रविवार, 12 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की ,,,(२) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १२जुलाई२०२०

यादें यू पी कालेज की ....(२)

            बहरहाल तीन दिन बाद शुक्रवार भी आ गया। हम और संतोष तीन दिनों से इस शुक्रवार का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। एक तरफ तो मन मे उत्साह था नये माने जाने कालेज मे पढ़ने का, वहीं दूसरी ओर तीन दिन रात तक मन मे धुकधुकी भी लगी हुई थी कि कहीं तीन दिन मे किसी क्षत्रिय छात्र को प्रवेश देने के लिये मेरा एडमिशन न कैंसिल हो गया हो। मन को यह भरोसा था कि जब बिना किसी सोर्स सिफारिश के नाम लिस्ट मे आ गया तो कटना नही चाहिये। फूलपुर बाजार मे हमें और संतोष को मिलना था वहीं से बस से बनारस आना था। बाजार मे संतोष मिले तो उन्होने कहा कि " यार सुनते है कि यू पी कालेज मे रैगिंग भी होती है और नये लड़कों को सब बड़ा मारते है।" अब यह एक नयी मुसीबत का नाम सुना हम लोगों ने, जिससे आज तक पाला नही पड़ा था। आपस मे तय किया कि चलो जहॉ तक हो सकेगा सह लिया जायेगा, और अति होने पर मूंछ वाले रामयाद सर हैं ही।  शायद इसीलिये उन्होने कहा ही है कि कोई दिक्कत पर मेरे पास आ जाना। बजरंगबली हनुमान जी का नाम ले कर हम लोग बस मे बैठे और भोजूबीर उतर कर यूपी कालेज पहुंच गये। आज भीड़भाड़ कुछ ज्यादा ही थी। लड़कों के साथ लड़कियॉ भी दिख रही थी। इतनी लड़कियों को एक साथ देखने का हमारा पहला अनुभव था क्योंकि  कक्षा ६ से लेकर इण्टर तक की हम लोगों की शिक्षा दीक्षा लड़को के स्कूल मे हुई थी। कला संकाय के भूतल पर संकाय का कार्यालय था । भवन मे प्रवेश करते दॉयी ओर,सीढ़ीयों के पहले। हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान समालोचक डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी संकाय प्रमुख थे और उन्ही के द्वारा कौसिंलिंग ली जा रही थी। हाईस्कूल इण्टर का मार्कशीट, सनद, टीसी, चरित्र प्रमाण पत्र का ओरिजिनल से मिलान कर फार्म के एक हिस्से को फाड़ कर छात्रों को दे दिया जाता और उसे ले जा कर विज्ञान भवन मे प्रथमतल के गलियारे मे स्थित फीस काउंटर पर फीस जमा करना था। यह संपूर्ण प्रक्रिया हम ने तीन चार छात्रों की कौंसिलिंग को देख कर समझ लिया था। बाहर भीड़ लगे रहने पर भी क्या मजाल कि कमरे मे दो के बजाय तीन लड़के घुस जाये। इतना सख्त अनुशासन हम लोगों के लिये नया ही नही अनोखा भी था। लगभग एक घंटा इंतजार करने के बाद संतोष का नंबर आया। मेरा नंबर लिस्ट मे उनसे पांच लाईन नीचे था। संतोष अंदर गये तो सब कुछ जॉच कर ये पता चला कि हाईस्कूल के सनद की कापी नही है। तुरंत बगल मे बैठे कुर्ता पजामा पहने हुये पतले दुबले गूरूजी ने ( बाद मे हम लोग उनको सतीश बाबू के नाम से जाने) एकदम से आदेश दिया कि जाओ  भोजूबीर से सनद फोटो कापी करा के ले आओ। अब बेचारे संतोष परेशान । हम लोगों के लिये  भोजूबीर भी उस दिन आक्सफोर्ड लेन से कम नही था। बाहर निकलने पर मैने संतोष से कहा कि थोड़ी देर रूक कर हमारी कौंसिलिंग के बाद दोनो जन चल के फोटोकापी करवा लेगें। पांच लड़को बाद बस मेरा नंबर है । मेरी बारी में अंदर  जब मेरे डाकूमेण्ट्स का मिलान हो रहा था तो संतोष बाहर  दरवाजे के पास खड़े हो उत्सुकतावश यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि कहीं मेरे मे भी कुछ कमी तो नही रह गई है तभी एकदम सफेद झकाझक सफारी मे विराजमान  डॉ० विश्वनाथ प्रासाद की दृष्टि उन पर पड़ गई और उन्होने कस कर संतोष को वहॉ खड़े होने पर डॉट दिया। रामकसम हम लोग अंदर से बुरी तरह सहम गये पर इस  बात की गॉठ बुरी तरह मन मे बैठ गई। बेचारे संतोष और हम सहमे सकुचाये भकुआये से फोटोकापी कराने दुकान पूछते पूछते हुये भोजूबीर पहुंचे। भोजूबीर भी अजीब जगह है । यहॉ १०० मीटर के अंदर मे तीन तिराहा  और दो चौराहा है और सब का नाम भोजूबीर ही है। तब यूपी कालेज से निकल कर दाहिने हाथ पकड़ कर कचहरी जाने वाले रास्ते पर चौराहे के पास कुंये के सामने कोने मे शव विश्राम स्थल का तबूतरा था और उसी के पास सरस्वती टाईपिंग एण्ड फोटोस्टेट की दुकान थी। पूरे कमरे मे लगी बड़ी सी मसीन मे पहले सीधे प्लेट निकाल कर  फिर गोल गोल आगे पीछे करते हुये फोटोकाफी हुआ करती थी वहॉ।  ५० पैसा कापी पहला पन्ना फिर ३० पैसा कापी दूसरा पन्ना की दर से। हम लोगों ने अपने सारे डाकूमेण्ट जो तब संख्या मे कुल चार थे  फोटो कापी करवा लिया।जेब के फुटकर दो रूपये उसे देकर वापस आर्ट्स फैकल्टी पहुंचे। डरते डरते संतोष के "मे आई कम इन सर?" कह कर अनुमति मॉगने पर डीन साहब ने ऐसे देखा जैसे उससे कोई गुनाह हो गया हो। थोड़ी देर पहले संतोष को मिली डॉट का सबक याद रखते हुये मै दरवाजे से हट कर खिड़की के सामने खड़ा था जहॉ से अंदर की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। डाकूमेण्ट चेक कराते समय संतोष थोड़ा टेबुल पर झुक कर कुछ बता रहा था कि ढीले ढाले कुर्ते पजामे मे अपने को सेट किये हुये पतले दुबले सतीश बाबू ने फिर हड़का दिया, "सीधे खड़े नही हो सकते, ऊपर बिछे जा रहे हो।" अब बेचारे सीधे साधे संतोष खुद की गलती भी नही समझ पाये और पहले ही दिन दो बार डॉट खा गये। खैर कौंसिलिंग की औपचारिकता पूरी कर एडमिशन फार्म का पन्ना हम लोगों को मिल गया फीस जमा करने के लिये। आर्ट्स फैकल्टी से विज्ञान भवन फीस काउंटर तक हम लोग मौन ही रहे। अंदर से दोनो जन महाविद्यालय मे हुये इस पहले साक्षात्कार से खुश नही थे पर एक दूसरे से कुछ कह नही रहे थे।

           शुक्र था कि शुल्क पटल प्रत्येक संकाय के लिये अलग अलग थे। कला संकाय वाले पटल पर आठ नौ छात्र पहले से लाईन मे थे।हम भी लाईन मे लग गये। हमे क्या पता कि असली मुश्किल तो अब होनी थी। हमारी फीस ₹६४१/- और संतोष की ₹५४१/- रूपये लगनी थी, यानि कुल ₹११८२/- रूपये । काउंटर पर पहुंच कर दोनो फार्म दिये तो काउंटर क्लर्क ने कहा कि एक छात्र से एक फार्म। जब पीछे पलट के संतोष का फार्म उसे पकड़ाने लगा तो पता नही क्यों क्लर्क महोदय को दया आ गई उन्होने कहा" अच्छा लाईन मे हो तो दे दो दोनो साथ ही।" हमने सौ सौ के बारह नोट उन्हे पकड़ाये तो फुटकर देने को कहा, तुरंत पीछे से संतोष ने पचास बीस के एक एक और दस के दो नोट बढ़ा कर मामला सेट करने की कोशिश की तो उन्होने दो रूपये फुटकर की डिमांड रख दी। यह कहते ही कि दो रूपये फुटकर नही है , वे महोदय भड़क गये, "नही है से क्या , एडमिशन कराने आये हो तो फुटकर ले के आना चाहिये था न, अब मै कहॉ से ले आँऊ आठ रूपये?" मै कभी खुद को कोस रहा था फुटकर न रखने के लिये कभी फोटोस्टेट वाले को जो उसने फुटकर दो रूपये ले लिये थे। " सर देख लिजिये" पीछे से संतोष ने याचना की। "अरे देख कहॉ से ले? यहॉ क्या हम रेचकारी की दुकान लगा के बैठे हैं।" काउंटर बाबू एकदम असहयोगात्मक मुद्रा मे थे।और हम दोनो काउंटर के बाहर विपन्न दीन हीन जैसे। समस्या यह भी थी कि उसी दिन फीस न जमा करने पर एडमिशन कैंसिल हो जाता। ऐसे मे कोई और सूरत न देख हमने लाईन मे अगल बगल वालों से फुटकर के लिये पूछना शुरू किया पर अंदर के रवैये को देख बाकी लोग भी  अपने अपने फुटकर से सावधान हो गये थे। बगल वाला काउंटर कृषि संकाय का था उस पर भी तीन चार लोग लाईन लगाये थे ,हमने उनसे भी फुटकर के लिये मदद मॉगी। पर सभी ने ना ना कह दिया। तभी उस लाईन मे खड़े तीसरे छात्र जो हम लोगों से वय मे बड़े और अच्छी कद काठी वाले थे, ने पूछा "कितना पैसा कम हो रहा है?" हम लोगों ने कहा कि "सर दो रूपये देना है इन्हे।" उन्होने तुरंत अपने जेब से एक रूपये के दो सिक्के निकाले और देते हुये कहा" कि फुटकर तो नही है, ये लो जमा कर दो।" 

                चलो ये समस्या तो निपटी। हमने ₹११८२ रूपये जमा कर रसीद ले कर औपचारिक प्रवेश पा लिया। तब तक फुटकर दो रूपये देने वाले सज्जन अपना काम निबटा कर के जा चुके थे। पुन: कला संकाय आ कर देखा तो नोटिस बोर्ड पर ५ अगस्त से कक्षाएँ चलने की नोटिस लगी थी। सुबह से लाईन लगाये और खड़े खड़े हम लोग थक गये थे । मन हुआ कुछ चाय चुक्कड़ कर लिया जाये। हमारी जानकारी मे दुकान भोजूबीर थी पर संतोष ने सुझाया कि उस दिन हम लोगों ने एनसीसी के बगल मे कैण्टीन देखा था और वहॉ बैठ कर कुछ चाय नाश्ता करते लोगों को भी। तो हम लोग कैण्टीन पहुंच गये। वहॉ ६० पैसे का समोसा और चालीस पैसे की चाय पी कर निकलने वाले ही थे कि  दो रूपये फुटकर देने वाले सज्जन कैण्टीन मे आते दिखे। हम लोगों ने सोचा बढ़िया है ये यही मिल गये नही तो बिना नाम पता के इनका भी पैसा लौटाना मुश्किल होता। अब हम लोगो के  पास फुटकर भी था । संतोष तुरंत उनके पास पहुंच कर दो रूपये देते हुये कहे "सर, वो आपका पैसा।" उन्होने दो क्षण संतोष और हमे देखा फिर बैठने को कह हम लोगों के बारे मे, विषय, पिछला कालेज, घर दुआर पूछने लगे। फिर बताया कि "इस कालेज मे सर कहने की परंपरा नही है, हम सभी एक परिवार के हैं , यहॉ बड़ो को भईया कह कर सम्मान देते है और अपनापन पाते है।" सुबह से तल्ख व्यवहार झेल रहे हम लोगों ने मुंहदेखी सहमति मे सिर हिलाया। और चलने को हुये। संतोष ने एक बार फिर दो रुपया उनकी ओर बढ़ाते हुये कहा" सर वो आपका दो रूपया।" इतना सुनते ही वो भड़क गये " तुम लोगो को एतना देर से समझा रहे है, बुझा नईखै रहा है। दूई रूपिया अपने छोटे भाई के फीस मे हम जोड़ देगें तो कर्जा मॉगेगें? और ई सर सर का होता है, कायदे से भईया कहे मे शरम आ रहा है तो अरून कहो।रखो पईसा। बड़े आये पईसा देने वाले?"

         आज सुबह से अनजाने लोगों से डॉट खाते हम लोगो का यह तीसरा मौका था। क्या जगह है यार, नये बच्चों को पा के जिसका मन हो रहा है वही हड़का दे रहा है। हम लोगों के मुंह लटक गये। जिसे तुरंत उन्होने ताड़ लिया, फिर बड़े प्यार से बोले " अरे पागल, अब हम भईया हो के तुमसे दो रूपया लेगें , मेरी तरफ से एडमिशन की खुशी मे लाल पेड़ा खा लेना", फिर जैसे उन्हे याद आया कि हम लोग तो पहली बार कालेज आये हैं हम तो लाल पेड़ा से अनजान होगें, तो तुरंत उन्होने कैंटीन काउंटर पर आवाज दिया " ऐ बाऊसाब, तीन गो लालपेड़ा भेजियेगा तो।"उस प्यार भरे डॉट के स्वाद से लालपेड़ा आज तक हमारे पसंदीदा मिठाई मे शामिल है।

         वह सज्जन अरूण भईया थे। मोहनिया रामगढ़ के रहने वाले बीएससी थर्ड ईयर के छात्र। अरूण भईया जब तक रहे, हम लोगों के लिये कालेज मे छॉव बने रहे। फिर जाने कितने बार उनके साथ लालपेड़ा खाने का मौका मिला और हर बार पैसा उन्होने ही दिया। बड़े भाई की मौजूदगी मे डॉट खाने के डर से हमने कभी पैसा देने की कोशिश भी नही की।और वो दो रूपया, वह अभी तक मूल धन के रूप मे अरून भईया के धरोहर रूप मे हमारे खाते मे दर्ज चला आ रहा है।😀😀😀

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क्रमश:.........

अगली बार----,'कालेज मे कक्षा चलने पर तीन छात्र गुट......


शनिवार, 11 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की (१) ; व्योमेश चित्रवंश की डायरी

यादें यू पी कालेज की........(१)

उदय प्रताप कालेज यानि छत्रिया कालेज।,यही धाऱणा थी यूपी कालेज के प्रति  हमारे अध्ययन से पूर्व हमारे जानने पहचानने और गॉव वालों के मन मे कि वहॉ केवल छत्रिय लोग ही पढ़ते है। वहॉ के अध्यापक दबंग होते है जो रिवाल्वर पिस्टल खोंस के चलते है, और छात्रों को दौड़ा दौड़ा कर मारते है। बाकी जातियों के बच्चों को फेल कर देते हैं। नकल करने पर रेस्टिकेट कर देते हैं। वगैरह वगैरह।
  वर्ष 1986 मे जब हमने अपने गॉव के कालेज से इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण कर लिया तो उच्च शिक्षा के लिये बनारस में कहॉ प्रवेश ले यह विकट समस्या थी। उस समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अराजकता चरम पर थी। शैक्षणिक सत्र दो वर्ष बिलंब से चल रहे थे। काशी विद्यापीठ मे पढ़ाई के अतिरिक्त सब कुछ होता था। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संबंध मे न तो कोई जानकारी थी, न ही वहॉ पढ़ने की ईच्छा, क्योंकि संस्कृत विषय मे हम पैदल क्या घसीटामार भी नही थे। तब ले दे के बचा उदय प्रताप कालेज और हरिश्चंद्र कालेज। इन दोनो कालेजो के विषय मे मेरे परिवार सहित गॉव के लोग भी तब बिलकुल अंजान थे क्योंकि मेरे परिवार के सभी लोगों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अध्ययन प्राप्त किया था और गांव के लोगों ने काशी विद्यापीठ से। मेरे इण्टर के सहपाठी मित्र संतोष कुमार सिंह (एसोसियेट प्रोफेसर, विधि, टीडी कालेज जौनपुर) ने सुझाया कि यूपी कालेज मे एडमिशन लेते है। दूसरे दिन हम दोनों जन यूपी कालेज आये और संभवत: चालीस रूपये का फार्म खरीद कर भर दिया गया। वह हम दोनो के लिये यूपी कालेज मे पैर रखने का पहला दिन था। फार्म भरने के पश्चात हम लोग विद्यालय परिसर देखने को निकले ।डिग्री कालेज से न्यू हास्टल होते हुये एनसीसी ,पुरानी लाईब्रेरी होते हुये कोआपरेटिव से घूमते हुये जिम और नंबर लिखे हुये हास्टलों को देखते हुये राजर्षि शिशु विहार रानी मुरार से आगे बढ़ते हुये इण्टर कालेज के लाल बिल्डिंग तक। बाप रे , कितना बड़ा कालेज ? हम लोग इण्टर कालेज के सामने पहुंचे ही थे कि पीछे से एक गरजती हुई आवाज आई ," रूको, कहॉ जा रहे हो? किस सेक्शन में हो? ड्रेस क्यों नही पहने हो?" हमने पीछे घूम कर देखा तो प्रभावशाली व विशाल व्यक्तित्व के सज्जन बड़ी बड़ी डरावनी मूंछे और बड़ी बड़ी ऑखों से सवाल करते हमे घूर रहे थे।

" जी हम लोग एडमिशन के लिये फार्म लेने आये थे।" हमारी व संतोष दोनों की हवा खिसक चुकी थी। छत्रिया कालेज के बारे मे सुने गये सारे किस्से कहानी हम लोगों को याद आने लगे थे।

"फार्म? किस चीज का फार्म?" उसी तल्ख असरदार आवाज मे अगला सवाल।

"जी, वह बी ए मे एडमिशन के लिये।" संतोष मिनमिनाये।

"तो यहॉ क्या कर रहे हो? डिग्री कालेज जाओ।"

"जी वह देख रहे......." संतोष वाक्य पूरा करें कि हमने मौके को संभाला " जी सर वह रास्ता भूल गये थे।"

"अच्छा,अच्छा, पहली बार आये हो। बेटा इधर से सीधे जा कर मेन गेट से बॉये घूम जाना तो डिग्री कालेज पहुंच जाओगे। यह इण्टर कालेज है। अब चले जाओगे न?" आवाज मे असर वही पर अब लहजा समझाने वाला हो गया था।

"जी सर।" हमने तत्काल उस लंबे चौड़े रोबीले काया का चरण छुआ। देखा देखी संतोष ने भी।

" खूब खुश रहो, मेहनत से पढ़ो। कोई समस्या हो तो आ जाना, उस कोने वाले कमरे मे बैठता हूँ मै।"

अब लहजा समझाने से बढ़ कर प्यार दुलार वाला हो गया था। बेहद अपनो जैसा, पर आवाज मे वही असर।

"जी", कह कर हम लोग वहॉ से जल्दी से निकल पड़े , जान बची तो लाखों पाये। लगभग भागने के अंदाज मे चलते हुये हम लोग मेन गेट से बाहर आ कर भरपूर सांस लिये होगें। संतोष ने तत्कालिक एलान कर दिया कि भाई मै तो यहॉ नही पढ़ूगॉ, अंदर से मै भी हिला हुआ था। संतोष तो फिर भी क्षत्रिय हैं, मेरा क्या होगा, मै भी ये सोच के परेशान था। ठीक है भाई , चलो हरिश्चंद का भी फार्म भर देते है। वहॉ से हम लोग निकल कर भोजूबीर केशरी मंदिर के पीछे अपने नाना के मकान पर पहुंचे वहॉ भोजन कर दोनो जन हरिश्चंद्र कालेज पहुंच गये। वहॉ फार्म लेने के बाद हमने पाया कि यह तो हमारे पुराने इण्टर कालेज से भी छोटा है। मुर्गी के दरबे के माफिक। बहरहाल वहॉ भी पचास रूपये का फार्म खरीद कर हम लोग गांव लौट आये, पर यू पी कालेज का वह खुला खुला हरा भरा परिसर हमारी आंखो पर चढ़ा रहा और  बार बार बुलाते हुये ललचाता रहा। एक सप्ताह बाद हम दोनो लिस्ट निकलने पर पुन: मन को समझाते यूपी कालेज पहुंचे ये मान कर कि हम लोगों का नाम तो आया नही होगा पर आशा के विपरीत दूसरी लिस्ट मे हम दोनो लोगों का नाम था। काफी भीड़ भाड़ ,गहमा गहमी और लिस्ट मे नाम न आये ढेर सारे निऱाश चेहरों को देखते हुये पुन: डिग्री कालेज के पीले रंग वाले कला भवन के बरामदें की रेलिंग पर आपस मे सोच विचार कर हम लोगों ने निर्णय लिया कि अब प्रवेश तो यहीं लिया जायेगा। 

एडमिशन के लिये तीन दिन बाद की तिथि मिली थी सारे ओरिजनल डाकूमेण्ट्स व फीस ले कर आने के लिये। साथ मे दो लिफाफे पर पॉच पॉच रूपये का डाक टिकट लगा कर भी जमा करना था शहर से बाहर के नव प्रवेशार्थियों को। हम लोग तीसरे दिन आने का निश्चय कर मेन गेट से लगे पोस्ट आफिस मे से टिकट खरीद कर निकले कि वही पहले दिन वाले रोबीले व्यक्तित्व व काया के स्वामी बुलेट पर से उतरते मिले। और हम लोगों के कुछ करने से पहले ही उन्होने पहचान लिया, " क्या बेटा , कैसे हो? क्या हुआ एडमिशन का?

हम लोगों ने आगे बढ़ कर पुन: चरणस्पर्श किया।
" जी सर, शुक्रवार को बुलाया है कौन्सिलिंग के लिये।"

"बहुत अच्छे, ठीक है एडमिशन ले लो। मेहनत से पढ़ोगे तो बहुत आगे जाओगे। कोई भी दिक्कत हो तो मेरे पास चले आना। मेरा कमरा देखे ही हो?"

" जी सर।" हम ने पुन: चरणस्पर्श कर उनसे विदा लिया। मैने संतोष से कहा " यार संतोष, जहॉ, इतने सहयोगी भाव वाले टीचर है,  न हम से जान न पहचान तब भी हमारे लिये इतना करने को तैयार है तो वहॉ छत्रियता के नाम पर भेदभाव कैसे हो सकता है? मुझे लगता है कि वे सब कही सुनी बाते हैं।" संतोष ने भी मेरी बात से सहमति जताई और कहा कि "अरे यार उस गुरूजी का नाम तो पता करना था जो हम लोगों के लिये यहॉ पहले गार्जियन व मार्गदर्शक के रूप मे मिले हैं।" हम लोग वही बाहर किताब की दुकान पर सिलेबस और विषय की जानकारी ले रहे थे कि अंदर से धड़धड़ाती हुई बुलेट पर पुन; रोबीले चेहरे और मूंछ वाले गुरूजी निकले। हमने दुकान वाले से ही पूछा "क्यों भईया , वो जो बुलेट से गुरूजी जा रहे हैं, उनका क्या नाम है?"

" वो, वो तो रामयाद सर थे।" दुकानवाले ने बताया।

      .........क्रमश;

  (एडमिशन और शेष प्रक्रिया अगले अंक में)

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व्योमवार्ता/ #गुलेलन चच्चा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, ११ जुलाई २०२०

व्योमवार्ता/आज की पोस्ट #गुलेलन चच्चा पर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,११जुलाई२०२०

लगभग डेढ़ साल पहले मैने #गुलेलन चच्चा की पोस्ट फेसबुक पर डालना शुरू किया। कुछ मित्रों ने आलोचना किया तो कुछ ने पसंद भी किया। पसंद करने वालों की संख्या आलोचना करने वालों से पचासो गुना ज्यादा थी तो #गुलेलन चच्चा की पोस्ट जारी रही। सुबह सुबह #गुलेलन चच्चा के तीखे सवाल से जहॉ व्यवस्था और पार्टी के कुछ लोग तिलमिला जाते तो बहुतेरे मुझे फोन कर इस तरह के सवाल उठाने के लिये प्रोत्साहित करते हुये शाबासी भी देते। बहुत सारे मित्रों ने #गुलेलन चच्चा को खोजने की भी कोशिश की।तो एक दो जनों ने #गुलेलन नाम पर ऐतराज जताया, मुस्लिम बंधुओं को यह नाम मुस्लिम तो हिन्दू मित्रों को इसमे तिरस्कृत हिन्दू की झलक मिली। पर #गुलेलन चच्चा इस हिन्दू मुस्लिम के पचड़े से दूर अपनी बेबाक राय देते रहे। इधर हाल मे फिर कुछ मित्रों ने #गुलेलन चच्चा के बारे मे जानने की ईच्छा और जिज्ञासा जाहिर किया तो मैने भी सोचा कि आज फुरसत मे #गुलेलन चच्चा के चरित्र को आप के समक्ष उजागिर कर ही देते हैं।
#गुलेलन चच्चा एक आम मध्यआयवर्गीय सामान्य जाति के भारतीय नागरिक है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से  बी.ए. करने के बाद उनकी नौकरी भारतीय जीवन बीमा निगम मे लग गई। तबियत से आरामपसंद और नीयत से ईमानदार इंसान #गुलेलन चच्चा १० से ५ की नौकरी करते हुये तीन साल पहले सहायक प्रशासनिक अधिकारी पद से सेवामुक्त हो कर आजकल अवकाशप्राप्त जीवन बिता रहे है। पूरी नौकरी मे ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर के सिद्धान्त पर चलते हुये दोस्तों के साथ कभी कभी चाय और खैनी शेयर करने वाले #गुलेलन चच्चा पिछली सदी के आखिरी साल जब ट्रांस्फर प्रमोशन ले कर बाबा भोलेनाथ की नगरी मे बनारस आये तो बाकी जिन्दगी यही काटने का निर्णय ले कर विभागीय आवासीय ऋण ले डेढ़ बिस्वा जमीन मे एक छोटा सा घरौंदा भी बनवा लिया। बाबा के आशीर्वाद से यहीं रह बच्चों को पढ़ाया लिखाया और बिटिया की शादी भी निबटा दी। बेटा प्राईवेट कालेज से समय और फैशन के अनुरूप बीटेक कर के कोई टेढ़े मेढ़े से नाम वाली मल्टीनेशनल कंपनी मे साफ्टवेयर इंजीनियर है,वो कुछ टीम हेड या ग्रुप हेड जैसे पद पर।#गुलेलन चच्चा ने जितना पैसा कभी एक साथ अपने बैंक एकाउंट मे देखा नही था उससे कहीं ज्यादा उसका एक महीने का सीटीसी है।#गुलेलन चच्चा बताते है कि ४०-४२ के पैकेज पर है अभी, उसकी एक टांग हैदराबाद मे तो दूसरी हमेशा उड़ते जहाज मे रहती है। अब बनारस मे रह गये #गुलेलन चच्चा और उनकी पत्नी तो दोनो मे दिन भर टीवी पर महादेव, सास बहू, ससुराल या आजतक और आर भारत देखने को लेकर चैनल बदलने व रिमोट लेने देने को ले कर टुन्न पुन्न लगी रहती है। #गुलेलन चच्चा डायबिटिक है तो पत्नी बीपी पेसेंट। बस इसी तरह ड्राइंगरूम से लेकर खाने से लेकर बतियाने तक का काम हाल मे लगे डाइनिंग टेबुल करते हुये जिन्दगी काढ़ा, टैब्लेट और नित्यम पर कट जा रही है।
#गुलेलन चच्चा की देशभक्ति (आप इसे मोदीभक्ति भी कहें तो कोई दिक्कत नही) मे कोई कसर नही पर कालोनी मे झाड़ू मारने वाले से लेकर सभासद मेयर विधायक डीएम कमिश्नर तक के कार्यप्रणाली से उन्हे संतुष्टि नही है। असंतोष तो उन्हे चीन अमेरिका नेपाल पाकिस्तान से भी है पर वे इन सारी बातों को अपनी पत्नी से साझा नही कर पाते। सुबह जब दूध लेने आते है तो वहॉ उनके जैसे कई वरिष्ठ नागरिक भी इसी मनोदशा और मनोव्यथा मे अपने अपने विचार रखते है। वहॉ पर दूध वाले यादव जी भी उन्हे नही टोंकते क्योंकि जब चर्चा जवान होती है तभी यादव जी भी बचपन से सिखाया हुआ जवानी मे प्रैक्टिस किया अपना निरामयी करतब का खेल दूध मे अकसर कर देते है और #गुलेलन चच्चा तथा बाकी लोग थन से निकले शुद्ध दूध के जुमले मे अपनी संतुष्टि पा जाते है। और #गुलेलन चच्चा जैसे लोग वही पर अपने विचारों को अभिव्यक्त कर के अपने को राष्ट्रीय विचारक समझते है। पर यह हर आम औ खास देशवासी नागरिक की ईमानदार अभिव्यक्ति होती है।
जिसे हम #गुलेलन चच्चा के बेबाक पोस्ट पर लिखते हैं।
शुक्रिया #गुलेलन चच्चा और उनके सभी चाहने वालों का।
(बनारस, ११जुलाई२०२०,शनिवार)
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शनिवार, 20 जून 2020

व्योमवार्ता / षडयंत्र को समझिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2020

व्योमवार्ता / षडयंत्र को समझिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2020

*कल One+ 8 Pro लॉन्च हुआ 1 घण्टे में सारा बिक गया ऑनलाइन भारतीयों को जलील करने का ये एक नया ड्रामा शुरू हुआ है।*

*मेरे किसी मित्र ने खरीदा नहीं,आप भी पूछ कर देख लो, 1000 % आपके भी किसी मित्र ने नहीं खरीदा होगा फिर सारा माल गया कहा??*

*अब आप सच्चाई सुने- चीनी कंपनीज One+,Redme  आदि फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे ऑनलाइन स्टोर्स से पेड प्रमोशन करातीं हैं।*

*मात्र 1 घण्टे के प्रमोशन के लिए कम से कम 10 लाख रुपये सिर्फ इस बात के दिये जाते हैं कि यूजर हॉट सेल बटन को जब दबाए तो उसको मैसेज मिले - sold out, out of stock....*

*इसलिए किसी भारतीय को अपशब्द मत बोलना, किसी ने नहीं खरीदा है ये भारत की मिट्टी है।यहाँ इतना कमजोर कोई नही है जब देश पर बन जाये तो बड़ी से बड़ी आहूति देने के लिए हर भारतीय तैयार रहता है... ये paid promotion था*

*चीन हमें हतोत्साहित करने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है  कि हम भारतीय कुछ नहीं कर सकते...न युद्ध न आर्थिक बहिष्कार।*

*ग्लोबल टाइम्स जैसा अख़बार भी अगर इस खबर को छाप रहा तो इसका मतलब चोट सही जगह लगी है बहिष्कार जारी रहना चाहिए .*

*साथियो चीन के इस चालाकी को हम सभी मिल कर समाप्तकर देंगे।इस तरह के भ्रामक अफवाहों को फैलने न दे।*
(बनारस, २० जून २०२०, शनिवार)
#व्योमवार्ता
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शुक्रवार, 5 जून 2020

व्योमवार्ता / पिताजी आपने मेरे लिये किया क्या है?

व्योमवार्ता / पिताजी आपने मेरे लिये किया क्या है?
( कहानी जिसे आप पढ़िये और साझा किजिये)

"अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आओगे क्या?"

"क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?" शरद राव ने पुछा।

आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह 7 बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।"
"ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।"

शरद राव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये। पुष्पाबाई ने  राहत की साँस ली।

शरद राव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था।

विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और
पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना।

*विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ?*

"माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे पापा   (पिताजी)। अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।"

"राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे पापा  घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई?"

"क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई - बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ?"

एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं।

क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को *"बाप ने क्या किया मेरे लिये"* पुछ रहा हैं?

फिर बोली  ....
*"तुम्हारे पापा  ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। "*

राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — *"अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते।*

*आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं।"*

"यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे पापा ( पिताजी) का तत्व था, *ज्ञान दान का पैसा नहीं लेना।*

उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे।"

ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया।

"क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।"

इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे।

पापा  ने उनका  बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरद राव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया।

ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज ....

शरद राव ने टिफ़िन साईकिल को  अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे।

7 किलोमीटर दूर कंपनी तक पहुचते - पहुंचते उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया।

"राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?"

"अभी नहीं सहाब आये हुए है ।" गार्ड बोला।

"चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।"

शरद राव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी।

थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था।

इसलिये शरद राव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी।

चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे कई   अधिकारी और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।

उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया।

   *चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरद राव की ओर उठ गई।*

कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे।

"वो सामने कौन खडा हैं?" उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा।

"अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।"
गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा।

"बुलवाइये उनको।"

जो नहीं होना था वह हुआ।

राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा।

गार्ड के आवाज देने पर शरद राव पास आये।

चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये।

*"आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हाई स्कूल में शिक्षक थे।"*

"हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?"

कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये।

*"सर, मैं अतिश अग्रवाल। तुम्हारा विद्यार्थी। आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे।"*

" हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो ..."

*चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, "सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।*

सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया?"

गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया।

वो देखकर शरद राव ही बोले — "उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया।"

"ओके... ओके...!"

*चेयरमैन साहब ने शरद राव का हाथ अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।*

"बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।

"नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।" शरद राव सकपकाते हुए बोले।

*"सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं।*
तब पहला हक आपका हैं।"
चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।
"आपको मालूम नहीं होगा पवार सर.."

जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले,
"पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता।"

राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे।

"स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई।

*माँ ने उनसे बहुत विनती की।* और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने सबको चौंका दिया था।"

*"माय गुडनेस...! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी?"*
जनरल मैनेजर ने पुछा। 
        
"मेरे माँ - पिताजी के साथ मैं सर के घर पेढे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं।

सर बोले — "मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हीरे बनाये हैं। सर आपको कोटि कोटि प्रणाम...!!"
*चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।*

"परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।"
शरद राव की ओर देखकर जी. एम ने कहा।

"अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था।" चेयरमैन बोले।

*"मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।"*

*ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया।ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।"*

बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला।

फिर चेयरमैन ने शरद राव से पुछा, - "सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं।"

*"उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! "*
शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया।
   
*उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।*

‌"तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ....."
"क्या.?"
शरद राव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें। "नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।" शरद राव आग्रहपूर्वक बोले।

चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया।  "सर, प्लीज....  ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।"

फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या?"

‌"नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया।"

चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले "अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। *"सागर लान्स"* तो मालूम ही होगा!"

"सर वह तो बहूत महंगा हैं..."

"अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं।

परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने... वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारीख बताओ और सामान लेकर जाओ।
"बहूत बहूत धन्यवाद सर।"

राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। *"धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल!* ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें कोई दुख भी नहीं होने दोगे।

मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से  लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।"
चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले।

"नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा।" राहूल हाथ जोडकर बोला।

*शाम को जब राहूल घर आया तब, शरद राव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी।*

राहूल ने बैग रखी और शरद राव के पाँव पकडकर बोला — *"पापा , मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आज तक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था पापा  आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।"*

‌शरद राव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं।

इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बूंदे गाल पर लुढक आई।

आज मुझे यह कहानी सोशल मीडिया पर मिली , दिल को छू गई । अगर आपको भी अच्छी लगे तो एक विनती है कि यह पोस्ट किसी स्नेहीजन को भेजियेगा जरूर ! खाली वक्त में हम कुछ अच्छा भी पढ़ें ।
✍
*कृपया अपने पिताजी से कभी यह न कहे कि "आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं? जो भी कमाना हो वो स्वयं अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे..*✍
*मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः*
(बनारस, 5 जून 2020, शुक्रवार, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, सं०२०७७ वि०)
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