अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
गुरुवार, 28 मई 2026
#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं......
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
देव दीपावली ( बनारस पर कविता -10)
बनारस के गंगा घाट पर
रात है पूर्णिमा की
पर आज चांद भी उतर आया है लजा कर
छिपा है कहीं दीयों के रोशनी के कोने में
उसे आज अपनी रोशनी व चमक फीकी लग रही
घाट पर झिलमिलाते दीपों की कतारों से
केवल देवता ही नही, असुर गंधर्व,ऋषि भी
देख देख के प्रमुदित हो रहे चमकते प्रकाश को
कही उलाहना भी है उनके मन में चांद के प्रति
और कही प्रताड़ना भी चांद से
देखो आज बनारस के घाटों पर कितने चांद उतरे है
तुम्हे भ्रम है कि तुम अकेले रोशनी बिखेरते हो
पर निर्विकार बैठे है काशी पुराधिपति शिव
अपने विश्वनाथ धाम में
हमेशा की तरह सुख दुख पाप पुण्य से परे
अपने नन्दी के साथ अलमस्त, निर्विचार
उनके लिये जैसे त्रिपुरासुर का वध
सामान्य सी घटना हो
और अपने पुराधिपति पार्वतेपति
शंकर की तरह अलमस्त निर्विकार भाव से
देव दीपावली के दिये जला रहा काशी
आदि केशव से अरसी तलक
अपने उल्लास से.......
काशी, देवदीपावली,25.11.2025
Upon the steps of the Ganga ghats in Banaras.
It is the night of the full moon,
Yet even the moon has come down today, struck with shyness,
Hiding somewhere in a quiet corner of the lamplight—
Feeling its own glow and brilliance pale
Before the rows of shimmering earthen lamps lining the ghats.
Watch with pure delight, mesmerized by this blazing light.
In their hearts, there is a gentle teasing of the moon,
And a playful rebuke as they whisper to it:
"Look, how many moons have descended upon the ghats of Banaras today!
You lived under the illusion that you alone scatter light across the dark."
Enshrined within his Vishwanath Dham.
As always, he exists far beyond joy and sorrow, sin and virtue,
Lost in his own bliss alongside Nandi—utterly carefree and thoughtless,
As though the slaying of Demon Tripurasur
Were just another ordinary event.
Of its sovereign lord, the consort of Parvati—
Kashi continues to light the lamps of Dev Deepawali,
Stretching all the way from Adi Keshav to the shores of Assi,
Overflowing with its own eternal ecstasy...
मंगलवार, 7 अप्रैल 2026
बनारस की सुबह (बनारस पर कविता -9)
Each at its own hour, in its own unique way,
From the sacred hours before dawn until nine,
As the sun shifts from a fiery red to a bright yellow.
From Kaithi to Kandwa,
Every neighborhood and every village
Has its very own definition,
Its own tradition and practice of Subah-e-Banaras.
In fact, this practice is deeply personal—
Guided solely by the mood and whim
Of each individual Banarasi.
Baths at Dashashwamedh Ghat, offering prayers to the rising sun,
While his son, Maheep, heads out
At four-thirty in the morning straight to the gym.
The daughter, Bhavna, joins
The Subah-e-Banaras yoga sessions at Assi Ghat
Alongside her dearest friend, Nisha—
Who comes just to listen,
Fulfilling her love for music before her upcoming wedding
As an eager listener to the cultural programs playing on Assi’s morning stage.
As early as four o'clock, waiting for the daily newspaper,
Because by four-thirty, his regular customers start pouring in—
Who, while sipping tea, serve as the ultimate news anchors
For the entire neighborhood and all of Banaras.
Piping-hot kachoris begin to surface,
And Bhaggu, the sweet-maker, is busy frying jalebis,
Shouting orders left and right to his helpers, Munnava and Pappu.
Among the newspaper hawkers sorting through their daily bundles.
Is fully absorbed in adorning and decorating the idol of Hanumanji,
For a sea of regular devotees begins to gather from the first light of dawn.
In his frantic rush to reach the mosque for the Fajr prayers—
For the moment he hears the Azaan, he scrambles to get ready,
Terrified of missing even a single unit of his prayer.
Upon his growing son, Suresh,
Who, instead of feeding and watering the cows and buffaloes,
Lies hidden under his bedsheet, completely glued to his mobile screen.
With people buying fresh produce from the morning vegetable markets after their early walks.
To the labor market at Ardali Bazar,
Every single neighborhood wakes up to its own distinct morning
In our beloved Banaras—
A morning quite apart from that grand spectacle
That unfolds gracefully along the steps of the Ganga,
Stretching all the way from Assi to Rajghat.
रविवार, 29 मार्च 2026
बनारस पर कविता (8)
नये साल पर.........
कुछ तो है अलग सा
इस शहर में
तभी तो कहते है
अलमस्त निर्विकार, अव्यक्त काशी
कुछ तो है
जब पूरी दुनिया पश्चिमी रंग में
रंग कर उसके चमक ने खोयी है
तो यहां विश्वनाथ धाम में
तीन से चार लाख की भीड़ खड़ी है
नये साल की शुभेच्छाओं के लिये
और आभार कहने बीते वर्ष की.
कुछ तो है
जब शहर का पारा गिर रहा है
शिमला, कुल्लू और मनाली जैसे
ऐसे मे नंगे पांव खुले सिर
चलते बैठे और भक्ति भाव मे
डूबे है ढेरों लोग
गंगा घाट से मंदिरों तक
कुछ तो है
हिल्टन, ताज, जैसे सप्ततारांकित
होटल और रेस्टोरेंट के बजाय
ठेले पर घुंघनी, चाट के लिये
सड़क पर खड़े लोग
कुछ तो है
इस शहर मे जहां
गलियों में मंहगी सस्ती कारें नही आती
मोटर बाईक और बाकी दिखावा भी नही
कुछ तो है
एक ही गली के रमेन्द्र पांडे और रामचरन नाई
मिलते है घाट पर जजमानी प्रतिद्वन्दिता मे
तो जुम्मन मियां और तूफानी सिंह
चाय लड़ाते है कल्लू सरदार के यहां
पान जमा के देश की राजनीतिक अड़ी
तजबीजते है छेदी पनवाड़ी के ठीहे पर
असलम के अजान को सुन के
उठते है दुर्गा पंडित हाजिरी लगाने
भोले बाबा के दरबार में
कुछ तो है
जो यहाँ काल भी आकर ठिठक जाता है
मरण भी जहाँ मंगल है, और हर कंकड़ शंकर है
जहाँ उत्सवों का शोर नहीं, रूह का सुकून है
जहाँ नया साल कैलेंडर से नहीं
गंगा की पहली लहर और डमरू की गूँज से शुरू होता है।
तभी तो कहते हैं—
दुनिया बदलती होगी अपनी रफ़्तार से
मगर मेरी काशी तो आज भी
उसी शिव-धुनी में मगन है,
उसी अल्हड़पन में ज़िंदा है..…..
(काशी, 01जनवरी 2026 , गुरूवार)
On the New Year: There is Something...
There is something distinct
About this city,
That is why they call it—
Carefree, detached, and the unmanifested Kashi.
There is something...
When the whole world, drenched in Western hues,
Has lost itself in superficial glitter,
Here, at the Vishwanath Dham,
A crowd of hundreds of thousands stands tall,
To offer greetings for the new year
And gratitude for the one that passed.
There is something...
When the city’s mercury drops
Like that of Shimla, Kullu, or Manali,
Even then, bare-footed and heads uncovered,
Countless souls walk, sit, and immerse themselves
In pure devotion—
From the banks of the Ganga to the temple doors.
There is something...
Instead of the seven-starred luxury
Of Hiltons and Taj hotels,
People stand on the streets
For a plate of ghughni and chaat at a roadside stall.
There is something...
In this city where
Expensive or cheap cars cannot enter the narrow lanes,
Where motorcycles and worldly vanity find no place.
In the same alley, Ramendra Pandey and Ramcharan the barber
Meet at the ghat, competing in their ancestral trade,
While Jumman Miyan and Toofani Singh
Clink their tea glasses at Kallu Sardar’s shop.
With a paan in their mouths, they deliberate
Over national politics at Chedi Panwari’s corner.
Hearing Aslam’s call to prayer (Azaan),
Durga Pandit wakes up to mark his attendance
In the court of Lord Shiva (Bhole Baba).
There is something...
Where even Time comes to a standstill,
Where death is a celebration, and every pebble is Shiva.
Where the new year doesn't begin with a calendar,
But with the first ripple of the Ganga and the resonance of the Damru.
That is why they say—
The world may change at its own pace,
But my Kashi remains forever lost
In that same divine rhythm,
Living in its own eternal, carefree spirit.......
(Kashi, 01January 2026,Thursday)
रविवार, 16 नवंबर 2025
बनारस पर कविता (7)
बनारस
बुलाता है बार बार
हर तीज त्योहार पर
प्रयोगकर्मी बनारस, उत्सवधर्मी बनारस
परंपरावादी बनारस, अपने रंग में डूबा बनारस
अपने इतिहास संस्कृति पर
इतराता आधुनिक बनारस
जहां महादेव ईस्ट व भगवान नही
वे बावा है, बहुतअपने से हर किसी के
सर्व सिद्धि देवी अन्नपूर्णा देखती है
हर काशीवासी को माई बन कर
वह बनारस, जो रामनगर की लीला में
साथ साथ चलता है अपने प्रभु के संग
अयोध्या के राजमहल से जनकपुर की फुलवारी
चित्रकूट व पंचवटी से लंका फिर अयोध्या तक
वह बनारस जो प्याले का मेला को जीता है
तो नागनथैया में ग्वाल वन कान्हा के संग
कंदुक क्रीड़ा का सहभागी होता है
अस्सी से रथ को खींच खींच कर
रथयात्रा में अपने कान्हा को नानखटाई खिलाता है सारनाथ के मृगदाव में महीनो मेला देखता बनारस
दौड़ पड़ता है अपने रामजी को कान्हे पर लेने
नाटीइमली, जब वह लौटते है
चौदह साल बनवास के बाद अपनी अयोध्या में
दशहरे के आखिरी तीन दिनों
दुर्गामय होने वाला बनारस
गुलाब बाड़ी के केवड़ा फुहारों से
मसाने में होली व बुढ़वा मंगल में
जीवन व मृत्यु को उत्सव मनाता बनारस
नक्कटैया में अपने विरोध के स्वांग से शुरु
विश्वनाथ का बराती बन शिव बरात ही नही
सब को अपने ठेगें ये रख फगुआ पर
गरियाता, मौज मस्ती करता बनारस,
अमौसा जूतियाँ सोरहिया, ललहीछठ से
परदोस, एकादशी ही नही हर रोज
अपने मस्ती में जीता, अपने में रमता
तीन वार तेरह त्योहार मनाता बनारस
वह बनारस बुलाता है
छठ फगुआ अमऊसा पर
अपने अपनों को
जो दूर दराज गये है
कमाने पेट के खातिर
नहीं आ पाते छुट्टी,
भीड़ और रिजर्वेशन के कारण
पर ने नही बिलग हो पाते
अपनी माटी और बनारसियत से
याद कर कर के अपने बनारस को
जो हर तीज त्योहार पर बुलाता है
उन्हें बार बार, हर बार
हर तीज त्यौहार .....
- व्योमेश चित्रवंश
22.10.2025
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
बरसात में मेरे शहर का पानी पानी होना.... (बनारस पर कवितायें)
रविवार, 31 अगस्त 2025
बनारस बाढ़ में.....(बनारस पर कविताएँ-6)
अखबारों में छपी है ढेर सारी तस्वीरें
खबरों सहित
घुटने और कमर तक पानी में,
नाव से बस्ती राहत सामग्री
बाढ़ शिविरों में मुस्कराते
समाजसेवी व राजनेता
टूट गये है गंगाघाटें के
आपस के संपर्क और संबंध
ऊपर की ओर सरक औ सिमट गये है
सुबहे बनारस और गंगा आरती स्थल
पहुंच गई है वरुणा उन इलाकों में
जिन्हे वह बहुत पहले छोड़ आई थी
बहुत सी आँखों मे सवाल दिखते है
डूब क्षेत्र में घर बनाने को किसने कहा था
तब नगर निगम और विकास प्राधिकरण कहाँ थे
क्यों परेशान होते हैं लोग हर साल
सब कुछ जान बूझ कर भी
पर मै देख रहा हूं
घर के आंगन मे आये बाढ़ के पानी में
अपनी देहरी पर आरती करती
घाट के ठीक ऊपर रहने वाली
मां गंगा और काशी की आस्थावान
बुढी माई को
जिसके लिये बाढ़ विभिषिका नही
गंगा मैया का शुभागमन है
उसके छोटे से पुराने घर में
बाढ़ के इन दोनो दृश्यों को देख
मै हैरान परेशान हूं
सच और सत के मध्य
रेखा परिभाषित करने में
आस्था और विभिषिका
दो रुप है सोच के
शिव के उग्र व कल्याण के
प्रश्न हम से है
उत्तर भी हमी से
काशी के विविध रंग में
हमारी समस्याओ और
हमारी आस्था के.....
-व्योमेश चित्रवंश; ३०अगस्त २०२५
मंगलवार, 26 अगस्त 2025
मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा..
बरसात में मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा
ऊफनती गंगा का प्रचण्ड वेग
दूर दूर तक असीमित अपरिमित जलधार
सामनेघाट से राजघाट तक
गंगा की सूनी पड़ी गोंद
बिना नाव,बिना पक्षियों बिना पतंगों के
जैसे मां ने बरज दिया हो
खुद के पास आने से
उफनते मटमैले जल में
रत्नेश्वर महादेव मंदिर का कलस
दे रहा है साक्षी उसके होने का
बाकी सब तो गंगा के मटमैले पानी मे
खो गये है सीढीयां मढ़ी घाट और चबूतरे
मणिकर्णिका महाश्मसान डूबा है बाढ़ मे
साथ में विश्वनाथ धाम का जलासेन पथ
और गंगाद्वार भी
अंतिम संस्कार में जल रही
और कतार मे पड़ी अहर्निश चितायें
मोक्ष को कामना में
श्मसानेश्वर महादेव से लगे ऊँचे छत पर एक दूसरे को धकियाती, देखती, इंतजार में अपनी बारी का,
यह प्रतीक्षा धरा पर कभी नही थी
न ही किसी ने प्रतीक्षा करना चाहा था
यहां आने का
पर आज वह निर्जीव,आत्माहीन शव भी व्याकुल है स्वयं की प्रतीक्षा पर,
उसे दिखती है औरो की व्याकुलता
जो सशरीर सआत्मा सजीव आये है
उसे अंतिम यात्रा पर पहुंचाने
पर व्याकुल है स्वयं की वापसी हेतु
अपने घरों को
गंगा की बाढ़ तो एक बहाना है
इस सच्चाई से मुंह मोड़ने का
कि अंत मे सबको यही आना है ..….
-व्योमेश,26अगस्त 2025
मंगलवार, 15 जुलाई 2025
क्वीन्स कालेज का नाम प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज हो..../व्योमवार्ता, 29062025
नगर ही नही पूर्वांचल के प्राचीन माध्यामिक विद्यालयों में राजकीय क्वीन्स कालेज का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। इस कालेज में हिन्दी के प्रख्यात लेखक उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी ने शिक्षा प्राप्त किया था। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभ रहे है एवं इन्हे साहित्य संसार की महत्वपूर्ण हासेयों में से एक माना जाता है। प्रेमचंद जी का जीवन परिचय एक प्रेरणादायक साहित्यिक यात्रा है। 31जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही मे मुंशी अजायब राय और पाता आनन्दी देवी के परिवार में जन्में धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ प्रेमचंद जी ने अपनी पढ़ाई गांव अगल बगल के विद्यालय से प्रारंभ करने के बाद क्वीन्स कालेज से हाईस्कूल व इण्टर किया था। उनके जीवन में क्वीन्स कालेज का बहुत बड़ा योगदान रहा है। क्वीन्स कालेज ने उन्हे जीवन में विद्यालयीय शिक्षा के साथ ही व्यवहारिक जीवन की शिक्षा भी दिया। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी क्वीन्स कालेज से ही हुई थी। जो उनके प्रारंभिक कहानियों और उपन्यास सेवा सदन कर्मभूमि अन्य में परिलक्षित होता है। वर्तमान समय में सांस्कृतिक अभिनवीकरण व भारतीय मूल्यों व प्रतीकों को पुनर्स्थापना की जा रही है ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि दो सदियों से अंग्रेजी दासता के प्रतीक रहे क्वीन्स कालेज के नाम पर चलने वाले इस महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान का नाम भी परिवर्तित कर अपने महान छात्र के नाम पर प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज किया जाये। अब समय आ गया है कि वाराणसी एवं वाराणसी के धरोहरों के प्रति संकल्पित और समर्पित लोग एवं संस्थाये अपने माटी के सपूत प्रेमचंद जी के नाम पर करने के लिये एकजूट हो और यह प्रेमचंद जयंती पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-व्योमेश चित्रवंश,एडवोकेट
29.06.2025
(लेखक चित्रगुप्त सभा काशी के उपाध्यक्ष एवं प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र लमही के सलाहकार संरक्षक हैं)
शनिवार, 28 जून 2025
गोदौलिया ....(बनारस पर व्योमेश की कविता)28जून2025
मैं खड़ा हूँ
गोदौलिया चौराहे पर
ढूंढ़ रहा हूं प्राचीन गोदावरी तीर्थ
वह कहीं नहीं दिखता
दिखता तो गोदौलिया भी नहीं
बल्कि वहाँ है, स्टील प्लेट्स और पाईप के ढेर
पैदल बेशुमार भीड़
चौराहे के तीन तीन ओर
टोटो का रेला
जो बढ़ा रहे है अनिच्छित चिड़चिड़े जाम को
बाबा बताते थे है गोदौलिया
गाडविला से बना है
चौराहे के सेंट थामस चर्च के नाम पर
प्रिंसेप ने ढूढ़ा था
शाही नाला और घोड़ा नाला यही कहीं
सुबह इसी चौराहे से, गमछा कांधे पर डाले
हर हर महादेव गंगे, काशी विश्वनाथ शंभो
अलख जगाते जाते थे श्रद्धालु नेमीगण
बाद में दोनो चौराहों के किनारे
बैठा दिये गये नंदी जमी से पंद्रह फीट ऊपर
दोनो गोदौलिया के तीन किनारे खुदे पड़े हैं
निर्माणाधीन स्टेशन के लिये,
जो बनेगें नंदी की तरह पचासों फीट ऊपर
चलने वाले वाले हवाई झलुआ टोटो के लिये
जिन्हे अखबारी भाषा मे रोप वे कहते हैं
बड़े बड़े होटल दिखने लगे है
ग्लोसाईन औ डिस्प्ले मानीटर वाले
सुंदर आकर्षक शोरुम भी
पर नही दिखता वह पुराना गोदौलिया
जो शहर का हृदयस्थल कहा जाता था
नही दिखती, गमछा टांगे अलमस्त
दुनिया को अपने ठेगें पे रखे चाय लड़ाती
पान घुलाती वो बनारसी फक्कड़ रहीसियत
जो कभी मेरे शहर के पहचान थी
अब दिखते है देर सारे पर्यटक, तीर्थयात्री
पैदल चलता सड़क के दोनो लेन में,
सब दिखता है पर नही दिखता
इसी भीड़ मे खो गया बनारसीपन
खुदाई, रोपवे, ग्लोसाईन टूरिज्म वाले चौराहे में
मेरे शहर की पहचान, गोदौलिया की तरह...
-व्योमेश चित्रवंश
28.06.2025
रविवार, 15 जून 2025
गंगा की सीढ़ीयॉं.......(कविता) 14जून 2025
शहर से बस नदी की ओर
नही ले आती हैं
वे ले आती है
कोलाहल से शांति कीओर
भौतिकता से आध्यात्म की ओर
स्व से शिव को ओर
सांसरिकता से बैराग्य की ओर
इन्ही सीढ़ीयों पर
शिव ने शंकर को बताया था
द्वैत अद्वैत से परे ब्रहम को,
तुलसी ने लिखा था रामायण
रामानंद ने दिया था कबीर को
रामनाम का गुरूमंत्र
इन्ही सीढीयों पर
बुलाया था जगन्नाथ ने
अपनी लवंगी के लिये
माँ गंगा को
और गंगा चढ़ती आयी थी
इन्ही सीढ़ीयों पर
अपन पुत्र रत्नाकर के
निश्छल प्रेम का साक्ष्य देने
इन्ही सीढीयों पर
रैदास ने किया था आवाहन
अपनी कठौती में मां गंगा का
नजीर ने देखा था
इन्ही सीढ़ीयों पर
सुबह ए बनारस को
गंगा में नहाते हुये
ख्वाहिश कर जीने मरने की
गंगा में बजू कर कर के
इन सीढ़ीयों पर
हरिश्चन्द्र ने नहीं छोड़ा सत्य को
छोड़ दिया सारे संबंधों को
राजपाट, पत्नी पुत्र सर्वस्व काे
क्योंकि ये केवल सीढ़ीयां नहीं
बॉहे है मॉ गंगा की गोंद की
वह मॉं है हमारी प्रकृति मॉं
स्रोत है सत्य,श्रद्धा,निर्मल
पवित्र मोक्ष और कल्याण की
ये सीढीयॉ उतारती है
हमारे अंतर का अहंकार
मिटाती है तम और क्लेश,
हिमालय की उंचाई से
चल कर सागर मे समाते हुये,
बताती है सच्चाई
स्वयं को समाहित कर
अथाह सागर में विलीन होने की
तभी वह श्रद्धा पात्र होती है
हम सबके लिये
तभी केशव को भरोसा है
एकमात्र अपने मॉं गंगा पर
हे भागीरथी
हम दोष भरे,
पर भरोसे यही है कि भरोस तुम्हारे
नाम लिए कितने तर जात,
प्रणाम किए सुरलोक सिधारे।
मंगलवार, 10 जून 2025
काशीवासी.....
स्वयं में लीन
काशी के स्वभाव में रमा
शिव और शक्ति को
मन मे जपते
चलता है
शहर से गंगा की ओर
भौतिकता से वैराग्य की दिशा में
स्वयं से स्व की ओर
गंगाघाट की सीढ़ीयों से उतरते
सधे कदमों से रस्ते नापता
अंतर में शिव व गंगा को लिये
हर हर महादेव शंभों
काशी विश्वनाथ गंगे,
मन बुद्धि अहकार से परे
भूत को भूल, भविष्य से मुक्त
मात्र वर्तमान को जीता
अपना सर्वस्व दुःख चिन्ता, भार
शिव को समर्पित कर
स्वयं शिवमय होता हुआ
शिव के शरण में
वह काशीवासी,
फक्कड मस्त अड़भंगीग
कुछ अधिक पाने के चाह से दूर
कुछ खोने का डर से मुक्त
मृत्यु से भय नही
जीवन में कुछ चाह नही
वह स्वयं मे शंकर बन
सब कुछ छोड़ कर
अपने महादेव पर,
भोले बाबा से भी अधिक
विश्वास है उसे अपनी मां अन्नपूर्णा पर
तभी तो अलख जगाता है
वो विश्व के नाथ विश्वेश्वर के दरवार में,
बाबा बाबा सब कहे माई कहे न कोय
बाबा के दरबार में माई करें सो होय,
वह जानता है कि
मां बिना पिता की पूर्णता नही
प्रकृति बिना पुरुष सिद्ध नही
जीव बिना आत्मा संपूर्ण नही
इसी लिये वह सहज है सरल है
पर जटिल और अबूझ
अपने आराध्य महादेव के समान
वही तो काशीवासी है।
-व्योमेश,
10जून2025, मंगलवार
बुधवार, 4 जून 2025
व्योमवार्ता/ गंगा दशहरा
गंगा दशहरा हिन्दूओं का एक प्रमुख त्यौहार है जो प्रत्येक वर्ष हिन्दू पंचांग के ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा नदी के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। यह हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो गंगा नदी ही पूजा के लिये समर्पित है। इस शुभ अवसर पर हम भारतवासी गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति करते हुये उन्हें सम्मान और आदर देते है। मां गंगा के भक्त नदी के किनारे एकत्र होते हैं। गंगा नदी में स्नान करते हैं और पूर्ण पवित्रता एवं रीति रिवाज से उनका पूजन कर आशीर्वाद की कामना करते है। माना जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह त्यौहार गंगा को संराक्षत और सुरक्षित रखने के महत्व को भी दर्शाता है जो हिन्दू धर्म में अध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व रखती है। सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी के कमंडल से राजा भगीरथ द्वारा देवी गंगा को धरती पर अवतरण दिवस को गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी पर अवतार से पहले गंगा नदी स्वर्ग का हिस्सा थी। एक बार महाराज सगर ने अपने राजधानी अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने ईष्यावश यज्ञ के प्रतीक अश्व का अपहरण कर लिया और उसे ले जा कर समुंदर के किनारे महर्षि कपिल के आश्रम में बांध दिया। अश्व का गायब होना यज्ञ में विघ्न के समान था। इसे यद्य में विघ्न के साथ हो अपशकुन और आने वाले अनिष्ट के रूप में मानते हुये राजा सगर की समस्त प्रजा राजकुमार अंशुमान के नेतृत्व में हर कहीं यज्ञ के अश्व को दूढ़ने लगी। महर्षि कपिल के आश्रम पहुँचने पर लोगों ने देखा कि वहीं एक कोने में यज्ञ का अश्व बंधा हुआ है और आश्रम के यज्ञशाला में महर्षि कपिल अपने साधना में समाधिस्थ थे। अश्व को देखते ही दूढ़ रही प्रजा एवं सैनिक महर्षि कपिल को ही अश्व चुराने का आरोपी मानते हुये उन्हें चोर चोर चिल्लाने लगी जिससे महर्षि कपिल की समाधि दूर गई एवं उन्होने बिना सोचे समझे स्वयं पर आरोप लगाने वालों को अपने क्रोधाग्नि व श्राप से भस्म कर दिया। जब इस बात की जानकारी महाराजा सगर को हुई तो उन्होंने महर्षि कपिल से क्षमा मांगते हुये अपने भस्म हो चुके प्रजा एवं सैनिकों के मुक्ति का मार्ग पूछा। महर्षि कपिल ने उन्हें बताया कि यदि स्वर्ग से गंगा नदी धरती पर आ कर इस स्थान से प्रवाहित हो तो भस्म चिता बन चुके प्रजा और सैनिकों को मुक्ति मिल सकेगी। राजा सगर फिर उनके पुत्र राजा दिलीप ने गंगा को धरती पर बुलाने के लिये अथक तपस्था किया पर उन्हें सफलता नहीं मिली। दिलीप के पश्चात उनके पुत्र भगीरथ ने अपनी घोर तपस्या से ब्रहमा को प्रसन्न किया एवं उनसे वरदान के रूप में गंगा को पृथ्वी पर उतारने की मांग किया। ब्रह्मा जी ने भगीरथ को वरदान में गंगा को धरती पर भेजने का वरदान देते हुये कहा कि गंगा के वेग को धरती पर संभालने की क्षमता केवल शंकर भगवान के पास है। यदि वे तैयार हो तो गंगा धरती पर उतर सकती है। इसके पश्चात भगीरथ ने शंकर भगवान से तप कर के गंगा के वेग को धारण करने को कहा। जिसके परिणाम स्वरुप गंगा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन धरती पर अवतरित हुई। शिव जी जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की वादियों में कल कल निनाद करते हुवे मैदान को अपने जल से सिंचित करते हुये महर्षि कपिल के आश्रम में राजा सगर के सैनिकों एवं प्रजाओं को मुक्ति दिलाते हुये सागर में समाहित हो गई।
इस प्रकार महाराज भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण कर बड़े भाग्यशाली हुये। उन्होने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों युगों तक बहने वाली गंगा की अविरल धारा महाराज भगीरथ के कठोर तप एवं साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणिमात्र को जीवन-दान ही नहीं देती. मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व में गंगा की महिमा गाई जाती है।
गंगा दशहरा के दिन गंगा जी में स्नान किया जाता है यदि कोई श्रद्धालु गंगातट तक नही पहुंच पाता तब वह अपने घर के पास ही किसी नदी या तालाब में श्रद्धापूर्वक गंगा मां का ध्यान करते हुये स्नान करते हैं। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी हस्त नक्षत्र में होने के कारण यह तिथि: फोर पापों को नष्ट करने वाली मानी गई है। कहते हैं कि हस्त नक्षत्र में बुधवार के दिन गंगावतरण हुआ था। इसलिये यह तिथि अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। लाखो करोणों श्रद्धालु दूर दूर से आ कर गंगा की पवित्र धारा में स्नान करते है। हरिद्वार, प्रयाग, काशी पटना गंगासागर के साथ ही अन्य शहरों में गंगा तट पर गंगा दशहरा के मेले लगते है जहां लोग दान में कोई भी वस्तु दस की संख्या में दान देते हैं। गरीबो को भोजन कराने और उन्हें आम दान करने की परंपरा अभी भी बहुत से गंगातटीय क्षेत्रों में मनायी जाती है।
काशी में गंगा दशहरा के दिन दशाश्वमेध घाट में दस बार डुबकी मार के स्नान करके शंकर भगवान को दस की संख्या में गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन कर के रात्रि को जागरण करने से अनन्न फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा पूजन का भी विशिष्ठ महत्व है। इस दिन विधि विधान से गंगा जी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ, दस सेर गेंहू और दस आम दस ब्राहमणों को दान देने व दशहरा स्त्रोत्र का पाठ किया जाता है।
गंगा दशहरा धार्मिक पर्व होने के साथ साथ हमारे भारतीय संस्कृति का भी प्रतीक है। गंगा दशहरा के माध्यम से हम अपने प्रकृति प्रदत्त उपहारों जल स्रोत गंगा नदी को मां मानते हुये उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते है एवं अपनी संस्कृति की महत्वपूर्ण अंग गंगा नदी के पुण्यता पवित्रता एवं स्वच्छता के प्रति संकल्पित होते है क्योंकि गंगा हमारे लिये मात्र एक नदी ही नही हमारीजीवनदायिनी मां है तभी तो हम गंगा को विश्वरूप मान कर प्रार्थना करते हैं-
ॐ नमो गंगाये, विश्वरुपिणे नारायण्यै नमो नमः।
शुक्रवार, 30 मई 2025
व्योमवार्ता/ मेरे शहर में नवतपा.......
बुधवार, 28 मई 2025
बनारस इस पार और उस पार......(बनारस पर कविता -1)
तरना रेलवे ओवर बृज के
नीचे उतरने वाले फ्लाईओवर से
बदलते बनारस को
मेट्रो सिटी के लुक में
फिल्मों के रीलों में चलती जैसे
ओवरबृज के पार
दिखती बहुमंजिली इमारतें
उन पर चमकतें ग्लोसाईन बोर्ड
नहीं पता चलता
हम इमारत की तरफ है
या उसके दूसरी ओर
पुल के ऊपर आ कर
संशय दूर होता है
कि हम इमारत के ओर हैं
यानि इसी पार
पर पीछे देखने पर
हम फिर उस पार हो जाते है
एक भ्रम और संशय को जीते
बनारस के मर्म और अध्यात्म के जैसे
जीवन के इस पार
भौतिकता, सांसारिकता, स्वार्थ और अहम
और उस पार
आत्मा के चरम पर, शरीर से परे
सिर्फ आत्मा अघोर शून्य और शिव
वह ऊँचा ओवरबृज
दूर कर देता है मन व जीवन के संशय को
बनारस को महसूस करने जैसे
वैसे भी इस शहर को समझने के लिये
बनना पड़ता है कबीर
चढ़ना होता है मन की ऊंचाइयों पर
तब हम देख पाते है
बनारस को मन की आखों से
जान पाते है बनारस को
जीवन के इस पार
और उस पार के सच को
जो बनारस दिखाता है
रेलवे ओवरबृज की ऊंचाइयों जैसे
इस पार और उस पार का बनारस
प्रकृति और पुरुष के मध्य का बनारस...
- व्योमेश चित्रवंश
28मई2025 बुधवार
Banaras: This Side and the Other...
I watch
From the flyover descending
Beneath the Tarna railway overbridge,
The changing face of Banaras
In its new "metro city" look—
Moving like frames in a film reel.
Beyond the overbridge,
Multi-storied buildings appear,
Their glowing signboards shimmering.
It is hard to tell
If we are toward the buildings
Or on the opposite side.
Reaching the top of the bridge,
The doubt clears:
We are on the side of the structures—
On this side.
But looking back,
We find ourselves on the other side once more.
Living within a haze of illusion and doubt,
Much like the essence and spirituality of Banaras.
On this side of life:
Materialism, worldliness, selfishness, and ego.
And on the other side:
The peak of the soul, beyond the body—
Only the soul, the Aghor (fearless/limitless) void, and Shiva.
That high overbridge
Dissolves the doubts of mind and life,
Much like the feeling of truly sensing Banaras.
Anyway, to understand this city,
One must become a Kabir—
One must climb the heights of the mind.
Only then can we see
Banaras through the eyes of the soul.
Only then can we know Banaras—
The truth of this side of life,
And the truth of the other,
Which Banaras reveals
From the heights of a railway overbridge.
Banaras: of this side and the other...
Banaras: existing between Nature (Prakriti) and the Cosmic Soul (Purusha).
— Vyomesh Chitravansh
Wednesday, May 28, 2025
रविवार, 25 मई 2025
व्योमवार्ता/ मित्रता (कविता)
मात्र एक शब्द नही,
एक अहसास है,
जिसे बस महसूस किया जा सकता है,
ठीक वैसे हो जैसे सांसों में गर्मी को,
बर्फ में पानी को,
गुड़ में मिठास को,
हम अंतर तक अनुभूति करके भी
शब्द नही दे सकते जैसे,
आपस की बदमासियाँ, नादानिया
फिर नाराज होने पर भी एक हो जाना,
यही तो है,
जो पद सम्मान, धन, मान से परे है,
जहां हम दिल से जुड़ते हैं,
समुन्दर की लहरों की तरह,
एक दूसरे को धकियाते,
हटाते जगह बनाते,
इस पार से उस पार जाते पर,
एक दूसरे से कभी अलग नही हो पाते
पानी के अनगिनत बनते बिगड़ते धाराओं में, क्योंकि हम सब भी जल धाराये हैं
मित्रता के संमुदर में,
-व्योमेश
काशी,09.05-2025