मंगलवार, 25 जून 2019

व्योमवार्ता/ हम सब दोषी है मुजफ्फरपुर के मासूमों की मौत के लिये :व्योमेश चित्रवंश की डायरी,

व्योमवार्ता/ हम सब दोषी है मुजफ्फरपुर के मासूमों की मौत के लिये :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 25 जुलाई 2019

यह पोस्ट आदरणीय सुलखान सिंह  पूर्व पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश के  द्वारा डॉ० तहसीलदार सिंह जी की पोस्ट के हवाले से लिखी गई है, जिसका जोर है कि हम अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर और यथासंभव सरकार पर डालकर अपनी उदासीनता और अकर्मण्यता के अपराध-बोध से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। डा. तहसीलदार सिंह की पोस्ट का भी यही शिक्षा बिन्दु है।

"पढ़िए इसको, और शर्म महसूस करिए। सिर्फ सरकार को गाली देकर हमारा कर्तव्य पूरा नहीं होता, चाहे हम कितना भी ये समझें।
मुजफ्फरपुर हमारे सामूहिक शर्म का उत्सव है, जिसे हम मनाना नहीं चाहते।"
रिपोर्ट कहती है कि चमकी बुखार से वे ही बच्चे पीड़ित हैं जिन्हें उचित पोषण नहीं मिला। चमकी बुखार उन्हीं बच्चों पर ज्यादा असर डाल रहा है जो कुपोषित हैं। सरकार स्कूलों में मध्याह्न भोजन देती है, आंगनबाड़ी द्वारा पोषाहार बंटवाती है, हर विपन्न परिवार को प्रतिमाह राशन उपलब्ध कराती है। इस कार्य के लिए हर जिले में अरबों रुपये खर्च होते हैं। फिर भी बच्चे कुपोषित हैं। इन अरबों रुपयों में सैकड़ों अफसरों, कर्मचारियों की हिस्सेदारी है... इनमें कोई शर्मिंदा होना नहीं चाहता।
मुजफ्फरपुर में मरने वाले बच्चों में 80% लड़कियां हैं। मतलब साफ है कि बच्चियां बच्चों से अधिक कुपोषण की शिकार हैं। आप सौ बार नकारिये, पर यह सच्चाई है कि ग्रामीण निम्नवर्ग लड़कियों के साथ निर्लज्ज भेदभाव करता है।
किसी बूढ़े को यदि एक रसगुल्ला मिले तो वह घर ला कर नाती को ही देता है, नतिनी को नहीं... घर में यदि आधा किलो मीट बने तो लड़कियों के हिस्से में केवल ग्रेवी आती है, मांस नहीं... वैसे निर्लज्ज माँ-बाप को शर्म आनी चाहिए न? पर नहीं आ रही।
गाँव में यह कहा जाता रहा है कि यदि पड़ोसी भूखा है तो दूसरे पड़ोसी के लिए खाना खाना रक्त पीने जैसा होता है। मुजफ्फरपुर के गाँवों में ही असंख्य लोगों ने रक्त पिया है। उन्हें भी शर्म नहीं आ रही...
मरने वालों में अधिकांश बच्चे अनुसूचित वर्ग के हैं। पर रुकिये! अनुसूचित वर्ग के टोले में सरकारी सुविधाओं को पहुँचाने के लिए और देखरेख करने के लिए सरकार ने उसी वर्ग से टोला-सेवक और आंगनबाड़ी सेविकाओं की नियुक्ति की है।
मतलब समझ रहे हैं? मतलब यह है कि अनुसूचितों का हिस्सा खाने में अनुसूचित भी पीछे नहीं। उन गरीब बच्चों का हिस्सा छीन कर खाने वालों को शर्म आनी चाहिए न? पर नहीं आ रही।
सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि राज्य में कोई भूखा नहीं रहे/कुपोषित नहीं रहे। इसकी जिम्मेवारी हर पंचायत के मुखिया और प्रखण्ड के BDO की है। सरकार इसके लिए अकूत धन देती है, और किसी भी पंचायत से वह राशि वापस नहीं जाती। सब जगह खर्च हुई दिखाई जाती है।
फिर भी बच्चे भूखे रहे, कुपोषित रहे... पर मुजफ्फरपुर के उन पंचायतों के मुखियाओं को शर्म नहीं आ रही होगी, वहाँ के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को शर्म नहीं आ रही होगी...
मीडिया स्वयं को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहती है। मुजफ्फरपुर में देश के सबसे प्रसिद्ध चैनल की सबसे प्रसिद्ध कर्मी पहुँचती है और टीआरपी के लिए डॉक्टर को झाड़ते हुए पूछती है, "यहाँ बेड क्यों नहीं लगे हैं?" यह पत्रकार भूल चुकी है कि डॉक्टर का काम चिकित्सा है, बेड लगवाना नहीं। ये काम तो सरकार का है। फिर भी, जो प्रश्न सत्ता से पूछे जाने चाहिए, वे प्रश्न डॉक्टर से पूछे जा रहे हैं और प्रश्नकर्ता को शर्म नहीं आ रही...
पूरे मुजफ्फरपुर में एक दो नहीं, पचासों ट्रस्ट, और N.G.O काम कर रहे हैं। वे सरकार से करोड़ो रूपये पाते भी हैं। जनता की भलाई के लिए काम करने के उनके हजार दावे होंगे, लेकिन जिले में फैले कुपोषण पर उन्हें भी शर्म नहीं आ रही...
जो माँ-बाप अपने लिए दो समय का पौष्टिक भोजन नहीं कमा पाते, वे छह-छह, आठ-आठ बच्चों को जन्म देते हैं। वे एक बार भी नहीं सोचते कि ये बच्चे कहाँ रहेंगे, क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे। शर्म क्या उन्हें नहीं आनी चाहिए? पर नहीं आ रही...
जिस राज्य के बच्चे कुपोषण से मर रहे हों, वहाँ के शासक को शर्म से मर जाना चाहिए। पर लोकतंत्र में सत्ता को शर्म नहीं आती...
इस देश का पूरा सिस्टम सड़ चुका है। हम सब अपने अंदर की भारतीयता को लात मार चुके हैं।

भाई जी, मुजफ्फरपुर के लिए केवल सरकार दोषी नहीं, पूरा समाज दोषी है। हम सब दोषी हैं, हमारी विकृत मानसिकता दोषी है, मीडिया दोषी है, लड़के लड़की में फर्क करने की परंपरा दोषी है, भ्रष्टाचार करने की आदत दोषी है, पालने की हैसियत ना होने के बावजूद बच्चे पैदा करने की सोच दोषी है, बस हमें शर्म नहीं आ रही।

सोचते हैं कि बस सरकार ही शर्म करले।"
(बनारस,25 जून 2019,मंगलवार)
http://chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 15 जून 2019

व्योमवार्ता/गोस्वामी तुलसी दास का अखाड़ा संकट मोचन मंदिर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15जून 2019

व्योमवार्ता/तुलसी दास का अखाड़ा संकटमोचन मंदिर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15जून 2019, शनिवार
                बनारस का संकट मोचन मंदिर अपने श्रद्धालुओं के लिये एक आस्था व विश्वास का जीवन्त केन्द्र है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि किसी भी प्रकार का संकट  हो महाबली हनुमानजी उसको दूर कर देते है। मन मे  बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो की गुहारी लगाते भक्तजन संकटमोचन बाबा को एक भगवान के रूप मे कम अपना संरक्षक अपने बल के रूप मे ज्यादा मानते हैं। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसी दास ने संकट मोचन मंदिर को अॉखाड़े के रूप मे स्थापित किया था और अखाड़े के महन्त की यह परंपरा लगातार चलती ई रही है। यहॉ के अखाड़े के पीठ प्रमुख अर्थात महन्त अपने जीवन निर्वाह के लिये मंदिर पर निर्भर नही रहते बल्कि वे अपने गुण, विद्वता व कौशल से अपना व अपने परिवार का खर्च चलाते है। इसी कारण यहॉ के महन्त संगीत, विज्ञान, तकनीकी जैसे विषयों से जुड़े रहे हैं। वर्तमान महन्त प्रो० विश्वम्भर नाथ मिश्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर है।
                संकटमोचन मंदिर का इतिहास विलक्षण घटनाओं से भरा पड़ा है उन्ही मे एक घटना यहॉ के महंत स्वामीनाथ द्वारा विश्व प्रशिद्ध पहलवान राममूर्ति को कुश्ती मे पटकनी देने से है जो गोस्वामी तुलसी दास के अखाड़े संकटमोचन मंदिर की महत्ता बताती है। घटना का जिक्र आप बनारसी हैं सोशल मीडिया मंच से लिया गया है।
                           90 वर्षीय शिव पहलवान बताते हैं “भइया दस जिला में महन्त स्वामीनाथ जइसन लड़वैया कोई नाहीं रहल।का जाँघ रहल, सीना और बाँह को कटाव…….ओह! पूछ मत………….”। तब बनारस में एक बहुत जबर्दस्त दंगल हुआ था। महन्त स्वामीनाथ बनाम राममृर्ति पहलवान का। राममूर्ति पहलवान तब देश के प्रमुख पहलवान थे। उनके लड़ने की हिम्मत जुटाना बहुत कठिन था।
              राममूर्ति बनारस में आये और उन्होंने चुनौती दी। सारे बनारसी पहलवानों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी थी। लेकिन बनारस की आन-बान-शान की खातिर महन्त स्वामीनाथ जी ने चुनौती को स्वीकारा। पूरे बनारस में तहलका मच गया। स्वामीनाथ जी के पिता तुलसीराम जी ने पुत्र की नादानी पर सिर पकड़ लिया। कुश्ती के चौबीस घंटे पूर्व वे संकट मोचन जी में हनुमान जी के सामने फाँसी का फन्दा गले में डालकर खड़े हो गये और हनुमान जी से बोले- “अगर हार भइल तो फाँसी लगालेब। तुलसी दास जी के अखाड़े के अपने जीअत न हारे देब”।
              स्वामीनाथ जी ने बड़ी जीवंतता से रिआज किया। तुलसी मन्दिर स्थित ‘गुफा के हनुमान जी’ की एक पैर पर खड़े होकर 48 घंटे आराधना की। मुकाबले के दिन पूरा बनारस उमड़ पड़ा था। प्रश्न यह था कि “बनारस को इज्ज्त बची की नाहीं।” राममूर्ति पहलवान शेर की तरह अखाड़े में घूम रहे थे। महन्त स्वामीनाथ जी जैसे ही अखाड़े में उतरे दर्शकों की साँसे टंग गईं। उस्ताद ने मुकाबला शुरू होने की आज्ञा दी एक सेकेण्ड के लिए दोनों ने ताकत आजमाइश की। अभी राममूर्ति अपने को स्थापित करते कि महन्त जी ने ‘धोबिया पाट’ मारा और देश का सिरमौर चारो खाने चित्त हो गया। काशी के लोगों ने महन्त जी को फूलों से लाद दिया। राममूर्ति दुबारा लड़ने की मिन्नत करते रहे, लेकिन जुलूस बनारस की सड़कों पर घूम रहा था। तुलसीराम जी फाँसी का फन्दा हटाकर हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े, खुशी से घंटो रोते रहे। आखिर रोते क्यों न! हनुमान जी ने पूरे बनारस की लाज रख ली थी। कहते हैं कि वह कुश्ती स्वामीनाथ जी ने नहीं, हनुमान जी ने स्वयं लड़ी थी। 95 वर्षीय छोटी गैबी के मल्लू गुरू बताते हैं कि “वइसन दंगल बनारस में कब्बौ नाहीं भइल”। स्वामीनाथ जी ने बनारस की नाम रख ली थी। शिव पहलवान बताते हैं कि तब स्वामीनाथ जी की कुश्ती में तूती बोलती थी। उन्होंने भीमभवानी को भी पटका था, जो राममूर्ति का प्रधान शिष्य था। तभी से अखाड़ा स्वामीनाथ बड़ा सिद्ध अखाड़ों में गिना जाता है।
(बनारस, 15 जून 2019, शनिवार)
http://chitravansh.blogspot.com

शुक्रवार, 14 जून 2019

व्योमवार्ता/ बस यूँ ही मन में ख्याल आया: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 14जून2019, शुक्रवार

बदल रहे हैं वक्त के साथ नये जमाने के शौक,
आलमारी मे बंद किताबें हसरतों से निहारती है हमें।
-व्योमेश चित्रवंश, 14जून 2019, बनारस
http://chitravansh.blogspot.com

सोमवार, 10 जून 2019

व्योमवार्ता: सुबह ए बनारस की शुरूआत कचौड़ी जलेबी के साथ: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 10जून 2019

व्योमवार्ता/ सुबह ए बनारस की शुरूआत कचौड़ी जलेबी के साथ : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,10जून 2019, सोमवार

      सुबह ए बनारस की शुरूआत गंगा मईया के घाट से से चल कर मोहल्ले के कचौड़ी जलेबी की दुकानों से होते हुये पान जमा के पूरी होती है। जब पेट मे तर माल पड़ता है, तो मन मिजाज चंगा और चोला मस्त रहता है। आइए विपुल नागर जी से आज जानते हैं बनारस के राजसी नाश्ते कचौड़ी-जलेबी का थोड़ा इतिहास और भूगोल।
आटे की लोई में में पीसी हुई उड़द की दाल की थोड़ी मसालेदार पीठी भर कर उसे बेल कर देसी घी की कढ़ाई में तैराना और फिर गरमागरम सब्ज़ी के साथ परोसना। इस शानदार कचौड़ी के साथ केसरिया जलेबी। ये है बनारस का राजसी नाश्ता।
अगर इतिहास को थोड़ा खँगालें तो कचौड़ी शब्द बना मूल संस्कृत शब्द कच और पूरिका के मेल से। सम्भावना है कि कचपूरिका घिसते घिसते कचपूरीया हुआ होगा और फिर कचउरिया।  संस्कृत में कच का मतलब होता है बाँधना या बंधन। असल में पहले कचौड़ी पूरी के आकार की ना होकर मोदक के आकर की हुआ करती थी जिसमें आटे या मैदे की लोई में ख़ूब सारा मसाला  भर कर बाँध दिया जाता था इसलिए उसे कचपूरिका कहा जाता था। वहीं दूसरी ओर आपको जान कर आश्चर्य होगा कि जलेबी मूल रूप से अरबी भाषा का एक शब्द है और अरब से आयी इस मिठाई को जलाबिया कहा जाता है जिससे शब्द मिला जलेबी। वहीं दूसरी ओर जलेबी को भारतीय व्यंजन मानने वाले इतिहासकार और शोधकर्ता भी हैं। उनके अनुसार इसे पुराने समय में कुंडलिका या जल वल्लिका कहा जाता था। सच्चाई जो भी हो स्वाद इसका बेमिसाल है।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!
बनारस में कचौड़ियों की एक से बढ़कर एक दुकानें हैं। सुबह से ही इन दुकानों पर कचौड़ी और सब्ज़ी बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और उठने लगती है आपको अपनी ओर खींचने वाली सुगंध। ठठेरी बाज़ार में राम भंडार की कचौड़ी की कचौड़ी के अलावा विश्वेश्वरगंज के विश्वनाथ साव, चेतगंज के शिवनाथ साव, हबीबपुरा के मम्मा, डेढ़सी पुल वाली दोनो दुकानों, जंगमबाड़ी के बटुकसरदार, लोहटिया में लक्ष्मण भंडार, सोनारपुरा के वीरू और लंका वाली मरहूम चचिया के साथ साथ राम भंडार परिवार के ही सदस्यों की की नदेसर और महमूरगंज की दुकान की खर कचौड़ी और तर जलेबी प्रसिद्ध है। मौक़ा मिले तो इनमें से किसी भी दुकान पर जाइए। स्वाद पूरा मिलेगा।
        ये कचौड़ी और जलेबी का कॉम्बिनेशन ठीक वैसा ही है जैसे coke और चिप्स का। अब जलेबी तो हिंदुस्तान के हर शहर में बिकती है लेकिन बनारस की अन्य चीज़ों के अलावा बनारस की जलेबी भी थोड़ी ख़ास है. मुझे एक प्रसिद्ध हलवाई ने बताया था कि 'बनारसी हलवाई जलेबी बनाने वाली मैदानी पर बेसन का हल्का-सा फेंट मारते हैं. जलेबियां कितनी स्वादिष्ट बनेंगी, यह फेंटा मारने की समझदारी पर निर्भर करता है. कितनी देर तक और कैसे फेंटा मारना है यह कला बनारसी हलवाई अच्छी तरह जानते हैं.”
बनारस का स्वादिष्ट नाश्ता खर कचौड़ी और तर जलेबी, इस आपाधापी और दौड़ भाग के फ़ास्ट फ़ूड दौर में भी मजबूती से अपनी जगह बनाए हुए है।
आइए खाइए और बनारस के गुण गाइए!
(बनारस,10जून 2019, सोमवार)
http://chitravansh.blogspot.com

रविवार, 9 जून 2019

व्योमवार्ता/ बनारस मे मणिकर्णिका महाशमसान की अखण्ड चिता धूनी और बाबा “काल भैरव”  : व्योमेश चित्रवंश की डायरी       

व्योमवार्ता/ बनारस मे मणिकर्णिका महाशमसान की अखण्ड चिता धूनी और बाबा “काल भैरव”  : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 9जून 2019                         

बनारस, काशी, वाराणसी सब एक ही हैं, लेकिन जब बात इस शहर की हो, तो मानो सबकुछ बहुत पीछे छूट जाता है। हम खुद को इतने बौने और अज्ञानी नजर आते हैं, जैसे आकाशगंगा में चींटी या उससे भी छोटे। खैर, विषयांतर होने से पहले लौटते हैं काशी पर, जिसके रक्षण की जिम्मेदारी युग-युगांतर से यहां के कोतवाल “काल भैरव” पर है। जी हां, समूचे जगत को धर्म-अध्यात्म का पाठ पढ़ाने वाली सबसे न्यारी हमारी प्यारी काशी नगरी की आन-बान-शान हैं काल भैरव। तो चलिए, अपने अल्प ज्ञान से काशी के कोतवाल को समझने की कोशिश करते हैं। बहुत पहले हमने बनारस के कोतवाली पुलिस थाने के कोतवाल के बारे मे एक पोस्ट (बनारस, अजब मिजाज का गजब शहर ,बाबा कालभैरो : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 अगस्त 2017, सोमवार http://chitravansh.blogspot.com ) लिखा था कि इस थाने मे थाना प्रभारी की कुर्सी पर कोई नही बैठता बल्कि बाबाकालभैरव की फोटो थाना प्रभारी की कुर्सी पर स्थापित रहती है, यहॉ पर कार्यरत थाना प्रभारी बगल की कुर्सी पर बैठ कर अपना कामकाजकानून व्यवस्था आदि देखते है। आज फेसबुक पर प्रियंका राय की एक पोस्ट मिली कि मणिकर्णिका के महाश्मसान मे अखण्ड जल रह चिताओं का संबंध भी बाबा काल भैरव से ही है तो इस जानकारी को साझा करने का मन करने लगा।
       शिव की क्रोधाग्नि से उत्पन्न हुए काल भैरव को काशी का ‘कोतवाल’ कहा जाता है। काल भैरव के दर्शन व आराधना के बिना काशी विश्वनाथ की पूजा-अर्चना व काशी-वास पूर्ण सफल नहीँ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार काशी के व्यवस्था संचालन की जिम्मेदारी शिव के गण संभाले हुए हैं। उनके गण भैरव हैं, जिनकी संख्या 64 है एवं इनके मुखिया काल भैरव हैं। शिव के सातवें घेरे में बाबा काल भैरव का स्थान है। इनका वाहन कुत्ता है, इसलिए कहा जाता है, यहां विचरण करने वाले तमाम कुत्ते काशी के पहरेदार हैं।
प्राचीन काल में बाबा काल भैरव का मंदिर कब और किसने बनाया स्पष्ट नहीं होता, पर अकबर के शासन काल में संपूर्ण काशी क्षेत्र में राजा मानसिंह ने सवा लाख देवालयों का या तो निर्माण कराया या नव शृंगार। उसी में इस देवालय की भी गणना की जाती है। वर्तमान मंदिर को साल 1715 में दोबारा बाजीराव पेशवा ने बनवाया था। मंदिर की बनावट तंत्र शैली के आधार पर है और प्रथम दर्शन से ही इसकी प्राचीनता का स्पष्ट अनुभव होता है। यहां गर्भगृह में ऊंचे पाठ पीठ पर कालभैरव की आकर्षक व प्रभावोत्पादक विग्रह देखी जा सकती है, जो चांदी से मढ़ी है और भक्त वात्सल भाव से ओत-प्रोत है। ईशान कोण पर तंत्र साधना करने की महत्वपूर्ण  स्थली है।
मार्गशीष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यहां रात में बाबा काल भैरव की सवा लाख बत्ती से महाआरती की जाती है।
बाबा विश्वनाथ के बाद बाबा काल भैरव का सबसे बड़ा स्थान है। इस शहर के राजा हैं और बाबा काल भैरव इस शहर के सेनापति हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाबा भैरव ने जब काल भैरव का रूप धारण किया, तो नेत्रों से क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो रही थी। इस अग्नि से लोगों को बचाने के लिए शिव जी ने काल भैरव से बोला कि अपना मुख महाश्मशान मणिकर्णिका की ओर करिए, तब से लेकर आज तक श्मशान की अग्नि बुझी नहीं है।
(प्रयागराज, 9जून 2019, रविवार])
http://chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 8 जून 2019

व्योमवार्ता/ "ये शहर बनारस तेरे हवाओं के बगैर ये सांसे अधूरी सी हैं।" : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 8 जून 2019 ,शनिवार

व्योमवार्ता / "ये शहर बनारस तेरे हवाओं के बगैर ये सांसे अधूरी है।"

घाटो और मंदिरो के शहर के नाम से प्रसिद्ध काशी की सुबह जंहा काकी के कचौड़ी जलेबी के भोग से शुरू होती है तो, दूसरी तरफ चाय के टपरी पर बकैती से और बाकी दिन भर तो कोने-खोपचे में अपने श्रद्धा अनुसार लोग चिलम के धुआँ में उतराते रहते है,
वहीं शाम होते ही लंका यादव, ख़ादिम और बीबीसी विधान सभा जिसकी प्रतिनिधित्व की बागडोर हमारे युवा लौंडो के हाँथ में उनकी कैंपेनिंग शुरू हो जाती है, पर ये कैंपेनिंग न वोट मांगने के लिये होती है न चुनाव जीतने के लिये, ई तो कन्या के साथ नैन मटक्के के लिये होती है और हो भी क्यों न रंडूओ की संख्या में इजाफा जो दिन प्रतिदिन होती जा रही है,
पर भईया इन्हीं जमघट के बीच और बनारस एक ऐसी जगह जंहा प्रवेश द्वार तो है पर निकास द्वार नही है, क्यों कि काशी में रहने की लत ऐसी है जो कि चरस से भी बुरी है चाह कर भी कोई दूर नही हो सकता है और अगर जो दूर होता है तो ऐसे तड़पता है जैसे बिन पानी के मछली
कुछ खास बात इस शहर की
प्रवेश द्वार पर बौद्ध स्थल सारनाथ तो दूसरी तरफ शिक्षा की राजधानी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वंही भारत का दूसरा संसद अस्सी घाट जंहा का एक-एक बच्चा से लेके बुढ़वा तक कैबिनेट मंत्रिमण्डल का पदाधिकारी और सांसद होता है, जिसको कुछ बोलने से पहले ना सोचना होता है न बोलने के बाद माफ़ी माँगना होता है सब अपने में गुरु है, कौनो चेला नही
और भोसड़ी के सबका अपने में एक से बढ़ के एक भौकाल रहता है, मोदी चा भी आ जाये तो चूरन हो जायेंगे भौकाल से,
वंही दूसरी तरफ कैंट स्टेशन से 6 किलोमीटर की दुरी पर है अपना राजघाट पुल जंहा की बात और रौनक ही कुछ और ही है, रात में मानो ऐसा लगता है की चांदनी के साथ आसमां जमीन से अठखेलियां कर रहा हो, वंही किष्णमूर्ति संस्था का स्कूल चार चाँद लगाता है
तो वसंता कालेज की लड़कियों का कॉलेज से निकलता हुआ झुंड और उनकी खिलखिलाती हुई मुस्कान फिजा में एक अलग तरह की हवा बिखेर देती है, जिसमे नशा का पैमाना बिना एल्कोहल के चरम सिमा पे पंहुचा रहता है,
अगर शराबी देखे तो उतर जाये और होश वाला देखे तो चढ़ जाये, मोड़ पे गोल गप्पे वाले चच्चा का गोल गप्पा तो जैसे बिन सीजन के आम वाली फिलिंग देते है, न खाओ तो निमोनिया हो जाये और दू गो खा लो तो जैसे लगता है, पेट का गुब्बाड़ा बन गया हो और उधर से गुजरते हुये लड़को की बटेर की तरह टुकुर टुकुर लड़कियों को देखना,
सीआईडी के एसीपी प्रद्युमन के तरह आंख गड़ाये हो, ओहि जगह है लाल खाँ का रौजा अब तो ऐतिहासिक धरोहर कम युगलों के चोंच लड़ऊल का ठीहा ज्यादा बन गया है
राजघाट पुल पे फिल्माया उ गाना एक दम उसके लिए फिट बैठता है की "तू किसी रेल से गुजरती है मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ"
वंही पुल को देख भोसड़ी के कुन्दनवा का परेम और उसकी फटफटिया, तो फैजल खाँ और उसका चिलम रह रह के याद आते है!
"ये शहर बनारस तेरे हवाओं के बगैर ये सांसे अधूरी है"।"
स्रोत; सोशल मीडिया
(प्रयागराज, 8जून 2019)
http://chitravansh.blogspot.com

रविवार, 2 जून 2019

व्योमवार्ता/एक अपील पर्यावरण के मुहिम मे इस बच्ची के साथ देने की: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, ैंजून 2019

एक अपील.......

👍बनारस की बेटी बैठी है हड़ताल पर।👍

जब लोग 46 डिग्री तापमान में घर से बाहर निकलने में कतराते है। तब एक बनारस की बेटी जो कि कक्षा बारहवीं की छात्रा है, नाम साक्षी है।ये लगातार 5 दिनों से बीच गोदौलिया चौराहे पर कड़कती धूप में सिर पर मात्र एक गमछा रखे। हाथ में दो तख्तियों पर प्रकृति सुरक्षा के खतिर सरकार से कुछ मांग लिये हड़ताल पर बैठी है। जिसमें प्रमुखता से प्लास्टिक पर बैन, धुंए से निजाता, AC में कमी करने के मांगो को लेकर हड़ताल पर बैठी है। साक्षी से जब मैने पूछा कि आप दिन- भर तख्तिया पकड़े बैठी रहती है। क्या कोई इस पर ध्यान देता है। साक्षी ने बड़े धैर्यता पूर्वक कहा जैसे, आज आप पूछने चले आये है। उम्मीद करती हूं कि आगे उच्च स्तरीय लोग भी पूछने आएगे और इस मुहिम में साथ देगे। इस प्रतिक्रिया पर जब हमने उनसे उनके घर वालो की राय जाननी चाही तो उन्होंने बड़ी ही प्यार से बोला कि थोड़ी जिद्दी हूं। घर वाले मना ही जाते है। साक्षी के इस हड़ताल को देखकर कई लोग उन्हें पागल समझ रहे है। लेकिन जहाँ तक मुझे लग रहा है। समाज को ऐसे पागलो कि जरूरत है। आपको बता दे कि बीते तात्कालिक 2019 आम चुनाव में पर्यावरण सुरक्षा का कही दूर-दूर तक मुद्दों में शामिल नही था। पक्ष-विपक्ष के किसी भी राजनेता ने गलती से इस मुद्दे को अपनी जुबान पर आने तक नही दिया जबकि ऑस्टेलिया के आम चुनाव में इस बार पर्यावरण सुरक्षा सबसे प्रमुख मुद्दा है। साक्षी जो अभी बारहवीं की छात्रा है और पर्यावरण को लेकर इतना बड़ी सोच रखती है। उनके जज्बे को सलाम कीजिए।उन तक सोशल मीडिया के माध्यम से ही अपनी साहस भेजिए और अपने प्राकर्तिक पर्यावरण के साथ ही सामाजिक पर्यावरण के प्रति थोड़ा जागरुक होइए।
मेरा आप सभी सम्मानीय जनता से अनुरोध है कि पर्यावरण के लिए चलाए गए साक्षी द्वारा छोटे से अभियान को आप सभी लोग अपना समर्थन दें .

- व्योमेश चित्रवंश, सूर्यभान सिंह, प्रतीक पाण्डेय, राजीव श्रीवास्तव, अजय यादव,डॉ०कुलदीप सिंह, मनोज श्रीवास्तव, संजय श्रीवास्तव, अशोक पाण्डेय,डॉ०ओ पी सिंह, कैप्टन प्रवीण श्रीवास्तव, डॉ० अरविन्द कुमार सिंह, कमल नयन मधुकर, संजय राय, सजल जल प्रहरी, सुशान्त श्रीवास्तव, अजय श्रीवास्तव, अंकित विश्वकर्मा, अंकुर विश्वकर्मा, विजय चौबे, राजीव गोंड़, मुंशी प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र लमही, सरस्वती शिशु मंदिर बसहीं, राजीव कुमार सिंह शरिफा, डॉ० रोली सीडब्लूसी, डॉ० राजेश श्रीवास्तव, प्रमोद आर्य,वेद प्रकाश आर्य
एवं हमारी वरूणा के समस्त सदस्यगण
(बनारस)
http://chitravansh.blogspot.com