देखा था एक ख्वाब कल रत नीद में
जीता हु होंगे सच , बस इस उम्मीद में
जो जिंदगी के ख्वाब हकीकत न बन सके
यादो के उस जहर को हम कैसे पी सके
आएगी उनको याद कभियो मेरे साथ की
सोचेंगे कैसे है वो मेरे रकीब में
यूँ जिंदगी में अक्सर तनहा रहा हु मै
बिखरने के ही ख्याल से लड़ता रहा हूँ मै
जीवन की डोर अब रुक जाती है बार बार
तमन्ना है उनको देखे अपने करीब में
हर ओरसे जब टूट मुझे मिला एक आसरा
उनको ही प् के साथ मुझे कुछ सुकून मिला
लेकिन ये जख्म मुझको लगना था अभी व्योम
कोई बंधा है पहले से उनके नसीब में
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
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शुक्रवार, 19 सितंबर 2008
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