शनिवार, 30 नवंबर 2019

व्योमवार्ता/ टाटी के नेनुआ से गमले के क्रोटन तक : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 नवंबर 2019 शनिवार

व्योमवार्ता/ टाटी के नेनुआ से गमले के क्रोटन तक : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 नवंबर 2019 शनिवार

कभी नेनुआ टाटी पे चढ़ के रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था, कभी खपरैल की छत पे चढ़ी लौकी महीना भर निकाल देती थी.. कभी बैसाख में दाल और भतुआ से बनाई सूखी कँहड़ोड़ी सावन भादो की सब्जी का खर्चा निकाल देती थी.. वो दिन थे जब सब्जी पे खर्चा पता तक नहीं चलता था.. देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे लेकिन खिचड़ी आते आते उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी.. तब जीडीपी का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था, सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा थीं.. लोहे की कढ़ाई में किसी के घर रसेदार सब्जी चूरे, तो गाँव के डीह बाबा तक गमक जाती थी.. संझा को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से दिन रुखसत लेता था.. रातें बड़ी होती थीं.. दुआर पे कोई पुरनिया आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो.. किसान लोगो में लोन का फैशन नहीं था.. फिर बच्चे बड़े होने लगे.. बच्चियाँ भी बड़ी होने लगी.. बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही अंग्रेजी सेंट लगाने लगे.. बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे.. किसान क्रेडिट कार्ड सरकारी दामादों की डिमांड और ईगो का प्रसाद बन गया.. इसी बीच मूँछ बेरोजगारी का सबब बनी.. बीच में मूछमुंडे इंजीनियरों का दौर आया.. अब दीवाने किसान अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार थे.. बेटी गाँव से रुखसत हुई.. पापा का कान पेरने वाला रेडियो साजन की टाटा स्काई वाली एलईडी के सामने फीका पड़ चुका था.. अब आँगन में नेनुआ का बिया छीटकर मड़ई पे उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया पिया के ढाई बीएचके की बालकनी के गमले में क्रोटॉन लगाने लगी.. और सब्जियाँ मंहँगी हो गईं..
(बनारस, 30नवम्बर 2013,शनिवार)
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मंगलवार, 6 अगस्त 2019

व्योमवार्ता/ जुलाई 2019 मे पढ़ी गई किताबें : व्योमेश चित्रवंश की डायरी , 31 जुलाई 2019

 किताबे पढ़ने के पुराने शौक को पुन: बनाने के प्रयास के संकल्प को तीसरे महीने भी बरकरार रहने का भरपूर प्रयास सफल रहा और इस महीने हम ने अंग्रेजी की दो पुस्तकें frredom at midnight और चेतन भगत की one night@call centre हिन्दी की चार पुस्तकें नरेन्द्र मोदी की ज्योतिपुंज, राही मासूम रजा की नीम का पेड़ , श्री कांत पांडेय की आज भी जीवित है हनुमानजी, सुरेन्द्र मोहन पाठक की क्रिस्टल लाज और ऱाकेश बैरागी की दि ब्लाइंड मर्डर केस यानि कुल छ: किताबें पढ़ कर अपनी पढ़ने की शौक  यात्रा जारी रखी। प्रयास यह था कि पुस्तके बोझिल व गंभीर न हो इसलिये पुस्तक चयन को लेकर कोई मापडण्ड नही बस पुस्तक चयन का आधार स्वान्त: सुखाय मन के आनंद हेतु  पढ़ना था। इसलिये हमने दो तीन वे किताबे उठाई जो दस साल बीस साल और तीस साल पहले हमने पढ़ा था। एक लुगदी साहित्य का उपन्यास तो एक रहस्य रोमांच से भरी जासूसी कथा और एक धार्मिक रचना तो एक राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी हुई गाथा।
श्रीकांत पाण्डेय जी की पुस्तक आज भी जीवित है हनुमानजी विशुद्ध रूप से भक्ति व श्रद्धा भाव से लिखी गई महावीर हनुमानजी के प्रति उनके सादर भाव है। वे पुस्तक की भूमिका मे कहते हैं कि हम रामराज लायेंगे, तो भाई-बहनों  फिर राम कहाँ से लायेंगे? रामराज्य की अवस्था क्या है? "सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती" यह रामराज्य की अवस्था है, व्यवस्था कैसी भी हो अगर, व्यक्तियों की और समाज की यह अवस्था रहेगी तो शासन में कोई भी बैठो राज्य राम का ही माना जायेगा, राम मर्यादा है, धर्म है, सत्य है, शील है, सेवा है, समर्पण है, राम किसी व्यक्तित्व का नाम नही है, राम वृत्ति का नाम है, स्वरूप का नाम राम नहीं है बल्कि स्वभाव का नाम राम है, इस स्वभाव के जो भी होंगे वे सब राम ही कहलायेंगे, वेद का, धर्म की मर्यादा का पालन हो, स्वधर्म का पालन हो, यही रामराज्य है। स्वधर्म का अर्थ है जिस-जिस का जो-जो धर्म है, पिता का पुत्र के प्रति धर्म, पुत्र का पिता के प्रति धर्म, स्वामी का धर्म, सेवक का धर्म, राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, पति का धर्म, पत्नी का धर्म, शिक्षक का धर्म, शिष्य का धर्म।जरा सी मर्यादा का उल्लंघन जीवन को कितने बड़े संकट में फँसा सकता है, जो रामराज्य में रहेगा हनुमानजी उसके पास संकट आने ही नही देंगे, क्योंकि रामराज्य के मुख्य पहरेदार तो श्रीहनुमानजी महाराज हैं, तीनों कालों का संकट हनुमानजी से दूर रहता है, संकट होता है- शोक, मोह और भय से, भूतकाल का भय ऐसा क्यों कर दिया, ऐसा कर देता तो मोह होता है। हनुमानजी सब कालों मे विद्यमान हैं, "चारों जुग प्रताप तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा" हनुमानजी तो अमर हैं।चारों युगों में हैं सम्पूर्ण संकट जहाँ छूट जाते हैं शोक, मोह, भय वह है भगवान् श्री रामजी की कथा, कथा में हनुमानजी रहते हैं, अगर वृत्तियाँ न छूटे तो हनुमानजी छुड़ा देंगे। हनुमानजी मिले तो जानकीजी का ह्रदय शान्त हो गया, शीतल हो गया, हनुमानजी के प्रति श्रद्धा रखियें, श्रद्धा से भय का नाश होता है, आपके मन में यदि भगवान् के प्रति श्रद्धा है तो आप कभी किसी से भयभीत नही होंगे।
ज्योतिपुंज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अपने आरएसएस स्वयंसेवक निर्माण काल के स्मृतियों का संग्रह है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होने अपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे प्रचारक काल के अनुभवों को सूचीबद्ध कर गुजरात मे कार्य कर चुके संघ के अपने जीवन निर्माण मे उन आदरणीय स्वयंसेवको के स्मृतियों को पिरो कर गुजराती मे ज्योतिपुंज नाम से यह पुस्तक लिखा था, जिसे उनके प्रधानमंत्री होने पर श्रीमती  संगीता पाण्डेय ने हिन्दी मे अनुवादित किया है। पूर्व शंकराचार्य स्वानी सत्यमित्रानंद ने पुस्तक की भूमिका मे अपने हृदयोद्गार बहुत ही सुंदर शब्दों मे व्यक्त किया है। उन्होंने पुस्तक के बारे मे लिखा है कि "राजनीति में रहते हुए अपने प्रेरणा-स्रोतों का स्मरण करना प्रायः कठिन काम है, लेकिन जिनके द्वारा प्रेरणा मिली है, जीवन का निर्माण हुआ है, उनका स्मरण सदा रहना चाहिए। एक सामान्य कार्यकर्ता से प्रचारक, प्रचारक से समाज के प्रतिनिधि, उसके बाद में गुजरात प्रांत के मुख्यमंत्री पद पर रहकर माननीय श्री नरेंद्र मोदी ने इन सब सात्त्विक महापुरुषों का वर्णन किया है, समाज को प्रेरणा देनेवाले लोगों का स्मरण किया है। प्रायः लोग अपने दो-चार वर्ष के काल में अपने वैभव के प्रासाद में ही रमण करते हैं। लेकिन नरेंद्र मोदीजी के व्यक्तिगत जीवन से सिद्ध होता है कि वर्तमान काल में भी प्रामाणिकता के चिह्न उपस्थित किए जा सकते हैं, उन्हें प्रकट करने में वे बड़े सावधान हैं। 
जब कोई व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है तो असत्य के मार्ग पर चलनेवाले लोगों को कष्ट होता ही है। सूर्य का उजाला सबके लिये है। सूर्य का काल सदा होता है। सूर्य सर्वदेशीय है। जब हम मानते हैं कि भारत में अँधेरा है तो अमेरिका में सूर्य प्रकाश देता है। सूर्य कभी अंधकार को स्वीकार करता नहीं। वर्तमान परिदृश्य मे हम मोदीजी की तुलना सूर्य से ही कर सकते है वे भी प्रकाश के पक्के पथिक हैं। साहसपूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। बड़े ही सहज भाव से ज्योतिपुंज मे उन्होने गुरूजी माॉधव सदाशिव गोलवलकर, वर्तमान सरसंघचालक डॉ० मोहन भागवत के पिताजी मधुकर भागवत जी, वकील साहब लक्षमण ईमानदार जी, केशव राव देशमुख जी,अनंतराव काले जी, बसंतभाई, विश्वनाथ वणीकर जी जैसे लोगो की स्मृतियों को नमन करते हुये अपनी भावांजलि व्यक्त किया है। कुछ महापुरूषों पर मोदी जी की अपनी भावांजलि कविताओं मे भी प्रकट हुई है, जिसे संगीता पाण्डेय ने बहुत ही अच्छे ढंग से अनुवादित किया है जो पुस्तक के प्रथम पृष्ठ से ही पुस्तक को रूचिकर बनाये रखती है।
नीम का पेड़ को मैने तकरीबन सत्ताईस अट्ठाईस साल पहले तब पढ़ा था जब इस उपन्यास पर आधारित पंकज कपूर अभिनीत धारावाहिक दूरदर्शन पर प्रसारित होता था। बुधिया का दर्द और सुखीराम के व्यवहार से उसकी खिन्नता आज भी ज्यों की त्यों याद हैं। हमारे पड़ोसी जिले गाजीपुर के एक गॉव मे 1 सितम्बर, 1925 को  जन्मे डॉ० राही मासूम रजा गॉव से ही प्रारम्भिक शिक्षा पा कर उच्च शिक्षा के लिये अलीगढ़ यूनिवर्सिटी चले गये और वहॉ ‘उर्दू साहित्य के भारतीय व्यक्तित्व’ पर पी-एच.डी. किया। अध्ययन समाप्त करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में अध्यापन-कार्य से जीविकोपार्जन की शुरुआत कर कई वर्षों तक उर्दू-साहित्य पढ़ाते रहे। बाद में फिल्म-लेखन के लिए बम्बई गए। जीने की जी-तोड़ कोशिशें और आंशिक सफलता पाते हुये सृजन संघर्ष मे फिल्मों में लिखने के साथ-साथ हिन्दी-उर्दू में समान रूप से सृजनात्मक लेखन किया। फिल्म-लेखन को और लेखकों की तरह ‘घटिया काम’ नहीं, बल्कि ‘सेमी क्रिएटिव’ काम मानते थे। बी.आर. चोपड़ा के निर्देशन में बने महत्वपूर्ण दूरदर्शन धारावाहिक ‘महाभारत’ के पटकथा और संवाद-लेखक के रूप में उन्हे सारे देश मे पहचान मिली। डॉ० राही एक ऐसे कवि-कथाकार, जिनके लिए भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही। वे मुंबई की फिल्मी दुनिया के रंगीनीयों मे रह कर भी वे गॉव गिराँव और आम भारतीय को नही भूले । नीम का पेड़ मे भी उनका यही पूरबिया शैली की आम गंवई की भाषा मे देश की समस्या, मूल्य और चिन्ता को लेकर किस्सागोई का अंदाज बॉधे रहता है जो आजादी के पॉच साल पहले के संघर्षों की कहानी को आजादी के दो दशकों बाद तक लेजाता है जहॉ राजनीतिक नव मानवीय मूल्यों का ह्रास बड़ी तेजी से हो रहा है, पर इसके लिये कोई शख्स खुद को बरी साबित नही कर सकता इसीलिये  सारी बाते वक्त के गवाह नीम के पेड़ से किस्सागोई मे कह जाती है' मैं तो शुक्रगुज़ार हूँ उस नीम के पेड़ का जिसने मुल्क को टुकड़े होते हुए भी देखा और आज़ादी के सपनों को टूटते हुए भी। ज़मींदारी को खत्म होते हुए देखा तो नए राजाओं को बनते हुए भी देखा। उसका दर्द बस इतना है कि वह इन सबके बीच मोहब्बत और सुकून की तलाश करता फिर रहा है। पतन के दौर में आदर्श की तलाशमें भटक रहा है। क्या करे बेचारा सारा खेल उसकी छाँह को खरीदने-बेचने का जो चलता रहा खुद उसी की छाँह के नीचे, तो तकलीफ उसे नहीं होती तो किसे होती।अब बताइए भला, मैं तो एक लेखक ठहरा। मुझे तो हर तकलीफज़दा के साथ होना है। चाहे वह हाड़-मांस का बना इंसान हो या फिर एक अदना-सा नीम का पेड़। क्या मैं उसकी कहानी सिर्फ़ इसलिए नहीं सुनाऊँ कि हम इंसानों की बस्ती में उसकी कोई औकात नहीं है। या इसलिए कि जब इंसानी जुबान का ही कोई भरोसा नहीं रहा तो फिर एक नीम के पेड़ का क्या ठिकाना। लेकिन मेरा तो यह फर्ज़ बनता ही था कि मैं उसकी कहानी आप तक पहुँचाऊँ। अब अगर इसमें आपको कोई झूठ लगे तो समझ लीजिएगा कि यह मेरा नहीं उसका झूठ है। और सच…तो साहब उसका दावा तो कोई भी नहीं कर सकता, न मैं न आप।अब मैं आपके और नीम के पेड़ के बीच ज़्यादा दीवार नहीं बनना चाहता, नहीं तो आप कहेंगे कि मैंने उसकी कहानी को अपनी बताने की गरज़ से इतनी लम्बी तकरीर दे मारी। तो चलिए आपकी मुलाकात गाँव मदरसा खुर्द के अली ज़ामिन खाँ और गाँव लछमनपुर कलाँ के मुसलिम मियाँ से करवाते हैं जो वैसे तो खालाज़ाद भाई हैं, लेकिन वैसी दुश्मनी तो दो दुश्मनों में भी न होती होगी। और हाँ, बुधई उर्फ बुधीराम का भी तो अफ़साना है  तो नीम के पेड़ की जुबानी ही सारा बुधिया के सपने और उनका छनक कर टूट जाना भी एक अफसाना है। पाठक की नजर से कहे तो  सुखीराम का आदर्शों से भटकाव व उस के लिये बुधिया की पीड़ा ही नीम का पेड़ की कथा वस्तु है जिसे देखने व सुनाने के लिये वो अभिशप्त है। बिला शक इतने वर्षों के बाद भी नीम का पेड़ की कहानी मुझे बॉधे रखने मे सफल रही।
डोंगरी से दुबई तक मुम्बई माफ़िया के छह दशक की कहानी है जिसे मुंबई के मशहूर क्राईम रिपोर्टर एस हुसैन जैदी ने अंग्रेजी मे Dongari to Dubai -Six Decades of the Mumbai Mafia के नाम से लिखा है और हिन्दी मे अनुवाद मदन सोनी ने किया है, हालिया दिनो मे इस पर एक बालीवुड मूवी 'शूटआऊट ऐट बटाला' भी बन चुकी है। इस किताब के प्रति आकर्षित होने के प्रति संभवतः यह भी एक परोक्ष कारण था। मूलत:दाऊद इब्राहिम को केन्द्रित पात्र बना कर मुंबई माफिया के इतिहास को सिलसिलेवार तरीक़े से दर्ज करने की पहली कोशिश है। यह हाजी मस्तान, करीम लाला, वरदाराजन मुदलियार, छोटा राजन, अबू सलेम जैसे कुख्यात गिरोहबाज़ों की कहानी तो है ही, लेकिन इन सब से ऊपर, एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो अपने पिता के पुलिस महकमे में होने के बावजूद ग़लत रास्ते पर चल पड़ा। अपराध की दुनिया में दाऊद इब्राहिम का दाखिला मुम्बई पुलिस के एक मोहरे के रूप में हुआ और वह इस दुनिया के अपने प्रतिद्वन्द्वियों का सफ़ाया करता हुआ अन्ततः मुम्बई पुलिस के लिए ही भस्मासुर साबित हुआ। पठानों के उत्थान से लेकर दाऊद गिरोह के बनने तक, पहली बार दी गयी सुपारी से लेकर बॉलीवुड में माफ़िया की घिनौनी भूमिका तक, और दाऊद के कराची में पलायन से लेकर दुनिया के इस मोस्ट वाण्टिड अपराधी को कथित रूप में पनाह देने में पाकिस्तान की भूमिका तक यह किस्सा हिन्दुस्तान के अपराध के इतिहास के कई बड़े-बड़े कारनामों को अपने भीतर समेटता है। ज़बरदस्त शोध के बाद लिखी गई यह किताब पूरी गहराई और तफ़सील के साथ माफ़िया की वर्चस्व की लड़ाइयों और एक दूसरे को नेस्तनाबूत कर देने की उसकी रणनीतियों का ब्योरा पेश करती है।
 One Night @ Call Centre  by Chetan Bhagat. I must say comparing this to Five point someone is not cool , as this book does not deal with the students , although it represents the youth of the country . This book is about 6 call centre employees – Shyam , Priyanka , Esha , Vroom , Radhika & “military uncle” . Just like Five point someone was adapted in a movie , the bollywood movie -“Hello” (2008) starring Salman Khan was adapted from this story .  One thing why I like Chetan Bhagat’s books is that he describes the characters in the story really well . He does the same here – may it be the mysterious story teller girl or Shyam . The pace of the book is really good till the phone call from God & I was drowned into the story . I feel that the post phone call story could have been better. Thats it for now , I had a nice time reading the book while travelling in the journey and had a nice time too 

                   Freedom at Midnight (1975) is a book by Larry Collins and Dominique Lapierre. It describes events around Indian independence and partition in 1947-48, beginning with the appointment of Lord Mountbatten of Burmaas the last viceroy of British India, and ending with the death and funeral of Mahatma Gandhi. The book gives a detailed account of the last year of the British Raj, the princely states'reactions to independence (including descriptions of the Indian princes' colourful and extravagant lifestyles), the partition of British India (into India and Pakistan) on religious grounds, and the bloodshed that followed.There is a description of the British summertime capital Shimla in the Himalayasand how supplies were carried up steep mountains by porters each year. On the theme of partition, the book relates that the crucial maps setting the boundary separating India and Pakistan were drawn that year by Cyril Radcliffe, who had not visited India before being appointed as the chairman of the Boundary Commission. It depicts the fury of both Hindus and Muslims, misled by their communal leaders, during the partition, and the biggest mass slaughter in the history of India as millions of people were uprooted by the partition and tried to migrate by train, oxcart, and on foot to new places designated for their particular religious group. Many migrants fell victim to bandits and religious extremists of both dominant religions. One incident quoted describes a canal in Lahorethat ran with blood and floating bodies. Also covered in detail are the events leading to the assassination of Mahatma Gandhi, as well as the life and motives of British-educated Jawaharlal Nehru and Pakistani leader Muhammad Ali Jinnah .I read this book more than 30 years back. In this book The authors quoted Lord Mountbatten that east and west Pakistan will never be together for more than 30 years. He was right. This book was one of the inspirations for the 2017 film Viceroy's House by Gurinder Chaddha. we may say that it is an alltime redable book about indian independent history
.(बनारस, 31 जुलाई 2019, बुधवार)
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गुरुवार, 25 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ ब्रह्माण्ड के प्रमेय पर आधारित काशी की आध्यात्मिक वैज्ञानिक संरचना

व्योमवार्ता/ ब्रह्माण्ड के प्रमेय पर आधारित काशी की आध्यात्मिक वैज्ञानिक संरचना

भौमानामपि तीर्थनां पुणयत्वे कारणं ॠणु।
यथा शरीरस्योधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।
तथा पृथिव्यामुधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।।
प्रभावाध्दभुताहभूमे सलिलस्य च तेजसा।
परिग्रहान्युनीमां च तीर्थानां पुण्यता स्मृता।। 
(महाभारत, कृ.क.त., पृ. ७-८)

वाराणसी जिसे बनारस और काशी के नाम से भी जाना जाता है, की संस्कृति का गंगा नदी और इसके धार्मिक महत्व से एक अटूट और अहम रिश्ता है। वाराणसी से कई प्राचीन से प्राचीन कहानियां जुड़ी हुई हैं। प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन ने तो वाराणसी के लिए यह भी लिखा है कि, "बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।"
वाराणसी मात्र एक नगर नही वरन एक यंत्र है, यह एक असाधारण आध्यात्मिक यंत्र है। ऐसा यंत्र इससे पहले या फिर इसके बाद कभी नहीं बना।
इसे केवल एक नगर समझने का भूल नही करना चाहिये। आध्यात्मिक संरचना के दृष्टिकोण से देसा जाय तो मानव शरीर में जैसे नाभी का स्थान है, वैसे ही पृथ्वी पर वाराणसी का स्थान है। शरीर के प्रत्येक अंग का संबंध नाभी से जुड़ा है और पृथ्वी के समस्त स्थान का संबंध भी वाराणसी से जुड़ा है।
इस यंत्र का निर्माण एक ऐसे विशाल और भव्य मानव शरीर को बनाने के लिए किया गया, जिसमें भौतिकता को अपने साथ लेकर चलने की मजबूरी न हो, शरीर को साथ लेकर चलने से आने वाली जड़ता न हो और जो हमेशा सक्रिय रह सके... और जो सारी आध्यात्मिक प्रक्रिया को अपने आप में समा ले।
काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है, क्योंकि हमारा सौरमंडल कुम्हार के चाक की तरह है।
आपके अपने भीतर 114 चक्रों में से 112 आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल 108 चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं।
इसमें एक खास तरीके से मंथन हो रहा है। यह घड़ा यानी मानव शरीर इसी मंथन से निकल कर आया है, इसलिए मानव शरीर सौरमंडल से जुड़ा हुआ है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चल रहा है।
सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। आपके अपने भीतर 114 चक्रों में से 112 आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल 108 चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं।
अगर आप इन 108 चक्रों को विकसित कर लेंगे, तो बाकी के चार चक्र अपने आप ही विकसित हो जाएंगे।
हम उन चक्रों पर काम नहीं करते।
शरीर के 108 चक्रों को सक्रिय बनाने के लिए 108 तरह की योग प्रणालियां है।
पूरे काशी यनी बनारस शहर की रचना इसी तरह की गई थी। यह पांच तत्वों से बना है, और आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि शिव के योगी और भूतेश्वर होने से,  उनका विशेष अंक पांच है।  इसलिए इस स्थान की परिधि पांच कोश है। इसी तरह से उन्होंने सकेंद्रित कई सतहें बनाईं। यह आपको काशी की मूलभूत ज्यामिति बनावट दिखाता है। गंगा के किनारे यह शुरू होता है, और ये सकेंद्रित वृत परिक्रमा की व्याख्यां दिखा रहे हैं।
सबसे बाहरी परिक्रमा की माप 168 मील है।
यह शहर इसी तरह बना है और विश्वनाथ मंदिर इसी का एक छोटा सा रूप है। असली मंदिर की बनावट ऐसी ही है। यह बेहद जटिल है। इसका मूल रूप तो अब रहा ही नहीं।
वाराणसी को मानव शरीर की तरह बनाया गया था
यहां 72 हजार शक्ति स्थलों यानी मंदिरों का निर्माण किया गया। एक इंसान के शरीर में नाडिय़ों की संख्या भी इतनी ही होती है। इसलिए उन लोगों ने मंदिर बनाये, और आस-पास काफी सारे कोने बनाये - जिससे कि वे सब जुड़कर 72,000 हो जाएं।यहां 468 मंदिर बने, क्योंकि चंद्र कैलंडर के अनुसार साल में 13 महीने होते हैं, 13 महीने और 9 ग्रह, चार दिशाएं - इस तरह से तेरह, नौ और चार के गुणनफल के बराबर 468 मंदिर बनाए गए।तो यह नाडिय़ों की संख्या के बराबर है।
यह पूरी प्रक्रिया एक विशाल मानव शरीर के निर्माण की तरह थी। इस विशाल मानव शरीर का निर्माण ब्रह्मांड से संपर्क करने के लिए किया गया था। इस शहर के निर्माण की पूरी प्रक्रिया ऐसी है, मानो एक विशाल इंसानी शरीर एक वृहत ब्रह्मांडीय शरीर के संपर्क में आ रहा हो। काशी बनावट की दृष्टि से सूक्ष्म और व्यापक जगत के मिलन का एक शानदार प्रदर्शन है।
कुल मिलाकर, एक शहर के रूप में एक यंत्र की रचना की गई है।रोशनी का एक दुर्ग बनाने के लिए, और ब्रह्मांड की संरचना से संपर्क के लिए, यहां एक सूक्ष्म ब्रह्मांड की रचना की गई।
ब्रह्मांड और इस काशी रुपी सूक्ष्म ब्रह्मांड इन दोनों चीजों को आपस में जोडऩे के लिए 468 मंदिरों की स्थापना की गई। मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं, और 54 शक्ति या देवी के हैं। अगर मानव शरीर को भी हम देंखे, तो उसमें आधा हिस्सा पिंगला है और आधा हिस्सा इड़ा। दायां भाग पुरुष का है और बायां भाग नारी का।
यही वजह है कि शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी दर्शाया जाता है - आधा हिस्सा नारी का और आधा पुरुष का। यहां 468 मंदिर बने, क्योंकि चंद्र कैलंडर के अनुसार साल में 13 महीने होते हैं, 13 महीने और 9 ग्रह, चार दिशाएं - इस तरह से तेरह, नौ और चार के गुणनफल के बराबर 468 मंदिर बनाए गए। आपके स्थूल शरीर का 72 फीसदी हिस्सा पानी है, 12 फीसदी पृथ्वी है, 6 फीसदी वायु है और 4 फीसदी अग्नि। बाकी का 6 फीसदी आकाश है।
सभी योगिक प्रक्रियाओं का जन्म एक खास विज्ञान से हुआ है, जिसे भूत शुद्धि कहते हैं। इसका अर्थ है अपने भीतर मौजूद तत्वों को शुद्ध करना।
अगर आप अपने मूल तत्वों पर कुछ अधिकार हासिल कर लें, तो अचानक से आपके साथ अद्भुत चीजें घटित होने लगेंगी।
मैं आपको हजारों ऐसे लोग दिखा सकता हूं, जिन्होंने बस कुछ साधारण भूतशुद्धि प्रक्रियाएं करते हुए अपनी बीमारियों से मुक्ति पाई है। इसलिए इसके आधार पर इन मंदिरों का निर्माण किया गया। इस तरह भूत शुद्धि के आधार पर इस शहर की रचना हुई।यहां एक के बाद एक 468 मंदिरों में सप्तऋषि पूजा हुआ करती थी और इससे इतनी जबर्दस्त ऊर्जा पैदा होती थी, कि हर कोई इस जगह आने की इच्छा रखता था। भारत में जन्मे हर व्यक्ति का एक ही सपना होता था - काशी जाने का।
यह जगह सिर्फ आध्यात्मिकता का ही नहीं, बल्कि संगीत, कला और शिल्प के अलावा व्यापार और शिक्षा का केंद्र भी बना। इस देश के महानतम ज्ञानी काशी के हैं। शहर ने देश को कई प्रखर बुद्धि और ज्ञान के धनी लोग दिए हैं।अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, 'पश्चिमी और आधुनिक विज्ञान भारतीय गणित के आधार के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता था।’ यह गणित बनारस से ही आया।
इस गणित का आधार यहां है।
जिस तरीके से इस शहर रूपी यंत्र का निर्माण किया गया, वह बहुत सटीक था। ज्यामितीय बनावट और गणित की दृष्टि से यह अपने आप में इतना संपूर्ण है, कि हर व्यक्ति इस शहर में आना चाहता था। क्योंकि यह शहर अपने अन्दर अद्भुत ऊर्जा पैदा करता था।
यह हमारी बदकिस्मती है कि हम उस समय नहीं थे जब काशी का गौरव काल था। हजारों सालों से दुनिया भर से लोग यहां आते रहे हैं। गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं दिया था।गौतम के बाद आने वाले चीनी यात्री ने कहा, ‘नालंदा विश्वविद्यालय काशी से निकलने वाली ज्ञान की एक छोटी सी बूंद है।’ और नालंदा विश्वविद्यालय को अब भी शिक्षा का सबसे महान स्थान माना जाता है।
आज भी यह कहा जाता है कि ‘काशी धरती की जमीन  पर नहीं है। वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है।’ लोगों ने एक भौतिक संरचना बनाई, जिसने एक ऊर्जा संरचना को उत्पन्न किया। जो भी हो पर आज के इस भौतिकवादी युग मे आध्यात्मिक काशी की वैज्ञानिक संरचना स्पष्टत:  दिखती है।
(बनारस,२४जुलाई २०१९, बुधवार)
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बुधवार, 24 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ धर्म का अर्थ और प्रासंगिक औचित्य

व्योमवार्ता/ धर्म का अर्थ और प्रासंगिक औचित्य

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था.युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फ़टे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे, और वायुमण्डल में पसरी हुई  थी घोर उदासी. गिद्ध, कुत्ते, सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा देवब्रत भीष्म शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था अकेला.तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची, "प्रणाम पितामह"
भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी। बोले, " आओ देवकीनंदन... स्वागत है तुम्हारा. मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था"
कृष्ण बोले, " क्या कहूँ पितामह! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप"
भीष्म चुप रहे.कुछ क्षण बाद बोले, " पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव? उनका ध्यान रखना, परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है"
कृष्ण चुप रहे.
भीष्म ने पुनः कहा, " कुछ पूछूँ केशव? बड़े अच्छे समय से आये हो, सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय।"
कृष्ण बोले- कहिये न पितामह!
एक बात बताओ प्रभु! तुम तो ईश्वर हो न..
कृष्ण ने बीच में ही टोका, "नहीं पितामह! मैं ईश्वर नहीं। मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह, ईश्वर नहीं।"
भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े। बोले, " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण, सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा। पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया, अब तो ठगना छोड़ दे रे..."
कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले, " कहिये पितामह!"
भीष्म बोले, "एक बात बताओ कन्हैया! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या?"
- "किसकी ओर से पितामह? पांडवों की ओर से?"
- "कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया, पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था? आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध, सब ठीक था क्या? यह सब उचित था क्या?"
- इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह! इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया। उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम, उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन, मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह!
- "अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण? अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है, पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है। मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण!"
- "तो सुनिए पितामह! कुछ बुरा नहीं हुआ, कुछ अनैतिक नहीं हुआ। वही हुआ जो हो होना चाहिए।"
- " यह तुम कह रहे हो केशव? मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है? यह क्षल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया? "

- "इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है। हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है। राम त्रेता युग के नायक थे, मेरे भाग में द्वापर आया था। हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह।"
-" नहीं समझ पाया कृष्ण! तनिक समझाओ तो..."
-" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह! राम के युग में खलनायक भी 'रावण' जैसा शिवभक्त होता था। तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण और कुम्भकर्ण जैसे सन्त हुआ करते थे। तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे। उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था। इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया। किंतु मेरे युग के भाग में में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं। उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह। पाप का अंत आवश्यक है पितामह, वह चाहे जिस विधि से हो।"
- "तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा? और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा?"
-" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह। कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा। वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा, नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा। जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह! तब महत्वपूर्ण होती है विजय, केवल विजय। भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह।"
-"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव? और यदि धर्म का नाश होना ही है, तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है?"
-"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता, सब मनुष्य को ही करना पड़ता है। आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न! तो बताइए न पितामह, मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या? सब पांडवों को ही करना पड़ा न? यही प्रकृति का संविधान है। युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से। यही परम सत्य है।"
                भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे। उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी। उन्होंने कहा- चलो कृष्ण! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है, कल सम्भवतः चले जाना हो... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण!"
कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले, पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था।
जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है।
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शनिवार, 20 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ इस अंधेरी रात मे दीपक जलाना कब मना है .....: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20जुलाई 2019

कर्मपथ पत्रिका के स्वाधीनता दिवस विशेषांक हेतु उनके विशेष आग्रह पर

इस अंधेरी रात में दीपक जलाना कब मना है.......

                                         
                                   -व्योमेश चित्रवंश, एडवोकेट

14 -15 अगस्त 1947 की अर्धरात्रि में हमारी स्वाधीनता का अरुणोदय हुआ ।स्वर्ण विहान आया और हमारे देश के इतिहास मे एक अद्भुत अनुभूति पूर्व शब्द जुड़ गया, स्वतंत्रता, स्वाधीनता  और स्वायत्तता । तब से  आज तक गंगा जाने कितना जल प्रवाह समुंद्र को दे बैठी । समय निरंतर अविराम भाव से कालखण्ड पर अपने छाप छोड़ता रहा । इतिहास नई करवटें  लेते हुए हमारी खुद की सत्ता व्यवस्था अपनी पैनी दृष्टि गड़ाए रहा।खुद को नया करने की होड़ में और साल दर साल  बीतते बीतते 72 वर्ष हो गए । यूँ ही इतिहास की दृष्टि से किसी राष्ट्र के  जीवन में 72 वर्ष का कार्यकाल बहुत लंबा नहीं होता किन्तु जिस झंझावात की वजह से इन दशकों में बदलाव आए । सदियॉ वर्षों मे ही सिमट आई ।रातो रात पुश्त दर पुश्त संग संग रहने वाले हम अपनों ने अपनी ही देव भूमि पर एक रेखा खींच  डाली अपनों के भूमि पर देशों के मध्य दूरियां बढ़ती गई फिर दो से तीन देश, अपनो से जूझते , अपनों से परेशान, विकास की लंबी यात्रा पर चलने वाले मुसाफिर , जिसके पास सब कुछ होते हुये भी कुछ नहीं और कुछ नही होते हुये भी सब कुछ ।

समीचीन होगा कि इन 72 वर्षों की उपलब्धियों का, सफलता-असफलता का लेखा-जोखा तैयार किया जाए और देखा जाए कि हमारे राष्ट्र निर्माताओं के कितने सपने साकार हुए और कितने राख हो गए ? हमने इन72 वर्षों मे क्या खोया क्या पाया ? हम कहां से चले थे और कहां पहुंचे?

 जहॉ तक व्यक्तिगत रूप से हमारा  मानना है कि स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि हमारा संविधान है । हम इस विशालतम आबादी वाले विविधता भरे और तरह तरह से विखंडित और विभाजित  देश के लिए एक सर्वमान्य संविधान बना कर  पिछले लगभग छ दशकों से अनेक विकट समस्याओं के बावजूद देश की एकता अखंडता और लोकतंत्र को सुरक्षित रख सके तो यह हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि है और यह हमारे  संवैधानिक व्यवस्था की ही देन है ।

         पर आज जब हम चारों ओर देखते हैं  तो राजनीतिक व्यवस्था चरमराती  हुई दिखाई देती है । परिस्थितियां विषम है, संकटमय है। लगता है हम आज विनाश  की कगार पर खड़े हैं ऐसे अंधे मोड़ पर ,जहां से कोई रास्ता कहीं जाता ही नहीं।हमारी गणना संसार के 10 सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्रों में है। दुनिया भर में किसी अन्य देश में इतने निरक्षर लोग नहीं बसते जितने हमारे यहाँ हैं। गरीबी की रेखा के नीचे लोगों की तादाद भी भारत में सबसे ज्यादा है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? हमी मे से अधिसंख्य लोगों का मानना है कि दोष राजनीतिक व्यवस्था का है। वहीं दूसरे लोग कहते हैं दोष वस्तुतः व्यवस्था को चलाने वालों का है ये ही निकम्मे और निष्ठाहीन निकले। लेकिन क्या ऐसे ही दूसरे पर उंगली उठा देने से हम खुद को बचा सकते हैं ? हो सकता है दोष व्यवस्था का भी हो और व्यवस्था चलाने वालों का भी, पर सबसे अधिक दोषी तो 'हम' है यानि "हम भारत के लोग" ।

 जब भारत अंग्रेजी दासता से मुक्त हुआ और राष्ट्रीय आंदोलन के कर्णधार स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने बैठे तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी विभिन्न प्रकार से विभाजित-विखंडित "हम भारत के" लोगो को किस प्रकार एक सूत्र में पिरो कर एक राष्ट्र का निर्माण किया जाय? संविधान निर्माता चाहते थे कि एक लंबे समय तक गुलामी का दंश झेलने वाले भारतवर्ष में राष्ट्रीयता की चेतना जगे, साम्प्रदायिक भेदभाव व जातिवाद समाप्त हो, देश का आर्थिक विकास हो, गरीबी मिटे और सामाजिक न्याय का वातावरण तैयार हो। संविधान निर्माताओं ने एकता भाईचारा और बराबरी के सपने सजोंये थे और चाहा था भारतीय गणतंत्र में हर गॉव, हर घर और हर झोपड़ी में, हर खेत और खलिहान में स्नवधीनता के बिहान का अनुभव हो, खुशहाली आए, गरीबी बेकारी भूखमरी और अशिक्षा मिटे। चारों ओर आपसी प्रेम और शांति का वातावरण हो। गांधी जी ने हर ऑख के हर आंसू पोछने का आदर्श रखा था तो नेहरू ने संविधान सभा में प्रतिज्ञा की थी कि जब तक आंसू है, गरीबी है ,पीड़ा है ,तब तक आजादी पाने का काम पूरा नही होगा। उनका विश्वास था कि हमारा संविधान भूखे को रोटी और नंगो को कपड़ा देने के साथ  ऐसी व्यवस्था  कायम करेगा जिसके अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार अधिक से अधिक ऊंचे उठने के पूरे के पूरे अवसर मिल सकेंगे ।अगर यह संविधान नहीं कर सका तो वह नेहरू के अनुसार मात्र कागजों का पुलिंदा ही होगा 

              आज हम सब जानते हैं संविधान निर्माताओं के सपने पूरे नहीं हुए हम लोग आज भी उनके कल्पना के राष्ट्र नहीं बन सके। वास्तविकता तो ये है कि पिछले दो दशकों से हमारा समाज जितना विखंडित व विभाजित आज है उतना पहले कभी नही था। नक्शे पर खींची रेखाओं से कहीं  अधिक भयावह होती हैं मन और भावनाओं में पड़ी दरारें।  आज हम जुड़ने के बजाय बिखरे हैं । राष्ट्रीयता व एकता की बातें पुरानी पड़ गई है और जाति धर्म  भाषा क्षेत्रियता संप्रदाय के आधार पर अब नई पहचान बनने लगी है। हमारी नई पीढ़ी के लिये राष्ट्रीयता व देशप्रेम का मतलब घर मे टीवी के सामने बैठ कर क्रिकेट मैच मे भारत के लिये हुर्रै चिल्लाना ही रह गया है। राष्ट्रगान की पहचा व कीमत उनके लिये रोज स्कूली प्रार्थना के बाद गाये जाने वाली महज एक औपचारिकता भर है। वे रामायण महाभारत गीता के राम कृष्ण और अन्य भारतीय महापुरूषों राणा प्रताप, शिवाजी, गांधीजी, नेताजी, भगत सिंह के  बजाय हैरीपाटर और निंजा हथौड़ी को जानते है। नैतिक शिक्षा, नैतिक मूल्य, प्रकृति प्रेम, प्रकृति पूजा जैसे शब्द उनके लिये वर्णमाला के संयोग भर है। परिणाम भी सामने आने लगे है, आज औसतन हर तीसरे बच्चे के ऑख पर चश्मा, शारीरिक कमजोरी, मानक के विपरीत शारीरिक गठन प्रत्यक्ष दिखते है तो परोक्ष रूप से पारिवारिक अशांति, परिवार विघटन, एकल परिवार, एक दूसरे से आगे बढ़ने की अंधी अंतहीन दौड़, कमाने के लिये बड़े शहरों  विदेशों मे गये बच्चो के इंतजार मे बेबस बूढ़ी ऑखे, व्यक्तिगत तनाव, मधुमेह, हृदय दौर्ब्लयता, रक्तचाप, मानसिक विकार जैसी समस्यायें आम हो गई हैं। वोटबैंक बनाने के लिये जातीय व धार्मिक तुष्टिकरण, आरक्षण जैसे विभेदकारी नीति से  प्रतिभा का अवमूल्यन जैसे कारकों ने जातिगत विभेद की खाईं को और चौड़ा किया है। मेरी बिरादरी की मेरी सरकार वाली मान्यता के चलते मन के अंदर तल रहे यह विभाजनकारी प्रभाव सड़कों पर भी दिखने लगे है। ऐसे समय मे अपने संविधान के उद्देश्यों का मूल्यांकन करने पर हमे चंहुओर निराशा ही दिखती है।

                       एक समय था अपनी सारी कमियों, कमजोरियों, मफलिसी और गुलामी के बावजूद अपने को भारतीय कहने में गर्व महसूस करते थे एक हिंदुस्तानी होने का गर्व। किंतु आज स्थिति यह है कि हिन्ददुस्तान में हिंदुस्तानी को छोड़ बाकी सभी मिल जाते हैं पंजाबीी कश्मीरी राजस्थानी मराठी उड़िया, तमिल तेलगू बिहारी,आसामी और ढेरों , पर एक भारतीय को ढूंढने के लिए दिन में भी लालटेम लेकर निकलना पड़ेगा ।आज हम अल्पसंख्यको के कल्याण की बात करते हैं पर सच्चाई तो यह है कि असली अल्पसंख्यक तो  "भारतीय" नामधारी प्राणी हो गया है। आज हममे से कोई यह कहने की हिम्मत क्यो नहीं जुटा पा रहा है कि हमें हिंदू मुस्लिम ,सिख ईसाई , हिन्दी-गैर हिन्दी मे बांटने की कोशिश कर रहा है अर्थात जो भी देेेश को तोड़ने की कोशिश कर रहा है वह देश का दुश्मन है। हर नेता यह सब जानते हुये भी बस इसलिए नहीं कहता क्योकि सच यह है कि आज भारत और भारतीयता के नारे के सहारे कोई वोटबैंक नही बनते हैं बल्कि आज समाज मे वैमनस्यता फैलाकर जाति धर्म भाषा वादी फूट फैला कर फूट के जहर डालकर वोट बैंक बनते हैं तब जाकर संसद और विधानसभा में स्थान मिलते हैं सरकारें बनती हैं और संसदीय लोकतंत्र चलता है।

            पहले अंग्रेजों के लिए कहा जाता था उनकी कूटनीति थी "फूट डालो शासन करो" । किन्तु आज के अधिकांश नेता भी तो वही कुछ कर रहे हैं। सच तो यह  लगता है कि राष्ट्र निर्माण की आवश्यकताओं में और पश्चिमी शैली के लोकतंत्र में सत्ता में आने या बने रहने की शर्तों मे ही परस्पर विरोधाभास है क्योंकि आज जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं या ,दूसरे शब्दों में जिसे हम ढो रहे हैं वह हमारे परिवेश के लिए नहीं, थी, गांधी के सपनों के व्यवस्था तो कदापि नहीं थी। वह डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ,अंबेडकर की कल्पना का प्रसाद भी नहीं थी।उसे लोकनायक जयप्रकाश नारायण नेताओं का भी समर्थन नहीं था। जो संविधान बना वह भारतीय मानस के  सपने का संविधान नहीं था , वह तो अंग्रेजी वातावरण में पले बढ़े, पढ़े लिखे  और अंग्रेजों सभ्यता और पश्चिमी राजनीतिक संस्थाओं से अभिभूत अभिजात वर्ग के कुछ लोगों का आदर्श मात्र था। वस्तुतः लोकतांत्रिक व्यवस्था तो देश के अंतर्मन से प्रस्फुटित होनी चाहिए ,लोगों के बीच से ही उपजनी पनपनी चाहिए ।यहां के लोगों के विचारों मनोभावनाओं,आदर्शों ,मान्यताओं और अनुभवों के अनुरूप नैसर्गिक रूप से विकसित होनी चाहिए ।

अब वक्त आ गया है कि हमें अपनी आस्था का मूल्यांकन करना चाहिए अपने परिस्थिति के अनुरूप व्यापक बदलाव किया जाना चाहिए ।

व्यवस्था के बाद हमें स्वयं को देखना आवश्यक है कि अब तक दूसरों पर उंगलियां उठाते उठाते हमारी उंगलियां भी थकने लगी हैं। सुधार हमें अपने आप से करना है । यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति बोध नही कराएंगे तो आने वाली पीढ़ी की उंगलियों को अपने पर उठने से नहीं रोक पाएंगे ।

        बातें बहुत हो चुकी अब करने का समय आ चुका है। हर एक को अपने अपने स्थान से ही  राष्ट्रीय  पुनर्जागरण के यज्ञ में लगना होगा ।देश के जवान  अगर सीमा पर मुस्तैद हैं तो देश के किसान को भी उनके लिए खेतं मे मुस्तैद होना होगा। यदि अध्यापक नई पीढ़ी को दिशा दे रहे हैं  तो डॉक्टर , वकील को भी समाज को  सही दिशा देने और आदर्श बनने की जरूरत है। कहने का अर्थ यह है कि हम जहां है वहीं से राष्ट्रीय बोध को दृष्टिगत रख अपने कार्य मे लग जायें और नई पीढ़ी, उसकी तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि वह आने वाले भविष्य के लिये नियामक ही वरन वर्तमान से भविष्य तक ले जाने की वाहक भी है। नयी पीढ़ी को अपने आने वाले भविष्य के संरक्षण संवर्धन और शुभदायक बनाने के लिये स्वयं के साथ देश के प्राकृतिक संसाधनों , सिद्धान्तो और मूल्यों को संरक्षित रखना होगा ताकि उन्हे वे सौगात के तरह अपनी आने वाले पीढ़ी को भेंट कर सके।

 (लेखक विधिव्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता है)

संपर्क: शैलनिकेत, शिव 3/18 बी-4एन, शारदा विहार, मीरापुर बसहीं, वाराणसी -221003,

मो० 9450960851, http://chitravansh.blogspot.in 

सोमवार, 1 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ जून 2019 में पढ़ी गई किताबें : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30जून 2019

व्योमवार्ता / जून 2019 में पढ़ी किताबें :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30जून 2019

       आज जून 2019 के आखिरी रात डायरी के इस पृष्ठ को लिखते हुये खुशी महसूस कर रहा हूँ। अप्रैल तक अपने पढ़ने की आदत छूटने से मन मे एक बेचैनी महसूस कर रहा था सोशल मीडिया और मोबाईल ने पढ़ने की आदत को समाप्त तो नही पर बहुत कम कर दिया था, लिहाजा पिछले जन्मदिन को यह संकल्प लिया कि प्रत्येक सप्ताह एक किताब अवश्य पढ़ूगॉ। मई मे लिया गया  यह संकल्प इस माह भी आशुतोष अवढर दानी की कृपा से सफलतापूर्वक संपूर्ण हुआ। प्रभु की कृपा हैऔर खुद को बहुत संतोष अनुभव हो रहा है।
इस महीने कुल चार किताबें हमने पढ़ा जिनमे से तीन तो वर्ष भर पूर्व से खरीदने के बाद आलमारी की शोभा बनी हुई थी। आश्विन संघी की the rozabal line , प्रभात बांधुल्या की बनारस वाला ईश्क, आशुतोष राणा की मौन मुस्कान की मार और शारदेन्दु बंधोपाध्याय की व्योमकेश बख्शी की रहस्यमयी कहानियॉ जाने कब से आलमारी से ताकते हुये हमारा इंतजार कर रही थी।
                     दि रोजाबल लाईन वर्ष 2015 मे दशहरे की छुट्टीयों मे दिल्ली रहने के दौरान लिया था, पचास साठ पेज पढ़े भी फिर किताब धरा गई तो उसका नंबर ही नही आया, हालॉकि उसके बाद आश्विन सांघी की आई किताबों कृष्णा की, चाणक्या चैंट, प्राईवेट इंडिया,दि स्यालकोट सागा, 13 स्टेप्स टू ब्लडी गुडलक को हमने आनलाईन मंगा कर पढ़ लिया था, पर रोजाबल लाईन बेचारी बेकसूर होते हुये भी मेरे पुस्तक संग्रह मे आश्विन सांघी के प्रथम पुस्तक व स्वयं उनकी लिखी हुई प्रथम पुस्तक हो कर भी हसरतों से हमे देखा करती थी। आखिरकार जून के संकल्प मे यह पढ़ ली गई। अकसर हमे आश्चर्य होता है आश्विन सांघी के लेखन क्षमता पर कि वह एक सफल व्यापारी होते हुये भी कैस विभिन्न विषयों की विविधताओं को समेटे इतनी जबर्दस्त रचनायें कर लेते है, उनके लेखन मे विज्ञान धर्म इतिहास मिथक अध्यात्म राजनीति का अद्भुत सामंजस्य रहस्य व रोमांचक कल्पनाओं से जुड़ा रहता है कि आप पूरी किताब पढ़ते समय यह तय ही नही कर पाते कि हम उपन्यास पढ़ रहे है कि विशेष शोधपरक तथ्य। रोजाबल लाईन की कहानी ईसा से २००० वर्ष पूर्व से प्रारंभ हो सन २०१२ तक के कालखण्ड के बिखरे मिथकों को ले कर पिरोई गई है जिसमे गौतम बुद्ध से लेकर जीसस क्राईस्ट और मोहम्मद से होते हुये ओसामा बिन लादेन तक के पात्रों को समेटते हुये रहस्य, षडयंत्र, अपऱाध का तानाबाना है, शुरूआती पृष्ठों मे बिखरे कालखण्ड के मिथक समेटने मे परेशानी होती है पर बाद मे किताब आपको पूरी तरह बॉधने मे सफल रहती है और अपने सवाल कि क्या जीसस भारत आये थे और भारत मे ही उनकी मृत्यु काश्मीर मे हुई थी। कश्मीर का रोजाबल दरगाह किसी मुस्लिम धर्मावलंबी की नही बल्कि जीसस क्राईस्ट की कब्र है । यह स्थापित करने मे लगभग सफल रहती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है किताब के साथ दिये गये संदर्भ सूची जिसमे प्रमाण सहित २०९ संदर्भों का उल्लेख है, वे कहानी को अपने प्रामाणिकता व मूल तक पहुँचाने मे सहायक है। एक और बात जो इस किताब के बारे मे याद रखने लायक है वह यह कि प्रचलित धारा व मान्यताओं के विपरीत लिखे इस कथानक को आश्विन संघी भी पहली बार प्रकाशित करते समय अपने नाम से छपवाने की हिम्मत नही कर सके थे और द रोज़ाबाल लाइन, 2007 में एक छद्‌मनाम शॉन हेगिन्स से स्वयं प्रकाशित करवाया था। इस सिद्धांत पर आधारित यह धर्म शास्त्रीय थ्रिलार कि जीज़स की मृत्यु कश्मीर में हुई थी, बाद में उनके अपने नाम से 2008 में वैस्टलैंड से प्रकाशित हुआ और वैस्टसैलर बन गया और कई महीनों तक राष्ट्रीय वैस्टसैलर सूचियों में बना रहा।
अश्विन व्यवसाय से उद्यमी हैं लेकिन रोमांच विधा में ऐतिहासिक उपन्यास लिखना अश्विन का जुनून और शौक़ है। सांघी ने कैथीड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल, मुंबई, और सेंट ज़ेवियर कॉलेज, मुंबई से शिक्षा प्राप्त की थी और येल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की और क्रिएटिव राइटिंग में पीएचडी किया है।
अश्विन के लेखन व रोजाबल लाईन के बारे समीक्षकों के विचार देखें तो  अश्विन हम सब को विभिन्न दशकों में दुनिया की सैर पर ले जाते हैं तो धर्म, इतिहास और राजनीति के प्रति सांघी का रुझान स्पष्ट झलकता है। तुलनात्मक धर्म, ख़तरनाक रहस्यों और रोमांचकारी कथानक का मेल एक रहस्यपूर्ण उपन्यास रचता है। हमारे लिए रोज़ाबाल वंशावली जो सर्वश्रेष्ठ प्रतिफल समेटे है, वह है आश्चर्यों का ख़ाज़ाना जो इसमें भरा है, जिस प्रकार से इतिहास प्रस्तुत किया जाता है... आनंददायक, हैरान कर देने वाली साधारण बातों के रूप में। इस तरह सांघी आतंकवादी हमलों, गुप्त समाजों, मारे गए प्रोफ़ेसरों, संभ्रमित पादरियों और आकर्षक घातक महिलाओं का ज़बर्दस्त मिश्रण परोसते हैं। एक पंक्ति मे कहें तो रोज़ाबाल वंशावली वह वाक़ई मज़ेदार सवाल पूछती है—अगर ऐसा होता तो?”
           प्रभात बांधुल्या की बनारस वाला ईश्क किताब का शीर्षक देख कर पढ़ने को जी किया। हमने यह स्वीकार करने मे कभी गुरेज नही किया कि बनारस हमारी कमजोरी है। बनारस वाला ईश्क गया से बीएचयू पढ़ने आये एक युवा युगल की इश्किया किस्सागोई है, जिसे मसालेदार और चटकदार बनाने के लिये उसमे छात्र राजनीति का छौंका लगाया गया है। बिहार के मगधी टच जुड़े डायलॉग अच्छे लगते है और प्रेमकहानी को ईश्क प्यार और मोहब्बत के रूमानी लहरों से बिड़ला हास्टल, छित्तूपुर, लंका तक की सैर कराते है । कहानी बनारस से बाहर निकलते ही ठहर सी जाती है जब ठकुराईन के रोड हादसे मे मरने के साथ ही जैसे रूक जाती है। हॉलाकि प्रभात कहानी को खींच कर क्लाईमेक्स तक पहुँचाने की कोशिस करते है और कुछ हद तक कामयाब भी रहे है पर कहानी मे वह जान नही आ पाती है । कुल मिला जुला कर  छात्र जीवन के ईश्क प्रेम व मोहब्बत पर अच्छा उपन्यास है जो पढ़ने के बाद निराश नही करता।
          अभिनेता आशुतोष राणा की लिखी मौन मुस्कान की मार  को पढ़ने की प्रेरणा मेरी छात्र जीवन की छोटी बहन प्रज्ञा मोहले ने दी। प्रज्ञा जबलपुर से है और आशुतोष जी की पड़ोसन व फैन है। प्रज्ञा स्वयं भी साहित्यिक अध्यासु है और हिन्दी साहित्य मे बीएचयू से डाक्टरेट है, यह अलग बात है कि अब वह साहित्यिक क्षेत्र के बजाय जबलपुर के सांस्कृतिक गतिविधियाें मे अधिक क्रियाशील है। बहरहाल बात मौन मुस्कान के मार की। आशुतोष के साहित्यिक प्रतिभा के हम सभी तब से कायल है जब हमने उनकी कविता "हे भारत के राम जगो, मै तुम्हे जगाने आया हूँ " पहली बार सुनी थी। आशुतोष हिन्दी फिल्मों के उन अभिनेताओं मे से है जो मजे हुये विशुद्ध कलाकार है और साहित्यिक व सांस्कृतिक जागरूकता उनके रगों मे बसी है। हमे नही मालूम कि आशुतोष की इससे पहले भी कोई किताब आई थी कि नही पर मौन मुस्कान की मार एक सधी हुई लेखनी का परिणाम लगती है। आशुतोष ने  अपने अगल बगल के पात्रों को अपने शहर के बुंदेलखंडी बोली मे चुटीले व्यंग्यो को पिरो कर अपने मौन मुस्कान की मार को तेज धार दी है जो पढ़ने वाले को बुंदेलखंड की दुनिया मे ले जा कर गुदगुदाती है, और घटना से संबंधित कथानक व पात्रों को अपने आस पास के लोगों मे और अपने जीवन व परिवेश मे खोजने के लिये मजबूर करती है। अपनी बात से शुरू भूमिका से ही आशुतोष का प्रभाव परिलक्षित हने लगता है जो भक्क जी महराज, विष्पाद गुधौलिया, बीसीपी उर्फ भग्गू पटेल, रामरवा लपटा महाराज, यश व राज का चक्कर, मौन मुस्कान की मार  और शार्टकट कटशार्ट तक की कहानियॉ हमे अपने स्थानीय छोटे शहरों के परिवेश से जोड़ती है जहॉ एक सहसंबधता का रिश्ता आज भी दिखता है । इन व्यंग्य रचनाओं को पढ़ते हुये हम अगर भाषा बदल दे तो वह हमे अपनी और बनारस, कानपुर, गोरखपुर जैसो अपने शहरो की अपनी सी कहानी दिखती है। पढ़ के मजा आया कि अपने अास पास के लोगो से जुड़ी छोटे छोटे संस्मरणों को इतना शानदार स्वस्थ व्यंग्य का रूप दिया जा सकता है। निश्चित ही मौन मुस्कान की मार पढ़ने के बाद आशुतोष की आने वाली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी।
       शारदेन्दु बंद्योपाध्याय की व्योमकेश बख्शी की रहस्यमय कहानियॉ  हम सबलके लिये नई नही है। दूरदर्शन पर अपने शुरूआती दिनो मे हमने इस भारतीय जासूसी धारावाहिक को देखा था, एक ऐसा जासूस जो स्वयं को जासूस कहने के बजाय सत्यान्वेषी कहलाना पसंद करता था और उसका किरदार किसी पश्चिमी डिटेक्टिव पात्रो की नकल  न हो कर मूल भारतीय चरित्र था। व्योमकेश की एक दो कहानियॉ अभी तक याद हने के बावजूद जब व्योमकेश बख्शी की रहस्यमय कहाँनियॉ  नजरो के सामे पड़ी तो उसे पढ़ने का लोभ संवरण नही कर पाया। कुल १३० पृष्ठों मे ५ कहानियॉ सत्यान्वेषी, ग्रामोफोन पिन, तरनतुला का जहर , वसीयत का जंजाल, विपदा का संहार कुछ मंहगी लगती है पर आज भी एक बैठकी मे पूरी किताब पढ़ लेने का मोह बनाये रखती है। आज हमारे देश मे ऐसे साफ सुथरे रहस्य रोमांच से भरे आकर्षक कथानक वाले उपन्यासों की कमी खलती है।
कमी तो पढ़ने वालो की भी खलती है , हम अभी हाल मे ही इसी ख्याल को लफ्जों मे कह बैठे " आलमारी की किताबें हसरतों से देखती है हमें, बदल रहे है शौक अब जमाने के।"
(बनारस, 30 जून 2019, रविवार)
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