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शनिवार, 1 अगस्त 2020

व्योमवार्ता/ ट्वेल्थ फेल, एक अच्छा व रोचक उपन्यास 

व्योमवार्ता/ ट्वेल्थ फेल, एक अच्छा व रोचक उपन्यास : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,1जुलाई 2020

शनिवारीय लाकडाऊन मे आज अनुराग शर्मा की ट्वेल्थ फेल पढा। आईपीएस मनोज शर्मा पर आधारित “12th Fail Book”- ट्वेल्थ फेल उपन्यास” मे कैसे एक 12 वी फ़ैल पुलिस सेवा में आईपीएस अधिकारी बना की कहानी बेहद रोचक ढंग से लिखी गई है । बुंदेलखण्ड के मुरैना के जौरा कस्बे के परिवेश और भाषा से शुरू हुई कहानी यूपीएससी मे बैठे साक्षात्कारमण्डल के सदस्यों के हमारे गॉवो के प्रति नजरिये का बेहतरीन चित्रण है।
                जब हम छोटे होते हैं, तबसे ही हमसे डाक्टर, इंजीनियर और पायलट बनने की उम्मीद की जाने लगती है। और हमारे घर के सभी लोग हमारे बड़े और समृद्ध इंसान होने की कामना करने लगते हैं।यही बात हमारे मन मस्तिष्क में भी बैठ जाती है। और हम भी बड़े होकर डाक्टर इंजीनियर कलेक्टर पाईलट आईएएस पीसीएस बनने का इरादा कर लेते हैं। और बड़ा आदमी बनने के सपने मन मे  बना लेते  हैं। और जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं। हमारे सपनो का सफर कठिन होता जाता है।
ऐसे ही संघर्ष की कहानी हम आपको आज बताने जा रहे हैं। यह कहानी मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के IPS मनोज शर्मा की है। वर्तमान में मनोज शर्मा मुंबई पुलिस में एडिशनल कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं।उनके जीवन के संघर्ष पर लिखा गया यह उपन्यास ट्वेल्थ फेल पठनीय है।
(बनारस, 1जुलाई 2020)
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#किताबें_मेरी_दोस्त
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गुरुवार, 16 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ ईमरजेंसी की इनसाईड स्टोरी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ ईमरजेंसी की इनसाईड स्टोरी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16जनवरी 2020

जब देश मे इमरजेंसी लगी थी तो हम चार पॉच साल के उमर के रहे होगें। ईमरजेंसी खत्म होने के बाद चुनावों मे अपने परिजनों के जोश की हल्की हल्की यादें है हमारे जेहन में। जब अपने चाचा के साथ गॉव वालों को चक्र मे हलधर का पीला हरा झण्डा उठाये साथ मे हम लोग भी जोर जोर से नारा लगाते थे "जेपी, जनता जयप्रकाश'और ' जयप्रकाश का विगुल बजा है, हवा नही यह ऑधी है'। थोड़े बड़े हुये तो इमरजेंसी मे हुये सरकारी दमनतंत्र के ढेरों किस्से सुनते थे पर कोई प्रामाणिक इतिहास नही पढ़ा । ईमरजेंसी के बीस साल , पचीस साल और तीस साल पूरे होने पर अखबारों मे इन घटनाओं और कई लोगों का संसमरण पढ़ने को मिला तो उत्सुकता और बढ़ती गई। हाल मे ही प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर की लिखी पुस्तक  "ईमरजेंसी की इनसाईड स्टोरी" मिली तो उसे पढ़ने से खुद को रोक नही पाया। हालॉकि दिसंबर मे खूब किताबें पढ़ने के बाद जनवरी मे पता नही क्यों किताबें पढ़ने की गति अत्यंत धीमी होगई है, शायद ठंड के काऱण या छुट्टियों के पश्चात काम के बोझ से, फिर भी जब ईमरजेंसी के बारे मे पढ़ने बैठा तो पूरा कर के ही उठा। ईमरजेंसी हमारे लोकतंत्र मे
सत्तर के दशक का कड़ुआ इतिहास है , जिसे परत दर परत नैय्यर जी ने बेहद खूबसूरती से ईमरजेंसी के पीछे की सच्ची कहानी को शब्दों मे पिरोया है। इमरजेंसी के घटनाओं की शुरुआत उड़ीसा में 1972 में हुए उप-चुनाव से हुई। लाखों रुपए खर्च कर नंदिनी सत्पथी को राज्य की विधानसभा के लिए चुना गया था। गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के इस मुद्दे को प्रधानमंत्री के सामने उठाया। उन्होंने बचाव में कहा कि कांग्रेस के पास इतने भी पैसे नहीं कि वह पार्टी दफ्तर चला सके। जब उन्हें सही जवाब नहीं मिला, तब वे इस मुद्दे को देश के बीच ले गए। एक के बाद दूसरी घटना होती चली गई और जे.पी. ने ऐलान किया कि अब जंग जनता और सरकार के बीच है। जनता जो सरकार से जवाबदेही चाहती थी और सरकार जो बेदाग निकलने की इच्छुक नहीं थी।’
आखिर क्यों घोषित हुई इमरजेंसी और इसका मतलब क्या था, यह आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि तब प्रेरणा की शक्ति भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मिली थी और आज भी सबकी जबान पर भ्रष्टाचार का ही मुद्दा है। एक नई प्रस्तावना के साथ कुलदीप नैयर जी ने वर्तमान पाठकों को एक बार फिर तथ्य, मिथ्या और सत्य के साथ आसानी से समझ आनेवाली विश्लेषणात्मक शैली में परिचित कराया है। वह अनकही यातनाओं और मुख्य अधिकारियों के साथ ही उनके काम करने के तरीके से परदा उठाया है। भारत के लोकतंत्र में 19 महीने छाई रही अमावस पर रहस्योद्घाटन करनेवाली एक ऐसी पुस्तक, जिसे पढ़ कर राजनेताओं और उनके चाटुकार अधिकारियों के काकस के कुतंत्र की सच्चाई पता चलती है। किताब के अंत मे परिशिष्ट रूप मे दिये मात्र मारूति के संदर्भ मे लिखें खण्ड को ही पढ़ लिया जाय तो यह कटु सत्य सामने आता है कि एक परिवार के लिये किस तरह पूरे शासनतंत्र को बौना कर के येन केन प्रकारेण लाभान्वित किया गया। सरकार मे बिना किसी पद पर रहे संजय गांधी के समक्ष किस तरह चाटुकार नेताओं और चमचे अफसरान घुटने टेके रहते थे यह सोच के भी आज हैरानी होती है।
कुल मिला कर अपने उद्देश्यों को पूरा कर इमरजेंसी के कटु इतिहास को बेनकाब करने मे सफल रही है नैय्यर जी की यह किताब।
#किताबें मेरी दोस्त
(बनारस, 16 जनवरी 2020, गुरुवार)
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गुरुवार, 2 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ अजीतभारती की किताब "घरवापसी ", व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 2जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ अजीतभारती की किताब "घरवापसी ", व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 2जनवरी 2020
    बिहार के बेगूसराय से चल कर दिल्ली मे डेरा डंडा जमायें वर्तमान समय के मेरे सबसे पसंदीदा पत्रकारों मे से एक अजीत भारती जी की किताब 'घर वापसी ' पढ़ के अभी फुरसत पाया हूँ।अजीत भारती जी की इससे पहले  "बकर पुराण" नाम की लिखी किताब पढ़ा था पर "घरवापसी"मे  मुझे बेहद समीचीन समस्या पर लिखी और आज के पढ़े लिखे प्रतिभाशाली नवयुवकों की अपनी माटी के लिये कुछ करने की तड़प और कुछ करने की जिद दिखी, शायद यही मेरे इस किताब के बारे मे लिखने का कारण भी बना। यूँ तो अजीत भारती जी भी अपने माटी से जुड़ कर अपने लोगो को आज के मीडिया विशेष मे विषव्यापित कर रहे विशेष लोगों के  छद्म कुटिल उद्देश्यों से सनी मानसिकता को उजागिर करने के जिद मे लगे है। ऑपइण्डिया के अपने विश्लेषण के माध्यम से वे कुटिलता भरे विषव्यापित कर रहे स्वनामधन्य कथित पंथनिरपेक्ष कहे जाने वाले खुद अपने ईमानदारी का ढिंढोरा पीटने वाले सेकूलर पत्तलकारों की उन्ही के विशेष अंदाज मे उनके कथित समाचार प्रस्तुतियों का जो पोस्टमार्टम करते हैं उसे देख तबियत मस्त हो जाती है और अनायास ही देश की नीतियों को बचाने और संस्कारों के लम्बरदार बनने वाले मीडिया मठ वाले अपनी बड़ी बड़ी आँखे नचा नचा कर गंभीर शैली मे सपाट कहने की शैली मे आमजन को भरमाते उन खास लोगों की नीयत का खुलाशा होते देख सुन होंठ अपने आप मुस्कराने लगता है।
बहरहाल बात  " घर वापसी " की। घरवापसी भी बिहार , पूर्वी उत्तर प्रदेश के गंगा के विशाल मैदानी क्षेत्र से गये उन हजारों युवकों के ऑखों मे  बसे उन सपनों की कहानी है जिन्हे वह चाह कर भी सोई ऑखों से भूल नही पाता और जगती ऑखों मे कटु जिम्मेदारियॉ उन्हे पूरा नही करने देती।यूँ तो विस्थापित युवा के संघर्ष और आंतरिक संवाद यहाँ भी दिखते हैं, लेकिन संदर्भ अलग हो जाता है। ‘घरवापसी’ के मूल में संघर्ष है। यह संघर्ष एक बच्चे का अपने जीवन के उद्‌देश्य को लेकर है जो कि लगातार उसके अंदर कुलबुलाता रहता है। वह इससे परेशान होता है, और इससे निकलने का हर प्रयास करता है। यह रिश्तों की कहानी है जहाँ पिता-पुत्र, पति-पत्नी, दोस्ती जैसे वैयक्तिक रिश्तों के साथ-साथ व्यक्ति का अपने समाज के साथ बने रिश्ते को भी जगह दी गई है। हम वही होते हैं जो हमारा समाज हमें पालकर बनाता है।व्यक्ति तरह-तरह के वातावरण से ली गई हवाओं के ख़ून तक में संचारित होने से वो बनता है जो वो बन जाता है। हमारा दौर, पहले के तमाम दौरों की तरह, मिश्रित और बनावटी वास्तविकताओं का दौर है। सूचनाएँ आती हैं, जाती हैं, हम उनके हिसाब से, उन्हें समझते हुए, खुद को उनके अनुरूप, विपरीत, या निरपेक्ष रहते हुए व्यक्तित्वमें बदलाव लाते, या नहीं लाते हैं।बिहार से बाहर आ चुकी एक पूरी पीढ़ी के भीतर यह संघर्ष चलता रहता है। कहने का सीधा मतलब यह है कि हमारे अंदर कई लोग होते हैं। किताबों में लिखे शब्दों से लेकर फ़ेसबुक, व्हाट्‌सएप्प, दोस्तों के बीच की बातों में और पारिवारिक जगहों पर हम अलग-अलग व्यक्ति होते हैं। हर जगह हमारी आकाँक्षाएँ अलग होती हैं, संघर्ष अलग होता है। सुखमय वर्तमान अपनी विस्थापित जड़ों को नई मिट्‌टी में सींच तो रहा है, लेकिन वो पुरानी नम तासीर नहीं मिलती। दो दुनिया के बीच फँसा हमारा जीवन न तो दिल्ली का हो पाता है, न बेगूसराय के रतनमन बभनगामा गाँव का। वो बहुत कुछ करना चाहता है, लेकिन सब भीतर ही कहीं क़ैद रह जाता है।विस्थापन का सबसे बड़ा दर्द अपने घर को छोड़कर बाहर आना नहीं है। उस दर्द को आप अपने नए परिवार के साथ जी लेते हैं। आप ख़ुद को समझा लेते हैं कि आपके बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए आपका विस्थापित होना सही है। लेकिन एक बड़ा दर्द हमेशा यह रहता है कि आप उसी गली में दोबारा जा पाते तो उसे थोड़ी बेहतरी दे पाते। हर बार गाँव जाते वक़्त रिक्शा वाले से यह पूछ बैठना कि ‘अरे अभी भी सड़क नहीं बनी’, या ‘दहेज के लिए अभी भी जला देते हैं’, उसी दर्द का विस्तार है। आपके मन में यह आता है कि इसमें कुछ बदलाव कर सकते आप, लेकिन वो हो नहीं पाएगा। क्योंकि अपने भविष्य के सामने समाज का भविष्य हमेशा पीछे रह जाता है। बहुत कम लोगों में यह हिम्मत होती है कि जब वो सड़क पर खड़ा हो तो वापस मुड़ जाए।
डॉ. विवेकी राय जब उस सड़क पर खड़े हुए तो उन्होंने कुछ और चुना। उनके सामने भी परिवार, बेहतर जीवनशैली, बेहतर भविष्य की नींव का पत्थर पड़ा था। साथ ही, उनके सामने ही वो गाँव भी था जिसने उन्हें इस लायक बनाया था कि वे अपने भविष्य को बेहतर कर सकें। समाज भी एक परिवार होता है, वो भी एक माँ-बाप का जोड़ा है जो आप में निवेश करता है। हमारी पीढ़ी माँ-बाप को भी त्याग देती है, और समाज के नाम पर उसके पास कुछ वैसे फ़ोन नंबर के अलावा कुछ नहीं होता जिससे आनेवाले कॉल को वो ख़ाली वक़्त में भी उठाने से पहले सोचने लगता है। घरवापसी के अंतर्द्वंद्व से हमारी पीढ़ी हर रोज़ जूझती है।वही अंतर्द्वंद्व इस कहानी के मुख्य पात्र रवि का भी है। उसके अवचेतन में कोई नोचता है, खरोंचता है, चिल्लाता है… लेकिन उसके चेतन का विस्तार, उसके वर्तमान की चमक उस छटपटाहट को बेआवाज़ बनाकर दबा देते हैं। रवि अपनीअपूर्णताओंको जीते हुए, उनसे लड़ते हुए, बचपन में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर का पीछा करता रहता है कि उसे क्या बनना है। अपने वर्तमान में सामाजिक दृष्टि से ‘सफल’ रवि का अपने अवचेतन के सामने आने पर, ख़ुद को लंबे रास्ते के दो छोरों को तोलते हुए पाना, और तय करना कि घर लौटूँ, या घर को लौट जाऊँ, ही ‘घरवापसी’ की आत्मा है।
          अजीत की यह छोटी सी किताब पूरे कथानक को वास्तविक समस्या से ही नही बॉधती बल्कि पाठक को भी किताब पढ़ने के दौरान खुद से छूटने नही देती।
(बनारस,2जनवरी 2020)
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