बुधवार, 9 जून 2021

अनुज मित्र राजीव आर्यावर्त द्वारा "यह सड़क मेरे गांव को नही जाती" पढ़ कर लिखी गई यह पाती

अनुज मित्र राजीव आर्यावर्त द्वारा "यह सड़क मेरे गांव को नही जाती" पढ़ कर लिखी गई यह पाती
बहुत बहुत आभार व स्नेह राजीव आर्यावर्त ।आपने किताब पढ़ते हुये मेरे मनोभावों को महसूस ही नही किया है वरन सच्चे रूप मे जिया है।

बड़े भैया व्योमेश चित्रवंश जी,
          आपको सादर सादर चरण स्पर्श तथा कोटि कोटि धन्यवाद जो आप अपनी किताब के माध्यम से मुझे और अपने पाठकों को आपने अपने अपने बचपन में जाने का मौका दिया है
     जैसा कि हम सब जानते हैं कि मनुष्य को अपना बचपन कभी नहीं भूलता है और ना ही उससे मधुर और कल्पनाशील कोई और याद होती है दूसरे शब्दों में अगर मैं कहूं तू मनुष्य पूरा जीवन अपने बचपन को ही जीता रहता है और व्योमेश भैया आपने अपने इस संस्मरण यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती है के माध्यम से मेरे जैसे पाठकों को बहुत ही आहिस्ता आहिस्ता उंगली पकड़कर उनके बचपन में ले जाती है और और उन दिनों को क्रमबद्ध ढंग से याद दिलाती है साथ ही साथ मन में यह कसक और कचोट पैदा करती है की हर एक भाव हर एक विचार अपने शब्दों के माध्यम से आप सभी को बताऊं लेकिन आप जानते ही हैं कि हर एक भाव हर एक विचार लोगों के साथ प्रकट कर पाना असंभव होता है मैं भी चाहता हूं कि मैं अपने हर एक विचार को उन बचपन की यादों को बताऊं लेकिन वह शब्द वह वाक्य मेरे पास शायद नहीं है ।परंतु आप कोटि कोटि  बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से हर घटना और हर पात्र का बहुत बहुत ही सुंदरता और सटीकता से वर्णन किया है और हर घटना को जो मेरे बचपन में या हम लोगों की उम्र के लोगों के बचपन में घटती थी चाहे वह पंपिंग सेट पर नहाना हो बचपन के खेल कूद जैसे हॉकी कबड्डी सरपट सुटूर आदि तमाम खेल और साथ ही साथ गांव में होने वाले तमाम त्योहारों, घटनाओं ,सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैवाहिक आयोजनों का भी आपने बहुत ही सटीक और सुंदर वर्णन किया है इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी। आपकी इस किताब को अब तक में है दो बार पढ़ चुका हूं और ऐसा लग रहा है कि जैसे अभी भी पूर्णरूपेण मन भरा नहीं है वैसे ही जैसे बहुत स्वादिष्ट भोजन करने पर पेट तो भर जाता है लेकिन  आत्मा अतृप्त रह जाती है अर्थात मन बार-बार  आपकी किताब पढ़ना चाहता है और आपकी किताब दो बार पढ़ने के बाद भी ऐसा लग रहा है की और पढ़ा जाए।
     इसके साथ ही आपकी किताब का शीर्षक "#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नहीं_जाती ''आज के मानव के मनोभाव को पूर्णरूपेण व्यक्त करती है इसके साथ ही वर्तमान ग्रामीण समाज और उसमें उसमें हुए आर्थिक ,सामाजिक, राजनैतिक ,पारिवारिक परिवर्तनों को भी बहुत ही बृहद रूप में हम लोगों के सामने रखती है यह किताब "यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती ''।
    आपकी किताब को पढ़कर इसके बारे में और समाज और देश के बारे में कहने के लिए तो मेरे पास बहुत कुछ है और शायद कई दिन इसमें लिखना पड़ जाए मुझे परंतु मैं अपने मित्रों भाइयों और शुभचिंतकों से यही अनुरोध करूंगा की आप सभी लोग भी इस किताब को एक बार अवश्य पढ़ें और एक बार फिर से अपने बचपन को और उन यादों को फिर से जिएं और उन यादों में भींग कर सराबोर हो जाएं।
   अंत में एक बात और कहूंगा व्योमेश भैया कि आज के 100-200 साल बाद जब हमारी पीढ़ी और तब की पीढ़ी के बीच में जब तुलना होगी तो उस समय की पीढ़ी अगर आपकी किताब को पढ़ेगी या आज की ही पीढ़ी पढ़ेगी तो अवश्य समझ जाएगी कि उसके पूर्वज जो गांव में रहते थे उनमें कितना अपनत्व, कितनी एकता ,कितनी समझ, परस्पर भाईचारा, प्रेम और लगाव और उच्च कोटि के संस्कार थे और आपकी किताब उसका जीवंत और मूल्यवान प्रमाण होगी व्योमेश भैया।
    पुनः राजर्षि के पावन धरा के सपूत व्योमेश चित्र वंश भैया के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन और अभिनंदन करते हुए इतनी उच्च कोटि की रचना के लिए आपको धन्यवाद करता हूं ताकि आप ऐसे ही नए नए विषयों पर अपनी कलम चलाते रहें और सभी राजर्षि के भाइयों मित्रों और भारत वासियों को आनंदित और प्रफुल्लित करते रहें।
   लेख में किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा।
                                                             #राजीव_आर्यावर्त
  भूतपूर्व छात्र
उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी
पुस्तक का नाम "यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती"
    लेखक श्री #व्योमेश चित्रवंश जी एडवोकेट वाराणसी कचहरी  ।
भूतपूर्व छात्र उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी

शनिवार, 5 जून 2021

पर्यावरण रक्षा के लिये सुंदर लाल बहुगुणा जी का मंत्र

व्योमवार्ता/पर्यावरण रक्षा के लिये सुंदर लाल बहुगुणा जी का मंत्र.....
(व्योमेश चित्रवंश की डायरी,5जून2021) 

   वह शायद बीसवीं सदी के आखिरी दशक का तीसरा या चौथा वर्ष रहा होगा। हम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र थे तब तक मेरे लिखे स्तंभ और समसामयिक लेख देश के कई समाचारपत्रों मे छपने लगे थे। मन मे आरक्षण आंदोलन की विफलता को ले कर एक निराशा थी तो दूसरी ओर समाज देश के लिये कुछ अलग करने की सुलगती चिन्गारी जैसी ईच्छा। बड़े भाई राजीव कुमार सिंह के स्नेहसंबंधों के चलते उनके बाबूजी के स्मृति मे बने स्वैच्छिक संगठन डाॅ० शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाऊण्डेशन से जुड़ाव हो चुका था वहीं उस समय के हमउम्र के साथी और  सामाजिक कार्यकर्ता डाँ०लेनिन जैसे मित्रों से सामाजिक सरोकारों पर चर्चायें होती रहती थी। उसी समय देश के जाने माने पर्यावरण कार्यकर्ता और हिमालय बचाओ आंदोलन के प्रमुख बाबा सुंदर लाल बहुगुणा जी का काशी आना हुआ। डा० लेनिन से वे पूर्व परिचित थे।सो डा० लेनिन के साथ ही हम भी उनसे मिलने गये संयोगवश काशी के सांस्कृतिकविद् और इन्टैक के नवनीत रमण भी बहुगुणा जी से मिलने आये थे।आठ दस लोग और थे जिनमे ज्यादातर हम लोगों के ही समवयस्क थे। चर्चा चल रही थी टिहरी बांध से लेकर उसके दुष्प्रभाव की, अविरल गंगाजल को बांधे जाने से गंगा जल के औषधीय गुणों के समाप्ति और प्रदूषण की। जो आज दिखने भी लगा है। बाबा के पास बताने के लिये बहुत कुछ था उनका विशाल अनुभव, संघर्ष, पीड़ा, पर्यावरणीय भविष्य को ले कर आशंकाये और सत्ता से संघर्ष मे असहाय होने की बेबसी। उनके मन की पीड़ा उनके वाणी के थरथराहट और आँखों मे बार बार छलकते आँसूओं मे रह रह बाहर आ जा रही थी। हम लोग समझ नही पा रहे थे कि हम जैसे लोग बाबा की पीड़ा को कैसे बाँट सकते है। तब नवनीत रमण ने बहुगुणा बाबा से पूछ ही लिया कि "बाबा हम लोग बनारस मे रह कर अपनी पढ़ाई लिखाई करते हुये आप का साथ कैसे दे सकते हैं?" और बहुगुणा बाबा ने जो आगे कहा वो मुझे आज तक रोमांचित कर जाता है। बहुगुणा जी ने हम लोगों से अपने आंदोलन मे शामिल होने को नही कहा। हमसे धरना प्रदर्शन जूलूस निकालने की अपेक्षा नही की बल्कि बहुगुणा जी ने बड़ी ही गंभीरता से कहा था कि
"बेटा,यहां किसी को साथ देने वाली बात ही नही है। खुद के लिये करने वाली बात है। आप जब किसी से कुछ मांगते हो तो उसे वापस करते हो न। ठीक उसी तरह हम प्रकृति देवता से जो लेते हैं उसे वापस करना हमारा धर्म है नही तो वह ऋण हम पर बना रहेगा।"
"परंतु कैसे बाबा? हम तो न उतने सक्षम है न ही हमारे पास जमीन जगह है कि कुछ कर सके?" हममें से किसी ने वास्तविक उत्सुकता जगाई थी।तब उन्होने बड़े शांत चित्त से एक सुझाव (मंत्र) दिया। हां, मै उनके उस सुझाव को मंत्र ही मानता हूं जो हम सब कर सकते है और समाज देश पर्यावरण को अपने स्तर से लाभ दे सकते हैं।
" एक मुट्ठी किसी भी वृक्ष के बीज ले लो और जहां कहीं तुम्हे खाली जगह दिखे उसमे बिखेर दो। प्रकृति देवता उन्हे अपने जरूरत से सहेज लेगें।अगर तुम्हारे एक मुट्ठी बीज से एक पौधा भी पनप कर वृक्ष बन गया तो तुम्हारा प्रयास सार्थक होगा।"
उसी वर्ष से हमने वृक्षारोपण प्रारंभ किया। आज अपने गांव से लेकर शहर तक अपने लगाये हुये लगभग तीन सौ से अधिक पेड़ो को देख कर सूकून मिलता है कि प्रकृति देवता के समस्त ऋणों मे थोड़ा सा ही हमने चुकाने का प्रयास तो किया है। गांव से लेकर आयर,पिण्ड्रा, लमही, सिगरा, लालपुर कालोनी, यू पी कालेज, कचहरी, मिंटहाऊस के पीछे कटिंग मेमोरियल प्राईमरी स्कूल, डगमगपुर कृषि फार्म, पाण्डेयपुर तालाब व पंचकोसी मार्ग पर लहलहाते पेड़ो को देख खुद को मिलने वाली खुशी को वास्तविक रूप से वही समझ सकता है जिसने कभी अपने लगाये हुये पेड़ के नीचे खड़े होकर उसकी छाया व हवा का सूकून महसूस किया हो। ऐसे मे साथ के मित्रों सहयोगियों अग्रजों का आभार आजीवन स्मरणीय रहेगा जिनमे राजीव भैया, सुधीर भाई, प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र के राजीव गोड़, ग्रीन सोसाईटी के जावेद, यू पी कालेज के डा० अरविन्द कुमार सिंह भैया, डा० कुलदीप सिंह, हमारी वरूणा अभियान के सूर्यभान सिंह पृथ्वीमित्र, जलप्रहरी फाउण्डेशन के सजल श्रीवास्तव जलप्रहरी और ढेर सारे नाम न याद रहे मित्रों के योगदान से ही यह संभव हो सका।
      बहुगुणा बाबा के मंत्र के अनुसार उसी साल से हर बरस बरसात के बाद जामुन और नीम के बीजों को इकट्ठा कर हाईवे किनारे पुलों पर रेलवे लाईन के किनारे खाली मैदानों और गंगा वरूणा के किनारों पर बिखेरने का संकल्प निर्वहन कर रहे हैं जिसमे गंगा वरूणा के किनारों पर सफलता नही दिखती पर अन्य स्थानों पर बढ़ रहे दो चार नीम व जामुन को देख लगता है कि वृक्षारोपण की मंत्र साधना पूर्णत: तो नही पर अत्यंत अल्प रूप मे ही सफल हो रही है।
       इस वर्ष सुंदर लाल बहुगुणा जी भी अपनी स्मृतियां छोड़ प्रकृति देवता के शरण मे चले गये उनके न रहने पर यह पहला पर्यावरण दिवस है। आज जामुन के बीजो को ईकट्ठा कर रिंगरोड पर बिखरने के लिये थैले मे भरते समय बार बार उनका यह मंत्र याद आ रहा है। अपने से एक मुट्ठी बीज बिखेर दो प्रकृति देवता उन्हे अपने हिसाब से सहेज लेगें। आज कोरोना के इस आपदा काल मे जब हम सब असहाय हो कर प्रकृति देवता पर सब कुछ छोड़ बैठे हैं तब प्राणवायु के सतत प्रवाह के लिये इस मंत्र का औचित्य और भी समझ मे आ रहा है। प्रकृति रक्षति रक्षित:।
(काशी,पर्यावरण दिवस 5जून 2021, शनिवार)
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सोमवार, 31 मई 2021

व्योमवार्ता / कोरोना के आगे......



#कोरोना के आगे........
  
( कोरोना 2 लाकडाऊन मे प्रेमचंद पथ पत्रिका द्वारा आयोजित राष्ट्रीय आनलाईन संगोष्ठी "विश्वास रखें सब अच्छा होगा" मे व्यक्त विचार,03मई 2021सोमवार)
                         वर्तमान समय बड़े मुश्किलों का है। इस तरह की आपदा के बारे मे संभवतः हम मे से किसी ने कल्पना भी नही की थी। फिल्मों व उपन्यासों की बात छोड़ दिया जाए तो यह चीन जनित मानव आपदा कोरोना हमारे देश ही नही मानव जाति की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई है जिसके समक्ष वर्तमान मे हम असहाय है। विज्ञान के नए आविष्कारों पर चढ़ कर मंगल और चंद्रमा तक यात्रा करने की क्षमता रखते हुए भी हम एक अति सूक्ष्म अदृश्य विषाणु के प्रकोप के आगे स्वयं को किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में मान नतमस्तक हो चुके हैं। कोरोना वाईरस ने जहां राष्ट्र व समाज को आर्थिक क्षति पहुंचाई उससे कहीं अधिक सामाजिक सांस्कृतिक  व पारिवारिक क्षति किया है। इस बीमारी ने मानवीय संवेदनाओं व संबंधों को तार-तार कर दिया। ऐसा नहीं कि मानवीय संवेदनाएं हमसे हमारे अंतस से समाप्त हो गई वरन स्वयं के प्राणरक्षा के भय ने इन संवेदनाओं की भ्रूणहत्या कर दी। संबंधों के तराजू पर स्वयं के प्राणों के आगे दूसरे पलड़े पर  संवेदना का कोई वजन कोई मूल्य चाह कर भी नहीं रहने दिया।       
                   जब वर्ष भर पहले कोरोना की पहली लहर आई थी तब यह मानवीय संवेदनाएं बेबसी में खुद को कसमसाते हुए इस आशा और उम्मीद से जी रही थी कि यह बुरा वक्त है चला जाएगा देश की जनता सरकार के प्रत्येक कदम में सहयोग की भावना के साथ कभी ताली बजाने से लेकर शंख घड़ियाल बजाती रही, कभी कोरोना से जूझ रहे फ्रण्टलाईन वारियर्स डाक्टर्स,पैरामेडिकल्स,पुलिस वालो का हौसला बढ़ाने के लिये दीपक जला कर उनका हौसला बढ़ाती रही। मनोवैज्ञानिक व सामरिक दृष्टि से देखें तो इसका लाभ भी हमें मिला। एक डेढ़ माह के कंप्लीट लॉकडाउन ने हमारे देश को कोरोना से लड़ने की प्राथमिक तैयारी का मौका दिया। मास्क से लेकर सैनिटाइजर, वेंटीलेटर जैसी जरूरी चीजों को तैयार कर हम कोरोना से लड़ने मैदान में आ गए तो सरकार ने आम गरीब जनता के राशन पानी तक की व्यवस्था की। पुलिस का संवेदनशील व सहयोगात्मक व्यवहार आम जन ने पहली बार महसूस किया। कोरोना वाईरस से इस पहली लड़ाई में पूरी तैयारी के साथ उतरने का लाभ यह रहा कि हम कोरोना के पहले युद्ध में विजई हुए। हमारे लड़ने के ढंग से लेकर मनोवैज्ञानिक सामरिकी तक की तारीफ पूरी दुनिया ने किया। इस मुश्किल वक्त मे एक दूसरे से हाथ में हाथ मिला कर जहां हमने एक दूसरे के बिखरे बिछड़े साथियों को ढूंढ़ना शुरू किया जहां हमने जमीन पर करोना को हराया वही अपने अंशदान से पीएम केयर्स फंड को समृद्ध किया। कोरोना के आपदा काल में शारीरिक और भौतिक दूरियां काफी होने के बावजूद हमने एक दूसरे के बिखरे बिछुड़े साथियों को ढूंढ़ ढूंढ कर एक माला में पिरोने का काम बड़े करीने से किया। स्कूली जमाने के दोस्तों से लेकर विश्वविद्यालय और संघर्ष के दिनों के बिखरे हुये साथी एक एक कर प्लेटफार्म पर इकट्ठे हुए और फेसबुक व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर कई कई ग्रुप बन गए। इन सोशल मीडिया ग्रुप ने केवल आभासी स्तर पर नहीं बल्कि वास्तविक धरातल पर भी आपस में एक समझदारी व साझेदारी कायम किया। आपसी संबंध भौतिक रूप से दूर रहने के बावजूद मन से जुड़ते गये, जिंदगी फिर वैसे ही चलने लगी जैसे कोरोना के पहले चलती थी। सरकार लगायत वैश्विक संगठन हमें बार-बार चेतावनी देते रहे पर हम फिर अपने रंग में रंग गए 'हम न मरब  मरिहै संसारा' के तर्ज पर ।
         भूल तो यही हो गई जो हमने काशी के गूढ़वादी फक्कड़ अलमस्त कबीर के 'हम न मरब मरिहै संसारा' का अर्थ न समझ खुद को ही  स्वयं संप्रभु मान बैठे। हमने यह नहीं सोचा, एक क्षण के लिए भी नहीं कि हम अपने अंदर के 'अहं' का प्रतीक है और यदि हमने अपने 'हम' अर्थात 'अहंकार' को नहीं मारा तो हम अपने 'जियावनहारा' अर्थात परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकते। यह परमात्मा ही कल्याणकारी हमारा सुख है हमारी शांति है हमारी संतुष्टि है।  परंतु हमने करोना के बाद अपने अहंकार को बस में नहीं किया , दिशानिर्देश नही माने, संकल्पबद्ध नही किये। मास्क सावधानी भीड़ सब को अनदेखा कर दिया हमने तो हमारे अहंकार को मारने प्रकृत को आना ही था। परिणाम सामने है आज करोना कि दूसरी लहर के आगे हम असहाय हैं। जिस भारत की पूरे विश्व में कोरोनावायरस के लिए प्रशंसा हो रही थी आज वही अपनी गलतियों से संपूर्ण विश्व का दयापात्र बना हुआ है। गलती कहां हुई? यह आत्मआलोचना व आत्मनिरीक्षण का विषय है पर कड़ुआ सच यह है कि हम में से कोई भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।चाहे वह प्रधानमंत्री हो या प्रधान सचिव ग्राम प्रधान हो या गांव के पटवारी। वास्तविकता यह है कि हम सब ने बेहद गैर जिम्मेदाराना तरीके से अपनी लापरवाही प्रदर्शित किया है।आज बंगाल तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम के विधानसभा चुनाव के लिए न्यायपालिका हाई कोर्ट मद्रास चुनाव आयोग को हत्या जैसे अपराध का दोषी बताती है। वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट पंचायत चुनाव पर उत्तर प्रदेश सरकार को अप्रैल के आखिरी तारीख तक अनिवार्य रूप से चुनाव कराने का आदेश देकर स्वयं को साफ पाक कैसे कह सकती है?वही देश के सर्वोच्च जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री, मुख्यमंत्री सहित बड़े-बड़े राजनेताओं द्वारा की जाने वाली चुनाव रैलियों में 'दो गज की दूरी मास्क है जरूरी' का सिद्धांत चुनावी प्रचार पार्टियों मे चुनावी पम्फलेट की तरह उड़ता नजर आया। देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री और सरकार कोरोना की सुनामी को झेलने के बावजूद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पाँच सर्वाधिक प्रभावित जिलों में लॉकडाउन लगाने के निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर स्टे ले आए और हमारा सर्वोच्च न्यायालय दूसरे प्रदेशों में हो रही घोर लापरवाही प्राणवायु और अस्पतालों में पेड़ों और श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए तीन-तीन दिनों से लाइन में लगे लोगों के सहूलियत के लिए कड़ी टिप्पणी जारी करने के बावजूद उच्च न्यायालय के निर्देश को स्थगित कर दें तो आमजन अपने अपनों की सेवा चिकित्सा और प्राण रक्षा के लिए कहां जाएं ? जनता की दृष्टि मे इस कागजी कवायद ने न्यायपालिका पर भी मूकप्रश्न उठाया है। बार-बार चिकित्सा सेवा और सुविधाओं के विस्तारीकरण की आवश्यकता और आवश्यक धनराशि होने के बावजूद हमारे सर्वशक्तिमान सत्तानियंता व अधिकारीगण पूरे साल में 1000 वेंटिलेटर और हर जनपद में ऑक्सीजन प्लांट भी नहीं लगा पाए तो दूसरों को सामाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश देने वाले न्यायालयों में सोशल डिस्टेंसिंग का कितना अनुपालन हुआ यह किसी से छिपा नहीं है फिर आम जनता तो नियम कानून ना मानने को अपना जन्मसिद्ध मूल अधिकार ही मानती है उसके लिए '2 गज की दूरी मास्क है जरूरी' सैनिटाइजेशन सोशल डिस्टेंसिंग जैसी बातें ही बेमानी थी। कुल मिला जुला कर अगर हम पूरे कोरोना सुनामी के दूसरे लहर के लिए किसी पर उंगली उठाने की स्थिति में है तो वह शीश महल में पत्थर फेंक कर उसके किरिचों मे खुद का बिगड़ता चेहरा देखने वाली बात होगी।
             परन्तु कोरोना का जो सर्वाधिक दुखद पहलू है आपसी संवेदनाओं और संबंधों की तिलांजलि। कोरोनावायरस आज के समय में अश्पृश्य जैसे हो गए जहां पुत्र पिता की, व्यक्ति अपने निकटतम परिजनों की अंत्येष्टि भी नहीं कर पाया। छोटी-छोटी घटनाओं पर एक दूसरे से कंधा मिलाने वाले लोग आज मृत्यु जैसे संस्कारों पर भी साथ नहीं दे पा रहे हैं। आपदा मे अवसर के नाम पर मानव गिद्धों ने दो रूपये की दवायें बीस रूपये और 899/- का रेमडेसिवर ७५ हजार एक लाख मे बेंचने से बाज नही आये।  अस्पतालों ने कोरोना के नाम पर बिना किसी सुविधा के १५००/- वाले  बेड पर डेढ़ लाख रूपये तक वसूला तो लाशों को कंधा देने के नाम पर दस कदम तक लाश पहुंचाने के आठ से सोलह हजार , एंबुलेंस के किराये  दो दो लाख रूपये तक वसूले गये। नकली दवा इंजेक्सन डाक्टर ड्राईवर एंबुलेंस की तो बात ही छोड़ दिजिये। किस मानसिक आर्थिक आध्यात्मिक विकास की ओर बढ़ रहा है हमारा भारतीय समाज? कैसे बचा जाय इन मानव गिद्धों से यह प्रश्न तो सदैव खड़ा रहेगा।
                      हम निराशाजनक और नकारात्मक पहलू को छोड़ दें तो हर व्यक्ति मन से एक दूसरे के पीड़ा में शरीक हैं यदि वह भौतिक रूप से अपनों के लिए उपस्थित नहीं हो पा रहा है तो यह उसकी मर्जी या मनोदशा नहीं है वरन आज की दुर्गम परिस्थितियां हैं। मैं फेसबुक व्हाट्सएप और अखबारों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम देखता हूं कि इस आपदा काल में अपनी आवास से ही मृत आत्मा को श्रद्धांजलि दें तो सोचता हूं यह विनम्र निवेदन है या सूचना की औपचारिकता?कभी हमने ऐसे परिवेश और परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी पर जो सच हमारे सामने हैं हम उसे अस्वीकार नही कर सकते । आज हमें उसमें ही स्वयं को समायोजित करने के अतिरिक्त कोई पर्याय भी नहीं है । आवश्यकता परिस्थितियों को सकारात्मक रूप से लेने की है। माल्थस ने कहा था प्रकृति अपने आवश्यकतानुसार जनसंख्या को नियंत्रित करती है संभवत यह प्रकृति का ही स्व नियंत्रण हो, पर प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया भी है उसका भी हमें धन्यवाद देना चाहिए कभी-कभी किसी पेड़ के नीचे बैठकर उस पर चहचहाती चिड़ियों की आवाज सुनिए और पेड़ के पत्तों से बहते हुए सनसनाहट को महसूस करिए तब आपको पता चलेगा की प्रकृति ने हमें कितनी प्यारी चीजें दी है। कभी किसी तालाब के किनारे चुपचाप बैठ उसमें भागती उछलती मछलियों को देखिए और उन पर ध्यान लगाए बगूले की एकाग्रता को महसूस कीजिए तब पता चलेगा कि संसार में कोरोनावायरस केअतिरिक्त भी बहुत कुछ है जोअच्छा है बस उसे देखने की जरूरत है। जीवन की आपाधापी में हमने उसके लिए दो पल का वक्त ही नहीं निकाला । कुछ नहीं तो घर के बाहर एक छोटे खुले डिब्बे में चिड़ियों के लिए पानी रखकर गमले में खुद के लगाए पौधे को ध्यान से देखिए तब लगेगा कि जीवन बहुत खुशनुमा है और कोरोनावायरस कुछ भी नही बल्कि इससे हट के जिन्दगी बहुत कुछ है जिसे जीना है महसूस करना है आनंद लेना है।

-व्योमेश चित्रवंश
संपर्क सूत्रः 9450960851
(लेखक विधि व्यवसायी व पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता है।)
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गुरुवार, 13 मई 2021

व्योमवार्ता/ एक गलती जो श्राप बन गई....(इजरायल फीलीस्तीन विवाद)

एक गलती जो श्राप बन गई....

                                     #इजरायल और #फिलिस्तीन के बीच जंग क्यों हो रही है इसके पीछे इतिहास की एक गलती है जो श्राप बन गई और 2 हजार सालों से यहूदियों के कत्लेआम की वजह बनी रही. अगर आज इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जारी संघर्ष को समझना है तो इतिहास की उन गलियों से गुजरना होगा जहां पत्थर कम और लाशें ज्यादा हैं. मानव इतिहास के सबसे घिनौने नरसंहारों को जानना पड़ेगा और तब जाकर जमीन के लिए यहूदियों की भूख को पहचाना जा सकेगा।
इजराइल और फिलिस्तीन के संघर्ष को समझने के लिए यीशू के जन्म से हजार साल पहले का सफर करना पड़ेगा. उस वक्त दुनिया में धर्म के दो केंद्र थे. पहला हिंदुस्तान का वो हरा-भरा इलाका जहां सनातन धर्म की जड़ें मजबूत हो चुकी थीं. और दूसरा मिडिल ईस्ट का वो रेगिस्तानी इलाका जहां हजरत इब्राहीम उन तीन धर्मों के पैगंबर कहलाने की ओर अग्रेसर थे जिनका पूरी दुनिया में फैलना निश्चित था.
हजरत इब्राहीम को यहूदी, ईसाई और इस्लाम में शुरुआती पैगंबर होने का दर्जा हासिल है. साधारण भाषा में समझें तो इन्हीं इब्राहीम की धार्मिक थ्योरी को मूसा (यहूदी के पैगंबर), ईसा (ईसाई के पैंगबर) और मोहम्मद (इस्लाम के पैगंबर) ने अपने-अपने कालखंड में अपने दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया और सभी ने इब्राहीम को सम्मान दिया.
तीनों धर्मों के मुख्य पूर्वज इब्राहीम बने जिनका जिक्र धार्मिक पुस्तकों में मिलता है. इब्राहीम के वंश में इजराइल का जन्म हुआ जो उनके पोते थे. इजराइल ने 12 कबीलों को मिलाकर इजराइल का गठन किया . जिसे आज हम इजराइल देश के नाम से जानते हैं . इजराइल के एक बेटे का नाम जूदा या यहूदा था जिनकी वजह से इस धर्म को Jew या यहूदी नाम मिला.
इब्राहिम, इजराइल और जूदा के बाद जो नाम यहूदियों से जुड़ा वो है हजरत मूसा का. यहूदियों के पैगंबर हुए मूसा इनका उल्लेख कुरान और बाइबल में भी मिलता है. यूं तो यहूदियों के कई पैगंबर हुए लेकिन मूसा प्रमुख हैं. इन्होंने ही वो नियम तय किए जिपर यहूदी आगे बढ़े. यहूदियों की धार्मिक किताब तौराह है जो दुनिया के निर्माण से शुरू होती है जिसे खुदा ने 6 दिन में बनाया और समाप्त होती है मूसा की मृत्यु पर. मान्यता है कि हजरत मूसा ने ही इजराइल के वंशजों को मिस्त्र की सैकड़ों साल पुरानी गुलामी से आजाद कराया था और एक आजाद जिंदगी दी थी.
अब अगर पैगंबरों से नीचे उतरें और यहूदियों के इतिहास पर नजर डालें तो इसका सही सटीक इतिहास ईसा से करीब 1 हजार साल पूर्व किंग डेविड के समय से मिलता है. डेविड को इस्लाम में दाउद के नाम से संबोधित किया गया है. किंग डेविड ने यूनाइडेट इजराइल पर शासन किया. डेविड के बेटे हुए किंग सोलोमन.जो इस्लाम में सुलैमान हुए. इनका कालखंड ईसा से करीब 900 साल पहले का है. किंग सोलोमन ने यहूदियों का पहला टैंपल #यरुशलम में बनवाया जहां भगवान यहोवा की पूजा होती थी. ये यहूदियों का गोल्डन टाइम था. किंग सोलोमन के पास अकूत दौलत थी. उनकी 300 रानियां थीं और इस बात का भी उल्लेख मिलता है की किंग सोलोमन के समय में कई देशों की तरह ही दक्षिण भारत से भी इजराइल का व्यापार होता था.
किंग सोलोमन की मौत के बाद यहूदी बिखर गए और फिर सदियों तक एक छत नसीब नहीं हुई. ईसा पूर्व 931 में यूनाइडट इजराइल में सिविल वॉर होता है और ये इलाका उत्तर में इजराइल किंगडम और दक्षिण में जूदा किंगडम में बंट जाता है. यहीं से इजराइल के पतन की कहानी शुरू होती है लेकिन वो सबसे बड़ी गलती होनी बाकी है. जिसने आने वाले 2 हजार साल तक यहूदियों का पीछा नहीं छोड़ा. इजराइल के बंटवारे के बाद वहां बेबीलोन साम्राज्य का कब्जा हुआ जो इराक के राजा थे. ईसा पूर्व 587 में बेबीलोन ने यरुशलम में किंग सोलोमन के बनाए यहूदियों के पहले मंदिर को गिरा दिया. फिर कुछ समय बीता और 516 ईसा पूर्व में इसे फिर बनाया गया जिसे यहूदी सेकंड टैंपल या दूसरा मंदिर कहते हैं. उस दौर में यहूदी कुछ संभले और इनकी आबादी भी लाखों में पहुंच चुकी थी. यहूदियों ने शिक्षा और व्यापार के जरिए खुद को मजबूत बनाए रखा.
ईसा पूर्व साल 332 में इजराइल की धरती पर सिकंदर ने कदम रखें और उसकी मौत तक वो राजा रहा. सिकंदर के बाद कुछ विशेष नहीं हुआ लेकिन तभी ईसा पूर्व 63 में इजराइल में रोमन की एंट्री होती है और यहूदियों का जमकर कत्लेआम शुरू होता है. और इसी दौर में यरुशलम की उसी जमीन पर जहां आज अल अक्सा मस्जिद है और जो विवाद का केंद्र बना हुआ है वहां ईसा मसीह का जन्म होता है. ईसा एक यहूदी थे लेकिन वो अपनी विचारधारा लेकर आए. उन्होंने अपने धर्म का प्रचार किया जो #रोमन और #यहूदी दोनो को पसंद ना आया. ईसा ने खुद को परमेश्वर का पुत्र कहा और चमत्कार किए कई यहूदी उनके शिष्य बनने लगे और ईसाई धर्म की नींव पड़ी और बस यहीं पर यहूदियों से वो गलती हो गई जिसकी भरपाई अगले 2000 साल तक करनी पड़ी.
ऐसा आरोप है कि यहूदियों ने ही रोमन गवर्नर पिलातुस को भड़काया और ईशु की शिकायत कर दी. पिलातुस ने यहूदियों को खुश करने के लिए ईसा को सलीब पर चढ़ाकर मारने का आदेश दिया तब ईशू की उम्र 30-33 साल बताई जाती है. ईशु की मौत में जिम्मेदार होने का कलंक यहूदियों के साथ चस्पा हो गया कि ये श्राप बन गया इसके बाद तो कई सदियों तक यहूदियों का नरसंहार हुआ है. हालांकि पोप बेनेडिक्ट 16वें ने ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने के आरोप से यहूदियों को मुक्त करार दे दिया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इतिहास में इस एक घटना के कारण इतना रक्त बहा जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती. यहूदी धर्म के आलोचकों के मुताबिक यहूदी धर्म को धार्मिक श्राप मिला है और उसका एक बहुत बड़ा कारण ईसा की मृत्यु में रोमन का साथ देना है. ईशु के बाद दुनिया में जहां भी #ईसाई साम्राज्य स्थापित हुए वहां यहूदियों के रक्त से होली खेली गई लेकिन इन दो धर्मों की लड़ाई में #इस्लाम की एंट्री कब और कैसे हुई ये जानना भी दिलचस्प है.
यहूदियों को मिले धार्मिक श्राप का पहला नजारा ईसा की मौत के करीब 37 साल बाद देखने को मिला जब यहूदियों ने इजराइल पर राज कर रहे रोमन साम्राज्य के खिलाफ बगावत की दी और बदले में रोमन सेनाओं ने यरुशलम को रौंद डाला. ऐसा कत्लेआम इतिहास में नहीं देखा गया था कहा जाता है कि एक ही दिन में करीब 1 लाख से ज्यादा यहूदियों को कत्ल कर दिया गया और सेकंड टैंपल भी नेस्तनाबूद कर दिया. यहूदियों की बहुत सी धार्मिक किताबें और धार्मिक चिन्ह और महत्व की चीजें भी तबाह हो गई और यहीं से शुरू होता है यहूदी डायसपोरा. जो साल 1917 तक जारी रहा करीब 1900 साल का कत्लेआम.

यहूदी डायसपोरा का अर्थ है यहूदियों का इजराइल से भागना और दुनिया के दूसरे मुल्कों में शरण लेना. वो यूरोप, अफ्रीका, अरब और एशिया तक में फैल गए पर कत्लेआम नहीं रुका. रोमन को लगता था कि ईसाई और यहूदी एक ही हैं और वो दोनों का दुश्मन रहा जबकि यहूदी और ईसाई एक-दूसरे कि खिलाफ लड़ रहे थे.
वर्चस्व का त्रिकोणीय मुकाबला अगले 300 साल तक जारी रहा और अरब में लाशों के पहाड़ खड़े कर दिए गए . ईसा 300 में बहुत बड़ा टर्निंग प्वाइंट आया कांस्टैंटिन द ग्रेट जो कि एक रोमन राजा था उसने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया वो पहला रोमन बादशाह हुआ जिसने ईसाई धर्म को चुना और यहां से यहूदियों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गईं क्योंकि अब रोमन और ईसाई एक हो चुके थे जबकि यहूदी बिल्कुल अकेले पड़ गए. अब तो क्या रोमन और क्या ईसाई. सभी ने मिलकर यहूदियों को कहीं का नहीं छोड़ा. ऐसे दौर भी आए जब यहूदियों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए. वो गुलाम नहीं रख सकते थे. बाहर शादी नहीं कर सकते थे, अपने धार्मिक स्थल नहीं बना सकते.
अगले 500 साल तक ईसाई ही यहूदियों के दुश्मन रहे लेकिन ईस्वी 570 आ चुकी थी और यहूदी डायसपोरा को करीब 500 साल पूरे हो चुके थे. इसी साल मक्का में हजरत मोहम्मद का जन्म हुआ. ईस्वी 622 में वो मक्का से मदीना गए जिसे इस्लाम में हिजरी कहा जाता है. मदीना में तब अरबी कबीलों के आलावा ज्यादा आबादी यहूदियों की थी और तीन मुख्य कबीले यहूदियों के पास थे. यहां पर इस्लाम और यहूदियों के बीच संधि हुई कि जब मक्के से हमला होगा तो मुसलमान और यहूदी मिलकर उनका मुकाबला करेंगे और यहां से यहूदियों के जीवन में पहली बार इस्लाम की एंट्री हुई. इस्लाम के जानकर आरोप लगाते हैं कि यहूदियों ने पैगंबर मोहम्मद के साथ धोखा ही किया और कई बार उनके दुश्मनों का साथ दिया और यहीं से यहूदियों और इस्लाम के बीच अविश्वास और दुश्मनी की नींव पड़ी जो आज भी बदस्तूर जारी है.
इतिहास में मुसलमान और यहूदी हमेशा एक दूसरे के दुश्मन नहीं रहे दोनो धर्म साथ-साथ भी रहे हैं. खलीफा उमर के दौर में भी ऐसा ही हुआ. जब मुसलमानों ने सातवीं शताब्दी में स्पेन को फतह किया तो दोनो ने वहां अच्छा दौर भी देखा लेकिन साल 1099 में यूरोप के ईसाई भी संगठित हो चुके थे और क्रूसेडर का क्रूर कालखंड आरंभ हुआ. अब यूरोप से लेकर अरब के मैदान में दो नहीं बल्कि तीन धर्म एक दूसरे से वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे. ईसाइियों, इस्लाम और यहूदियों के बीच जमकर तलवारें चलीं. साल 1271 तक यूरोप के ईसाइयों ने धार्मिक युद्ध छेड़ दिया वो पवित्र भूमि फिलिस्तीन और उसकी राजधानी जेरूसलम जहां ईसा का जन्म हुआ था उसे मुसलमानों से छीनने के लिए युद्ध करने लगे. स्पेन से धीरे धीरे मुसलमान और यहूदियों को बाहर निकलना पड़ा और यहूदी या तो दुनिया के अलग हिस्सों में फैले या फिर हजारों की संख्या में अपने पूर्वजों की घरती इजराइल लौटे और बस्तियां बसानी शुरू कर दी.
भारी संख्या में यहूदी फिर से इजराइल लौटते हैं और 12वीं सदी मामलूक पीरियड और फिर उस्मानिया साम्राज्य के तहत रहते हैं. इस दौरान यहूदियों पर बहुत सी पाबंदियां लगाई गईं लेकिन मरता क्या ना करता उनको सबकुछ सहना पड़ा और पिछली कई सदियों से अपने घर के लिए भटक रहे यहूदियों का सब्र जवाब दे गया उनको लगा कि अब कुछ करना होगा नहीं तो आने वाली पीढ़ियों को क्या मुंह दिखाएंगे. कब तक इस तरह भटकते रहेंगे. इसी विचार को केंद्रबिंदू रख 17वीं शाताब्दी में हशकला मूवमेंट ने जोर पकड़ा . यहूदी राष्ट्रवाद की कल्पना ने पहली बार जन्म लिया. अब यहूदी अपने लिए एक जमीन का टुकड़ा चाहते थे जहां वो अपनी नस्ल को पाल सकें. यहूदियों ने अपने धर्म को फिर से पुर्नजीवित किया और तय किया कि एक देश तो उनके हिस्से होना ही चाहिए.
उस्मानिया साम्राज्य में भी यहूदियों की हालत अच्छी नहीं थी जिसके कारण इन्होंने रूस में भी शरण लेने की कोशिश की लेकिन वहां भी इनका नरसंहार हुआ और ईसा की मृत्यु के साथ चला आ रहा श्राप परछाई बनकर चलता रहा फिर यहूदियों को पौलेंड और लिथुआनिया में सुरक्षित ठिकाना मिला पर वो भी लंबे अरसे तक ना रहा क्योंकि ये भी तो किराए की ही जमीन थी.
बहरहाल अगले संकट से बेखबर यहूदियों ने पौलेंड में खुद को फिर से संगठित किया. ऐसा लगने लगा कि अब यहूदियों को उनके अधिकार मिल जाएंगे क्योंकि नेपोलियन ने फ्रांस की क्रांति के बाद इन्हें फ्रांस बुलाया लेकिन जल्द ही वहां भी इनके दुश्मन पैदा हो गए. यहूदियों ने ना तो कभी यीशू को और ना ही कभी हजरत मोहम्मद को पैगंबर का दर्जा दिया और यही कारण है कि इनको ईसाई और मुसलमानों ने कभी गले नहीं लगाया. कुछ अरसे तक साथ रहा लेकिन लंबा ना चला. कहना गलत नहीं होगा कि मुठ्ठी भर यहूदियों को अपने धर्म पर टिके रहने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है.
अब तक पहले विश्वयुद्ध का बिगुल बज चुका था यहां से ब्रिटेन की एंट्री मिडिल ईस्ट में होती है. इजराइल की भूमि पर मुसलमान भी रह रहे थे और यहूदी भी ये इजराइल भी था और फिलिस्तीन भी और जिस तरह ब्रिटेन ने भारत और पाकिस्तान का बंटवारा कर कभी ना समाप्त होने वाली दुश्मनी पैदा कर दी ठीक उसी तरह उसी कालखंड में यहूदियों को उनका अधिकार दिलाने का झांसा दिया.
बदले में समर्थन लेते रहे और आखिरी में सब चौपट करके चले गए. पहले विश्वयुद्ध के साथ ही उस्मानिया साम्राज्य का अंत हो गया और इजराइल में बचे यहूदी और मुसलमान जो अपने अपने लिए मुल्क चाहते थे. पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही इजराइल के हिस्से में यहूदी आबादी जमना शुरू हो गई जिसका असर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दिखा.
फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर के बीच का समय यहूदी इतिहास का सबसे काला अध्याय साबित हुआ. जर्मनी के जरिए हिटलर ने दुनिया को हिला दिया और शुरू होता है यहूदी होलोकॉस्ट का चैप्टर. कहा जाता है कि करीब 60 लाख यहूदियों को हिटलर ने गैस चैंबर में मरवा दिया और जो बच गए उनकी हालात मुर्दे जैसी थी. इस दौरान जर्मनी समेत यूरोप के बहुत से हिस्सों से यहूदी अमेरिका और इजराइल पहुंचे.
अमेरिका पहुंचने वालो यहूदियों में से एक थे दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में शुमार अल्बर्ट आइंस्टीन जो जर्मनी में पैदा हुए पर अमेरिका में जाकर शरण लेनी पड़ी. दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर की हार हुई और संयुक्त राष्ट की स्थापना हुई.
संयुक्त राष्ट्र की आगुवाई में दुनिया ने तय किया कि अब यहूदियों को उनका एक देश दे देना चाहिए और इस तरह साल 1948 में उस भूमि का बंटवारा हो गया जहां सबसे पहले यहूदियों ने राज किया था किंग डेविड और किंग सोलोमन के समय. हां बाद में वहां रोमन, सिकंदर, बेबलियोन, मुसलमान और ईसाइयों ने भी राज किया। साल 1948 के बाद का इतिहास तो सबको पता है एक हिस्सा अरब को गया और
दूसरा हिस्सा यहूदियों को मिला मगर ये बंटवारा अरब देश को रास ना आया. कई बार इजराइल और अरब मुल्कों की जंग हुई और हर बाहर अरब मुल्कों को मुंह की खानी पड़ी. इस युद्ध का सबसे ज्यादा खामियाजा उन मुसलामानों को भी उठाना पड़ा जो अलग फिलिस्तीन की मांग कर रहे थे यासिर अराफात इन्हीं के नेता थे. 1967 में 6 दिन का युद्ध हुआ जिस में अरब देशों की हार हुई और इजराइल ने जेरूसलम
के बड़े भाग पर कब्जा कर दिया और फिलिस्तीनी रिफ्यूजी हो गए . तब से जो आग लगी है वो मिडिल ईस्ट को लगातार जला रही है.
इतिहास को बारीकी और निष्पक्षता से देखेंगे तो कुछ तथ्य ज्ञात होंगे जैसे कि यहूदियों के ऊपर 2 हजार साल तक बेशुमार अत्याचार हुए हैं, यहूदियों की रंजिश मुसलामनों से ज्यादा रोमन और ईसाइयों से रही है, मुसलामनों और यहूदियों की दिक्कत तो मात्र 100 साल पुरानी है, रोमन ने यहूदियों का जैसा कत्लेआम किया वैसा इतिहास में कहीं और नहीं दिखता और कई जगहों पर यहूदी और मुसलमान साथ भी रहे हैं जैसे मदीना और स्पेन लेकिन उनके बीच विश्वास कभी पैदा ना हो सका. ईसाई और इस्लाम से भी प्राचीन होने के बावजूद यहूदियों के पास सदियों तक अपना कोई मुल्क नहीं रहा. आज जो इजराइल है वो मणिपुर जितना होगा. यहूदी अपने पूर्वजों की भूमि इजराइल और खासतौर से जेरूसलम को लेकर बहुत इमोशनल हैं क्योंकि यहां पर कभी उनकी सल्तनत थी यहीं पर उनका पहला और दूसरा मंदिर था और यहूदियों को भरोसा है कि यहीं पर उनका तीसरा मंदिर बनेगा.
वो आज भी जेरुशलम को अपना सबसे पवित्र स्थान मानते हैं. यहीं पर टेंपल माउंट भी है और अल अक्सा मस्जिद भी और यीशू का जन्म भी यहीं हुआ है. इसलिए जेरुशलम का ये परिसर अखाड़ा बन चुका है लेकिन ये गलती वर्तमान की नहीं इतिहास की है जिसकी सजा आज की पीढी भुगत रही है चाहे वो यहूदी हो या फिलिस्तीनी.
(काशी, 13मई 2021, गुरूवार)
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