आज फ़िर न्यूयार्क की बारिस भरी सुबह
मै ब्लू अंजिल बिल्डिंग के सोलहवें मेल की खिड़की पर बैठा
आँखे देख रही है चौडी कलि सडको पर पड़ती वर्षकी बुँदे
पर मन कही दूर , सैट समुंदर पार अपने भारत में
मै सोच रहा हूँ ऐसी रिमझिम बारिस हो रही होगी मेरे आँगन में
मेरे देश की मति पर
और महक रहा होंगा भारत मई का प्यार
सोंधी सोंधी महको में
छलक कर बह रहा होगा मई का दुलार
मगर मै इतने दूर परदेश में बैठा बस सोच रहा हूँ
हे मई मुझे बुला ले वापस अपने आचल में
मै फ़िर फ़िर खो जाना चाहता हूँ
तेरी ममता भरी गोंड mएन
जिसमे खेल कर इतना बड़ा हुआ हूँ मै
माँ मै आ रहा हूँ , मै आ रहा हूँ.
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
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गुरुवार, 8 जनवरी 2009
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