतगंज के शिवनाथ साव, हबीबपुरा के मम्मा, डेढ़सी पुल वाली दोनो दुकानों, जंगमबाड़ी के बटुकसरदार, लोहटिया में लक्ष्मण भंडार, सोनारपुरा के वीरू और लंका वाली मरहूम चचिया के साथ साथ राम भंडार परिवार के ही सदस्यों की की नदेसर और महमूरगंज की दुकान की खर कचौड़ी और तर जलेबी प्रसिद्ध है। मौक़ा मिले तो इनमें से किसी भी दुकान पर जाइए। स्वाद पूरा मिलेगा।
        ये कचौड़ी और जलेबी का कॉम्बिनेशन ठीक वैसा ही है जैसे coke और चिप्स का। अब जलेबी तो हिंदुस्तान के हर शहर में बिकती है लेकिन बनारस की अन्य चीज़ों के अलावा बनारस की जलेबी भी थोड़ी ख़ास है. मुझे एक प्रसिद्ध हलवाई ने बताया था कि 'बनारसी हलवाई जलेबी बनाने वाली मैदानी पर बेसन का हल्का-सा फेंट मारते हैं. जलेबियां कितनी स्वादिष्ट बनेंगी, यह फेंटा मारने की समझदारी पर निर्भर करता है. कितनी देर तक और कैसे फेंटा मारना है यह कला बनारसी हलवाई अच्छी तरह जानते हैं.”
बनारस का स्वादिष्ट नाश्ता खर कचौड़ी और तर जलेबी, इस आपाधापी और दौड़ भाग के फ़ास्ट फ़ूड दौर में भी मजबूती से अपनी जगह बनाए हुए है।
आइए खाइए और बनारस के गुण गाइए!
(बनारस,10जून 2019, सोमवार)
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