सोमवार, 5 जून 2017

बनारस के नागरिक होने की हमारी जिम्मेदारी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 5जून 2017

शहर मे उगे कंक्रीट के अव्यवस्थित जंगलो ने प्राकृतिक पेड़ पौधों को लील लिया है.
बनारस मे वाराणसी विनास ( सही पढ़ रहे है आप) प्राधिकरण व नरक निगम (पुन: सही पढ़ रहे है आप) के कृपा के चलते शहर मे एक तुलसी भी लगाने की जगह नही बची है. तालाब, पोखरों को तो छोड़े नाला, नजूल व सरकारी जमीन को कब्जा करा दिया इन दोन विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों ने. फिर फटाफट मकान नंबर भी एलाट कर बिजली, पानी,रासनकार्ड सब कुछ बनवा दिया, बदले मे लखनऊ दिल्ली गाजियाबाद नोयडा के पासकालोनियो मे अपनीआलीशान कोठी खड़ी कर ली. अनादिकाल से जिन्दा शहर बनारस  जीये चाहे मरे, इनके बला से.
अब पर्यावरण दिवस पर प्रचण्ड गर्मी मे 48 डिग्री तापमान पर शहर मे पेड़  लगाने की योजना है, योजना बन गई पर बनारस मे जमीन कहॉ है? कल रात देर तक दो तीन मित्रो से चर्चा होती रही कि गीनिजबुक मे प्लॉटेसन पर अखिलेशी रिकार्ड के तरह इस बार भी मामला हवा हवाई करने की मुकम्मल व्यवस्था कर ली है योगी के अफसरान ने.
चलिये प्लांटेसन के लिये हम जमीन का सुझाव देते है. वरूणा के किनारे दोनो तरफ जो गाद निकाली गई है उस पर सघन वृक्षारोपण किया जाये, गंगा वरूणा, नाद, अस्सी के पेटे को साफ कर उनसे तटबंध बनाये जाये व उन पर वृक्षारोपण हो. अर्दलीबाजार लगायत गोदौलिया लंका,  डीएलडब्लू गेट ककरमत्ता होते हुये मंडुआडीह स्टेशन से रथयात्रा तक. लहरतारा से मंडुआडीह बाजार लगायत ककरमत्ता तक और डीएलडब्लू गेट से चितईपुर चौराहा होते हुये अमरा बाईपास तक पेड़ लगाते हुये उसकी जिम्मेदारी पास के दुकानदारो को अर्थदण्ड के साथ सौंपा जाये.
इसी तरह शहर के अनुदानित विद्यालय परिसर मे भी सघन वृक्षारोपण कर के हम शहर के साथ अपना जीवन स्वस्थपूर्ण बना सकते है.
यह सूची समापन नही है, आप अपने सुझाव जोड़ते हुये इस पोस्ट को शेयर व फारवर्ड करे और बनारस शहर के जिम्मेदार नागरिक होने के साथ खुद के व परिजनो के बेहतरी के लिये आगे आयें.
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पर्यावरण दिवस, जो किया जा सकता है: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 5 जून 2017

क्या सार्वजनिक बसो को समयबद्धऔर पर्याप्त मात्रा मे चला कर प्रदूषण व जाम  रोकने की कवायद नही करनी चाहिये?

आज पूरा देश विशेषकर हमारा शहर जाम व प्रदूषण से परेशान है. आम जनता की तकलीफ है कि चारो तरफ जाम रहता है धूल गर्दा धूप से कही जाना मुश्किल हो गया है, प्रशासन की दिक्कत यह है कि शहर की सड़के सँकरी है लोगो को जल्दी है बेतरीब ड्रइविंग है बेहिसाब गाड़ियॉ है कम संसाधन है उपर से बनारसी भौकाल .
ऐसे मे कैसे नियंत्रित व सहज हो शहर की व्यवस्था?
इस बात को लेकर मीटिंग दनादन हो रही है एसी मीटिंग हाल से लेकर चौराहो के कोने अतरे तक.
पर रिजल्ट सब विकास के पैसे की तरह कहॉ जारगा है पता ही नही.

भाई मेरे, कभी इसका सामान्य सा हल सोचा और पालन किया गया होता तो अपने शहर मे ये समस्या ही नही है.
बनारस की जनता को शहर के चारो कोनो से जोड़ने वाली समयबद्ध व सर्वसुलभ नगर बस प्रणाली से बस जोड़ कर उसे नियमित व बाधारहित चलाने की जरूरत है.
मसलन सारनाथ से डीरेका, शिवपुर से लंका. मडुआडीह से मुगलसराय, कचहरी से राजातालाब, बाबतपुर से राजघाट, सामनेघाट से चौकाघाट के रूट पर हर १० से १५ मिनट पर बस चला कर सड़क पर वाहनो की भीड़ काफी कम की जा सकती है. होना तो यह भी चाहिये कि बस रूट पर रिक्सा आटो व प्राईवेट वाहनो को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाये.( विशेष परिस्थिति व रोगी वाहनो को छोड़ कर )
ऐसा नही है कि यह कार्य संभव नही है, बहुतों को याद होगा कि आज से २०-२५ वर्ष पूर्व बनारस मे सिटी बस की यह व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी.
सच तो यह है कि हम मे से बहुतेरे जाम प्रदूषण और पार्किंग के झंझट के साथ साथ पेट्रोल खर्च व व्यर्थ समय से बचना चाहते है ऐसे मे हमे सरल सुचारू समयबद्ध सस्ती यातायात बस प्रणाली मिले तो हम क्यो अपने जेब पर पेट्रोल व पार्किंग तथा सिर पर धूप व जाम का टेन्सन झेलेगें ?
शहर के यातायात समस्या पर आपके विचार आमंत्रित है. आइये मिल जुल कर सोशल मीडिया के रास्ते से ही से इसका समाधान खोजा जाय.....
(पिछले साल फेसबुक पर लिखी गई पोस्ट, जो आज भी प्रासंगिक है और कल भी रहेगी)
(बनारस, 5 जून 2017)

पर्यावरण दिवस 5जून 2017: व्योमेश चित्रवंश की डायरी

https://plus.google.com/100608441466577197052/posts/Rx7GuRFmi9h?_utm_source=1-2-2

मंगलवार, 9 मई 2017

मेरे जन्मदिन पर मेरे बच्चो के गिफ्ट

https://plus.google.com/100608441466577197052/posts/JaTDKwJ7rqk?_utm_source=1-2-2

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

मानवाधिकार के रहनुमाओं कहॉ हो? व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 अप्रैल 2017, सोमवार )

मानवाधिकार के रहनुमाओं कहॉ हो? व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 अप्रैल 2017, सोमवार )

     I am eagerly waiting for a candle light march from JNU students union in support of Kulbhushan Jadhav who has got stuck in lawless Pakistan.

I am also expecting Kanhaiya Kumar to come out and shout slogan for "Azadi" of Kulbhushan Jadhav.

I AM also waiting for all those politicians and journalists who were in the forefront not so long ago...

Also waiting for the greatest political pimps like Kejrival, shasi and prashant bhushan, Garibon ka case free me लड़ने वाला Jethmalani.

The list is long from Kanhaiya at one end to Barkha dutt at another.

आज वो आजादी-आजादी चिल्लाने वाले भाड़े के छात्र नज़र नहीं आ रहे जब एक बेकसूर को सच में आजादी दिलानी है .

अभी में बैठा बैठा सर्च  रहा था कि पाकिस्तान में भी कोई प्रशांत भूषण, केजरीवाल हैं क्या जो कुलभूषण जाधव के लिए रात के 3 बजे पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट खुलवा दें...

रिज़ल्ट आया "नहीं भाई ऐसे हरामखोर और राष्ट्र द्रोही सिर्फ भारत में ही रहते है.......

क्यों न उन 21 वकील को उठाकर लाहौर फेंक दिया जाए जो कसाब के लिए आधी रात को 2:00 बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवाने गए थे ताकि वो कुलभूषण का केस लड़ सके और मानवता को बचा सके।

कहाँ गया तुम्हारा फवाद
कहाँ गया राहत फ़तेह अली खान
कहाँ गयी अमन की आशा
क्या उन सफ़ेद कबूतरों के टिक्के बना के खा लिए तुमने..

याकूब मेनन की सज़ा रोकने के लिए दया याचिका में हस्ताक्षर करने वाले उन देशद्रोही_कुत्तों को बता दूँ, पाकिस्तान में कुलभूषण के लिए किसी ने दया याचिका दायर नहीं की है...

और कहाँ गयी वो लड़की जो कहती थी कि "pakistan did not kill my dad, the war did"

अजीब है। अब कोई नहीं बोलेगा...
ज़ावेद अख्तर भी चुप है अब तो...
कहॉ हो मानवाधिकार के रहनुमाओं? कुछ तो बोलो?
(इलाहाबाद, 17 अप्रैल 2017, सोमवार)
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रविवार, 16 अप्रैल 2017

रविवार, 2 अप्रैल 2017

नवसंवत्सर 2074 विक्रमी, " साधारण" चैत्र शुकल नवरात्रि : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 अप्रैल 2017, शनिवार

नववर्ष का नव आवाहन
नव संवत्सर नव विहान
पेड़ो पर नवांकुरित होती नव कोंपले
नव ऊष्मा की पछुआ नव बयार
संक्राति को बेध कर नवआदित्य की नव ऊर्जा
आम्रवृक्षो पर ईठलाती नव मंजरियॉ
दौने की पत्तियों से ऊभरती नवसुगंध
नवउत्साह के साथ अलसाया मन
नव संकल्पों का अल्हड़पन
नवरात्रि व्रत से शान्त संकल्पित मन
ब्रह्मबेला मे पक्षियों का नव गुंजारपन
शात्विक विचार, शॉत चित्त
कुछ तो है जो देता है नवचिंतन
भारत के नववर्ष, साधारण नवसंवत्सर में.
      (बनारस, 01 अप्रैल, 2017, शनिवार)
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गुरुवार, 30 मार्च 2017

पब्लिक स्कूलों की मनमानी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 मार्च 2017, गुरूवार

क्या आप ने यह समाचार देखा था?
फिर स्कूल वाले क्यों नही देख रहे, और आप से प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें खरीदवा रहे हैं

Only NCERT books at all CBSE schools

TNN : Feb 16, 2017, 03.00 AM

NEW DELHI: CBSE schools will have to use NCERT textbooks from the 2017-18 academic session. The move to make National Council of Educational Research and Training (NCERT) study materials mandatory for all Central Board of Secondary Education (CBSE) schools across the country is expected to standardise the curriculum across schools in the country.
The decision was taken at a review meeting chaired by Union minister for human resource development Prakash Javadekar.
It is a welcome relief for millions of parents forced by schools to purchase textbooks from private publishers, often at prices 300-600% higher than the NCERT books.
A senior HRD officials said NCERT has been directed to make all the textbooks available, in adequate numbers, through its 680 empanelled distribution vendors across the country by the last week of March, so that the April deadline for the 2017-18 academic session can be met. All the CBSE schools will have to raise their demand online on CBSE's website by February 22, 2017.
The MHRD decision comes after complaints by schools and parents about non-availability of NCERT books on schedule, and also by parents about schools selling expensive books by private publishers. "Many schools have book kiosks on their premises. As well as selling exorbitantly priced textbooks from private publishers, these shops sell 'bundle packs' that include pencils, erasers, and other stationery, which would cost a lot less for parents in the open market. We have also noticed that private publishers are sponsoring several school heads on junkets to countries like Switzerland," a senior HRD official said.
A CBSE official said that based on the mandatory disclosure of its schools, the board has an accurate estimate of the quantum of NCERT textbooks necessary for Classes I-XII for any academic session.
"We now know the number of students a school has class-wise, rather than section-wise. As schools raise their demand online, we will know whether they are requisitioning for adequate number of books. The numbers may vary, as March is also a month of admissions. But the schools are expected to factor this in their purchases. CBSE will also monitor the annual subscription by schools," the official said.
कल बच्चो के स्कूल खुलने वाले हैं, बच्चो ने दबाव बना रखा है नई किताबों के लिये. उनका उत्साह जायज है पर उनका यह उत्साह हमे आर्थिक रूप से हतोत्साहित करने वाला होता है, कमेबेस आप सब के साथ होता होगा.
      ऊपर से कोढ़ मे खाज यह कि इस बार  स्कूल ने बुकलिस्ट नही दिया इसके पीछे उनका सधा कारण कि अभिभावक बच्चों की किताबें उन विशेष दुकानों से या स्कूल के अंदर बने दुकानो या स्टाल से खरीदें जिन्हे स्कूल ने पुस्तक के नाम पर अभिभावकों को मनमाना लूटने का अधिकार दिया है. मेरे बच्चों के विद्यालय मे बुकशाप है. वो भी स्थाई. हाईकोर्ट सुप्रीमकोर्ट सब ने विद्यालय परिसर के अंदर की दुकानो को बंद करने को कहा पर बच्चों के हित मे माल ऐंठने के लिये वे सारे आदेश ठेंगे पर ही रहे.
विद्यालय का समय बीत जाने के बाद उसी दुकान संचालकों की एक दुकान बाईपास मोड़ पर गिसटबाजार मे चलती है.
बहरहाल बात मुद्दे की, शाम को मै बच्चे को लेकर किताबे खरीदने पहुँचा तो दुकान पर संचालिका व उसके दोनो बच्चे जबर्दस्त मेहनत करते हुये ग्राहकों को निपटा रहे थे. एक सज्जन का बिल 11677 रूपये का बना था, वो बेचारे अपना पर्स झाड़झूड़ कर 11675 रूपये दे रहे थे पर दुकान संचालिका बार बार यह कह कर उसे लेने से इंकार कर रही थी कि" सर बहुत घाटा हो जायेगा, आप ऐसा करें कि एक किताब छोड़ दीजिये बाद मे लेते जाईयेगा." वो बेचारे समझ नही पा रहे थे कि 2 रूपये के लिये इतनी जबर्दस्त जिद. मै काफी देर से यह झिकझिक देखने के बाद उस सज्जन से अनुरोध किया कि " भाई साहब, आप मुझसे 2 रूपये ले लिजिये, जिन्दगी के किसी मोड़ पर मिलने पर इसका हिसाब हम लोग कर लेगें" , बेचारे मरता क्या न करता वाले स्थिति मे उनके पास शेष कोई चारा भी नही था, पर उनकी वह कृतग्यता भरी ऑखे मुझे जितना संतोष दे रही थी वही दुकान संचालिका की 2 रूपये के लिये थोथी जिद उतनी ही पीड़ा व क्रोध. क्या मानवता मे संवेदनशीलता इस हद तक शून्य हो चुकी है कि हम 11000 रूपये की खरीद बिक्री पर 2 रूपये के लिये समझौता नही कर सकते?
      मैने अपने बच्चे का स्कूल व कक्षा बताते हुये किताबें पूछा तो दी गई सारी किताबें प्राइवेट पब्लिकेशन की थी , अब चौंकने की बारी मेरी थी, मैने प्रकाश जावड़ेकर साहब के उपरोक्त आदेश को बताते हुये सीबीएससी के दिशानिर्देश का जिक्र किया तो दुकान संचालिका ने कहा कि " सर हो सकता है स्कूल वालों को उस आदेश का पता न हो. उन्होने हमसे तो यही बुक्स बेंचने को बोला है"
      मै अभी तक यह नही समझ पा रहा हूँ कि सीबीएससी के गाईडलाईन मे जब यह तथ्य स्पष्टतः उल्लिखित है कि सीबीएससी स्कूलों मे केवल एनसीईआरटी की किताबे चलेगी तो ये प्राईवेट स्कूल वाले जबरन क्यों प्राईवेट पब्लिकेशन की किताब खरीदवा कर हम अभिवावकों को बेवकूफ बना रहें है.
क्या वो जानना नही चाहते, या हम खुद ही बच्चो के मोह मे इस खबर से जानबूझकर अनजान बने हुये हैं
सोचियेगा जरूर.
(बनारस, 30 मार्च 2017 गुरूवार)
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सोमवार, 27 मार्च 2017

पब्लिक स्कूल मालामाल, हम आप बेहाल : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28 मार्च 2017, सोमवार

क्या आपने कभी सोचा है?

पब्लिक स्कूलों मे पाठ्यपुस्तकों की सूची नही दी जाती क्योंकि अभिवावक कमीशन वाली दुकान के अतिरिक्त कहीं और से किताब न खरीद सकें.
मेरे एक मित्र ने बताया कि जो किताबे हम पब्लिक स्कूलों के कमीशनदात्रि दुकानों से दाम के दाम पर खरीदते है वे दिल्ली के पब्लिकेशन मार्केट मे छपे दाम से 40% कीमत पर मिल जाती है.
यानि नफा 60% . शुद्ध

पूरे मामले को एक उदाहरण से समझते है
बनारस के एक जाने माने पब्लिक स्कूल मे चलने वाली कक्षा 1 को लेते है. कुल 4 सेक्शन, एक सेक्शन मे 60 छात्र, यानि कुल 240. प्रवेश शुल्क मात्र 12000/-  एवं पुस्तक मूल्य 3600/- कापीयॉ कवर सहित 1200/- यानि कुल 16800/-
बाकी सब को छोड़ केवल किताबों की ही चर्चा करें, 3600 रूपये की किताबो का वास्तविक मूल्य 1440/- मात्र, लाभ 2160/- दुकानदार ने स्कूल को कमीशन दिया बिक्री मूल्य का 30% यानि 1080/- रूपये.

कापियों के लिये तो अगर आप दिल्ली के बजाय कर्णघंटा चले जायें तो 1200/- वाली कुल कापियॉ आपको खुदरा मूल्य पर 720 से 780 रूपये मे मिल जायेगीं, यदि इसे रूपये 800/- भी मान ले तो दुकानदार का फायदा 400/- स्कूल को कमीशन गया 200/- रूपये.

यानि बैठे बिठायें, बिना हाथ पैर चलाये, बिना कुछ किये, बिना टेंसन के स्कूल के संचालक को 1280/- प्रति छात्र मिल रहा है. 1280 गुणा 240 कुल हुये 3,07,200/-

यह केवल कक्षा 1 का उदाहरण लिया गया है, बाकी कक्षाओं मे जैसे जैसे ऊपर चलेगें कमीशन की कमाई बढ़ती जायेगी. जो लगभग  50,00,000/- पचास लाख तक प्रतिवर्ष हो जाती है और यह विशुद्ध रूप से पब्लिक स्कूलो की काली कमाई है.

ड्रेस, बैग, जूता,  बेल्ट, टाई,  स्पोर्ट्स किट जैसे बाकी ताम झाम से अलग कमाई होती है जिसकी बेहिसाब कमाई अलग.

कोई रोक टोक नही....
http://chitravansh.blogspot.in(बनारस, 28 मार्च 2017, सोमवार)

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

बनारस की बेपटरी यातायात व्यवस्था : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 23 मार्च 201


             आज शाम मध्य शहर जाना हुआ. स्पष्ट करता चलूँ कि हम बनारस के वरूणापार के लोग जब लहुराबीर चौक गोदौलिया क्षेत्र मे जाते है तो कोई निहायत ही जरूरी काम होने पर,  नही तो हम लोगो के लिये पक्का महाल व मध्य बनारस वैसे ही हो गया है जैसे जंगल से आये भकुआये अचकचाये जन्तू के लिये बिना पेड़ पौधे वाला धूऑ उड़ाता, भागाभागी के बीच कंक्रीट का अजायबघर.
शहर वालों की सोच  अलग हो सकती है क्योंकि उनके नजर मे हम वरूणापार के लोग प्रधानमन्त्री मोदी के संसदीय क्षेत्र मे रहते हुये भी जंगल व गॉव के लोग है.
अपना अपना नज़रिया.
बहरहाल बात आज शाम की, गोदौलिया से लहुराबीर की ओर बढ़ा ही था कि भयंकर जाम. जाम भी ऐसा जो 50 मीटर आगे खाली दिख रहा था. कारण पता चला कि दो बैटरी चलित आटोरिक्सा वालों मे सवारी को लेकर कुछ टनन मनन हो गया है और वे एक दूसरे से आगे बढ़ने के डौड़ ने सबका आगे बढ़ना रोक दिये है. जब से मोदी जी ने बनारस मे बैटरी चलित कुछ रिक्से क्या बॉटे, दिन दूने रात चौगुने की स्पीड से बैटरी वाले रिक्से की संख्या बढ़ गई और उसकी दूगुनी स्पीड से बनारस मे जाम बढ़ गया. बिना परमिट के बिना ड्राइविंग लाइसेंस के जिस धाकड़पने से बैटरी रिक्सा वाले शहर के प्रतिबन्धित इलाको मे बिना किसी नियम कानून के चल रहे है उनसे आप खुद को बचाना चाहे तो बचाये आप को लगने वाले चोट चपेट से उन्हें कोई फर्क नही पड़ने वाला.
थोड़ी सी और आगे जाने पर कई दशकों से गंगा सफाई के नाम पर शाही नाले के नाम पर सड़क के बीचोबीच डिवाईडर से लगा कर मोटी मोटी पाईपो से सड़क का छ: से सात फीट घेर लिया गया है. बची हुई सड़क पर मोमोज, चाट से लेकर रिकिम रिकिम की दुकानो ने आधा घेर लिया. बाकी बची सड़क  पर खड़ी बेतरीब कारें व मोटरसाइकिल इस बात की जीवन्त प्रमाण है कि उन्होने वाहन पंजीकरण के समय जमा किये गये रोडटैक्स का भरपूर उपयोग करना सीख लिया है. जाम मे उलझा ही था कि मोबाइल ने घंटी मारना शुरू कर दिया, यह मोबाइल भी अक्सर गलत समय ही घंटी मारता है,  योगी जी के एण्टी रोमियो स्क्वायड के माफिक.
तभी बिना मोटरसाइकिल के हेलमेट पहने एक सिपाही जी सड़क पर लगी पटरिया दुकानदारों से प्रति दुकान 100/- लेते दिखे.  आश्चर्य हुआ कि जब पूरा पुलिस अमला डीजीपी लगायत दिवान तक टीवी कैमरे के साथ घूम घूम कर शेहदे पकड़ कर नाम कर रहे है तो ये यहॉ पर वसूली कर रहा है, जबाब पता चल गया है कि यह सड़क पर दुकान लगाने का रोजही लाईसेंस शुल्क है जुसके बदले केवल जुबाानी अनुमति पत्र है.
हम बनारस मे हर साल सुनते है कि सड़क पर अतिक्रमण होने पर जिम्मेदारी व जबाबदेही संबधित थाना प्रमुख होगे पर इतने वर्षों से हमने अतिक्रमण के लिये कभी किसी थाना प्रमुख को जिम्मेदार होते व उसके विरूद्घ कार्यवाही होते भी नही देखा.
कुल 4 किमी की दूरी  बाईक से 1घंटे 40 मिनट मे तय कर घर पहुँचने के बाद सोच रहा हूँ कि शहर मे जाकर गलती किया या शहर मे रह कर ..........
(बनारस, 23 मार्च 2017, गुरूवार)

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

बनारस शहर दक्षिणी की चुनावी चर्चा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 25 फरवरी 2017, शनिवार

आरिफ भाई मेरे अच्छे मित्र है, कल उनसे चुनाव प्रचार के दौरान मुलाकात हुई.
आज उन्होने उस मुलाकात का हवाला देते हुये वाट्सऐप्प पर एक संदेश लिखा है. अच्छा लगा.
कापी पेस्ट कर रहा हूँ

डॉ0 नीलकण्ठ के विधायक होने के मायने

    बनारस शहर दक्षिणी से युवा अधिवक्ता डॉ0 नीलकण्ठ तिवारी भारतीय जनता पार्टी से चुनाव मैदान मे है. मै मो0 आरिफ सिद्दकी न तो भाजपा का कार्यकर्ता हूँ, न राजनीतिक व्यक्ति, पर मै डॉ0 नीलकण्ठ का समर्थक हूँ, कुछ लोगो को यह अटपटा लग सकता है पर मुझे लगता है वे ऐसे लोग है जो नीलकण्ठ को नही जानते. ऐसे लोगो को व्यक्ति की पहचान उसके मजहब से, उसके नाम से करने की आदत है. क्योंकि जहॉ तक मै नीलकण्ठ को जानता हूँ वे जहॉ भी रहे जिसके साथ रहे ईमानदारी के साथ रहे. चाहे वे छात्र नेता के रूप मे हो, चाहे वे संघ कार्यकर्ता के रूप मे हो, चाहे अधिवक्ता के रूप मे हो. जब डॉ0 नीलकण्ठ हमारे सेण्ट्रल बार के अध्यक्ष थे तब उनके लिये अधिवक्ता हित सर्वोपरि था अब जब वे शहर दक्षिणी के विधायक होगें तो वहॉ की जनता के हित को सर्वोपरि रखेगें, कल शाम दक्षिणी क्षेत्र के पियरी मोहल्ले मे ही हमारे मित्र व्योमेश चित्रवंश, एडवोकेट मिल गये, व्योमेश भाई को करीब से जानने वाले ही उनका प्रभाव व पहुँच जानते है अन्यथा वे अपने मे अलमस्त व फक्कड़ रहते है, अपनी विचारधारा अपने संपर्को मे़, वरूणा नदी के पुनरुद्धार के बारे मे रूचि रखने वालों को पता है कि पंद्रह वर्षों से वरूणा के पुनर्जीवन व पुनरुद्धार के संघर्ष की शुरूआत से लेकर आज तक के कार्यकम के पीछे व्योमेश भाई ही है बिना अपना नाम दिये बिना हो हल्ला किये.
बहरहाल ऱाजनीतिक रूप से भाजपा से जुड़े व्योमेश भाई  चार पॉच लोगो के साथ डॉ0 नीलकण्ठ के बारे मे प्रचार करते मिले पूछने पर बताया कि  "नीलकण्ठ की ईमानदारी व निष्ठा बेदाग है. वकालत मे भी वे जहॉ रहते है पूरे मन से रहते है,और वकील की यही निष्ठा ही उसे चरित्रवान बनाती है.  भले ही लोग कह रहे हो कि सात बार से विधायक को प्रत्याशी न बनाना गलत है पर मुझे लगता है कि नीलकण्ठ को अवसर मिलेगा तो वे भी अपनी ईमानदारी निष्ठा व मेहनत से सात को बढ़ा कर नौ तक ले जा सकते है. मध्यवर्गीय परिवार से उठे नीलकण्ठ की सारी उपलब्धि उनकी स्वयं की है और यही लोकप्रियता उन्हे लखनऊ पहुँचायेगी."
व्योमेश भाई उन लोगों मे से नही है जो किसी की मुँहदेखी बतियाते हो न ही उन्हे किसी को अपना योगदान दिखाने की आदत है, इसलिये मुझे उनकी बातो मे वजन दिखता है, और मुझे अब पूरा विश्वास है कि बनारस कचहरी इस बार प्रदेश को एक और विधायक देने जा रही है.
बस आप सब अपने ईरादे मजबूत रखें.
        ----- मो0 आरिफ सिद्दकी, एड0
            चैम्बर नं0 12 ए, सेण्ट्रल बार
              वाराणसी सिविल कोर्ट
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सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

आत्मकथा मे श्रीमद्भागवतगीता व गीता दर्शन, डॉ0 वशिष्ठ सिंह जी के सुखद संस्मरण के बहाने : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 फरवरी 2017, सोमवार

               पिछले दो सप्ताह से परम आदरणीय डॉ0 वशिष्ठ सिंह जी आत्मकथा पढ़ रहा हूँ, बल्कि पढ़ने के साथ साथ समझने व आतमसात करने का प्रयास कर रहा हूँ. डॉ0 वशिष्ठ सिंह हमारे अध्यापक व गुरू रहे है अध्यापक के ऱूप मे उन्होने हम लोगो को विषय ज्ञान  दिया तो गुरू के रूप मे जीवन के गूढ़तम समस्याओं से निपटने व सरलता सहजता व संयमता से जीने का व्यवहारिक सोच व दृष्टिकोण. वशिष्ठ सर आज के उन कुछेक गिनेचुने लोगो मे से है जिनकी कथनी व करनी मे कोई अंतर नही है. मऊ जनपद के पलिया गॉव के एक समृद्धिशाली परिवार मे जन्म लेने के बावजूद विमाता के हस्तक्षेप के कारण हाईस्कूल के बाद से ही पढ़ाई के लिये लगातार संघर्ष में मित्रों, शुभचिंतको के सहयोग से एम ए गणित तक की शिक्षा फिर मऊ से कलकत्ता से लेकर यूपी कालेज मे नौकरी प्राप्त करने तक उनकी संकल्पशक्ति हमेशा हम सब के लिये प्रेरणादायक रहेगा. डॉ0 वशिष्ठ सिंह के आत्मकथा को पढ़ कर उनके जीवन व कार्योे  के पीछे छिपे बेहद निजी रहस्यों का पता चलता है जैसे उनके द्वारा बनारस मे वाईएमसीए कोचिंग की शुरूआत क्यों की गई और कई एक वर्षों तक सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँच कर बंद कर दी गई? सर द्वारा कालेज मे क्यो कभी लाभ का पद नही लिया गया? और सर हमेशा समयपाबंदी को ले कर इतना कठोर क्यों रहते थे? इन सब के पीछे छिपे कारणों को उन्होने स्वयं जीया है, उसका सुख एवं पीड़ा महसूस किया है. बेहद सहज भाव से गॉव के संपत्ति संघर्ष मे स्वयं के अंदर अहंकार आने की स्वीकरोक्ति, फिर कालेज के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष मे योगदान, आजादी बचाओ आंदोलन मे प्रो0 बनवारी लाल शर्मा जी के आदेश को सिरोधार्य कर अपने स्तर से योगदान व नेतृत्व सब कुॉछ बेहद ईमानदारी से पिरोते गये है सर. कहीं पढ़ा था कि व्यक्ति स्वयं के बारे मे लिखते समय थोड़ा सा संकीर्ण व आत्ममुग्ध हो ही जाता है पर वशिष्ठ सर के आत्मकथा मे ऐसा कही बोध नही होता. हमने उनसे खुद के बारे मे जो सुना है वही देखा है और वही आत्मकथा ने पढ़ा भी है. सही अर्थो मे उनके कथनी व करनी मे कोई अंतर नही है. मनसा वाचा कर्मणा एक ही वास्तविक जीवन को जीते हुये उन्होने स्वयं को जीया है, वही बताया है, वही लिखा है. एक उदाहरण देना चाहूगॉ, बहुतेरे लोग कहते है कि जीवन के इस पड़ाव पर सन्यास ले लूगॉ, या यह कर्तव्य पूर्ण होने पर सांसारिक जीवन के आपाधापी से स्वयं को विमुख कर लूगॉ, पर उनका वह पड़ाव कभी नही आता, एक के पश्चात दूसरी मृगतृष्णायें उन्हे बॉधी रहती है पर वशिष्ठ सर ने अपने कहे अनुसार 75 वर्ष की आयु होने पर स्वयं को मृगतृष्णाओं व जिजीविषाओं से निर्विकार कर लिया है. श्रीमद्भागवत गीता को आदर्श ही नही जीवनदर्शन व कर्तव्य के रूप मे स्वीकार करते हुये संपूर्ण जीवन वशिष्ठ सर ने ईश्वर की ईच्छा व निर्देशन मान कर जीया है कदाचित् इसीलिए उन्होने अपनी आत्मकथा के परिचय मे लिखा भी है कि " व्यहार मे ऐसा देखा जाता है कि कुछ व्यक्ति स्वप्न ही देखते रहते हैं, कुछ व्यक्ति स्वपनो को साकार करने के लिये प्रयत्नशील रहते है, परन्तु कुछ भाग्यशाली व्यक्ति स्वप्नो को साकार भी कर लेते हैं. मेरी स्थिति इन सभी से बिलकुल भिन्न है क्योकि  मैने इस प्रकार के कार्य की न तो कभी पहले योजना बनाई थी और न तो कभी इसका स्वप्न ही देखा था. यह ईश्वर का मेरे ऊपर अनुग्रह ही कहा जा सकता है कि उन्होने मेरी क्रियाशीलता, अभिरूचि और आन्तरिक भावनाओं को लक्ष्य कर मुझे इस कार्य के लिये प्रेरित किया .
वशिष्ठ सर ने अपनी जीवन यात्रा के तीन प्रकार से देखते हुये यह आत्मकथा लिखी है और यह तीन महत्वपूर्ण भाग है उनके आत्मकथा के. व्यक्तिगत जीवन मे उन्होने अपने पारिवारिक जीवन का संघर्ष, अध्ययन के लिये संघर्ष व इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र जीवन, नौकरी के लिये कलकत्ता से वाराणसी तक की यात्रा, यू पी कालेज मे अध्यापन के दौरान काहिविवि से शोधकार्य, फिर टाटा इंस्टिट्यूट आफ फण्डामेण्टल रिसर्च मे ओरियेण्टेशन कार्यशाला, पारिवारिक जिम्मेदारियोंं को पूरा करने ते लिये वाईएमसीए कोचिंग का संचालन फिर उन पारिवारिक जिम्मेवारियो के पूरा होते ही लोकप्रियता के शिखर पर चल रही कोचिंग को बंद कर देना जैसे कार्यो के वर्णन वशिष्ठ सर ने बेहद ईमानदारी से करते हुये अपने निष्काम कर्मयोगी होने काे दर्शाया है. यद्यपि वे कहीं भी मनसा वाचा कर्मणा स्वयं को कर्मयोगी होने का दावा नही करते पर उनको करीब से जानने  वाले उनके निष्काम कर्मयोग से भली भॉति परिचित है.
    दूसरे भाग मे उन्होने अपने व्यवहारिक जीवन मे आये उन महान व्यक्तियों के बारे मे चर्चा  व संस्मरण किया है जिनसे वे प्रभावित रहे है. इन महान व्यक्तित्वो मे प्रो0 बनवारी लाल शर्मा, प्रो0 जानकीप्रसाद द्विवेदी, रामअशीष सिंह, जगदीश सिंह के साथ साथ अपने जीवन को आध्यात्मिक दिशा देने वाले वाले स्वामी स्वतंत्रानन्द, स्वामी कृष्ण प्रेमानन्द सरस्वती, स्वामी परमानन्द, श्री श्यामचरण दास, स्वामी धर्मनीधि, स्वामी सुरेशानन्द, श्री नरेन्द्र रामदास व राष्ट्रसंत श्री रामेश्वर जी के साथ बिताये संस्मरण व जिग्यासा समाधान का वर्णन है.
      आत्मकथा के तीसरे भाग मे श्री मद्भागवत व उससे प्रेरित हो कर विभिन्न जीवन मूल्यो का उल्लेख है. वशिष्ठ सर ने संपूर्ण जीवन मे श्री मद्भागवत का अनुशीलन ही नही किया बल्कि उसे जीया भी है. जीवन के दैनिन्दिन कार्यों से लेकर जीवन मूल्यों के संघर्षो मे, चाहे वह यू पी कालेज प्रबंधन का मसला रहा हो या आजादी बचाओ आंदोलन उनके नित कार्यों मे श्री मद्भागवत की प्रेरणा परिलक्षित होती है. उसी प्रेरणा के अन्तर्गत अपने आत्मकथा के तीसरे व आध्यात्मिक खण्ड मे उन्होने गुरू : गुरुतत्व, गीता के संबध मे स्वामी विवेकानंद, डा0 ऐनी वेसेण्ट, लोकमान्य तिलक, हक्सले,महात्मा गॉधी, अरविंद के साथ महामना मालवीय के विचारो के साथ गीता , उपनिषद, मनुस्मृति के परिप्रेक्ष्य मे धर्म, मानवधर्म, मन,योग, बुद्धियोग, कामना, ईच्छा, स्वभाव तथा स्वधर्म, कर्म - विकर्म- अकर्म, कर्ता, अनासक्ति-असंगता, यग्य भावना, ग्यान विग्यान,स्थितप्रग्य -दर्शनव परम पुरूषार्थ, परम लक्ष्य को वैग्यानिक तरीके से सरलतम शब्दों मे समझाया है.
      इन आयामों को सहज भाव से समझने व समझाने के पश्चात लगभग 105 पृष्ठों मे श्रीमद्भागवतगीता को सार रूप मे समझाते हुये सार रूप मे उन्होने गीता को जिस सहज भाव से समझा है वही लिखा है. पुन: गीता के व्यवहारिक प्रयोग के रूप मे ऊँ की साधना, भागवत पुराण, गीता व भागवत का लक्ष्य, भगवान की बाल लीलाओं का रहस्य का वर्णन करते हुये वे स्वयं बालहृदय भाव से भक्तिरस मे डूब गये हैं और इसी लिये उनकी आत्मकथा परम्परागत रूप से  समाप्त न हो कर भक्ति रस के पात्रो के उपाख्यानों से समाप्त होती है.
    कुल मिला जुला कर डॉ0 वशिष्ठ सिंह जी की आत्मकथा " मेरी जीवन यात्रा : एक सुखद संस्मरण"  एक सहज सरल व सत्य अभिव्यक्ति है जो आत्मकथा लिखने मे स्वाभाविक सहज दोष, आत्मप्रवंचना, आत्मप्रशंसा से दूर दोष रहित कृति है. यह हम सबको उनके विद्यार्थी होने के साथ साथ शिक्षार्थी होने का भाव जगाती है. आज भी वे अपनी प्रवृत्ति के अनुसार समाज पर उनका विशेष ध्यान है और वे कई ट्रस्ट स्थापित कर सामाजिक विविध कार्यो मे योगदान दे रहे हैं. चिदानंद रूपं शिवोहम शिवोहम.
(बनारस, 20 फरवरी 2017, सोमवार)
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