शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

व्योमवार्ता / रोहिग्यॉ मुस्लिम समस्या की जटिलता से परिचित कराती सरल कोशिस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 सितंबर 2017

जव्योमवार्ता : रोहिंग्या मुस्लिम समस्या की जटिलता से परिचित कराती सरल कोशिस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 सितंबर 2017, शुक्रवार

आजकल रोहिंग्या मुस्लिमों की समस्यायें रोज सुनने मे आ रही है, कुछ मानवाधिकार वादी जहॉ अपने कथित तर्को के आधार पर कलुषित करूणा से विकारग होकर रोहिंग्यायों को तुरंत शरण देने व बसाने की मॉग कर रहे है ध्यानदेने वाली बात यह है कि ये कथित मानवाधिकारवादी आज तक कश्मीर मे अपने घर से बेघर किये गये काश्मीरी पंडितो के पक्ष मे खड़े होना तो दूर बोलना भी उचित नही समझे जब कि उन्हे अपने परिवार से दूर ड्यूटी कर रहे सुरक्षाबसो पर कायरता पूर्ण ढंग से गोली चलाने वाले नक्सली के मरने पर अपरंपार कष्ट होता है ,वहीं दूसरी तरफ व्यवहारिक सोच वाले लोगों (जिन्हे आजकल की भाषा मे राष्ट्रवादी कहा जाने लगा है ) का मानना है कि किसी भी सूरत मे इन शरणार्थियों को शरण देने पर विचार भी किया जाना भारत के लिये आत्मघाती कदम होगा. ऐसे मे ही क मुझे जोया मंसूरी की एक पोस्ट मिली, जिसमे जोया ने रोहिंग्या मुस्लिमो की समस्या, स्वभाव व संस्कार का हवाला देते हुये एक मुस्लिम व उससे भी ऊपर एक भारतीय की नजर से पूरी समस्या का विवेचन किया है. धन्यवाद जोया ,इस कठिन सी लगने वाली समस्या को इतने सरल तरीके से समझाने के लिये.

         रोहिंग्या दरअसल सुन्नी मुसलमान है जो म्यांमार के पश्चिमी रखाइन प्रांत में लगभग दस से ग्यारह लाख की आबादी में रहते है ।  इनका कोई देश नही है ।  संयुक्त राष्ट्र इन्हें दुनियाँ का सबसे प्रताड़ित जातीय समूह मानता है ।  स्थानीय बौद्ध इन्हें बंगाली कहते है क्योंकि ये लोग जो भाषा बोलते है वैसी दक्षिण पूर्व बांग्लादेश के चटगांव में बोली जाती है ।  इस पूरे मामले में रोहिंग्या शब्द भी एक अहम रोल अदा करता है ।  कुछ रोहिंग्या इतिहासकारों का मानना है कि रोहिंग्या शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है इसलिए ये लोग पीढ़ियों पहले अरब से आकर बसने वाले मुस्लिम है वहीँ कुछ दूसरे रोहिंग्या इतिहासकारों का मानना है कि इस शब्द का स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाति है जो चौदहवीं सदी में म्यामांर में आकर बसी ।  जबकि इसके विपरीत बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं सदी से पहले कभी प्रयोग ही नहीं हुआ और रोहिंग्या उन बंगाली मुसलमानों का नया नामकरण हैं जो अपना घर बार छोड़कर बंगाल से अराकान में आबाद हुए थे ।  रोहिंग्या मुसलमानों के 14वीं शताब्दी के आस पास म्यांमार में बसने के दावे किए जाते है ।  ऐसा कहा जाता है कि रोहिंग्या मुस्लिम 1430 में रखाइन प्रान्त के बौद्ध राजा नीरा मीखला के दरबार मे गुलामों ,सैनिकों और नौकरों का काम करते थे ।  1785 में बौद्धों ने रखाइन प्रान्त से राजतन्त्र को उखाड़ फेंका और राजा के वफादार रोहिंग्या मुस्लिमो को रखाइन प्रान्त से मार भगाया ।सन 1826 में म्यांमार पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया ।
अंग्रेज़ों ने फिर से बंगाल से रोहिंग्या मुसलमानों को बुला कर म्यांमार में बसाया ।  द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब म्यांमार पर जापान का कब्ज़ा हो गया तो बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच जमकर खूनी लड़ाइयां हुई ।  दरअसल अंग्रेज़ों ने रोहिंग्या मुसलमानों को सुरक्षा और अलग इस्लामी राष्ट्र देने का गुपचुप वादा किया था जबकि स्थानीय बौद्ध किसी भी सूरत में अंग्रेज़ों से छुटकारा चाहते थे इसलिए बौद्ध जहां जापानियों की सहायता कर रहे थे वहीं रोहिंग्या मुसलमान अंग्रेज़ों के समर्थक थे और बौद्धों तथा जापान के खिलाफ जासूसी करते थे । 
जनवरी 1948 में जब म्यांमार स्वतंत्र हो गया तो रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए हिंसक और सशस्त्र आंदोलन आरंभ कर दिया ।  अलग इस्लामी राष्ट्र के लिए रोहिंग्या मुसलमानों का ये सशस्त्र आंदोलन सन 1962 तक चला ।  1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति के बाद जनरल नी विंग की सरकार ने अलग इस्लामी राष्ट्र की मांग कर रहे रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख रोहिंग्या मुसलमान भाग कर बांग्लादेश, पाकिस्तान और मलेशिया चले गए ।  तत्कालीन भारतीय सरकारों ने भी रोहिंग्या मुस्लिमो को जम्मू, कश्मीर, पश्चिम बंगाल , मुम्बई और हैदराबाद में बसाया ।
ज्यादातर ने इन देशों की नागरिकता लेकर उसे ही अपना देश मान लिया ।  जो इस सब के बावजूद म्यांमार में रह गए उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया ।  म्यांमार के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह नी विंग से मुक्ति प्राप्त कर ली ।  वर्ष 2012 में म्यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव हुए और लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी ने सरकार बनाई ।  सत्ताधारी पार्टी की मुखिया आँग सान सू ची मानवाधिकारों की बहुत बड़ी समर्थक और कार्यकर्ता है बावजूद इसके रोहिंग्या मुद्दे पर वो खामोश है । 
दरअसल बौद्ध बहुलता वाले लोकतांत्रिक देश म्यांमार में सत्ता के दो केंद्र काम करते है ।  देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा सेना के हाथ मे है जिसमें सरकार का कोई दखल नही होता ।  सरकार द्वारा रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए आवाज़ उठाने का मतलब है सेना के साथ सीधा टकराव क्योंकि 2012 में सेना की चौकियों पर अरब समर्थित रोहिंग्या मुस्लिमों के एक गुट द्वारा हमले के बाद से सेना हर हाल में रोहिंग्या मुस्लिमो को देश से निकालने पर अड़ी है । 
म्यांमार दुनियाँ भर के दानी देशों की लिस्ट में सबसे पहले स्थान पर है ।  वहाँ की 92 फीसदी आबादी गरीबों की मदद करने में आगे है और 55 फीसदी आबादी सामाजिक कार्यों में बिना की सरकारी आदेश या मुहिम के स्वेक्षा से बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते है, जबकि म्यांमार की गिनती अमीर राष्ट्रों में नही की जाती ।  नागरिकता को लेकर म्यांमार में 1982 में बना एक कानून है जिसके अनुसार म्यांमार की नागरिकता पाने के लिए किसी भी जातीय समूह को ये साबित करना होगा कि वो 1823 के पहले से इस देश मे रह रहे है, रोहिंग्या मुस्लिम ये साबित करने में अक्षम रहे है क्योंकि उन्हें गुलामों, नौकरों और सैनिकों के रूप में म्यांमार में बसाया गया था ।  धर्मिक शिक्षा के अलावा उन्हें बाकी हर तरह की शिक्षा और अधिकारों से वंचित रखा गया ।      
            इसके अलावा इस विवाद में मुझे जो सबसे बड़ी वजह समझ मे आती है वो ये कि किसी भी देश के नागरिक नहीं चाहेंगे कि उनके देश के संसाधनों पर किसी और देश के शरणार्थी आकर राज करें और स्थानीय निवासी ही उनसे वंचित रह जाएं ।  कोई भी देश अगर शरणार्थियों को अपने यहाँ रहने की मंजूरी देता है तो उस देश के निवासी ये उम्मीद करते है कि शरणार्थी अहिंसक हों, देश और कानून के नियम मानने वाले हों, जिस देश का नमक खाएं उसकी देशभक्ति करने वाले हों ।  जो लोग जीवनपर्यंत किसी देश मे रहना चाहते हों उनसे अपेक्षा की जाती है कि उन्हें वहाँ के मूल निवासियों और अन्य धार्मिको की सभ्यता और संस्कृति से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । 
              सन 1948 में इज़राइल और अरब देशों बीच हुए युद्ध में सात लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी मुसलमान बेघर होकर सीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों की ओर पलायन कर गए थे।
ये दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी समस्या थी जो आज भी उतनी ही बड़ी है । इस युध्द के दौरान फिलीस्तीनियो पर जितना जुल्म इज़राइल ने किया उससे कहीँ ज्यादा जॉर्डन और इजिप्ट जैसे मुस्लिम देशों ने किया ।  इस युध्द में गाज़ा पर इजिप्ट और वेस्ट बैंक पर जॉर्डन ने कब्जा किया लेकिन इसके बावजूद भी इन मुस्लिम देशों द्वारा फिलिस्तीनी शरणार्थियों को वापस लाने का कोई प्रयास नही किया गया ।  उल्टे एक मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान के जनरल जियाउल हक ने जॉर्डन के शाह के कहने पर 1970 में  एक हफ्ते में 25000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को मार डाला था  (ब्लॅक सेप्टेम्बर) लेकिन आपने कभी कहीं इस पर उतना तेज करुण क्रंदन नही सुना होगा जितना रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर किया जाता है । 
पोस्ट के अंत मे अब ये सही वक्त है कि आप मुझे इस्लामोफोबिया का मरीज कह सकें पर ये बात किसी से छिपी नही है कि मुस्लिम किसी दूसरे धर्म को सम्मान नहीं देते , दूसरे धर्म के अनुयायियों की अपेक्षा ज्यादा कट्टर होते है, देश से बढ़कर मजहब को मानते हैं और बहुसंख्यक होते ही धर्म के नाम पर अलग देश की मांग करते है ।  मुसलमानों का ये इतिहास ही शायद सबसे बड़ी वजह है कि दुनिया का कोई देश रोहिंग्या को अपने देश मे शरण नही देना चाहता । 
रोहिंग्या मुसलमानों की इस दुर्दशा के ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ उनकी कौम के ही लोग है ।  रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण न देने की ये सारी वजहें भारत के पास भी है ।  यकीनन आज के हालात में रोहिंग्या मुस्लिम रहम के काबिल है, इंसानियत के नाते इनकी मदद होनी चाहिए, यही इंसानियत का तकाजा भी है ।  बांग्लादेश या म्यांमार पर दबाव डाल कर इन्हें किसी भी एक देश की नागरिकता उपलब्ध कराई जाए ।  हम दिन भर में कई मज़लूम और जरूरतमन्द लोगों की मदद करते है, रक्तदान करते है, धन से मदद करते है, मुफ्त भोजन कराते है, निराश्रितों के लिए अनाथालय, वृद्धाश्रम, विधवाआश्रम आदि बनवाते है लेकिन हम उन्हें अपनी बहन, बेटियों, पुरुषों के साथ रहने के लिए अपने घर का कमरा नही दे देते । 
हो सकता है शरण देने पर आज रोहिंग्या मुस्लिमो की ये पीढ़ी जीवन पर्यंत प्रशांत भूषण का, भारत और भारतवासियों का एहसान मानें लेकिन इसकी गारंटी कौन लेगा कि इनकी आने वाली पीढ़ियाँ अलग देश की मांग नही करेगी । 
कौन ये दावा कर सकता है कि इनके बच्चे बड़े होकर हमारी आंखों में आंखे डालकर हमसे ये नही कहेंगे कि
" किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े है.. "
जोया मंसूरी की कलम से
(बनारस, 15 सितंबर 2017, शुक्रवार)
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रविवार, 10 सितंबर 2017

व्योमवार्ता :अफशोस है कि सेकूलर मीडिया में तुम खबर होने लायक नहीं हो मयूरग्राम :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 09 सितंबर 2017, शनिवार

व्योमवार्ता : मयूरग्राम,अफशोस है कि सेकूलर मीडिया में तुम खबर होने लायक नहीं हो
व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 09 सितंबर 2017, शनिवार

          मयूरग्राम का नाम सुना है, नही न? क्योंकि मीडिया में मयूरग्राम के लिये न तो जगह है न चर्चा के लिये जरूरत. क्योंकि मयूरग्राम सेकूलर है या यूँ कहिये कि सेकूलर मीडिया ने उसे अपने लिहाज से उसे सेकूलरों के रहमो करम पर छेड़ दिया है.
       पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 240 किलोमीटर उत्तर बीरभूम जिले में  मुर्शिदाबाद से सटे नलहाटी के पास मयूरग्राम नाम का एक गांव होता था हाल-फिलहाल तक। 1990 के दशक में यहां 280 हिंदू परिवार और सिर्फ 15 मुस्लिम परिवार थे। सारे मुस्लिम परिवार भूमिहीन थे और बंटाई पर खेती करते थे। इसके बाद इन्होंने अपने बांग्लादेशी रिश्तेदारों को बुलाया और पंचायती व ग्रामसमाज की जमीन पर उनकी झोपड़ियां डलवा दी। 1998 तक गांव में 50 मुस्लिम परिवार हो गए और हालात बदलने लगे। अगले दो-चार साल में संख्या और बढ़ी और उससे ज्यादा तेजी से हिंदू महिलाओं का उत्पीड़न। घर से निकलते ही छेड़छाड़ शुरू हो जाती। कुछेक के साथ बलात्कार की कोशिश भी हुई। थाने में शिकायत करने का कोई नतीजा नहीं निकलता कभी। इसके बाद मुसलमानों ने पूजा पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का भी विरोध शुरू कर दिया। गांव के काली मंदिर के सामने मस्जिद बन गई। मुसलमानों के आपत्ति जताने पर पुलिस ने मंदिर में शंख और ढोल बजाने पर पाबंदी भी लगा दी। उनकी अजान तो खैर चलती ही रही। इसके बाद उन्होंने हिंदुओं के साथ रोजाना गालीगलौज व उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। महिलाओं का घर से बाहर कदम रखना दुश्वार हो गया। फिर दुर्गा पूजा बंद करा दी गई और ईद-बकरीद के दिन काली मंदिर के ऐन सामने मस्जिद में गायें कटने लगीं।

1990 के शुरू में जिस गांव में 280 हिंदू परिवार होते थे, 2016 आते-आते सिर्फ 10 शेष बचे। फिर मयूरग्राम थोड़ा सा हिंदू नाम लगा तो उसे भी बदल दिया गया। सरकार ने तेजी से कार्रवाई करते हुए मुसलमानों की मांग पर इसे मोरग्राम कर दिया। गांव के रेलवे स्टेशन का भी नाम अब मोरग्राम है। यह कहानी अकेले मयूरग्राम की नहीं बल्कि बांग्लादेश की सीमा से सटे बहुत से गांवों की है। असम की बराक वैली के सिलचर और करीमगंज जिलों में स्थिति और बदतर है।

यह दिखाता है कि बिना मारकाट किए लो-लेवल की संगठित और सतत हिंसा के क्या फायदे हो सकते हैं। यह तोप-तलवार से ज्यादा प्रभावी है, पीड़ित यह सोचकर ही थाने नहीं जाता कि ये तो रोज ही होना है। और वहां सुनवाई न होने पर एक असहाय शहरी के सामने समर्पण या फिर पलायन के अलावा कोई रास्ता शेष नहीं रहता। ज्यादातर पलायन का विकल्प चुनते हैं।

बंगाल-असम में जो हिंदुओं के साथ हो रहा है, ठीक वहीं यूरोप में यहूदियों के साथ हो रहा है। स्थिति इतनी विकट है कि प्रतिष्ठित पत्रिका "द अटलांटिक" ने अप्रैल 2015 के अंक में कवर स्टोरी छापी , " Is it time for jews to leave Europe"। इस पत्रिका के मुताबिक फ्रांस में सिर्फ एक प्रतिशत यहूदी हैं पर मजहबी/नस्ली हिंसा के 51 प्रतिशत मामलों में शिकार वही होते हैं। स्वीडन में स्थिति और भयावह है। वहां अगर आप यहूदी पहचान के साथ सड़क पर निकले तो मार खाना तय है। ज्यादातर यहूदी अब इजराइल भाग रहे हैं।

यह अलग मामला है कि यहूदियों के खिलाफ हिंसा के ज्यादातर मामले अनरिपोर्टेड ही रह जाते हैं। मीडिया में ये खबर नहीं बनते। इसकी वजह है? एक तो यह कि अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक होने के बावजूद साक्षर व समृद्ध यहूदी समाज की मुख्य धारा में हैं। यह उनका अपराध है। मुस्लिम अप्रवासी, अश्वेत और एलजीबीटी जैसे कुछ तबके सौभाग्यशाली हैं जो लिबरल-लेफ्ट लिबरल समुदाय की ओर से सत्यापित व सूचीबद्ध उत्पीड़ित तबकों में आते हैं। ये सरकार व मीड़िया की ओर से पीड़ित व संरक्षित घोषित किए जा चुके हैं। इनका बाल भी बांका हुआ तो तत्काल संज्ञान लिया जाएगा। मीडिया क्या करे? हमें तो पहले दिन ही सिखाया गया कि कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं होती पर आदमी कुत्ते को काट ले तो खबर है। जिसने भी यह थ्योरी दी वह पक्का लिबटार्ड रहा होगा। अब इसका नतीजा देख लें। कुत्ते आपके घर व मुहल्ले में कितनों को भी काट लें, पर आपकी खबर, खबर होने के लायक नहीं। पलायन चाहे मयूरग्राम से हो चाहे मालमो से, सामान्य घटना है। लेकिन अगर आपका नाम अखलाक या जुनेद है तो निश्चिंत रहें। आप सर्टिफाइड विक्टिम हैं, राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी आपके साथ होगी।
(बनारस, 9 सितंबर 2017, शनिवार)
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शनिवार, 9 सितंबर 2017

व्योमवार्ता/रेशम की डोरी से बंधा अनमोल रिश्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 7अगस्त 2017

व्योमवार्ता/ रेशम की डोरी से बंधा अनमोल रिश्ता :व्योमेश चित्रवंश की डायरी
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                   फेसबुक पर फाइंड फ्रेंड में नाम डाल डाल कर कई बार सर्च किया, लेकिन संजय का कोई पता न चला. ‘पता नहीं फेसबुक पर उस का अकाउंट है भी कि नहीं,’ यह सोच कर मैं ने लौगआउट किया ही था कि स्मार्टफोन पर व्हाट्सऐप की मैसेज ट्यून सुनाई दी. फोन की स्क्रीन पर देखा तो जानापहचाना चेहरा लगा. डबल क्लिक कर फोटो को बड़ा किया तो चेहरा देख दंग रह गई. फिर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. ‘बिलकुल वैसा ही लगता है संजय जैसा पहले था.’
मैं अपने मातापिता की एकलौती संतान थी और 12वीं में पढ़ती थी. पिताजी रेलवे में टीटीई के पद पर कार्यरत थे. इस कारण अकसर बाहर ही रहते. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण हम ने डिसाइड किया कि घर का एक कमरा किराए पर दे दिया जाए. बहुत सोचविचार कर पापा ने 2 स्टूडैंट्स जो ग्रैजुएशन करने के बाद आईएएस की तैयारी करने केरल से दिल्ली आए हुए थे, को कमरा किराए पर दे दिया. जब वे हमारे यहां रहने आए तो आपसी परिचय के बाद उन्होंने मुझे कहा, ‘पढ़ाई के सिलसिले में कभी जरूरत हो तो कहिएगा.’
उन में से एक, जिस का नाम संजय था अकसर मुझ से बातचीत करने को उत्सुक रहता. कभी 10वीं की एनसीईआरटी की किताब मांगता तो कभी मेरे कोर्स की. मुझे उस का इस तरह किताबें मांगना बात करने का बहाना लगता. एक दिन जब वह किताब मांगने आया तो मैं ने उसे बुरी तरह डांट दिया, ‘क्या करोगे 10वीं की किताब का. मुझे सब पता है, यह सब बहाने हैं लड़कियों से बात करने के. मुझ से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश न करो. आगे से मत आना किताब मांगने.’ उस ने अपने पक्ष में बहुत दलीलें दीं लेकिन मैं ने नकारते हुए सब खारिज कर दीं. उस दिन मुझे स्कूल से ही अपनी फ्रैंड के घर जाना था. मैं मम्मी को बता भी गई थी, लेकिन जब घर आई तो जैसे सभी मुझे शक की निगाह से देखने लगे.
बस्ता रखा ही था कि मम्मी पूछने लगीं, ‘आज तुम रमेश के साथ क्या कर रही थीं?’
‘रमेश,’ मैं समझ गई कि यह आग संजय की लगाई हुई है. मैं ने जैसेतैसे मम्मी को समझाया, लेकिन संजय से बदला लेने उसी के रूम में चली गई. ‘तुम होते कौन हो मेरे मामले में टांग अड़ाने वाले. मैं चाहे किसी के साथ जाऊं, घूमूंफिरूं तुम्हें क्या. तुम किराएदार हो, किराया दो और चुपचाप रहो. आइंदा मेरे बारे में मां से बात करने की कोई जरूरत नहीं, समझे,’ मैं संजय को कह कर बाहर निकल गई. दरअसल, रमेश मेरी कक्षा में पढ़ता था. अच्छी पर्सनैलिटी होने के कारण सभी लड़कियां उस से दोस्ती करना चाहती थीं. मेरे दिल में भी उस के लिए प्यार था और मैं उसे चाहती थी. सो फ्रैंड के घर जाते समय उसी ने मुझे ड्रौप किया था, लेकिन संजय ने मुझे उस के साथ जाते हुए देख लिया था.
थोड़ी देर बाहर घूम कर आई तो संजय मम्मी के पास बैठा दिखा. मुझे उसे देखते ही गुस्सा आ गया, लेकिन मेरे आते ही वह उठ कर चला गया. बाद में मम्मी ने मुझे समझाया,  ‘संजय ने मुझे उस लड़के के बारे में बताया है. वह लड़कियों से फ्लर्ट करता है. उस का तुम्हारे स्कूल की 11वीं में पढ़ने वाली रंजना से भी संबंध है. तुम उस से ज्यादा दोस्ती न ही बढ़ाओ तो ठीक है.’ ‘ठीक है मां,’ मैं ने उन्हें कह दिया, लेकिन संजय पर बिफर पड़ी, ‘अब तुम मेरी जासूसी भी करने लगे. मैं किस से मिलती हूं, कहां जाती हूं इस से तुम्हें क्या?’
इस पर वह चुप ही रहा. शाम को मुझे मैथ्स का एक सवाल समझ नहीं आ रहा था तो मैं ने संजय से ही पूछा. उस ने भी बिना हिचक मुझे समझा दिया, लेकिन ज्यों ही वह सुबह की बात छेड़ने लगा मैं ने फिर डांट दिया, ‘मेरी जासूसी करने की जरूरत नहीं. रमेश को मैं जानती हूं वह अच्छा लड़का है और बड़ी बात है कि मैं उसे चाहती हूं. तुम अपने काम से काम रखो.’ कुछ दिन बाद मैं स्कूल पहुंची तो हैरान रह गई. स्कूल में पुलिस आई हुई थी. पता चला कि रमेश और रंजना घर से भाग गए हैं. अभी तक उन का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने पूछताछ वाले लोगोें में मेरा नाम भी लिख लिया व मुझे थाने आने को कहा. पापा दौरे पर गए हुए थे सो मम्मी ने और कोई सहारा न देख संजय से बात की. फिर न चाहते हुए भी मैं संजय के साथ थाने गई. वहां इंस्पैक्टर ने जो पूछा बता दिया. संजय ने इंस्पैक्टर से मेरी तारीफ की. रमेश से सिर्फ क्लासफैलो होने का नाता बताया और ऐसे बात की जैसे मेरा बड़ा भाई मुझे बचा रहा हो. उस की बातचीत से इंप्रैस हो इंस्पैक्टर ने उस केस से मेरा नाम भी हटा दिया. घर आए तो संजय ने मुझे समझाया, ‘ऐसे लड़कों से दूर ही रहो तो अच्छा है. वैसे भी अभी तुम्हारी उम्र पढ़ने की है. पढ़लिख कर कुछ बन जाओ तब बनाना ऐसे रिश्ते. तब तुम्हें इन की समझ भी होगी,’ साथ ही उस ने मुझे दलील भी दी, ‘‘मैं तुम्हारे भाई जैसा हूं तुम्हारे भले के लिए ही कहूंगा.’’
दरअसल, गुस्सा तो मुझे खुद पर था कि मैं रमेश को समझ न पाई और मुझे प्यार में धोखा हुआ, लेकिन खीज संजय पर निकल गई. मेरी इस बात का संजय पर गहरा असर हुआ. राखी का त्योहार नजदीक था सो शाम को आते समय संजय राखी ले आया और मम्मी के सामने मुझ से रमेश के बारे में बताने व समझाने के लिए क्षमा मांगता हुआ राखी बांध कर भाई बनाने की पेशकश कर खुद को सही साबित करने लगा. मैं कहां मानने वाली थी. मैं पैर पटकती हुई बाहर निकल गई. उस ने राखी वहीं टेबल पर रख दी. पापा अगले दिन जम्मू से लौटने वाले थे. मैं और मम्मी घर में अकेली थीं. रात के लगभग 12 बजे थे कि अचानक मुझे आवाज मारती हुई मम्मी उठ बैठीं.
मैं भी हड़बड़ा कर उठी और देखा कि मम्मी की नाक से खून बह रहा था. मैं कुछ समझ न पाई, बस जल्दी से दराज से रूई निकाल कर नाक में ठूंस दी और खून बंद करने की कोशिश करने लगी. इधरउधर देखा, कुछ समझ न आया कि क्या करूं. लेकिन अचानक संजय के कमरे की बत्ती जलती देखी. कल उन का ऐग्जाम होने के कारण वे दोनों काफी देर तक पढ़ रहे थे. तभी मम्मी बेसुध हो कर गिर पड़ीं. मैं ने उन्हें गिरते देखा तो मेरी चीख निकल गई, ‘मम्मी...’ मेरी चीख सुनते ही संजय के कमरे का दरवाजा खुला. सारी स्थिति भांपते हुए संजय बोला, ‘आप घबराइए नहीं, हम देखते हैं,’ फिर अपने दोस्त कार्तिक से बोला कि औटो ले कर आए. इन्हें अस्पताल ले जाना होगा.
औटो ला कर उन दोनों ने मिल कर मम्मी को उठाया और मुझे चिंता न करने की हिदायत दे कर मम्मी को औल इंडिया मैडिकल हौस्पिटल की इमरजैंसी में ले गए. वहां उन्हें डाक्टर ने बताया कि हाइपरटैंशन के कारण इन के नाक से खून बह रहा है. आप सही वक्त पर ले आए ज्यादा देर होने पर कुछ भी हो सकता था. फिर उन्हें 2 इंजैक्शन दिए गए और अधिक खून बहने के कारण खून चढ़वाने को कहा गया. संजय ने ब्लड बैंक जा कर रक्तदान किया तब जा कर मम्मी के लिए उन के ग्रुप का खून मिला. कार्तिक ने ब्लड बैंक से खून ला कर मम्मी को चढ़वाया. सुबह करीब 6 बजे वे दोनों मम्मी को वापस ले कर आए तो मेरी भी जान में जान आई. अब मम्मी ठीक लग रही थीं. संजय ने बताया कि घबराने की बात नहीं है आप आराम से सो जाएं. हम हफ्ते की दवाएं भी ले आए हैं. आज हमारा पेपर है लेकिन रातभर जगे हैं अत: हम भी थोड़ा आराम कर लेते हैं. मम्मी को सलामत पा मैं बहुत खुश थी. मेरे इतना भलाबुरा कहने के बावजूद संजय ने मुझ पर जो उपकार किया उस ने मुझे अपनी ही नजरों में गिरा दिया था. मैं इन्हीं विचारों में खोई बिस्तर पर लेटी थी कि कब सुबह के 8 बज गए पता ही न चला. मैं ने देखा संजय के कमरे का दरवाजा खुला था और वे दोनों घोड़े बेच कर सोए थे.
अचानक मुझे याद आया कि आज तो इन का पेपर है. अत: मैं तेजी से उन के कमरे में गई और उन्हें उठा कर कहा, ‘पेपर देने नहीं जाना क्या?’ हड़बड़ा कर उठते हुए संजय ने घड़ी देखी तो उन की नींद काफूर हो गई. दोनों फटाफट तैयार हो कर बिना खाएपीए ही पेपर देने चल दिए. मैं ने पीछे से आवाज दे कर उन्हें रोका, ‘भैया रुको,’ भैया शब्द सुन कर संजय अजीब नजरों से मुझे देखने लगा. लेकिन मैं ने बिना समय गंवाए उस की कलाई पर वही राखी बांध दी जो वह सुबह लाया था. फिर मैं ने कहा, ‘जल्दी जाओ, कहीं पेपर में देर न हो जाए.’ शाम को जब पापा आए और उन्हें सारी बात पता चली तो उन्होंने जा कर उन्हें धन्यवाद दिया. मैं ने भी पूछा, ‘पेपर कैसा हुआ?’ तो संजय ने हंस कर कहा, ‘‘अच्छा कैसे नहीं होता. बहन की शुभकामनाएं जो साथ थीं.’
अब मैं और संजय अनमोल रिश्ते में बंध गए थे. जहां बिगर दुरावछिपाव के एकदूसरे के लिए कुछ करने की तमन्ना थी. मेरा अपना तो कोई भाई नहीं था सो मैं संजय को ही भाई मानती. स्कूल से आती तो सीधा उस के पास जाती और बेझिझक उस से कठिन विषयों के बारे में पूछती. कुछ ही दिन में संजय के तरीके से पढ़ने पर मुझे वे विषय भी आसान लगने लगे जो अब तक कठिन लगते थे. घर का कोई सामान लाना हो या अपनी जरूरत का मैं संजय को ही कहती. कभी किसी काम से बाहर जाती तो संजय को साथ ले लेती. वह जैसे मेरा सुरक्षा कवच भी बन गया था. कभीकभी लोग बातें बनाते तो संजय उन को भी बड़े तरीके से हैंडिल करता.
एक बार एक अंकल ने कुछ कह दिया तो संजय बेझिझक उन के पास गया और बताया, ‘यह मेरी मुंहबोली बहन है, गलत न समझें. अगर आप की लड़की अपने भाई के साथ जाती दिखे और लोग गलत समझें तो आप क्या करेंगे.’ उन की बोलती बंद हो गई लेकिन फायदा हमें हुआ, अब गली के लोग हमें सही नजरों से देखने लगे. कुछ दिन बाद मेरा जन्मदिन था. मैं काफी समय से पापा से मोबाइल लेने की जिद कर रही थी, लेकिन हाथ तंग होने के कारण वे नहीं खरीद पा रहे थे. मेरे केक काटते ही संजय ने मुझे केक खिलाया और मेरे हाथ में मेरा मनपसंद तोहफा यानी मोबाइल रख दिया तो मैं इसे पा कर फूली नहीं समाई. उस समय नएनए मोबाइल चले थे. मैं खुश थी कि मैं कालेज जाऊंगी तो मोबाइल के साथ. कुछ दिन बाद उन की प्रतियोगी परीक्षा समाप्त हुई तो पता चला कि वे वापस जाने वाले हैं, यह जान कर मुझे दुख हुआ लेकिन मेरी भी मति मारी गई थी कि मैं ने उन का पता, फोन नंबर कुछ न पूछा. बस यही कहा, ‘भूलना मत इस अनमोल रिश्ते को.’
जिस दिन उन्होंने जाना था उसी दिन मेरी सहेली का बर्थडे था. मैं उस के घर गई हुई थी और पीछे से संजय ने कमरा खाली किया और दोनों केरल रवाना हो गए. वापस आने पर मैं ने पापा से पूछा तो पता चला कि उन्होंने भी उस का पताठिकाना नहीं पूछा था. इस पर मैं पापा से नाराज भी हुई. मैं संजय द्वारा बताए गए परीक्षा के टिप्स अपना कर 12वीं में अव्वल दर्जे से पास हुई और कालेज मोबाइल के साथ गई, जिस में हमारे अनमोल रिश्ते के क्षण छिपे थे. फिर कालेज के साथसाथ जब प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगी तो मुझे ज्ञात हुआ कि एनसीईआरटी की किताबें इन में कितनी सहायक होती हैं. तब मुझे अपनी नादानी भरी भूल का भी एहसास हुआ. अब मैं हर साल राखी के सीजन में संजय को मिस करती. जब बाजार में राखियां सजने लगतीं तो मुझे अनबोला भाई याद आ जाता. समय के साथ मोबाइल तकनीक में भी तेजी से बदलाव आया और फोन के टचस्क्रीन और स्मार्टफोन तक के सफर में न जाने कितने ऐप्स भी जुड़े, लेकिन मैं ने अपना नंबर वही रखा जो संजय ने ला कर दिया था, भले मोबाइल बदल लिए. मैं हर बार फेसबुक पर फ्रैंड सर्च में संजय का नाम डालती, लेकिन नतीजा सिफर रहता. कुछ पता चलता तो राखी जरूर भेजती. इस बीच संजय ने भी कोई फोन नहीं किया था. लेकिन अचानक व्हाट्सऐप पर मैसेज देख दंग रह गई. तभी व्हाट्सऐप के मैसेज की टोन बजी और मेरी तंद्रा भंग हुई. संजय ने चैट करते हुए लिखा था, ‘‘नया स्मार्टफोन खरीदा तो पुरानी डायरी में नंबर देख सेव करते हुए जब तुम्हारा नंबर भी सेव किया तो व्हाट्सऐप में तुम्हारा फोटो सहित नंबर सेव हुआ देख मन खुश हो गया.
‘‘फिर फटाफट व्हाट्सऐप पर अपना परिचय दिया. तुम्हें मैं याद हूं न या भूल गई.’’ संजय के शब्दों से मेरी आंखें भर आईं. तुम्हें कैसे भूल सकती हूं निस्वार्थ रिश्ता. अगर तुम न होते तो शायद उस दिन पता नहीं मम्मी के साथ क्या होता. मेरे किशोरावस्था में भटके पांव कौन रोकता. मैं ने फट से मैसेज टाइप किया, ‘‘राखी भेजनी है भैया, फटाफट अपना पता व्हाट्सऐप करो.’’ मिनटों में व्हाट्सऐप पर ही पता भी आ गया और साथ ही  पेटीएम के जरिए राखी का शगुन भी, साथ ही लिखा था, ‘‘इस अनमोल रिश्ते को जिंदगी भर बनाए रखना.’’ मैं ने पढ़ा और अश्रुपूरित नेत्रों से बाजार में राखी पसंद करने चल दी अपने मुंहबोले भाई के लिए.
(बनारस 6अगस्त 2017, रविवार)
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