सोमवार, 27 जनवरी 2020

व्योमवार्ता / डॉ० राजीव मिश्रा की किताब विषैला वामपंथ, जिसे बहुत पहले प्रकाशित होना चाहिये था : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 जनवरी 2020

व्योमवार्ता /विषैला वामपंथ, जिसे बहुत पहले प्रकाशित हो कर पढ़ना चाहिये था : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27जनवरी 2020

                    मुखपुस्तिका(फेसबुक) की हमारी साहित्यकार मित्र अभिधा शर्मा के जनवरी 2020 के दिल्ली पुस्तक मेला के दौरान अति उत्सुकता से खोजी गई और न मिलने पर किसी भी मित्र से इस पुस्तक विषैला वामपंथ को उपलब्ध कराये जाने हेतु निवेदन ने मेरा ध्यान इस की तरफ आकर्षित किया। पुस्तक के बारे मे अभिधा की यह जानकारी कि अभी नवम्बर मे पहली बार प्रकाशित और उसके एक माह के अंदर दिसंबर मे दुबारा मुद्रित होने के बावजूद किताब की अनुपलब्धता ने इस आकर्षण को और तीब्र कर दिया। फिर अभिधा के ही पोस्ट पर आये टिप्पणियाँ मे ही किसी ने बताया कि अमेजन पर किताब आ चुकी है। लगे हाथ हमने भी आनन फानन मे किताब को मंगाने हेतु आर्डर बुक कर दिया। किताब आने के बाद जब पढ़ना प्रारंभ किये तो लगा कि हम अभी तक वामपंथ के बनाये छलावे और भूलाये मे ही जी रहे थे। और अपनी आँखों को खुली रखने के बावजूद वही देख रहे थे जो हमे किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिये साजिसन दिखाया जा रहा था।   डॉ० राजीव मिश्रा के छप्पन लेखों के इस बेहतरीन संकलन को पढ़ने से कहीं अधिक गुनते हुये यह कसिस रही कि इस किताब को तो बहुत पहले प्रकाशित होना और पढ़ा जाना चाहिये था ताकि यूटोपिया मे जीने की कल्पना करने वाली अपनी संस्कृति व परंपरा से विमुख हो कर कथित नैरेटिव्स के पीछे भाग रही युवा पीढ़ी को कभी न मिलने वाली मंजिल की सच्चाई और वास्तविकता तो पता हो जाती।
     किताब के बारे में जैसा राजीव स्वयं कहते है कि " यह किताब किसी विद्वता के भ्रम मे नही लिखी गई है। ऐतिहासिक घटनाओं और तारीखों की एक्यूरेसी के लिये इसे एक रिफरेंस बुक भी नही होना है। यह किताब पढ़ने के लिये लिखी गई है, ड्राइंग रूम मे सजाने के लिये तो बिलकुल नही। यह उन किताबों मे ना गिनी जाय जिसकी दस लाख प्रतियॉ बिकें और दस हजार लोग भी उसे खत्म ना कर पाये बल्कि इसकी पॉच हजार प्रतियॉ बिके तो एक लाख लोग उसे पढ़ें।" यह किताब पढ़ने और सोचने के लिये है।
समाज के जड़ तक नकारात्मक प्रवृत्ति ने इतना गहरे तक जम चुकी है कि उसने आम जनमानस का विशेषकर युवा वर्ग को साहित्य, मीडिया, संप्रेषण और कथ्य निर्माण के माध्यम से अपने सोचने समझने के नजरिये का चश्मा लगा कर हर तथ्य को देखने पर विवस करती है। डॉ०राजीव ने समाज को लुभाने वाली भ्रामक वामपंथी शब्दावली की व्याख्या करते हुये बताते है कि " हमारी समस्या यह है कि हम अकसर अपने विमर्श में इन्हीं पॉलिटिकली करेक्ट मूल्यों को मान्यता दिए बैठे हैं। बिना यह समझे कि ये सारे शब्द जिसकी महत्ता और मर्तायादा की दुहाई देते हुये हम आपस में लड़ते हैं, वे सभी किसी न किसी देशविरोधी धर्मविरोधी या समाज विरोधी शक्ति की ढाल है। एक देशद्रोही चैनल मीडिया की स्वतंत्रता के पीछे छुपा है, एक समाज विरोधी फिल्मकार कलात्मकता के की पीछे दो नंबर के पैसे को सफेद करने वाला एक दलाल समाजसेवा के पीछे छुपा है तो नक्सलियों और जिहादियों की फौज धर्मनिरपेक्षता की ओट लिये खड़ी है ....."
डॉ० राजीव अपने विश्लेषण के आधार पर इस पालिटिकल करेक्टनेस के हौव्वा का समाधान भी बताते है " खुलकर प्रश्न किजिये.., पालिटिकल करेक्टनेस के हर मानक को अस्वीकार किजिये.., वह एक सिद्धांत नही है,शत्रु का बंकर है? यह टूटा तो शत्रु सामने होगा.., बिना पालिटिकल करेक्टनेस को अस्वीकृत और अनधिकृत किये यह लड़ाई नही जीती जा सकती। पालिटिकल करेक्टनेस एक किस्म का बौद्धिक आतंकवाद है और इसका उस  बंदूक वाले आतंकवाद से बड़ा भाईचारा है....."
विषैला वामपंथ के तथ्यों ,शब्दावलीयों की सहज ,सरल व बोधगम्य व्याख्या करने के साथ हीजोसेफ मैक्कार्थी, जान एफ केनेडी, निक्सन, जिमक्रो, देंग सियांगो पिंग, ली कुआन यू,साल अलिन्स्की केट मिलेट,एंटिनियो ग्राम्स्की, माओ, मुसोलिनी के बारे भी चर्चा की है तो कुर्ता, जीन्स, मोटे फ्रेमवाले चश्मे और गले मे गमछा लटका कर बुजुर्वा और सर्वहारा की व्याख्या करने वाले वामपंथियों के बोझिल पर असरकारक टर्मोलाजी फ्रैंकफर्ट स्कूल, रूल्स फार रेडिकल्स, पालिटिकल करेक्टनेस, विक्टम आईडेंटिटी, कनफ्लिक्ट नैरेटिव, फेमिनिज्म, सोशल आटो इम्युनिटी, म्यूटेटेड वायरस, नैरेटिव बिल्डिंग को भी विश्लेषित किया है।
कुल मिला कर पूरी तरह से समझने बूझने वाली किताब को पढ़ कर कहीं से यह नही लगता कि किताब के लेखक डॉ० राजीव मिश्रा सीनियर गैस्ट्रोइंन्ट्रोलाजी के वरिष्ठ चिकित्सक है बल्कि यह महसूस होता है कि हम किसी बेहद सुलझे वरिष्ठ राजनीति विज्ञानी, विश्लेषक के द्वारा वामपंथ के वास्तविक स्वरूप से परिचित हो रहे हैं। वैसे हम कहें कि, डाक्टर साहेब ने  किताब लिखते समय भी वामपंथ का पोस्टमार्टम ही किया है जिसमें अंदर तक विष ही भरा मिलता है, तो गलत नही होगा। वाकई यह किताब आज की जरूरत है, हम तो सोच रहे थे कि यदि यह किताब पहले आई होती तो स्वयं मेरे मन मे कुछ सामाजिक कथ्यों पर मेरा जो भ्रम था कब का मिट गया होगा। क्योंकि "वामपंथ एक तरह का sociopsychosis है। उनकी सोशल रियलिटी कुछ और है। उसमे वर्ग संघर्ष है, क्रांतिहै, समानता है .... तरह तरह की बकवास है जो आपको तब तक दिखाई नही देगा जब तक आप उनके नैरेटिव को सब्सक्राईब नही करेगें, या आप खुद उनके सायकोसिस से ग्रस्त नही हो जायेगें।
        और जबतक आपको पता नही चल जाता कि यह सायकोसिस है, आप उसके नैरेटिव को सब्सक्राइब करते हैं और वह आपको वास्तविक ही लगता रहता है....."
(बनारस, 27 जनवरी 2020, सोमवार)
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सोमवार, 20 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/है और भी दुनिया मे नावेलनिगार बड़े अच्छे, हम कहते सत्य व्यास का अंदाजे बयॉ और ...

व्योमवार्ता/है और भी दुनिया मे नावेलनिगार बड़े अच्छे, हम कहते सत्य व्यास का अंदाजे बयॉ और : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,20 जनवरी 2020

          कल रात सवा नौ बजे सत्य व्यास की बागी बलिया उठाई तो जिला बलिया के मझौंवा घाट से लेकर सिटी पीजी कालेज तक संजय नेता और रफीक मियॉ के संगत मे दियारा के बलुहट मे उन्नीस मोबाईल काल को नही उठाने के बदले अनुराग राय को उन्नीस चिन्हानी देने तक के जलेबीनुमा मोड़ के बैठकी से उठा तो रात के दो बज रहे थे। घड़ी पर निगाह गई तो मुँह से अरे नही निकला बल्कि बैठकी एक बार मे पूरी कर उठने के लिये खुद के लिये वाह निकल गया। वैसे इस वाह के असली हकदार भी अनुज सत्यव्यास हैं जो बनारस टाकीज से शुरू हुये भरोसे को दिल्ली दरबार से होते हुये चौरासी मे जमसेदपुर की यात्रा कराते हुये बागी बलिया तक बदस्तूर बरकरार ऱखे जा रहे है। यह बैठकी ट्रेन की यात्रा में हो या घोर जाड़े की ठण्डी रातों मे अपना जलवा बिखेर जाती है और यही तो इस एकाकी बैठकी का मजा है। सत्य व्यास के इस रूप का पहला मुझसे परिचय मई २०१६ मे दिल्ली यात्रा के दौरान मंडुआडीह स्टेशन पर हुआ जब स्टेशन की दुकान से बनारस टाकीज खरीद कर मै मंडुआडीह स्पेशल मे बैठ कर पहला पन्ना पलटा तो आखिरी पन्ना उलटने तक गाजियाबाद स्टेशन आ चुका था। बनारस टाकीज मुझे मानसिक रूप से पुन: बीएचयू के दिनो मे ले जा चुकी थी। आखिरी कवर पर लेखक का फोटो देखा तो याद आया अरे यह तो अपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अपना अनुज विद्यार्थी हुआ करता था। बनारस लोटा तो दिल दिमाग मे घुमड़ती बनारस टाकीज के बारे मे अपनी राय अपने ब्लाग मे लिखने के साथ ही फेसबुक मे सत्यव्यास को तलाश कर मित्रता आमंत्रण के साथ ही उसे भी साट दिया। लौटती सॉझ सत्य व्यास का सम्मान सहित स्वीकृति और आभार आ गया। फिर सत्य के साथ जो आत्मीय रिश्ता बना आज तक बरकरार है। मुझे यह स्वीकारने मे कोई गुरेज नही है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अपने जूनियर होने के नाते मै सत्य का पक्षपाती हूँ पर सच यह है कि सत्य ने पक्षपात के इन अवसरों को अपने लेखन प्रतिभा से कहीं बहुत बौना कर दिया है। स्थानीय बोली, स्थान ,इतिहास, भूगोल को अपनी बेमिसाल बुनाई की अदाकारी से कसे उनके उपन्यास उन्हे लोकप्रियता के शिखर तक ले जाने मे सफल रहे  है।
       बागी बलिया मे आज के युवाओं मे खुद की जल्द पहचान बनाने के लिये राजनीति, गुण्डई, नेतागिरी, दादागिरी , चमचागिरी , चंदावसूली, फिरौती, वर्चस्व की जद्दोजहद है वहीं दो धर्मों के दकियानूसी परंपरा से दूर मस्तमौला दो दोस्तों की साफ दिलजोई की कहानी भी है। जो राजधानी दिल्ली और लखनऊ से दूर सीमावर्ती आर्थिक तौर पर पिछड़े पर अपने परंपरा पर गौरव करने वाले जिले के मनस्थिति की भी। छात्र राजनीति को बदबूदार बनाने वाले घूंटे राजनीतिज्ञोंं की तो गॉव की भोलीभाली अपने सपनों को देखने और फिर बदले की आग मे छली गई परिवार के सम्मान के लिये जान देने को मजबूर सीधी सरल लड़की की। शिक्षा मंदिर को अवैध कमाई का दुकान बनाने वाले प्रधानाचार्य की तो शिक्षा को मंदिर समझने वाले सिद्धान्तवादी प्रो० सुमित्रा की।
और डाक साहेब, उनके बारे मे जो कहो वह कम ही है, शुरू मे लगता है कि वह एक विछिप्त बुद्धिजीवी है फिर लगता है कि बंदा सीआईडी का आदमी है और अंत में......
जाने दिजिये , नही तो आपकी बैठकी का मूड बदल जायेगा।
रही बात सत्य की, तो वह अपने नये प्रतिमान स्वयं ही नयी रचनाओं के साथ गढ़ते जा रहे हैं। हम तो पहले ही कह चुके है कि सत्य व्यास का अंदाजे बयां और........
(बनारस, 20 जनवरी 2020, सोमवार)
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शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

व्योमवार्ता /ना करो, ना ना करो,😲कहीं ऐसा न हो जाये😕: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जनवरी 2020

व्योमवार्ता /ना करो, ना ना करो,😲कहीं ऐसा न हो जाये😕: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जनवरी 2020

क्या  होगा अगर विरोधियों के शह पर जरुरती कागजात  NRC के लिये  सरकार  को नहीं  देंगे ?.......
Mr.Mathew jeff  ने साफ शब्दों  मे कहा है कि" नमो और शाह के साथ  खिलवाड़  मत करिये ।यह दोनों अलग ही मिट्टी  के बनें  है"
ज्यादातर  सारे सेकूलर व विरोधी  कह रहे कि वह NRC के संबंधित  कोई दस्तावेज नहीं  देंगे ।!!? 
देखिए  आगे  क्या  होता है? विरोधी कह रहे है कि देखते  है हमको  कैसे  BJP बाहर  कराती  है ?
            कोई  इनको  बाहर  नहीं  कर रहा है।सिर्फ  नीचे  लिखी  गइ क्रिया  चालू  होगी ।
         सबके पास आधार  और  पेन कार्ड  है।जो कोइ NRC के लिये जरूरतमंद  दस्तावेजे देने के लिए  इनकार  करेंगे ........
        सरकार  बिना नामसे एक पत्र जारी  करेंगे कि जो कोई  Sept..2020 तक दस्तावेज  NRC के लिए  जरूरी  नहीं  पेश करेंगे,  कोई सरकारी कर्मचारी  उनके  घर नहीं  आयेगा । उनको नियमित  किये  हुए  दफ्तरों  को जाना  पड़ेगा और दस्तावेज  जमा करवाने  पड़ेंगे ।
अगर आप  डीटेल नहीं  देंगे  तो आपके  मोबाइल  पर मेसेज आयेगा कि कुछ  दिन  बाद  आपका मोबाइल  OUT OF NETWORK. उसके बाद आपका  BANK ACCOUNT  FREEZ हो जाएगा ।
इस  दौरान  भी आपको  दस्तावेज  जमा करने  की छूट  दी जायगी ।और आपके  मोबाइल  और  बेंक खाता नियमित  कर सकते  है।इसके बाद  भी आप सहयोग  नहीं  करते है तो आपके  राशन कार्ड  और गैस  कनेक्शन सीज कर दिया  जायगा । तबतक 90% Kakasअपने  दादाओं की कब्र खोदकर भी मोदी और  शाह गालिया बकते हुए दस्तावेज  जमा करा चुके  होंगे । बचे 10% अभी  ऐसे  ही ढोंग करेंगे । तब अगला  कदम  यह होगा  कि इनको वोटिंग  लिस्ट  से निकालने  का नोटिस  जारी  किया  जायगा ।ज्यादातर  काका अपने  आपा खो देंगे ।अगर  वोट  नहीं  कर सकते तो BJP और  मोदी  से मुकाबला  कैसे  करेंगे?????
अगला  कदम.....पानी  और बिजली  सप्लाई बंद  हो जाएँगी
वह कानूनी  अपनी  संपत्ति  क्रय  विक्रय  नहीं  कर सकेंगे ।संपत्ति मालिकाना  हक सील कर दिया  जायगा । कोई  रियायत  और  सरकारी सुविधा  नहीं  दी जाएगी जो भारतीय  नागरिक  नहीं  हैं ।😂😂😂😉
अबतक  ज्यादातर  काका भाग भाग  कर सरकारी  अफसरों  के तलूवे चाट रहे होंगे ।😀
😂अब रहे 1% या 2%जो  बंगलादेशी, &रोहिग्यांस होंगे । अमित शाह को  इन  लफंगो से अच्छी  तरह निपटना  आता हैं ।
😀अब सरकार  के पास  हर किसी  के दस्तावेज  होंगे ।
😁बस आप  खेल  देखते  रहिए ।संयम  रखिए ।आप इनके  हाथों  मे  सुरक्षित  है।गद्दारी मत करिये
CAA का समर्थन  करिये । सरकार  के साथ  कंधा  से कंधा  मिलाकर  खड़े  रहिए ।
फैसला  आपके  हाथ  मे है । अवैध घुसपैठियों को पहचानने मे सरकार के अभियान मे सहयोग करिये।
राष्ट्र के विकास मे योगदान करिये।
जय हिन्द
🙏🙏🙏🙏
(बनारस, 17 जनवरी 2020, गुरूवार)
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गुरुवार, 16 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ ईमरजेंसी की इनसाईड स्टोरी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ ईमरजेंसी की इनसाईड स्टोरी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16जनवरी 2020

जब देश मे इमरजेंसी लगी थी तो हम चार पॉच साल के उमर के रहे होगें। ईमरजेंसी खत्म होने के बाद चुनावों मे अपने परिजनों के जोश की हल्की हल्की यादें है हमारे जेहन में। जब अपने चाचा के साथ गॉव वालों को चक्र मे हलधर का पीला हरा झण्डा उठाये साथ मे हम लोग भी जोर जोर से नारा लगाते थे "जेपी, जनता जयप्रकाश'और ' जयप्रकाश का विगुल बजा है, हवा नही यह ऑधी है'। थोड़े बड़े हुये तो इमरजेंसी मे हुये सरकारी दमनतंत्र के ढेरों किस्से सुनते थे पर कोई प्रामाणिक इतिहास नही पढ़ा । ईमरजेंसी के बीस साल , पचीस साल और तीस साल पूरे होने पर अखबारों मे इन घटनाओं और कई लोगों का संसमरण पढ़ने को मिला तो उत्सुकता और बढ़ती गई। हाल मे ही प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर की लिखी पुस्तक  "ईमरजेंसी की इनसाईड स्टोरी" मिली तो उसे पढ़ने से खुद को रोक नही पाया। हालॉकि दिसंबर मे खूब किताबें पढ़ने के बाद जनवरी मे पता नही क्यों किताबें पढ़ने की गति अत्यंत धीमी होगई है, शायद ठंड के काऱण या छुट्टियों के पश्चात काम के बोझ से, फिर भी जब ईमरजेंसी के बारे मे पढ़ने बैठा तो पूरा कर के ही उठा। ईमरजेंसी हमारे लोकतंत्र मे
सत्तर के दशक का कड़ुआ इतिहास है , जिसे परत दर परत नैय्यर जी ने बेहद खूबसूरती से ईमरजेंसी के पीछे की सच्ची कहानी को शब्दों मे पिरोया है। इमरजेंसी के घटनाओं की शुरुआत उड़ीसा में 1972 में हुए उप-चुनाव से हुई। लाखों रुपए खर्च कर नंदिनी सत्पथी को राज्य की विधानसभा के लिए चुना गया था। गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के इस मुद्दे को प्रधानमंत्री के सामने उठाया। उन्होंने बचाव में कहा कि कांग्रेस के पास इतने भी पैसे नहीं कि वह पार्टी दफ्तर चला सके। जब उन्हें सही जवाब नहीं मिला, तब वे इस मुद्दे को देश के बीच ले गए। एक के बाद दूसरी घटना होती चली गई और जे.पी. ने ऐलान किया कि अब जंग जनता और सरकार के बीच है। जनता जो सरकार से जवाबदेही चाहती थी और सरकार जो बेदाग निकलने की इच्छुक नहीं थी।’
आखिर क्यों घोषित हुई इमरजेंसी और इसका मतलब क्या था, यह आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि तब प्रेरणा की शक्ति भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मिली थी और आज भी सबकी जबान पर भ्रष्टाचार का ही मुद्दा है। एक नई प्रस्तावना के साथ कुलदीप नैयर जी ने वर्तमान पाठकों को एक बार फिर तथ्य, मिथ्या और सत्य के साथ आसानी से समझ आनेवाली विश्लेषणात्मक शैली में परिचित कराया है। वह अनकही यातनाओं और मुख्य अधिकारियों के साथ ही उनके काम करने के तरीके से परदा उठाया है। भारत के लोकतंत्र में 19 महीने छाई रही अमावस पर रहस्योद्घाटन करनेवाली एक ऐसी पुस्तक, जिसे पढ़ कर राजनेताओं और उनके चाटुकार अधिकारियों के काकस के कुतंत्र की सच्चाई पता चलती है। किताब के अंत मे परिशिष्ट रूप मे दिये मात्र मारूति के संदर्भ मे लिखें खण्ड को ही पढ़ लिया जाय तो यह कटु सत्य सामने आता है कि एक परिवार के लिये किस तरह पूरे शासनतंत्र को बौना कर के येन केन प्रकारेण लाभान्वित किया गया। सरकार मे बिना किसी पद पर रहे संजय गांधी के समक्ष किस तरह चाटुकार नेताओं और चमचे अफसरान घुटने टेके रहते थे यह सोच के भी आज हैरानी होती है।
कुल मिला कर अपने उद्देश्यों को पूरा कर इमरजेंसी के कटु इतिहास को बेनकाब करने मे सफल रही है नैय्यर जी की यह किताब।
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(बनारस, 16 जनवरी 2020, गुरुवार)
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गुरुवार, 2 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ अजीतभारती की किताब "घरवापसी ", व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 2जनवरी 2020

व्योमवार्ता/ अजीतभारती की किताब "घरवापसी ", व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 2जनवरी 2020
    बिहार के बेगूसराय से चल कर दिल्ली मे डेरा डंडा जमायें वर्तमान समय के मेरे सबसे पसंदीदा पत्रकारों मे से एक अजीत भारती जी की किताब 'घर वापसी ' पढ़ के अभी फुरसत पाया हूँ।अजीत भारती जी की इससे पहले  "बकर पुराण" नाम की लिखी किताब पढ़ा था पर "घरवापसी"मे  मुझे बेहद समीचीन समस्या पर लिखी और आज के पढ़े लिखे प्रतिभाशाली नवयुवकों की अपनी माटी के लिये कुछ करने की तड़प और कुछ करने की जिद दिखी, शायद यही मेरे इस किताब के बारे मे लिखने का कारण भी बना। यूँ तो अजीत भारती जी भी अपने माटी से जुड़ कर अपने लोगो को आज के मीडिया विशेष मे विषव्यापित कर रहे विशेष लोगों के  छद्म कुटिल उद्देश्यों से सनी मानसिकता को उजागिर करने के जिद मे लगे है। ऑपइण्डिया के अपने विश्लेषण के माध्यम से वे कुटिलता भरे विषव्यापित कर रहे स्वनामधन्य कथित पंथनिरपेक्ष कहे जाने वाले खुद अपने ईमानदारी का ढिंढोरा पीटने वाले सेकूलर पत्तलकारों की उन्ही के विशेष अंदाज मे उनके कथित समाचार प्रस्तुतियों का जो पोस्टमार्टम करते हैं उसे देख तबियत मस्त हो जाती है और अनायास ही देश की नीतियों को बचाने और संस्कारों के लम्बरदार बनने वाले मीडिया मठ वाले अपनी बड़ी बड़ी आँखे नचा नचा कर गंभीर शैली मे सपाट कहने की शैली मे आमजन को भरमाते उन खास लोगों की नीयत का खुलाशा होते देख सुन होंठ अपने आप मुस्कराने लगता है।
बहरहाल बात  " घर वापसी " की। घरवापसी भी बिहार , पूर्वी उत्तर प्रदेश के गंगा के विशाल मैदानी क्षेत्र से गये उन हजारों युवकों के ऑखों मे  बसे उन सपनों की कहानी है जिन्हे वह चाह कर भी सोई ऑखों से भूल नही पाता और जगती ऑखों मे कटु जिम्मेदारियॉ उन्हे पूरा नही करने देती।यूँ तो विस्थापित युवा के संघर्ष और आंतरिक संवाद यहाँ भी दिखते हैं, लेकिन संदर्भ अलग हो जाता है। ‘घरवापसी’ के मूल में संघर्ष है। यह संघर्ष एक बच्चे का अपने जीवन के उद्‌देश्य को लेकर है जो कि लगातार उसके अंदर कुलबुलाता रहता है। वह इससे परेशान होता है, और इससे निकलने का हर प्रयास करता है। यह रिश्तों की कहानी है जहाँ पिता-पुत्र, पति-पत्नी, दोस्ती जैसे वैयक्तिक रिश्तों के साथ-साथ व्यक्ति का अपने समाज के साथ बने रिश्ते को भी जगह दी गई है। हम वही होते हैं जो हमारा समाज हमें पालकर बनाता है।व्यक्ति तरह-तरह के वातावरण से ली गई हवाओं के ख़ून तक में संचारित होने से वो बनता है जो वो बन जाता है। हमारा दौर, पहले के तमाम दौरों की तरह, मिश्रित और बनावटी वास्तविकताओं का दौर है। सूचनाएँ आती हैं, जाती हैं, हम उनके हिसाब से, उन्हें समझते हुए, खुद को उनके अनुरूप, विपरीत, या निरपेक्ष रहते हुए व्यक्तित्वमें बदलाव लाते, या नहीं लाते हैं।बिहार से बाहर आ चुकी एक पूरी पीढ़ी के भीतर यह संघर्ष चलता रहता है। कहने का सीधा मतलब यह है कि हमारे अंदर कई लोग होते हैं। किताबों में लिखे शब्दों से लेकर फ़ेसबुक, व्हाट्‌सएप्प, दोस्तों के बीच की बातों में और पारिवारिक जगहों पर हम अलग-अलग व्यक्ति होते हैं। हर जगह हमारी आकाँक्षाएँ अलग होती हैं, संघर्ष अलग होता है। सुखमय वर्तमान अपनी विस्थापित जड़ों को नई मिट्‌टी में सींच तो रहा है, लेकिन वो पुरानी नम तासीर नहीं मिलती। दो दुनिया के बीच फँसा हमारा जीवन न तो दिल्ली का हो पाता है, न बेगूसराय के रतनमन बभनगामा गाँव का। वो बहुत कुछ करना चाहता है, लेकिन सब भीतर ही कहीं क़ैद रह जाता है।विस्थापन का सबसे बड़ा दर्द अपने घर को छोड़कर बाहर आना नहीं है। उस दर्द को आप अपने नए परिवार के साथ जी लेते हैं। आप ख़ुद को समझा लेते हैं कि आपके बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए आपका विस्थापित होना सही है। लेकिन एक बड़ा दर्द हमेशा यह रहता है कि आप उसी गली में दोबारा जा पाते तो उसे थोड़ी बेहतरी दे पाते। हर बार गाँव जाते वक़्त रिक्शा वाले से यह पूछ बैठना कि ‘अरे अभी भी सड़क नहीं बनी’, या ‘दहेज के लिए अभी भी जला देते हैं’, उसी दर्द का विस्तार है। आपके मन में यह आता है कि इसमें कुछ बदलाव कर सकते आप, लेकिन वो हो नहीं पाएगा। क्योंकि अपने भविष्य के सामने समाज का भविष्य हमेशा पीछे रह जाता है। बहुत कम लोगों में यह हिम्मत होती है कि जब वो सड़क पर खड़ा हो तो वापस मुड़ जाए।
डॉ. विवेकी राय जब उस सड़क पर खड़े हुए तो उन्होंने कुछ और चुना। उनके सामने भी परिवार, बेहतर जीवनशैली, बेहतर भविष्य की नींव का पत्थर पड़ा था। साथ ही, उनके सामने ही वो गाँव भी था जिसने उन्हें इस लायक बनाया था कि वे अपने भविष्य को बेहतर कर सकें। समाज भी एक परिवार होता है, वो भी एक माँ-बाप का जोड़ा है जो आप में निवेश करता है। हमारी पीढ़ी माँ-बाप को भी त्याग देती है, और समाज के नाम पर उसके पास कुछ वैसे फ़ोन नंबर के अलावा कुछ नहीं होता जिससे आनेवाले कॉल को वो ख़ाली वक़्त में भी उठाने से पहले सोचने लगता है। घरवापसी के अंतर्द्वंद्व से हमारी पीढ़ी हर रोज़ जूझती है।वही अंतर्द्वंद्व इस कहानी के मुख्य पात्र रवि का भी है। उसके अवचेतन में कोई नोचता है, खरोंचता है, चिल्लाता है… लेकिन उसके चेतन का विस्तार, उसके वर्तमान की चमक उस छटपटाहट को बेआवाज़ बनाकर दबा देते हैं। रवि अपनीअपूर्णताओंको जीते हुए, उनसे लड़ते हुए, बचपन में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर का पीछा करता रहता है कि उसे क्या बनना है। अपने वर्तमान में सामाजिक दृष्टि से ‘सफल’ रवि का अपने अवचेतन के सामने आने पर, ख़ुद को लंबे रास्ते के दो छोरों को तोलते हुए पाना, और तय करना कि घर लौटूँ, या घर को लौट जाऊँ, ही ‘घरवापसी’ की आत्मा है।
          अजीत की यह छोटी सी किताब पूरे कथानक को वास्तविक समस्या से ही नही बॉधती बल्कि पाठक को भी किताब पढ़ने के दौरान खुद से छूटने नही देती।
(बनारस,2जनवरी 2020)
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