रविवार, 24 जून 2018

व्योमवार्ता/ काशी के इतिहास की वो तिथियां जिन्होंने बदल दिया बनारस को-

जानिए, काशी के इतिहास की वो तिथियां जिन्होंने बदल दिया बनारस को-

800 ई0पू0    राजघाट (वाराणसी) में प्राचीनतम बस्ती और मिट्टी के तटबंध के पुरावशेष
8वीं सदी ई0पू0     तेईसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का काशी में जन्म।
7वीं सदी ई0पू0 काशी-एक स्वतंत्र महाजनपद।
625 ई0पू0    काशी सारनाथ में सर्वप्रथम भगवान बुद्ध ने बौद्धधर्म का उपदेश दिया था।
405 ई0पू0    चीनी यात्री फाह्यान का काशी में  आगमन हुआ।
340 ई0पू0    सम्राट अशोक की वाराणसी-यात्रा। सारनाथ में अशोक-स्तंभ और धम्मेख तथा धर्मराजिक स्तूपों की स्थापना।
1 ई0 से 300 ई0   राजघाट के पुरावशेषों के आधार पर वाराणसी के इतिहास में समृद्धि का काल।
सन् 302  मणिकर्णिका घाट का निर्माण हुआ था
816 ई0    आदि जगदगुरू शंकराचार्य का काशी में आगमन हुआ।
सन् 580  पचगंगा घाट का निर्माण हुआ।
12वीं सदी काशी पर गहड़वालों का शासन। गहड़वाल नरेश गोविन्दचंद्र के राजपंडित दामोदर द्वारा तत्कालीन   लोकभाषा (कोसली) में उक्तिव्यक्ति प्रकरण की रचना। गोविंदचंद्र की रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में विहार     बनवाया। गहडवाल युग में काशी के   प्रधान देवता अविमुक्तेश्वर शिव की विश्वेश्वर में तब्दीली।
सन् 1193 काशीराज जयचंद की मृत्यु।
सन् 1194 कुतुबुद्दीन का काशी पर आक्रमण हुआ, जिसने विष्णु-मंदिर को तोड़कर ढाई कंगूरे की मस्जिद बनवा दी।
सन् 1194 व 1197  काशी पर शहाबुद्दीन और कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले। काशी की भारीलूट। गहडवालों का अंत।
सन् 1248 दूसरी बार मुहम्मद गोरी का आक्रमण हुआ।
सन् 1393 माघ शुक्ल पूर्णिमा को काशी में रविदास का जन्म हुआ।
सन् 1516 फरवरी माह में चैतन्य महाप्रभु का काशी में आगमन हुआ, जहाँ पर ठहरे थे वह स्थान चैतन्य वट के नाम से प्रसिद्ध है।

सन् 1526    बाबर ने इब्राहीम लोदी को पराजित   करने के बाद काशी पर भी आक्रमण किया।
सन् 1531 बनारस व सारनाथ में हुमायूं का डेरा।
सन् 1538 बनारस पर शेरशाह की चढ़ाई।
सन् 1553 सिख सम्प्रदाय के प्रथम गुरु श्री गुरूनानक देव जी का काशी आगमन हुआ और  काशी में कई वर्ष़ों तक        ठहरे थे। यह स्थान आज गुरुबाग के नाम से प्रसिद्ध है।
सन् 1565 काशी पर बादशाह अकबर का कब्जा।
सन् 1583-91  प्रथम अंग्रेज यात्री रॉल्फ फिच की वाराणसी-यात्रा।
सन् 1584 काशी में ज्ञानवापी स्थित प्राचीन विश्वेश्वर मन्दिर का निर्माण दिल्ली सम्राट अकबर के दरबारी राजा       टोडरमल के द्वारा हुआ।
सन् 1585 राजा टोडरमल और नारायण भट्ट की मदद से विश्वनाथ मंदिर का पुननिर्माण।
सन् 1600 राजा मान सिंह द्वारा काशी में मानमंदिर और घाट का निर्माण।
सन् 1623 सोमवंशी राजा वासुदेव के मंत्री नरेणु रावत के पुत्र श्री नारायण दास के दान से काशी में मणिकर्णिका घाट    स्थित चक्रपुष्करणी तीर्थ का निर्माण हुआ।
सन् 1642 विंदुमाधव मन्दिर ( प्रथम ) का निर्माण जयपुर के राजा जयसिंह द्वारा हुआ।
सन् 1656     दारा शिकोह की बनारस यात्रा।
सन् 1666   औरंगजेब की आगरा-कैद से भागकर छत्रपति शिवाजी कुछ दिन काशी में ठहरे।
सन् 1669   औरंगजेब के आदेश से विश्वनाथ मंदिर गिरा कर उसके स्थान पर ज्ञानवापी की मस्ज़िद उठा दी गई।   बिंदुमाधव का मन्दिर भी गिराकर वहां मस्जिद बनाई गई।
सन् 1669 औरंगजेब के शासन काल में उसकी आज्ञा से ज्ञानवापी का विश्वेश्वर मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1669 छत्रपति शिवाजी आगरे के किले से औरंगजेब को चकमा देकर कैद से निकल कर सीधे काशी आये। यहाँ    आकर पंचगंगा घाट पर स्नान किया।
सन् 1673 काशी में औरंगजेब द्वारा बेनी माधव का मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1699 आमेर के महाराज सवाई जयसिंह के द्वारा काशी में पंचगंगा घाट पर राम मन्दिर बनवाया था।
सन् 1714 गंगापुर ग्राम में कार्त्तिक कृष्ण पक्ष में काशीराज महाराज बलवन्त सिंह का जन्म हुआ।
सन् 1725 काशी राज्य की स्थापना।
सन् 1734 नारायण दीक्षित पाटणकर का वाराणसी आगमन; उन्होंने यहां कई घाट बनवाए।
सन् 1737 महाराजा जयसिंह नें मानमन्दिर वेधशाला का निर्माण कराया।
सन् 1740 बलवन्त सिंह के पिता श्री मनसाराम का देहावसान हो गया।
सन् 1741-42  गंगापुर में तत्कालीन काशीराज द्वारा दुर्ग का निर्माण कराया गया।
सन् 1737 सवाई जयसिंह द्वारा मानमंदिर- वेधशाला की स्थापना।
सन् 1747 महाराज बलवन्त सिंह ने चन्देल वंशी राजा को पराजित कर विजयगढ़ पर अधिकार किया।
सन् 1752 काशीराज बलवंत सिंह द्वारा रामनगर किले का निर्माण।
सन् 1754 महाराज बलवन्त सिंह ने पलिता दुर्ग पर विजय पाया।
सन् 1755 बंगाल, नागौर राज्य की रानी भवानी के द्वारा पंचक्रोशी स्थित कर्दमेश्वर महादेव के सरोवर का निर्माण हुआ।
सन् 1756 रानी भवानी ने भीमचण्डी के सरोवर का निर्माण करवाया।
सन् 1770 21 अगस्त का महाराज बलवन्त सिंह का स्वर्गवास हुआ।
सन् 1770 से 1781 तक काशी पर महाराज चेतसिंह का शासन था।
सन् 1777 महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का नवनिर्माण कराया।
सन् 1781 16 अगस्त को काशी में शिवाला घाट पर अंग्रेजी सेना से राजा चेतसिंह के सिपाहियों का संघर्ष हुआ। यह विद्रोह राजभक्त नागरिकों द्वारा मारे गये। 19 अगस्त, 1781 को काशी की देश भक्त जनता की क्रांति से भयभीत होकर वारनेहेस्टिंग्स जनाने वेश में नौका द्वारा चुनार भाग गया। दिसम्बर, सन् 1781 से 1794 तक काशी राज्य पर   महाराज महीप नारायण का राज्य था।
सन् 1785 काशी में महारानी अहिल्या बाई द्वारा विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण हुआ। सन् 1787-1795    जोनाथन डंकन बनारस के रेजिडेंट।
सन ~ 1787   काशी में प्रथम बार भूमि का बन्दोबस्त    मिस्टर डंकन साहब के द्वारा हुआ जो डंकन बन्दोबस्त के नाम से जाना जाता है।
सन् 1791 वाराणसी में संस्कृत पाठशाला (अब संस्कृत विश्व विद्यालय) का प्रस्ताव जोनाथन डंकन ने रखा था।
सन् 1794 काशी राजकीय संस्कृत विद्यालय (क्वींस कालेज) की स्थापना।
सन् 1802 बनारस की पहली पक्की एवं मुख्य सड़क दालमण्डी, राजादरवाजा, काशीपुरा, औसानगंज होते हुये जी.टी. रोड तक बनाई गई।
सन् 1814 बनारस में लार्ड हेस्टिंग्स का आगमन और दरबार।
सन् 1816 पश्चिम बंगाल के राजा जयनारायण द्वारा रेवड़ी तालाब मुहल्ले में अंग्रेजी भाषा के प्रथम विद्यालय ’जयनारायण हाईस्कूल’ (वर्तमान में यह इण्टर कालेज) की स्थापना।
सन् 1818 काशी के अस्सी मुहल्ले में रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
सन् 1820 वर्तमान न्यायालय भवन (कलेक्ट्री कचहरी) का निर्माण हुआ।
सन् 1822 जेम्स प्रिंसेप ने बनारस का सर्वेक्षण किया।सन् 1825 बाजीराव पेशवा द्वितीय ने कालभैरव मन्दिर का निर्माण कराया।
सन् 1827 फारसी शायर मिर्जा गालिब का काशी में आगमन, जो वर्तमान घुघरानी गली में ठहरे थे।
सन् 1828 ज्ञानवापी के खंडित सरोवर की रक्षा हेतु ग्वालियर की रानी बैजबाई ने एक कूप बनवाया।
सन् 1828-29  जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनारस की जनगणना; कुल आबादी-1,80,000
सन् 1830 विश्वेश्वरगंज स्थित गल्ला मण्डी (अनाज की सट्टी) का निर्माण हुआ।
सन् 1835 काशीराज महाराज ईश्वरी नारायण सिंह राज्य पर बैठे तथा 1889 में उनका स्वर्गवास हुआ।
सन् 1839 पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के   द्वारा काशी विश्वनाथ मन्दिर के कलश पर स्वर्ण-पत्र-चढ़ाया गया।
सन् 1845 बनारस का पहला सप्ताहिक समाचार पत्र ’बनारस’ प्रकाशित हुआ।
सन् 1853 वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन का निर्माण पूरा हुआ।
सन् 1866 काशी म्यूनिसिपल बोर्ड (नगर पालिका) की स्थापना हुई।
सन् 1867 काशी में प्रथम बार चुंगी (कर) लगी।
सन् 1869 22 अक्टूबर को काशी में स्वामी दयानन्द सरस्वती का आगमन हुआ। 17 नवम्बर सन् 1869 को दुर्गा कुण्ड पर राजा माधव सिंह बाग में विद्वानों से शाóार्थ हुआ।
सन् 1872 कमिश्नर सी.पी. कारमाइकल के नाम पर ज्ञानवापी में कारमाइकल लाइब्रेरी की स्थापना।
सन् 1875 कुमार विजयनगरम् श्री गजपति सिंह के द्वारा टाउनहाल का निर्माण हुआ।  जिसका उद्घाटन सन् 1876 में प्रिस ऑफ वेल्स के द्वारा हुआ।
सन् 1880-87  राजघाट पुल का निर्माण हुआ।
सन् 1882 नागरी प्रचारिणी सभा पुस्तकालय एवं बंग साहित्य पुस्तकालय की स्थापना।
सन् 1882 काशी में गंगा की अधिक बाढ़ हुई थी। कोदई-चौकी तक नावें चली थीं।
सन् 1885 काशी में कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई। इसकी प्रथम बैठक रामकली चौधरी के बाग में हुई थी। जिसके    सदस्य डॉ0 छन्नू लाल, बसीउद्दीन मुख्तार, मु0 माधोलाल, उपेन्द्रनाथ, वृन्दावन वकील थे।
सन् 1887 राजघाट स्थित गंगा पर रेल-सड़क पुल का उद्घाटन।
सन् 1888 काशी यात्रा के लिये स्वामी विवेकानन्द का आगमन हुआ।
सन् 1889 से 1931 तक काशी राज्य पर महाराज प्रभुनारायण सिंह का राज्य था
सन् 1890 भेलुपुर स्थित जल संस्थान का महारानी विक्टोरिया के पौत्र प्रिंस एलबर्ट विक्टर द्वारा शिलान्यास।
सन् 1891 सारनाथ में अनागारिक धर्मपाल द्वारा महाबोधि संस्था स्थापित हुई।
सन् 1892 14 नवम्बर को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर द्वारा भेलुपुर जल संस्थान का उद्घाटन।
सन् 1893 ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना।
सन् 1897 पादरी जानसन के द्वारा काशी में गिरजाघरों का निर्माण हुआ। प्रथम-सिगरा, दूसरा-गोदौलिया का।
सन् 1898 आर्यभाषा पुस्तकालय की स्थापना।
सन्  1904  तत्कालीन काशी नरेश की अध्यक्षता में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना के लिये पहली बैठक हुई।
सन् 1910 काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।
सन् 1910 सारनाथ संग्रहालय का निर्माण कराया गया।
सन् 1916 पं0 मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना।
सन् 1918 काशी में प्रथम सिनेमा घर का निर्माण बैजनाथ दास शाहपुरी द्वारा बांसफाटक पर मदन थियेटर के नाम से हुआ।
सन् 1920 काशी विद्यापीठ की स्थापना।
सन् 1920 महात्मा गांधी काशी में आये और तीन दिनों तक ठहरे।
सन् 1921 10 फरवरी को गांधी जी का पुनः काशी    आगमन हुआ। तीसरी बार 1921 में उन्होंने विद्यापीठ का शिलान्यास किया।
सन् 1925 26 दिसम्बर को काकोरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में वाराणसी में अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसमें काशी के राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दी गयी।
सन् 1928 वाराणसी मे बिजलीकरण।
सन् 1931 जून मे प्रथम बार नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का आगमन हुआ। दशाश्वमेध स्थित चितरंजन दास पार्क में अभिमन्यु दल द्वारा मानपत्र दिया गया। टाउनहाल के मैदान में नव जवान भारत सभा की ओर से एक सभा हुई।
सन् 1933-34  रिक्षे की सवारी की शुरुआत ‘दी रेस्टोंरेंट’ के मालिक बद्री बाबू नें की।
सन् 1934 13 जनवरी को काशी में भूकम्प आया।
सन् 1934 28 दिसम्बर को राजा बलदेव दास बिड़ला के दान से सारनाथ में एक धर्मशाला का निर्माण हुआ।
सन् 1937 ‘भारतमाता मन्दिर’ का महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटन।
सन् 1939 काशी राज्य में प्रजा की माँग पर काशी नरेश श्री महाराज आदित्य नारायण सिंह ने प्रजा परिषद की घोषणा की।
सन् 1940 राजघाट (वाराणसी) के उत्खनन की शुरूआत।
सन् 1948 15 अक्टूबर को बनारस राज्य का भारतीय संघ में विलय हुआ।
सन् 1956 बुद्ध-पूर्णिमा के दिन ‘बनारस’ को अधिकृत रूप से पुराना ‘वाराणसी’ नाम दिया गया।
सन् 1964 तुलसी मानस मन्दिर (दुर्गाकुण्ड के    पास) का निर्माण हुआ।
सन् 1986 काशी में हरिश्चन्द्र घाट पर प्रथम शवदाह गृह स्थापित किया गया।
2014 में काशी बनारस के सांसद नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनें।
(बनारस,24 जून 2018, रविवार)
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शनिवार, 23 जून 2018

व्योमवार्ता/महत्वपूर्ण पर प्राथमिकता से परे

व्योमवार्ता/महत्वपूर्ण पर प्राथमिकता से परे : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22 जून 2018

             बात भाजपा या कॉग्रेस की नही है बल्कि सरकार के रूख की है. कोई भी सरकार हो  या हम स्वयं हो किसी ने जिम्मेदारी से पर्यावरण पर काम नही किया चाहे वह गंगा का मसला हो या प्रदूषण का या वृक्षारोपण का.
आज शुद्ध हवा और साफ पानी की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है पर हम अपने अाने वाली पीढ़ी के लिये करोणों का मकान बना रहे हैं . समर्सेबुल से भूगर्भ जल को दोहन कर रहे है पर कल को जब हवा और पानी बिना जीवन ही नही रहेगा तो उन करोणों अरबों के मकान मे रहने को जीवित लोग कहॉ से आयेगें, यह कभी भी हमारे लिये  प्राथमिकता का प्रश्न नही रहा है.
(बनारस, 22 जून 2018, शनिवार)
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बुधवार, 20 जून 2018

व्योमवार्ता / बड़ी मुश्किल है: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 19 जून 2018

बड़ी मुश्किल है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 19 जून 2018

*बड़ी असमंजस सी हो गयी है...! आखिर किसको वोट दिया जाये, किसको नहीं !बेरोजगारी का आलम ऐसा है कि सोचने पर BJP से भरोसा उठ जाता है। और देश के बारे में सोचते हैं तो दूसरी पार्टियों से भरोसा उठ जाता है। त्रिपुरा में BJP की जीत पर वंदेमातरम के नारे लगे। अररिया में राजद की जीत पर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे। बेरोजगारी बर्दाश्त है, लेकिन पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा बर्दाश्त नहीं होता है। कमियां हर सरकार में होती है, पर सारी देशद्रोही ताकतों को भाजपा से इतनी नफरत देख भाजपा के साथ खड़ा रहने का इरादा और पक्का हो जाता है। राज ठाकरे से लेकर राहुल गांधी तक,चंद्रबाबू से लेकर शरद बाबू तक, येचुरी से लेकर अब्दुल्ला तक, लालू से लेकर अखिलेश तक, मायावती से लेकर ममता बनर्जी तक! सब नेता एक आदमी को हराने की मजबूरी के कारण एक साथ खड़े हो गए हैं। कुछ तो जरूर  है बंदे में , तभी तो अपनी दुकान बचाने के चक्कर में पूरा बाजार ही रास्ते पर उतर आया है..!
(बनारस, 19 जून 2018, मंगलवार)
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गुरुवार, 31 मई 2018

व्योमवार्ता : एनडीए का लचित बौरफूकन बेस्ट कैडेट मेडल , व्योमेश चित्रवंश की डायरी

व्योमवार्ता : एनडीए का लचित बौरफूकन बेस्ट कैडेट मेडल , व्योमेश चित्रवंश की डायरी 31मई 2017

आपको कदाचित यह ज्ञात होगा कि NDA (National Defence Academy) में जो बेस्ट कैडेट होता है, उसको एक गोल्ड मैडल दिया जाता हैं | लेकिन क्या आपको यह ज्ञात हैं कि उस मैडल का नाम "लचित बोरफुकन" है ? कौन हैं ये "लचित बोरफुकन" ? आईये आज लचित बोरफूकन पर चर्चा  करते हैं। पर इस पोस्ट को पूरा पढ़ने पर आपके मन में यह सवाल उठेगा कि आखिरकार इस महत्वपूर्ण जानकारी व महान वीर के इतिहास को आज तक क्यों छिपाया गया ? क्यों वामपंथी और मुगल परस्त इतिहासकारों ने इस नाम को हम तक पहुचने नहीं दिया |

क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे उत्तर भारत पर अत्याचार करने वाले मुस्लिम शासक और मुग़ल कभी बंगाल के आगे पूर्वोत्तर भारत पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सके ?
कारण था वो हिन्दू योद्धा जिसे वामपंथी और मुग़ल परस्त इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नो से गायब कर दिया - असम के परमवीर योद्धा "लचित बोरफूकन।" अहोम राज्य (आज का आसाम या असम) के राजा थे चक्रध्वज सिंघा और दिल्ली में मुग़ल शासक था औरंगज़ेब। औरंगज़ेब का पूरे भारत पे राज करने का सपना अधूरा ही था बिना पूर्वी भारत पर कब्ज़ा जमाये।
इसी महत्वकांक्षा के चलते औरंगज़ेब ने अहोम राज से लड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी। इस सेना का नेतृत्व कर रहा था राजपूत राजा राजाराम सिंह। राजाराम सिंह औरंगज़ेब के साम्राज्य को विस्तार देने के लिए अपने साथ 4000 महाकौशल लड़ाके, 30000 पैदल सेना, 21 राजपूत सेनापतियों का दल, 18000 घुड़सवार सैनिक, 2000 धनुषधारी सैनिक और 40 पानी के जहाजों की विशाल सेना लेकर चल पड़ा अहोम (आसाम) पर आक्रमण करने।
            अहोम राज के सेनापति का नाम था "लचित बोरफूकन।" कुछ समय पहले ही लचित बोरफूकन ने गौहाटी को दिल्ली के मुग़ल शासन से आज़ाद करा लिया था।
इससे बौखलाया औरंगज़ेब जल्द से जल्द पूरे पूर्वी भारत पर कब्ज़ा कर लेना चाहता था।
         राजाराम सिंह ने जब गौहाटी पर आक्रमण किया तो विशाल मुग़ल सेना का सामना किया अहोम के वीर सेनापति "लचित बोरफूकन" ने। मुग़ल सेना का ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे रास्ता रोक दिया गया। इस लड़ाई में अहोम राज्य के 10000 सैनिक मारे गए और "लचित बोरफूकन" बुरी तरह जख्मी होने के कारण बीमार पड़ गये। अहोम सेना का बुरी तरह नुकसान हुआ। राजाराम सिंह ने अहोम के राजा को आत्मसमर्पण ने लिए कहा। जिसको राजा चक्रध्वज ने "आखरी जीवित अहोमी भी मुग़ल सेना से लडेगा" कहकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
          लचित बोरफुकन जैसे जांबाज सेनापति के घायल और बीमार होने से अहोम सेना मायूस हो गयी थी। अगले दिन ही लचित बोरफुकन ने राजा को कहा कि जब मेरा देश, मेरा राज्य आक्रांताओं द्वारा कब्ज़ा किये जाने के खतरे से जूझ रहा है, जब हमारी संस्कृति, मान और सम्मान खतरे में हैं तो मैं बीमार होकर भी आराम कैसे कर सकता हूँ ? मैं युद्ध भूमि से बीमार और लाचार होकर घर कैसे जा सकता हूँ ? हे राजा युद्ध की आज्ञा दें....
        इसके बाद ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर वो ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसमे "लचित बोरफुकन" ने सीमित संसाधनों के होते हुए भी मुग़ल सेना को रौंद डाला। अनेकों मुग़ल कमांडर मारे गए और मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। जिसका पीछा करके "लचित बोरफुकन" की सेना ने मुग़ल सेना को अहोम राज के सीमाओं से काफी दूर खदेड़ दिया। इस युद्ध के बाद कभी मुग़ल सेना की पूर्वोत्तर पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई। ये क्षेत्र कभी गुलाम नहीं बना।
       ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर मिली उस ऐतिहासिक विजय के करीब एक साल बाद ( उस युद्ध में अत्यधिक घायल होने और लगातार अस्वस्थ रहने के कारण ) माँ भारती का यह अदभुत वीर लाड़ला सदैव के लिए माँ भारती के आँचल में सो गया |
                 माँ भारती के ऐसे अद्वितीय पुत्र को कोटि - कोटि नमन ।
(बनारस, 31 मई 2017 , बुधवार)
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सोमवार, 28 मई 2018

व्योमवार्ता / मिसिंग टाईल्स सिन्ड्रोम, आज की सबसे बड़ी बीमारी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 मई 2018,रविवार

मिसिंग टाइल सिंड्रोम : आज की सबसे बड़ी बीमारी

            मिसिंग टाइल सिंड्रोम एक मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसमें हमारा सारा ध्यान जीवन की उस कमी की तरफ रहता है जिसे हम नहीं पा सके हैं | और यहीं बात हमारी ख़ुशी चुराने का सबसे बड़ा कारण है।
           जिन्दगी में कितना कुछ भी अच्छा हो, हम उन्हीं चीजों को देखते हैं जो *मिसिंग* हैं और यही हमारे दुःख का सबसे बड़ा कारण है।
क्या इस एक आदत को बदल कर हम अपने जीवन में खुशहाली ला सकते हैं ?
           मिसिंग टाइल सिंड्रोम की नाम अवधारणा के बारे मे एक मजेदार कहानी है ,एक बार की बात है एक छोटे शहर में एक मशहूर होटल  ने अपने होटल में एक स्विमिंग पूल बनवाया। स्विमिंग पूल के चारों  ओर बेहतरीन इटैलियन  टाइल्स लगवाये, परन्तु मिस्त्री की गलती से एक स्थान पर टाइल  लगना छूट गया। अब जो भी आता पहले उसका ध्यान टाइल्स  की खूबसूरती पर  जाता। इतने बेहतरीन टाइल्स देख कर हर आने वाला मुग्ध हो जाता। वो बड़ी ही बारीकी से उन टाइल्स को देखता व प्रशंसा करता। तभी उसकी नज़र उस मिसिंग टाइल पर जाती और वहीं अटक जाती.... उसके बाद वो किसी भी अन्य टाइल की ख़ूबसूरती नहीं देख पाता। स्विमिंग पूल से लौटने वाले हर व्यक्ति की यही शिकायत रहती की एक टाइल मिसिंग है। हजारों टाइल्स  के बीच में वो मिसिंग टाइल उसके दिमाग पर हावी रहता थी।
कई लोगों को उस टाइल को देख कर बहुत दुःख होता कि इतना परफेक्ट बनाने में भी एक टाइल रह ही गया। तो कई लोगों को उलझन हो होती कि कैसे भी करके वो टाइल ठीक कर दिया जाए। बहरहाल वहां से कोई भी खुश नहीं निकला, और एक खूबसूरत स्विमिंग पूल लोगों को कोई ख़ुशी या आनंद नहीं दे पाया |
          दरअसल उस स्विमिंग पूल में वो मिसिंग टाइल एक प्रयोग था। मनोवैज्ञानिक प्रयोग जो इस बात को सिद्ध करता है कि हमारा ध्यान कमियों की तरफ ही जाता है। कितना भी खूबसूरत सब कुछ हो रहा हो पर जहाँ एक कमी रह जायेगी वहीँ पर हमारा ध्यान रहेगा। 
         टाइल तक तो ठीक है पर यही बात हमारी जिंदगी में भी हो तो ? तो यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है जिससे हर  व्यक्ति गुज़र रहा है।
            इस मनोविज्ञानिक समस्या को मिसिंग टाइल सिंड्रोम का नाम दिया गया। Dennis Prager के अनुसार उन चीजों पर ध्यान देना जो हमारे जीवन में नहीं है, आगे चल कर हमारी ख़ुशी को चुराने का सबसे बड़ा कारण बन जाती हैं।
             ऐसे बहुत से उदाहरण हो सकते हैं जिसमें हम अपनी किसी एक कमी के पीछे सारा जीवन दुखी रहते हैं। ज्यादातर लोग उन्हें क्या-क्या मिला है पर खुश होने के स्थान पर उन्हें क्या नहीं मिला है पर दुखी रहते हैं।
          मिसिंग टाइल हमारा फोकस चुरा कर हमारी जिन्दगी की सारी  खुशियाँ चुराता है। यह शारीरिक और मानसिक कई बीमारियों की वजह बनता है,  अब हमारे हाथ में है कि हम अपना फोकस मिसिंग टाइल पर रखे और दुखी रहें या उन नेमतों पर रखे जो हमारे साथ है और खुश रहें...
          मिसिंग टाइल अवधारणा आधुनिक युग की है परन्तु इसका निवारण so called outdated thoughts में है। कुछ लोग ये भी कह सकते हैं कि प्रतिस्पर्धा में विकास निहित है। यह सही है परन्तु वह उसी सीमा तक सही है जहां से मिसिंग टाइल अवधारणा से व्यक्ति ग्रसित न हो।
(बनारस, 27मई 2018, रविवार)
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सोमवार, 21 मई 2018

व्योमवार्ता : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय : यह सर्व विद्या की राजधानी ........

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय : यह सर्व विद्या की राजधानी .........: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 मई 2018

विश्व के सबसे बेहतरीन व अनूठे विश्वविद्यालय के बारे में कुछ रोचक तथ्य । हमें गर्व है कि हम मालवीय जी की इस महान कृति के हम उत्पाद हैं.........

काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के 100 गौरवशाली वर्ष के इतिहास पर एक नजर डालते हैं और जानते हैं इस विश्‍वविद्यालय से जुड़े 100 ऐसे तथ्‍य जो शायद आप ना जानते हों:
1. सर्वप्रथम प्रयाग (इलाहाबाद) की सड़कों पर अपने अभिन्‍न मित्र बाबू गंगा प्रसाद वर्मा और सुंदरलाल के साथ घूमते हुए मालवीय जी ने हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की रूपरेखा पर विचार किया।
2. 1904 ई में जब विश्‍वविद्यालय निर्माण के लिए चर्चा चल रही थी तब कइयों ने इसकी सफलता पर गहरा शक भी प्रगट किया था। कइयों को विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भी विश्‍वविद्यालय वाराणसी की धरती पर निर्मित किया जा सकता है।
3. नवंबर 1905 में महामना मदन मोहन मालवीय ने हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय निर्माण के लिए अपना घर त्‍याग दिया।
4. तत्‍कालीन काशीनरेश महाराजा प्रभुनारायण सिंह की अध्‍यक्षता में बनारस के मिंट हाउस में काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के लिए पहली बैठक बुलाई गई।
5. जुलाई 1905 ई. में काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय का प्रस्‍ताव पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया गया।
6. दिसम्‍बर 1905 ई. में वाराणसी में कांग्रेस के राष्‍ट्रीय अधिवेशन का आयोजन किया गया। ठीक एक जनवरी 1906 ई. को कांग्रेस अधिवेशन के मंच से ही काशी में हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की घोषणा की गई।
7. जनवरी 1905 ई. में प्रयाग में साधु-संतों ने भी काशी में हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के लिए स्‍वीकृति दे दी।
8. उस वक्‍त दरभंगा महाराज सर रामेश्‍वर बहादुर सिंह भी वाराणसी में 'शारदा विश्‍वविद्यालय' की स्‍थापना करना चाहते थे, लेकिन मालवीय जी कि योजना को सुनकर उन्‍होंने भी 'काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय' निर्माण के लिए अपनी सहमति दे दी।
9. दरभंगा नरेश को बाद में हिन्‍दू युनिवर्सिटी सोसाइटी का प्रमुख बनाया गया।
10. पं. मदन मोहन मालीवय ने 15 जुलाई 1911 को हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के लिए एक करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्‍य रखा था।
11. बीएचयू पूरी दुनिया में अकेला ऐसा विश्‍वविद्यालय है जिसका निर्माण भिक्षा मांगकर मिली राशि से किया गया है।
12. महामना मदन मोहन मालवीय के नेतृत्‍व में 20 लोगों को पूरे देश में घूम-घूमकर भिक्षा मांगने के लिए नियुक्‍त किया गया।
13. विश्‍वविद्यालय निर्माण के लिए नियुक्‍त हुए प्रबुद्ध भिक्षार्थियों में राजाराम पाल सिंह, पं. दीन दयाल शर्मा, बाबू गंगा प्रसाद वर्मा, बाबू ईश्‍वर शरन, पं. गोकर्ण नाथ मिश्रा, पं. इकबाल नारायण गुर्टू, राय रामनुज दयाल बहादुर, राय सदानंद पांडेय बहादुर, लाला सुखबरी सिन्‍हा, बाबू वृजनंदन प्रसाद, राव वैजनाथ दास, बाबू शिव प्रसाद गुप्‍त, बाबू मंगला प्रसाद, बाबू राम चंद्र, बाबू ज्‍वाला प्रसाद निगम, ठाकुर महादेव सिंह, पं. परमेश्‍वर नाथ सप्रू, पं. विशंभर नाथ वाजपेयी, पं. रमाकांत मालवीय तथा बाबू त्रिलोकी नाथ कपूर शामिल थे।
14. 28 जुलाई 1911 को मालवीय जी ने अयोध्‍या नगरी से भिक्षाटन की शुरुआत की। इससे पूर्व उन्‍होंने सरयू नदी में स्‍नान किया और श्रीरामलला के दर्शन भी किए।
15. सन 1911 में ही मालवीय जी ने लाहौर और रावलपिंडी (वर्तमान पाकिस्‍तान) में भी भिक्षाटन किया। इस दौरान उनके साथ लाला लाजपत राय भी मौजूद रहे।
16. मुजफ्फरनगर में भिक्षाटन के दौरान अजीब वाकया हुआ जब सड़क पर एक गरीब भिखारिन ने अपनी दिनभर की कमाई मालवीय जी को काशी में हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय निर्माण के लिए समर्पित कर दिया।
17. मालवीय जी प्राचीन नालंदा विश्‍वविद्यालय की तर्ज पर आवासीय विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना करना चाहते थे।
18. शुरू-शुरू में विश्‍वविद्यालय में सात कॉलेजों की स्‍थापना का प्रस्‍ताव पारित हुआ। इनमें, संस्‍कृत कॉलेज, कला एवं साहित्‍य कॉलेज, विज्ञान एवं तकनीकि कॉलेज, कृषि कॉलेज, वाणिज्‍य (कॉमर्स) कॉलेज, मेडिसिन कॉलेज और म्‍यूजिक एवं फाइन आर्ट्स कॉलेज शामिल थे।
19. काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के प्रस्‍ताव के समय देश में कुल पांच विश्‍वविद्यालय मौजूद थे - कलकत्‍ता, बम्‍बई, मद्रास, लाहौर और इलाहाबाद में।
20. मालवीय जी का यह स्‍पष्‍ट मत था कि विश्‍वविद्यालय में धार्मिक शिक्षा को अनिवार्य किया जाए।
21. विश्‍वविद्यालय के नाम में 'हिन्‍दू' शब्‍द को लेकर भी मालवीय जी को कइयों से तिरस्‍कार भी झेलना पड़ा। उस वक्‍त मालवीय जी ने हिन्‍दुत्‍व को समावेशी बताते हुए इसे अल्‍पसंख्‍यकों के सशक्‍तिकरण का आधार माना।
22. अक्‍टूबर सन 1915 ईस्‍वीं में बनारस हिन्‍दू युनिवर्सिटी बिल पारित हुआ। इसके बाद इस विश्‍वविद्यालय के निर्माण की मंजूरी ब्रिटिश हुकूमत ने दे दी थी।
23. ८ फरवरी 1916 ई के दिन बसंत पंचमी के पावन अवसर पर दोपहर 12 बजे काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के शिलान्‍यास का कार्यक्रम शुरू हुआ।
24. इस मौके पर वायसरॉय लॉर्ड चार्ल्‍स हार्डिंग मुख्‍य अतिथि के रूप में मौजूद थे।
25. उस वक्‍त बनारस के कलेक्‍टर थे मिस्‍टर लेम्‍बर्ट जिन्‍होंने इंजीनियर राय छोटेलाल साहब के साथ मिलकर पूरी व्‍यवस्‍था का खाका तैयार किया था।
26. बीएचयू के शिलान्‍यास स्‍थल पर मदनवेदी का निर्माण किया गया था।
27. पुष्‍पवर्षा के बीच वायसराय लार्ड चार्ल्‍स हार्डिंग ने विश्‍वविद्यालय का शिलान्‍यास किया।
28. काशी के संस्‍कृत विद्वानों ने हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के निर्माण में कोई रुचि नहीं दिखाई थी।
29. यही नहीं शिलान्‍यास समारोह को लेकर काशी में विशेष उत्‍साह भी नहीं दिखा।
30. दो मुद्दों पर काशी की जनता ने शिलान्‍यास का विरोध भी किया था।
31. पहला - शिलापट्ट पर सम्राट शब्‍द का संस्‍कृत में उल्‍लेख।
32. दूसरा - शिलापट्ट पर काशी के धर्माचार्यों या शंकराचार्य का नाम ना उल्‍लिखित होना।
33. विवाद इतना गहरा गया कि विश्‍वविद्यालय के शिलान्‍यास समारोह के बहिष्‍कार की घोषणा काशी की जनता ने कर दिया।
34. शिलान्‍यास समारोह में अंग्रेजों के शामिल होन पर नगवां इलाके के संभ्रांत व्‍यक्‍ति खरपत्‍तू सरदार ने कड़ी आपत्‍ति दर्ज कराई थी।
35. बाद में मालवीय जी को खरपत्‍तू को वचन देना पड़ा किया शिलान्‍यास के बाद विश्‍वविद्यालय के किसी भी कार्यक्रम में अंग्रेज शिरकत नहीं करेंगे।
36. जबतक मालवीय जी जीवित रहे तबतक कोई भी अंग्रेज अधिकारी विश्‍वविद्यालय के किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सका।
37. विश्‍वविद्यालय स्‍थापना के ताम्रपत्र में कुल तीन जगह 'ॐ' लिखा हुआ है। भारतीय परंपरा में तीन बार ॐ का जाप करना अत्‍यंत ही शुभ और पुण्‍यकारी माना गया है।
38. विश्‍वविद्यालय के ताम्रपत्र के अनुसार 'मनु की संतानों को अनुशासन और न्‍याय की शिक्षा देने के लिए ही काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की गई है।'
39. विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना में महामना मदन मोहन मालवीय जी की क्‍या भूमिका है इसका ताम्रपत्र में कहीं भी उल्‍लेख नहीं है।
40. कुछ लोगों का मानना है कि ऐनिबेसेंट के नाम का उल्‍लेख भी इस ताम्रपत्र में नहीं है। वहीं कुछ लोग मानते हैं कि ताम्रपत्र में ऐनिबेसेंट के नाम का उल्‍लेख मालवीय जी ने 'वासन्‍ति वाग्‍मिता' के रूप में कराया था।
41. ताम्रपत्र में विश्‍वविद्यालय के लिए दान देने वाले राजाओं के नाम नहीं हैं बल्‍कि उनके राज्‍यों के नाम लिखे गए हैं। जैसे - मेवाड़, काशी, कपूर्थला आदि।
42. ताम्रपत्र में विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना का श्रेय 'परमात्‍मा' को दिया गया है।
43. ताम्रपत्र में लॉर्ड हार्डिंग को 'धीर-वीर प्रजाबंधु' लिखा गया है। इसे लेकर वाराणसी की जनता ने मालवीय जी का उपहास भी उड़ाया और व्‍यंग चित्र भी बनाये।
44. सबसे पहले विश्‍वविद्यालय निर्माण के लिए वाराणसी के हरहुआ इलाके में भूमि उपलब्‍ध कराने का विचार महाराज प्रभुनारायण को आया था। बाद में इसे मालवीय जी ने खारिज कर दिया।
45. वाराणसी के दक्षिण में 1300 एकड़ भूमि (5.3किमी) को तत्‍कालीन काशीनरेश महाराज प्रभुनारायण सिंह ने महामना को विश्‍वविद्यालय निर्माण के लिए दान में दे दिया।
46. शिलान्‍यास के वर्ष 1916 ई को गंगा में भयानक बाढ़ आई और विश्‍वविद्यालय की भूमि पूरी तरह से जलमग्‍न हो गई। पहले विश्‍वविद्यालय को गंगा के बिल्‍कुल किनारे बसाने का विचार था।
47. इसके बाद मां गंगा को प्रणाम करते हुए विश्‍वविद्यालय परिसर को गंगा नदी से थोड़ी दूर बसाने का निर्णय लिया गया।
48. कुल 12 गांवों को खाली कराकर काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की गई है।
49. इन 12 गावों में भोगावीर, नरियां, आदित्‍यपुर, करमजीतपुर, सुसुवाही, नासीपुर, नुवांव, डाफी, सीर, छित्‍तुपुर, भगवानपुर और गरिवानपुर शामिल हैं।
50. बिजनौर के धर्मनगरी निवासी राजा ज्‍वाला प्रसाद ने काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्याल का नक्‍शा तैयार किया तथा अपने दिशानिर्देश में ईमारतों को मूर्त रूप दिया।
51. विश्‍वविद्यालय को प्राप्‍त पूरी जमीन अर्द्धचंद्राकार है।
52. विश्‍वविद्यालय के अर्द्धचंद्राकार डिजाइन और इसके बीचो-बीच स्‍थित विश्‍वनाथ मंदिर को देखकर काशी नरेश डॉ विभूति नारायण सिंह ने इसे शिव का त्रिपुंड और बीच में स्‍थित शिव की तीसरी आंख बताया था।
53. यहां निर्मित भवन इण्‍डो-गोथिक स्‍थापत्‍य कला के भव्‍य नमूने हैं।
54. शुरुआत में विश्‍वविद्यालय की भाषा को अंग्रेजी रखा गया हालांकि मालवीय जी ने इसे हिन्‍दी में किए जाने का विश्‍वास महात्‍मा गांधी को दिलाया था।
55. युवाओं को तकनीकि ज्ञान देने के लिए आजादी से पहले ही विश्‍वविद्यालय में बनारस इंजीनियरिंग कॉलेज (BENCO) 1919 ई, कॉलेज ऑफ माइनिंग एंड मेटलॉजी 1923 ई और कॉलेज ऑफ टेक्‍नॉलॉजी 1932 ई की शुरुआत कर दी गई थी।
56. विश्‍वविद्यालय में तीन संस्‍थान हैं : चिकित्‍सा (इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज), तकनीक (इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलॉजी) और कृषि (इंस्‍टीट्यूट ऑफ एग्रिकल्‍चर साइंसेज)।
57. विश्‍वविद्यालय में 11 संकाय है : चिकित्‍सा, कला, वाणिज्‍य, शिक्षा विधि, प्रबंधतंत्र, दृश्‍यकला, संस्‍कृति विद्याधर्म, विज्ञान, समाज विज्ञान, संगीत, महिला महाविद्यालय।
58. वाराणसी में बीएचयू से संबद्ध चार महाविद्यालय मौजूद हैं : डीएवी पीजी कॉलेज, बसंता कॉलेज फॉर वुमेन, आर्य महिला कॉलेज, बसंता कॉलेज कमक्षा।
59. विश्‍वविद्यालय से 70 किमी दक्षिण में मीरजापुर जनपद में बरकछा नामक स्‍थान पर 'राजीव गांधी दक्षिणी परिसर' स्‍थित है।
60. विश्‍वविद्यालय के भीतर प्रेस, हवाई अड्डा (रन-वे), पोस्‍ट ऑफिस, केंद्रीय विद्यालय और प्रमुख बैंकों के कार्यालय मौजूद हैं।
61. महिला शिक्षा : आजादी से पूर्व 1936-37 ई. में विश्‍वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में 100 लड़कियां स्‍नातकोत्‍तर की शिक्षा ग्रहण कर रही थीं।
62. मालवीय जी का स्‍वप्‍न था कि गंगा को नहर के माध्‍यम से विश्‍वविद्यालय के अंदर लाया जाए लेकिन एक दुर्घटना की वजह से यह कार्य रोक दिया गया।
63. हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय का कार्य सर्वप्रथम काशी में सेंट्रल हिन्‍दू कॉलेज के एक भवन में शुरू हुआ।
64. विश्‍वविद्यालय के लिए आचार्यों का चयन बिना किसी कमेटी, रेज्‍यूमे या सिफारिश के किया गया।
65. कुछ विद्वानों को निमंत्रण देकर, कुछ स्‍वयं की प्रेरणा से विश्‍वविद्यालय में पढ़ाने पहुंचे।
66. यहां पढ़ाने वाले कुछ विद्वान तो ऐसे भी थे जिन्‍होंने अपनी धन-सम्‍पत्‍ति तक विश्‍वविद्यालय के नाम कर दी।
67. बीएचयू के आजीवन रजिस्‍ट्रार और चीफ वार्डन रहे श्‍यामाचरण डे ने अपनी पूरी सम्‍पत्‍ति विश्‍वविद्यालय के नाम कर दी।
68. श्‍यामाचरण डे आजीवन एक रुपया की तनख्‍वाह पर विश्‍वविद्यालय की ओर से मिली जिम्‍मेदारियों का निर्वहन करते रहे।
69. सभी प्रोफेसर, वो चाहे जिस भी विषय के विद्वान रहे हों कुर्ता-धोती और कंधे पर रखने वाला दुपट्टा पहनकर ही विश्‍वविद्यालय में पढ़ाने आते थे।
70. अंग्रेजी भाषा के प्रोफेसर निक्‍सन भी कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर धोती-कुर्ता पहनकर कृष्‍ण मंदिर का घंटा बजाया करते थे।
71. 1930 में जब महामना को बंबई में गिरफ्तार किया गया तो बीएचयू से 24 छात्रों के एक दल के साथ एक छात्रा कुमारी शकुंतला भार्गव भी बंबई में धरना देने के लिए पहुंची थी।
72. स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर आजाद, राजगुरू, रामप्रसाद बिस्‍मिल, शचीन्‍द्रनाथ सान्‍याल आदि क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र काशी और काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय ही था।
73. महाराज प्रभुनारायण सिंह के पौत्र और बाद में काशी नरेश बने महाराजा विभूति नारायण सिंह आजीवन काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति रहे।
74. राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर 'गुरू जी' ने काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय से ही जूलॉजी में पोस्‍ट ग्रेजुएशन तक की शिक्षा ग्रहण की और बाद में यहां अध्‍यापन का कार्य भी किया।
75. मालवीय जी के निमंत्रण पर आरएसएस के तत्‍कालीन सरसंघचालक डॉ० केशव बलिराम हेडगेवार काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय आए थे।
76. बीएचयू परिसर में ही हेडगेवार और गोलवलकर के बीच मुलाकात हुई। बाद में गोलवलकर आरएसएस के सरसंघचालक बने।
77. आरएसएस और मालवीय जी के बीच मधुर संबंधों का ही नतीजा रहा कि विश्‍वविद्यालय परिसर में ही संघ के नाम दो कमरों का प्‍लॉट अलॉट हुआ।
78. 1929 से 1942 के बीच संघ की कई शाखाएं विश्‍वविद्यालय परिसर में खुल चुकी थीं।
79. 1948 ई. में महात्‍मा गांधी की हत्‍या के बाद तत्‍कालीन कुलपति गोविन्‍द मालवीय ने संघ के भवन को अपने कब्‍जे में ले लिया। संघ पर से प्रतिबंध हटने के बाद भवन दुबारा आरएसएस को सौंप दिया गया।
80. 8 अप्रैल 1938 ईस्‍वी को रामनवमी के दिन विश्‍वविद्यालय परिसर में 'राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ पेवेलियन' का शिलान्‍यास मालवीय मदन मोहन मालवीय, हेडगेवार और गोलवलकर की अगुवाई में हुआ।
81. अपनी भुजाओं के बल पर शेर को मारने वाले बचाऊ पहलवान महामना मदन मोहन मालवीय के अभिन्‍न मित्र थे। बचाऊ पहलवान ने मालवीय जी के प्राणों की रक्षा के लिए खुद के प्राणों की बलि दे दी थी।
82. विश्‍वविद्यालय के प्रथम कुलपति होने का गौरव राय बहादुर सर सुंदरलाल को प्राप्‍त हुआ।
83. इनके बाद सर पीएस शिवस्‍वामी अय्यर ने इस पद को सुशोभित किया।
84. कालांतर में वर्ष 1919 से लेकर 1939 तक पं. मदन मोहन मालवीय ने विश्‍वविद्यालय के कुलपति पद की शोभा को बढ़ाई।
85. 24 सितम्‍बर 1939 को सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन विश्‍वविद्यालय के दूसरे कुलपति के रुप में इस अति पावन पद पर काबिज हुए।
86. राधाकृष्‍णन आठ वर्षों तक विश्‍वविद्यालय के कुलपति बने रहे।
87. राधाकृष्‍णन के बाद अमरनाथ झा काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के कुलपति बने।
88. अमरनाथ झा के बाद क्रमश: पं. गोविन्‍द मालवीय, आचार्य नरेन्‍द्र देव, सीपी रामास्‍वामी अैय्यर, वीएस झा, एनएच भगवती, त्रिगुण सेन, एसी जोशी, कालू लाल श्रीमाली आदि ने विश्‍वविद्यालय के कुलपति पद को सुशोभित किया।
89. वर्तमान में इस पावन विश्‍वविद्यालय के 27वें कुलपति के रूप में जाने-माने जीव वैग्यानिक  प्रो0 राकेश भटनागर शोभायमान हैं।
90. प्रख्‍यात वैज्ञानिक शांति स्‍वरूप भटनागर ने विश्‍वविद्यालय के अतिलोकप्रिय कुलगीत की रचना की।
91. पुरावनस्‍पति वैज्ञानिक बीरबल साहनी, भौतिक वैज्ञानिक जयंत विष्‍णु नार्लीकर, भूपेन हजारिका, अशोक सिंहल, आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल, हरिवंश राय बच्‍चन जैसी महान विभूतियों ने इस विश्‍वविद्यालय की कीर्ति में चार चांद लगाया।
92. विश्‍वविद्यालय परिसर के भीतर ही विशाल विश्‍वनाथ मंदिर स्‍थित है।
93. इस मंदिर का शिलान्‍यास 11 मार्च 1931 में कृष्‍णास्‍वामी ने किया।
94. मालवीय जी चाहते थे कि भव्‍य विश्‍वनाथ मंदिर उनके जीवन काल में ही बन जाए लेकिन ऐसा शायद विधि को मंजूर नहीं था।
95. मालवीय जी के अंतिम समय में उद्योगपति जुगलकिशोर बिरला ने उन्‍हें भरोसा दिलाया कि वह बीएचयू परिसर में नियत स्‍थान पर ही भव्‍य विश्‍वनाथ मंदिर का निर्माण जल्‍द से जल्‍द कराएंगे।
96. 17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान विश्‍वनाथ की स्‍थापना इस मंदिर में हुई।
97. बीएचयू स्‍थित विश्‍वनाथ मंदिर पूरे भारत में सबसे ऊंचा शिवमंदिर है। मंदिर के शिखर की ऊंचाई 76 मीटर (250 फीट) है। यह मंदिर विश्‍वविद्यालय के केंद्र में स्‍थित है।
98. 60 से भी ज्‍यादा देशों के विद्यार्थी काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के विभिन्‍न विभागों, संकायों और संस्‍थानों में पढ़ाई कर रहे हैं।
99. महामना मदन मोहन मालवीय का आदर्श वाक्‍य था, 'उत्‍साहो बलवान राजन्''। अर्थात, उत्‍साह पूर्वक कर्म में लगो तभी शक्‍तिशाली बन सकते हो।
100. बनारस हिन्‍दू युनिवर्सिटी के निर्माण में अपना सबकुछ न्‍यौछावर करने वाले महामना मदन मोहन मालवीय जी को स्‍वतंत्रता के 67 वर्ष बाद देश के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान 'भारत रत्‍न' से सम्‍मानित किया गया।
(बनारस, 21 मई 2018, सोमवार )
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