शनिवार, 20 जून 2020

व्योमवार्ता / षडयंत्र को समझिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2020

व्योमवार्ता / षडयंत्र को समझिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2020

*कल One+ 8 Pro लॉन्च हुआ 1 घण्टे में सारा बिक गया ऑनलाइन भारतीयों को जलील करने का ये एक नया ड्रामा शुरू हुआ है।*

*मेरे किसी मित्र ने खरीदा नहीं,आप भी पूछ कर देख लो, 1000 % आपके भी किसी मित्र ने नहीं खरीदा होगा फिर सारा माल गया कहा??*

*अब आप सच्चाई सुने- चीनी कंपनीज One+,Redme  आदि फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे ऑनलाइन स्टोर्स से पेड प्रमोशन करातीं हैं।*

*मात्र 1 घण्टे के प्रमोशन के लिए कम से कम 10 लाख रुपये सिर्फ इस बात के दिये जाते हैं कि यूजर हॉट सेल बटन को जब दबाए तो उसको मैसेज मिले - sold out, out of stock....*

*इसलिए किसी भारतीय को अपशब्द मत बोलना, किसी ने नहीं खरीदा है ये भारत की मिट्टी है।यहाँ इतना कमजोर कोई नही है जब देश पर बन जाये तो बड़ी से बड़ी आहूति देने के लिए हर भारतीय तैयार रहता है... ये paid promotion था*

*चीन हमें हतोत्साहित करने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है  कि हम भारतीय कुछ नहीं कर सकते...न युद्ध न आर्थिक बहिष्कार।*

*ग्लोबल टाइम्स जैसा अख़बार भी अगर इस खबर को छाप रहा तो इसका मतलब चोट सही जगह लगी है बहिष्कार जारी रहना चाहिए .*

*साथियो चीन के इस चालाकी को हम सभी मिल कर समाप्तकर देंगे।इस तरह के भ्रामक अफवाहों को फैलने न दे।*
(बनारस, २० जून २०२०, शनिवार)
#व्योमवार्ता
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शुक्रवार, 5 जून 2020

व्योमवार्ता / पिताजी आपने मेरे लिये किया क्या है?

व्योमवार्ता / पिताजी आपने मेरे लिये किया क्या है?
( कहानी जिसे आप पढ़िये और साझा किजिये)

"अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आओगे क्या?"

"क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?" शरद राव ने पुछा।

आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह 7 बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।"
"ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।"

शरद राव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये। पुष्पाबाई ने  राहत की साँस ली।

शरद राव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था।

विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और
पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना।

*विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ?*

"माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे पापा   (पिताजी)। अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।"

"राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे पापा  घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई?"

"क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई - बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ?"

एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं।

क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को *"बाप ने क्या किया मेरे लिये"* पुछ रहा हैं?

फिर बोली  ....
*"तुम्हारे पापा  ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। "*

राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — *"अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते।*

*आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं।"*

"यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे पापा ( पिताजी) का तत्व था, *ज्ञान दान का पैसा नहीं लेना।*

उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे।"

ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया।

"क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।"

इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे।

पापा  ने उनका  बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरद राव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया।

ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज ....

शरद राव ने टिफ़िन साईकिल को  अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे।

7 किलोमीटर दूर कंपनी तक पहुचते - पहुंचते उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया।

"राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?"

"अभी नहीं सहाब आये हुए है ।" गार्ड बोला।

"चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।"

शरद राव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी।

थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था।

इसलिये शरद राव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी।

चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे कई   अधिकारी और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।

उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया।

   *चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरद राव की ओर उठ गई।*

कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे।

"वो सामने कौन खडा हैं?" उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा।

"अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।"
गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा।

"बुलवाइये उनको।"

जो नहीं होना था वह हुआ।

राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा।

गार्ड के आवाज देने पर शरद राव पास आये।

चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये।

*"आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हाई स्कूल में शिक्षक थे।"*

"हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?"

कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये।

*"सर, मैं अतिश अग्रवाल। तुम्हारा विद्यार्थी। आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे।"*

" हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो ..."

*चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, "सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।*

सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया?"

गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया।

वो देखकर शरद राव ही बोले — "उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया।"

"ओके... ओके...!"

*चेयरमैन साहब ने शरद राव का हाथ अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।*

"बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।

"नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।" शरद राव सकपकाते हुए बोले।

*"सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं।*
तब पहला हक आपका हैं।"
चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।
"आपको मालूम नहीं होगा पवार सर.."

जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले,
"पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता।"

राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे।

"स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई।

*माँ ने उनसे बहुत विनती की।* और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने सबको चौंका दिया था।"

*"माय गुडनेस...! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी?"*
जनरल मैनेजर ने पुछा। 
        
"मेरे माँ - पिताजी के साथ मैं सर के घर पेढे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं।

सर बोले — "मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हीरे बनाये हैं। सर आपको कोटि कोटि प्रणाम...!!"
*चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।*

"परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।"
शरद राव की ओर देखकर जी. एम ने कहा।

"अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था।" चेयरमैन बोले।

*"मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।"*

*ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया।ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।"*

बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला।

फिर चेयरमैन ने शरद राव से पुछा, - "सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं।"

*"उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! "*
शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया।
   
*उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।*

‌"तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ....."
"क्या.?"
शरद राव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें। "नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।" शरद राव आग्रहपूर्वक बोले।

चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया।  "सर, प्लीज....  ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।"

फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या?"

‌"नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया।"

चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले "अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। *"सागर लान्स"* तो मालूम ही होगा!"

"सर वह तो बहूत महंगा हैं..."

"अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं।

परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने... वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारीख बताओ और सामान लेकर जाओ।
"बहूत बहूत धन्यवाद सर।"

राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। *"धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल!* ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें कोई दुख भी नहीं होने दोगे।

मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से  लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।"
चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले।

"नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा।" राहूल हाथ जोडकर बोला।

*शाम को जब राहूल घर आया तब, शरद राव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी।*

राहूल ने बैग रखी और शरद राव के पाँव पकडकर बोला — *"पापा , मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आज तक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था पापा  आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।"*

‌शरद राव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं।

इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बूंदे गाल पर लुढक आई।

आज मुझे यह कहानी सोशल मीडिया पर मिली , दिल को छू गई । अगर आपको भी अच्छी लगे तो एक विनती है कि यह पोस्ट किसी स्नेहीजन को भेजियेगा जरूर ! खाली वक्त में हम कुछ अच्छा भी पढ़ें ।
✍
*कृपया अपने पिताजी से कभी यह न कहे कि "आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं? जो भी कमाना हो वो स्वयं अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे..*✍
*मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः*
(बनारस, 5 जून 2020, शुक्रवार, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, सं०२०७७ वि०)
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शनिवार, 2 मई 2020

व्योमवार्ता/ करना है एक वादा खुद से

व्योमवार्ता/  करना है एक वादा खुद से, : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 2मई2020

                      हम आर्थिक चुनौतियों के दौर में हैं। बहुत से लोगों की नौकरी चली गई होगी। जा सकती है। सैलरी कम हो गई होगी या हो सकती है। याद रखना है कि ये हालात आपकी वजह से नहीं आए हैं। आप ख़ुद को दोष न दें। न हार, अपमानित महसूस करें। रास्ता नज़र नहीं आएगा लेकिन हिम्मत न हारें। कम से कम खर्च करें। अपनी मानसिक परेशानियों को लेकर अकेले न रहें। दोस्तों से बात करें। रिश्तेदारों से बात करें। किसी तरह का बुरा ख़्याल आए तो न आने दें। इस स्थिति से कोई नहीं बच सकता। तो धीरे धीरे खुद को पहाड़ काट कर नया रास्ता बनाने के लिए तैयार करें। अपनी भाषा या सोच ख़राब न करें। कुछ भी हो जाए, जीना है, कल के लिए। धीरज रखें। कम में जीना है। यह वक्त आपका इम्तहान लेने आ गया है।

भरोसा रखिए जब आपने एक बार शून्य से शुरू कर यहाँ तक लाया है तो एक और बार शून्य से शुरू कर आप कहीं पहुँच जाएँगे। बस यूँ समझिए कि आप सांप सीढ़ी खेल रहे थे। 99 पर साँप ने काट लिया है लेकिन आप गेम से बाहर नहीं हुए हैं। क्या पता कब सीढ़ी मिल जाए। हंसा कीजिए। थोड़े दिन झटके लगेंगे। उदासी रहेगी लेकिन अब ये आ गया है तो देख लिया जाएगा यह सोच कर रोज़ जागा कीजिए।

सकारात्मक रहे। घर पर ही रहिए।
(बनारस,2मई 2020,शनिवार)
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शुक्रवार, 1 मई 2020

व्योमवार्ता / हमारी संस्कृति मे अभिवादन के लिये नमस्ते

व्योमवार्ता / हमारी संस्कृति में अभिवादन के लिए नमस्ते : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1मई 2020, शुक्रवार

              “नमस्ते” शब्द संस्कृत भाषा का है। इसमें दो पद हैं – नम:+ते । इसका अर्थ है कि ‘आपका मान करता हूँ।’ संस्कृत व्याकरण के नियमानुसार “नम:” पद अव्यय (विकाररहित) है। इसके रूप में कोई विकार=परिवर्तन नहीं होता, लिङ्ग और विभक्ति का इस पर कुछ प्रभाव नहीं। नमस्ते का साधारण अर्थ सत्कार = सम्मान होता है। अभिवादन के लिए आदरसूचक शब्दों में “नमस्ते जी"  शब्द का प्रयोग ही उचित तथा उत्तम है।
नम: शब्द के अनेक शुभ अर्थ हैं। जैसे - दूसरे व्यक्ति या पदार्थ को अपने अनुकूल बनाना, पालन पोषण करना, अन्न देना, जल देना,  वाणी से बोलना, और दण्ड देना आदि।  नमस्ते namaste शब्द वेदोक्त है। वेदादि सत्य शास्त्रों और आर्य इतिहास (रामायण, महाभारत आदि) में ‘नमस्ते’ शब्द का ही प्रयोग सर्वत्र पाया जाता है।
सब शास्त्रों में ईश्वरोक्त होने के कारण वेद का ही परम प्रमाण है, अत: हम परम प्रमाण वेद  से ही मन्त्रांश नीचे देते है :-

नमस्ते परमेश्वर के लिए
1. - दिव्य देव नमस्ते अस्तु॥ – अथर्व० 2/2/1
   हे प्रकाशस्वरूप देव प्रभो! आपको नमस्ते होवे।
2. - विश्वकर्मन नमस्ते पाह्यस्मान्॥ – अथर्व० 2/35/4
3. - तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम: ॥– अथर्व० 10/7/32
            सृष्टिपालक महाप्रभु ब्रह्म परमेश्वर के लिए हम नमन=भक्ति करते है।
4. - नमस्ते भगवन्नस्तु ॥  – यजु० 36/21
   हे ऐश्वर्यसम्पन्न ईश्वर ! आपको हमारा नमस्ते होवे।
                      
नमस्ते बड़ों के लिए
1. -  नमस्ते राजन् ॥ – अथर्व० 1/10/2
   हे राष्ट्रपते ! आपको हम नमस्ते करते हैं।
2. - तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे॥– अथर्व०6/28/3
   पापियों के लिए मृत्युस्वरूप दण्डदाता न्यायाधीश के लिए नमस्ते हो।
3. - नमस्ते अधिवाकाय ॥   – अथर्व० 6/13/2
   उपदेशक और अध्यापक के लिए नमस्ते हो।

नमस्ते देवी (स्त्री) के लिए
1. - नमोsस्तु देवी ॥   – अथर्व० 1/13/4
   हे देवी ! माननीया महनीया माता आदि देवी ! तेरे लिए नमस्ते हो।
2 -  नमो नमस्कृताभ्य: ॥   – अथर्व० 11/2/31
   पूज्य देवियों के लिए नमस्ते।

   नमस्ते  बड़े, छोटे बराबर सब को
1-  नमो महदभयो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्य: ॥     – ऋग० 1/27/13.
बड़ों बच्चों जवानों सबको नमस्ते ।
2 -  नमो ह्रस्वाय नमो बृहते वर्षीयसे च नम: ।।– यजु० 16/30.
    छोटे, बड़े और वृद्ध को नमस्ते ।
3 - नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नम: ॥– यजु०16/32
       सबसे बड़े और सबसे छोटे के लिए नमस्ते।

👉वैज्ञानिक महत्व:
हाथ के तालु में कुछ विशेष अंश हमारे मस्तिष्क और हृदय के साथ सुक्ष्म स्नायु माध्यम द्वारा संयुक्त है।
दोनो हाथ जब प्रणाम मुद्रा में आते हैं, तो उन विशेष अंश में उद्दीपन होते हैं, जो कि हृदय एवं मस्तिष्क के लिए लाभदायक है।
तो यही है नमस्ते की परम्परा।
इसलिए जब भी आप एक दूसरे का अभिवादन करना चाहें, तो ऋषियों के अनुसार चार कार्य करने चाहिएँ।।
पहला - सिर झुकाना।
दूसरा - हाथ जोड़ना।
तीसरा - मुंह से नमस्ते जी बोलना।
और चौथा -  बड़ों का पांव छूना।

यदि सामने वाला व्यक्ति आप से बड़ा नहीं है, धन में बल में विद्या में बुद्धि में अनुभव में किसी भी चीज में बड़ा नहीं है, बराबर का है, अथवा छोटा है, तो आप 4 में से चौथी क्रिया = (पांव छूने वाली क्रिया) छोड़ सकते हैं। बाकी तीन क्रियाएं तो करनी ही चाहिएँ।  तभी दूसरे का सम्मान ठीक प्रकार से हुआ, ऐसा माना जाता है।
सबको हमारा *नमस्ते जी* 🙏
(बनारस, 1मई 2020,शुक्रवार)
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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / जीत जायेगें हम ........

व्योमवार्ता/ जीत जायेगें हम...........:व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24अप्रैल 2020

             कोरोना से जंग जारी है, यह जंग अनोखी है, शायद इतिहास मे पहली बार। जिसे जीतने के लिये घर से बाहर निकल कर रणभूमि मे लड़ने के बजाय घरों मे रह कर जीतना है। ऐसी जंग जहॉ जीत के लिये सेना की जरूरत नही बल्कि खुद मे सेना बनना है। ऐसी जंग जिसमे जीतने के लिये "जीत जायेगे हम, तू अगर संग है" के बजाय तेरे बगैर अकेले ही जूझना है। इस जंग मे मोर्चे पर लड़ रहे कोरोना वारियर्स को सहयोग देने हमे बस खुद पर नियंत्रण रख अपने को सोशल डिस्टेंसिग मे बनाये रखना है, यहॉ तक कि हम कोरोना वारियर्स से हाथ मिला कर उन्हे बधाई देने मे उनके मोर्चे को कमजोर कर सकते है। बस जरूरत इस बात की है कि हम खुद पर भरोसा रख अपने नीति नियंताओं के निर्देशों का पालन करते रहे। एक अनुमान के अनुसार यदि देश मे समय से लाकडाऊन नही हुआ होता तो शायद स्थिति की भयावहता की कल्पना भी हम नही कर सकते। इटली, स्पेन, इंग्लैंड की स्थिति हम सब देख रहे हैं । अमेरिका जैसी महाशक्ति भी कोरोना से हिल गई है ऐसे मे विश्व के दूसरे  सबसे बड़ी जनसंख्या वाले हमारे देश से कोरोना हार रहा है तो उसके लिये सिर्फ़ हमारी संकल्प शक्ति, एकता व अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है।  अपवाद स्वरूप अवमानना की  छिटपुट घटनाएँ हुई है पर इस समय उन्हे चर्चा का मुद्दा न बना कर आगे बढ़ने की जरूरत है।
       आज का जो सबसे मुश्किल सवाल है वह कोरोना के बाद हमारे भविष्य का है। कोरोना के चलते उद्योग धंधे बंद होने से सेवा क्षेत्र ठप्प होने से बेरोजगारी की संख्या पहले की तुलना मे दो से ढाई गुनी बढ़ सकती है। व्यवसाय आधारित सेवायें  भी नकद प्रवाह कम होने से प्रतिगामी होगीं। मध्यवर्गीय जनसंख्या स्वयं के जीवनस्तर को बरकरार रखने के लिये परेशान होगी ऐसी स्थिति मे एकमात्र विकल्प मात्र हमारे देश भारत के ही पास है। भारतीय संस्कृति मे बताये गये सादा जीवन उच्च विचार वाली परंपरा को हमें अपने व्यवहारिक जीवन मे उतारना होगा। ऐसे मे प्रोफेसर जे०के०मेहता के ईच्छा विहीनता के सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वयं को संतुष्टि के उच्चतम स्तर तक प्राप्त कर सकेगें। निश्चित ही आज के भौतिकवादी एवं स्वसंतुष्टि को सर्वोपरि मानने वाले जीवनशैली व परिवेश मे यह दुष्कर है पर यदि हमे स्वयं को मानसिक हताशा, आर्थिक समस्या और अनिश्चित भविष्य के मकड़जाल से स्वयं को निकालना है तो इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय भी नही। प्रो० मेहता ने मनुष्य की आवश्यकता को अनन्त माना है जिसमें एक आवश्यकता की पूर्ति होने पर दूसरी आवश्यकता तुरंत जन्म ले लेती है और यह अवचेतन आवश्यकताओं की होने की स्थिति बन जाती है। यदि हम अपनी आवश्यकता को सीमित मानते हुये मानसिक सुख को भौतिक सुख के ऊपर मान लें और स्वयं को अपने ,अपने परिवार अपने समाज के आत्मिक व आध्यात्मिक कल्याण के लिये एक तंतु के रूप मे स्वीकार करते हुये कल्याण के उद्देश्य को प्रथम मान लें तो निश्चित ही इस हताशा के दौर से हम सफलतापूर्वक विजयी हो कर निकलेगें।
             कोरोना ने हमे एक चुनौती दिया है और लाकडाऊन ने एक अवसर। पिछले एक महीने से हम अपने घरों मे परिवार के साथ रह कर अभूतपूर्व स्थिति मे कार्य करते या न करते हुये रह रहे हैं इससे दुनिया पर कोई फर्क नही पड़ा है। यह लाकडाऊन हमे बताता है कि आने वाले दिनो मे भी दुनिया पर कोई फर्क नही पड़ने वाला। अगर कहीं फर्क पड़ना है तो वह सिर्फ़ व सिर्फ हम पर, हमारे सोच पर, हमारे मानसिक अवस्था पर और हमारे द्वारा बनाये गये परिस्थितियों पर। आज जरूरत इसी बात की है कि हम स्वयं के अंदर झॉक कर स्वयं को ढूढ़े। स्वयं के हिसाब से परिस्थितियों का निर्माण करें तो निश्चित ही भविष्य हमारा है। हम अपने जीवनचर्या का आत्मनिरीक्षण करते हुये  आत्मसंयम व आत्मनियंत्रण के द्वारा उसे आत्मकल्यार्थ परिवर्तित कर अपना सके तो कोरोना का दौर भी मुश्किल नही।
(बनारस,24अप्रैल 2020,शुक्रवार)
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