गुरुवार, 19 अगस्त 2021

व्योमवार्ता/धर्म बनाम आधुनिकता को समझने की जरूरत: रंगनाथ सिंह की फेसबुक वाल से

व्योमेश चित्रवंश की डायरी , 19अगस्त 2021 गुरूवार

                   दुनिया का असली वैचारिक संघर्ष धर्म बनाम आधुनिकता का है। जिसे हम यूरोपीय नवजागरण कहते हैं उससे इसकी शुरुआत मानी जाती है। यह महज संयोग नहीं है कि जिस वक्त यूरोप में नवजागरण चल रहा था लगभग उसी समय बनारस में बैठे कबीर मुल्ला-पण्डा के पाखण्ड की कलई खोल रहे थे। बुद्ध तो कबीर से भी दो  हजार साल पहले यह कर चुके थे।

नवजागरण की एक पँक्ति की परिभाषा यह है कि उससे पहले दुनिया के केंद्र में ईश्वर था। नवजागरण ने दुनिया के केंद्र में मनुष्य को स्थापित किया। ईश्वर खुद तो कभी दुनिया में आकर कोई गवाही नहीं दे गया लेकिन उसके नाम पर चलायी जा रही दुकानों (जिन्हें हम धर्म कहते हैं) ने दुनिया भर के कुकर्म ईश्वर के नाम पर किये। ईश्वर ने कभी दुनिया में आकर यह नहीं कहा कि ये हमारे मिडिलमैन रहेंगे लेकिन कई सज्जनों ने खुद को ईश्वर का बिचौलिया या कुछ ने तो खुद को ईश्वर ही घोषित कर दिया। 

ऐसा नहीं है कि यह काम आज नहीं होता। दुनिया के किसी भी हिस्से के किसी भी कालखण्ड के किसी भी 100 साल का इतिहास उठा कर देख लीजिए आपको एक ऐसा आदमी मिल जाएगा जो खुद को ईश्वर या ईश्वर का बिचौलिया बताता है। आदिवासियों तक में ऐसे ओझा मिलते हैं। 

ईश्वर है या नहीं यह तो बहस कभी निर्णायक बिन्दु पर नहीं पहुँचेगी लेकिन यह साफ है कि किसी एक धर्म या उसके ध्वजाधारी के पास ईश्वर का ठेका-पट्टा नहीं है। नवजागरण ने इतना तय कर दिया कि दुनिया के ज्यादातर संस्थागत धर्मों में बहुत सा अधकचरापन या पिछड़ापन है। धार्मिकों किताबों में दिये झूठ बेनकाब किये जाते रहे। वोल्टेयर जैसे लोगों की ख्याति इसी बात के लिए थी कि उन्होंने चर्च और पादरी के पाखण्ड को तार-तार किया। हालाँकि वो  कबीर के बाद पैदा हुआ था।  

विडम्बना यह है कि ईश्वर की आस्था मनुष्य के लिए इतनी बुनियादी चीज है कि धार्मिक धूर्तों का शिकार बनने का बीज उसके अन्दर हरदम मौजूद रहता है। इस बुनियादी प्रवृत्ति के चलते ही वह जरा सा असावधान या असंतुलित होते ही आधुनिकता के सारे लाभ और ज्ञान हासिल करने के बाद भी धार्मिक पाखण्डियों के चरणामृत पीने लगता है। 

सोशलमीडिया पर ही देखा है कि ब्रिलिएंट लोग, जो आईआईटी-आईआईएम जैसे संस्थानों से पढ़े हैं किसी संदिग्ध स्थिति में दसवीं-बारहवीं पास उन्मादी के फॉलोवर हैं क्योंकि वो उनकी धार्मिकता का शोषण करना जानता है। यही चीज दूसरे के धर्म में होती है तो हमें तुरन्त समझ में आ जाती है। अच्छे इदारों से पढ़े लिखे नौजवान इस्लामी जिहादी बन रहे हैं यह हमें आसानी से दिख जाता है। मदरसे में कुरान रटने वाला आदमी डॉक्टर-इंजीनियर-प्रोफेसर-पत्रकार को अपनी मर्जी पर चलाने लगता है क्योंकि वह उनकी धार्मिक पहचान का शोषण करना जानता है।   

आप भले ही भौतिकी, रसायन, दर्शन, गणित, इतिहास इत्यादि के ज्ञाता हों कोई मूढ़ संस्कृत के चार श्लोक बोलकर आपको अपने कंट्रोल में ले सकता है। आप कठपुतली की तरह उसके इशारे पर नाचने लगते हैं। गीता या वेद में ऐसा कुछ नहीं लिखा है जिसके बिना मनुष्य सुखी जीवन न जी सके। सच यही है कि करोड़ों भारतवासी इनसे परिचित हुए बिना ही दुनिया से गुजर जाते हैं। अरब मुल्कों के बाहर कुरान की अरबी समझने वाल दो प्रतिशत भी शायद ही हों। कुरान के तर्जुमों पर हजार साल से बहस जारी है तो सोचिए कि जिन लोगों को ढंग से हिन्दी तक नहीं आते वो क्या ही कुरान समझते होंगे और वो कौन सा इस्लाम जानते होंगे। वो वैसे ही अरबी आयतें याद कर लेते हैं जिस तरह हम में से बहुत से लोग संस्कृत जाने बगैर कई श्लोक याद कर लेते हैं। 

संस्कृत में एक गनीमत यह है कि हिन्दी या अन्य कई भाषाएँ उससे सम्बन्धित हैं तो हम कई शब्दों से परिचित होते हैं। अरब मुल्कों के बाहर अरबी किसी की जबान नहीं न उन जबानों का अरबी से कोई सीधा नाता है तो आप सोचें कि उन जबानों के लोगों के लिए कुरान का क्या मतलब हुआ? हमारे आसपास जितने भी इलीट मुसलमान मोटी पगार लेकर सोशलमीडिया पर धर्म की ध्वजा फहरा रहे हैं उनका सारा अधकचरा ज्ञान अंग्रेजी अनुवाद से आता है। कल ही देखा कि फैजान मुस्तफा जैसा कानुनविद तालिबान को सच्चा इस्लाम पढ़ा रहा था। दुर्भाग्य है कि फैजान साहब यह स्टैण्ड नहीं ले सके कि कुरान या हदीस की जो बात आधुनिकता की मेयार पर खरी नहीं उतरती उसे हम नहीं स्वीकार करेंगे। 

विडम्बना देखिए जिन लोगों ने अरबी मदरसे में सालों साल कुरान-हदीस पढ़ी है, शरिया कानून लाने के लिए बन्दूक उठाकर जान की बाजी लगा रहे हैं उन्हें एक अंग्रेजीदाँ सूटेड-बूटेड लॉ प्रोफेसर बताना चाह रहा है कि 'असल' इस्लाम क्या है?  आम इंसान आप वाले असल को असल मानेगा या उनके?

फैजान मुस्तफा को बाबासाहब आम्बेडकर से सीखना चाहिए। भारत में मनुस्मृति की कभी वो जगह नहीं रही जो ईसाइयों के लिए बाइबिल की थी और मुसलमानों के लिए कुरान की। मनुस्मृति को हिन्दुओं के धार्मिक आचार का आधार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ईसाई जजों-अफसरों ने बनाया क्योंकि उनकी जिद्दी मूढ़ता में कौई कौम बगैर एक किताब के चल ही नहीं सकती। उन्होंने यहूदी, ईसाई, मुसलमान और पारिसयों को ही देखा था। उन्हें नहीं पता था कि भारत एक किताब का नहीं बल्कि अनेक किताबों का देश है। फिर भी मनुस्मृति का बाबासाहब से लेकर हम जैसों तक आज तक सीधी आलोचना करते हैं कि यह किताब निंदनीय और त्याज्य है। मैंने ही मनुस्मृति पर एक पोस्ट लिखी तो कई हिन्दू कट्टरपंथी आहत हो गये। अफसोस था कि उनको अपना ही इतिहास नहीं पता। वो मनुस्मृति को सीने से चिपकाना चाहते हैं लेकिन ऐसे लोगों को आहत किये बिना तो धार्मिक कूपमण्डुकता का सामना नहीं किया जा सकता। कबीर ने जो काम आज से सात सौ साल पहले किया वो हम आज भी न कर सकें तो हम किस बात के बौद्धिक या प्रबुद्ध हुए। 

सरल शब्दों में कहें तो ईश्वर को कुरान, बाइबिल और गीता वगैरह के कैद से आजाद कराने की जरूरत है। इन लोगों ने भगवान पर कब्जा कर लिया है और उसका डर दिखाकर इंसान को कंट्रोल करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि यह कोई नई बात है। मध्यकाल का सूफी और भक्ति आन्दोलन दरअसल सभी धर्मग्रन्थों के खिलाफ बगावत का आन्दोलन है। सूफियों-भक्तों ने मुल्लाओं और पण्डों से सीधा सवाल किया कि वेद-कुरान में क्या लिखा है यह बताना छोड़ो, तुम हमें ये बताओ कि तुम्हारा खुद का आध्यात्मिक अनुभव क्या है? उसके पहले बुद्ध ने भी बौद्धिक ज्ञान के बरक्स आध्यात्मिक अनुभव को अपने धर्म का आधार बनाया था। 

अगर आपको सचमुच साम्प्रदायिकता या प्रतिगामिता से संघर्ष करना चाहते हैं तो धार्मिक ग्रन्थों की गुलामी बन्द करनी होगी। आध्यात्मिक अनुभवों का समाजशास्त्र-राजनीतिशास्त्र-अर्थशास्त्र-नागरिक शास्त्र-विधि शास्त्र से कोई वास्ता नहीं है। धर्मग्रन्थों में जो आध्यात्मिकता से जुड़ी बातें हैं उनके निकाल कर एक जगह रख लीजिए और अन्य विषयों पर जो हजार या दो हजार साल पुरानी सोच है उसे निकाल बाहर कीजिए। इसी में मानवता का कल्याण है।
(#रंगनाथ_सिंह के फेसबुक वॉल से)
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शनिवार, 14 अगस्त 2021

व्योमवार्ता/मानुष भज ले गुरू चरणम् । दुस्तर भव सागर तरणम...

धर्मवाणी पूज्य गूरूजी सद्गूरू राजेन्द्र ऋषि जी दासअनामी पुरूष के व्यवहारिक धर्मवाणियों का संग्रह है जो जीवन के व्यवहार मे आध्यात्मिक पक्ष को कैसे समावेशित किये जाने की राह बताती है ।
मेरे ऊपर गुरूजी की कृपा रही कि उन्होने मुझ अकिंचन को धर्मवाणी की भूमिका लिखने का उत्तरदायित्व दिया।

मानुष भज ले गुरू चरणम्.......
दुस्तर भव सागर तरणम..........

              सद्गुरू श्री राजेन्द्र ऋषि जी (दास अनामी पुरूष) से मेरा प्रथम साक्षात्कार वर्ष 2006 के सितम्बर महीने में हुआ था। बड़े भाई वरिष्ठ पत्रकार कमल नयन मधुकर जी के साथ मैं गुरूजी के विषय में जानकर मिलने उनके तत्कालीन रानीपुर आवास पर गया था। यूँ तो पूर्व में मेरे अग्रज मित्र प्रो० संजय सिंह (समाज कार्य संकाय, महत्मा गाॅधी काशी विद्यापीठ) एवं वरिष्ठ पत्रकार डाॅ० सुमन राव ने भी मुझसे सद्गुरू जी से भेंट की चर्चा किया था पर दैवयोग से वह भेंट सम्भव नहीं हो पाया था। श्री मधुकर जी के साथ मैं रानीपुर स्थित आश्रम पर गया पर वहाॅ मेरे मन में बसे आश्रय जैसी कोई छवि नही दिखी। सामान्य साफ सुथरा सादगी पूर्ण आवास, एक कक्ष में दो तीन लोग बैठे बेहद अपनेपन से कल के क्रिकेट मैच पर चर्चा करते हुए। हम और मधुकर जी भी वहीं पहुॅच कर सबको औपचारिक अभिवादन कर बैठ गये और क्रिकेट चर्चा में सम्मिलित हो गये। क्रिकेट चर्चा कब राजनीति से होते हुए समाज और वर्तमान परिवेश पर आ गयी, पता नही चला। इस चर्चा में वक्त के दो घण्टे भी बीत गये, यह भी नही पता चला, फिर हम और मधुकर जी सबको प्रणाम कर वहाॅ से चले आये। लौटते समय रास्ते में मैंने मधुकर जी से पूछा कि ‘‘गुरू जी नही थे क्या? उनसे भेंट हो गयी होती तो अच्छा रहता?’’ और मधुकर जी ने जो उत्तर दिया वह मेरे लिए आश्चर्यजनक ही नही अविश्वसनीय था। उन्होंने बताया, ‘‘अरे! वह गुरू जी ही तो थे, जो तुम्हें खुद उठकर अपने से चाय का कप पकड़ाये थे।’’ आज के दिखावेपूर्ण माहौल में इतनी सरलता? न कोई आडम्बर, न कोई साधु सन्तों वाला विशेष ताना बाना, न भगवा, पीला काला रंग, न कोई विशेष चयनित बैठने के लिए स्थान? क्या आज के समय में ऐसे भी गुरू हो सकते है? मैं बार-बार स्वयं से यह प्रश्न पूछकर और विस्मित होता जाता। रात में सोते समय भी मैं आश्रम रूपी आवास के उस अनुभव और भावदृश्य को स्वयं से अलग नहीं कर पा रहा था। हम लोग के साथ बैठे सफेद कुर्ते पायजामें में क्रिकेट पर चर्चा करते हुए गुरू जी। मुझे स्वयं उठ कर चाय का कप पकड़ाते हुए गुरू जी और कहीं से भी अपने को विशेष प्रदर्शित करने का आडम्बर न पालते हुए अतिशय सामान्य व्यक्ति जैसे आचरण करते हुए सरल स्वभाव वाले गुरू जी। एक ओर मुझे बार-बार उनकी सरलता अपने ओर आकर्षित करते हुए एक मूक आमन्त्रण दे रही थी तो दूसरी ओर मेरे पूर्वाग्रहों की धारणा उनके सरल स्वभाव व सामान्य आचरण को देखते हुए गुरूत्वता के प्रति संशय उपजा रही थी। पर मन में कहीं से यह बार-बार उठ रहे थे कि यही वह पड़ाव है जहाॅ पहुॅचने के लिए मेरा मन जाने कब से व्याकुल था। इसके पूर्व कभी भी किसी व्यक्ति के गुरूत्वता के प्रति मैं कभी इतना आकर्षित नही हुआ था। हालांकि प्रभावित करने का प्रयास बहुत से गुरू कहलाने वालों ने किया पर मैं प्रारब्धबश हरबार उनके प्रयासों से छूट गया था। आश्रम से लौटने के बाद दो तीन दिन तक एक कसमकस, उहापोह, बेचैनी जैसी मन पर छायी रही। गोस्वामी तुलसीदास के बचन-‘गुरू बिन भव निध तरई न कोई। जौ विरंचि संकर सम होई। संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु बाता।’ के बीच झूलते हुए मैं स्वयं को अन्ततः रोक नहीं सका और दो दिन बाद मधुकर जी से गुरू जी से भेंट करने की प्रक्रिया पूछी, तो वे फिर हॅस पड़े। ‘‘अरे कोई अपायमेण्ट वगैरह नही। सुबह 9 से 12 बजे दिन के बीच कभी भी चले आओ। तुम्हें गुरूजी का सानिध्य मिल जायेगा।’’ मैं क्या अकेले डायरेक्ट जा सकता हॅू। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि ‘‘बिलकुल और गुरू कृपा तो डायरेक्ट ही होती है उसके लिए किसी माध्यम की आवश्यकता थोड़े ही पड़ती है फिर अपने गुरू जी के यहाॅ कोई दिखावा, रोक टोक नही है। तुम खुद जाकर देखों अच्छा लगेगा।’’
         संयोगबश अगले दिन दूसरे शनिवार को अवकाश था तो हम अपने मित्र सूर्यभान को लेकर चल दिये रानीपुर स्थित ‘प्रकृति पुरूष सिद्धपीठ सूरत शब्द योग मार्ग अनुयायी आश्रम’। मधुकर जी के बताने के बाद भी मन में संशय था और गुरू जी के प्रति आकर्षण और उत्सुकता थी। जब हम लोग आश्रम पहुॅच कर घण्टी बजाये तो स्वयं गुरू जी ही दरवाजा खोलते हुए स्वागत किये। ‘‘आइये, आइये।’’ जैसा कि बहुत पूर्व से परिचय हो। एकदम सहज भाव से बेहद अपनापन। हम बातें करते रहे कहीं से कोई पूर्वधारणा नहीं, सहज, सरल जैसे बहुत-बहुत सालों से परिचय हो, सालों से ही नही जनमों से। घर परिवार की आपसी बातें, मन मिजाज की बातें। अपनी और उनकी बातें। यही वह मुलाकात थी जिसमें हम उनके मुरीद हो गये। यही हाल सूर्यभान का भी था। फिर मुलाकातों के इस सिलसिले ने कब हमलोगों को गुरूजी के बेहद करीबी लोगों में शामिल कर लिया, हमें पता नही चला। तब से आज तक मन में जब कोई भी कोई अकुलाहट होती है तो हम सीधे गुरूजी के पास चले जाते है और उनके सानिध्य में बैठे हमारी सारी समस्याओं का हल मिल जाता है। प्रायः ऐसा होता है कि यदि हम किसी परेशानी में है या समस्याग्रस्त है तभी गुरू जी का फोन आ जाता है कि ‘‘सत्यनाम डाक्टर साहब। कैसे है? सब कुशल से है न?’’ यह एक नहीं कईबार, कई लोगों के साथ हुआ है जिन्होंने गुरू जी के प्रेम व संरक्षण को टेलीपैथी द्वारा महसूस किया है।
             श्रद्धेय सद्गुरू दास अनामी पुरूष पूज्य राजेन्द्र ऋषि का जन्म सन 1964 में लखनऊ में हुआ था। पिता जी सैन्य अधिकारी थे तो उनके नियुक्ति व पदस्थापन के विभिन्न स्थानों पर आपकी शिक्षा दीक्षा हुई। बुन्देल खण्ड विश्वविद्यालय झाॅसी से अर्थशास्त्र में स्नात्कोत्तर उपाधि लेने के पश्चात दिल्ली की एक कम्पनी में मैनेजर हो गये। पर नीयति ने परमसत्ता ईश्वर के माध्यम नियुक्त करने हेतु सम्भवतः आपको पहले ही चयनित कर लिया था तो एक दिन नौकरी छोड़ ईश्वर आराधना व सत्य की खोज में निकल पड़े। लगभग चैदह वर्षो तक सन्त महात्माओं के सानिध्य में आध्यात्म की उच्च साधना करते हुए उन्होंने ईश्वर व सत्य का अन्वेषण जारी रखा। आध्यात्मिक साधना के संग ज्योतिष, कर्मकाण्ड के वैज्ञानिक पक्ष आयुर्वेद, मन्त्र-तन्त्र पर गहन एकाकी शोध करते हुए परमसत्ता के संकेत व अपने गुरूजनों के निर्देशों पर लोकहितार्थ सेवा का निर्णय लेकर 20 जनवरी 1991 को सूरत शब्द योगमार्ग आश्रम प्रकृति पुरूष सिद्धपीठ की स्थापना की। वर्तमान में वाराणसी के परमकल्याण मय पंचक्रोशी यात्रा के प्रथम पड़ाव कर्मदेश्वर महादेव मन्दिर कन्दवा से आधा किमी पश्चिम में घमहापुर में स्थित आश्रम रूपी आवास में साधनारत रहते हुए पूज्यवर भारतीय प्राच्य विद्याओं पर वैज्ञानिक ढंग से अनुसंधानरत है। गुरूजी का जीवन बिना किसी आडम्बर दिखावा और अहंकार, महत्त्वाकांक्षा से मुक्त एकदम सामान्य गृहस्थ का है। उनकी बातें बेहद व्यवहारिक एवं सर्वसहज होती है जो जीवनचर्या, आचरण एवं कर्मो से जुड़ी हुई होने के साथ परिलक्षित भी होती है।
इस संकलन के निर्माण नींव में छुपी हुई एक घटना को उल्लिखित करने से स्वयं को रोक नही पा रहा हॅू। गुलाबी जाड़े के फरवरी महीने के एक शाम हम हमारे साथ मित्र सूर्यभान सिंह एवं गुरूजी तब के तत्कालीन आवास आश्रम रानीपुर महमूरगंज में बैठे हुए जीवनचर्या पर चर्चा कर रहे थे। यॅू तो गुरू जी से मिलने का समय प्रातः 8.00 बजे से दोपहर 2.00 बजे तक है परन्तु हम लोगों की धृष्ठता को सदैव क्षमा करने वाले गुरू जी दिन भर आध्यात्मिक परामर्श देकर थके होने के बावजूद हम लोगों के साथ उर्जा व स्नेह से भरे हुए वार्ता में व्यस्त थे। संयोगवश उस समय पूरे मकान में हम तीन जन के अतिरिक्त अन्य कोई भी उपस्थित नही था। गुरू जी अन्धविश्वास एवं कल्पित भ्रम के सम्बन्ध में उठी शंका के निर्मूल होने के वैज्ञानिक व व्यवहारिक पक्ष हमें बता रहे थे और हम दोनों जब अपने अल्प बुद्धि एवं विवेक से उसे समझने का प्रयास कर रहे थे। लगभग पौना-एक घण्टे के पश्चात पूरा कमरा ताजे गुलाब के तीब्र सुगन्ध से महक उठा। हम और सूर्यभान सिंह उस तीक्ष्ण व तीब्र सुगन्ध से आश्चर्यचकित थे पर गुरूजी उसी शान्त भाव से अपनी बात जारी रखे हुए थे। हम लोगों के चेहरे पर आश्चर्य भाव देख कर उन्होंने बहुत ही शान्त भाव से कहा कि ‘‘कुछ और लोग जो इस विषय पर जानने को इच्छुक है वही आये है क्योंकि यह जिज्ञासा व समाधान का उनका विशेष निर्धारित समय है।’’ दो बार और इसी तरह शाम के समय गुरूजी के सानिध्य में बैठे हुए हम लोगों ने कुछेक सूक्ष्म अभौतिक उपस्थिति महसूस किया है। ऐसे में हर मौके पर प्रायः मेरे साथ सूर्यभान जी रहे है और उनका भी अनुभव ऐसा ही रहा। सायं सामान्य परामर्श से इतर विशेष सूक्ष्म शरीरधारी अभौतिकजनों की इस विशेष चर्चा में गुरूजी सम्पूर्ण तथ्य का सार अनगढ़ी सी चार पंक्तियों में कर देते है। हम बहुत दिनों से गुरूजी से इन अनगढ़ी सार अभिव्यक्तियों को संकलित कर प्रकाशित करने के लिए कहते रहे पर गुरू जी व्यस्ततावश हाॅ, हॅू कहकर टालते रहे। इस वर्ष जब कोरौना के महामारी के चलते पूरी तरह लाॅकडाउन में आध्यात्मिक समाधान लोकहित व्यक्तिगत परामर्श एवं सत्संग से गुरूजी को समय मिला तो हम पुनः इस संकलन के लिए बार-बार अनुरोध करने लगे। जिसका परिणाम परम पूज्य गुरूजी के कृपा से यह सार संकलन अपने साकार रूप में प्रस्तुत है। इसमें आध्यात्मिक जीवन, जीवनचर्या, व्यवहार, प्रकृति संस्कार से जुड़े गुढ़े तत्व सामान्य भाषा में कहे गये है जो आज के लिए हम सब के व्यवहारिक जीवन में आवश्यक है।
सूरत शब्द योगमार्ग अनुयायी आश्रम प्रकृति पुरूष सिद्धपीठ सद्गुरू श्री राजेन्द्र ऋषि जी का लगाया हुआ छोटा-सा पौधा है। इसे बड़ा और छायादार वह वृक्ष बनने में अभी समय लगेगा। आश्रम का उद्देश्य अध्यात्म व ज्योतिष विद्या के जरिये गरीब से अमीर तक सभी लोगों को लाभ पहुॅचाना है। हमारी बहुत पवित्र व महान योजना सबके लिए उपयोगी एक आध्यात्मिक ढंग का वृद्धाश्रम, जड़ी बूटी पर आधारित प्राकृतिक चिकित्सालय तथा मानव जाति को सम्मान देने के लिए मानव मन्दिर की स्थापना करने की है। हम इस मकान कार्य में आप सभी का सहयोग चाहते हैं। इस आश्रम का विकास बहुत धीमी गति से परन्तु ठोस रूप में हुआ है। आश्रम के भौतिक विकास पर ध्यान लगाने और उसके लिए गलत साधन अपनाने के बजाय हमने हमेशा ही आध्यात्मिक विकास पर ध्यान दिया जो कि संतमत की परम्परा रही है। जितने भी महान सन्त हुए है-सब आजीवन झोपड़ी में रहे, उन्होंने कोई महल नही बनाया। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा में लगा दिया। मानव सेवा करने के लिए किसी मठ या महल की नही सिर्फ शुद्ध हृदय और परमात्मा के आर्शीवाद की जरूरत पड़ती है। हमारे सुरत शब्द योगमार्ग अनुयायी आश्रम प्रकृति पुरूष सिद्धपीठ आश्रम के आध्यात्मिक पथ प्रदर्शक सन्त राजेन्द्र ऋषि जी ने एक छोटी सी जगह में रहकर भी हजारों लोगों का भला किया है और सैकड़ों लोगों की आध्यात्मिक उन्नति करायी।
स्व की अनुभूति होने के बाद भी अपने ही आनन्द में लीन रहने वाले स्वार्थी मनुष्य वे नहीं बने और दूसरों के दुःख से द्रवित होकर अपनी मानव सेवा जारी रखी। उन्होंने अपने कर्मो और सेवा से यह सिद्ध किया कि ऋषियों का कार्य ही शोध एवं अनुसंधान करना है, जिससे मानव लौकिक सुख व पारलौकिक आनन्द प्राप्त कर सके। बाहर से देखने पर उनकी इन्द्रियां मानव सेवा में लगी दिखती है, चेहरे पर कहीं कोई तनाव नहीं, भीतर इतना गहन मौन जिसे मापने की क्षमता हममें से किसी में भी नही है। उनकी मानव सेवा और दुःखी को भी हंसाने वाले आनन्द को ही हम देख पाते है। मैं गुरूदेव के लिए बस यही कहॅूगा कि-
सुख है न दुःख है, न है शोक कुछ भी
अजब है ये मस्ती पिया कुछ नहीं है।
हरेक में हॅू आनन्द ये आनन्द है मेरा,
मस्ती ही मस्ती और कुछ नहीं है।।
एक बार किसी ने उनसे कहा कि- आपको तो किसी ब्राह्मण के परिवार में जन्म लेना चाहिए था। गुरूजी ने उत्तर दिया कि -‘‘कर्म से ब्राह्मण होना अधिक सौभाग्य की बात है। मुफ्त में मिली चीज की मनुष्य कद्र नहीं करता है जो जन्म से ब्राह्मण हैं उनमें से कितने ब्रह्म से परिचित है? अपने कर्मो से समाज में वे अपना सम्मान खोते चले जा रहे हैं। जन्म की बजाय कर्म से मनुष्य श्रेष्ठ बनता है। ’’ किसी भी सन्त का आर्शीवाद उनके परिवार कुल व जाति के लिए ही नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के लिए गर्व की बात होती है। हमारे देश में ऋषि मुनियों की जो महान परम्परा चली आ रही है। उनमें से अधिकांशतः महान सन्त जन्म से ब्राह्मण नही थे। ईश्वर ने भी राम के रूप में क्षत्रिय के यहाॅ और कृष्ण के रूप में यादव के यहाॅ अवतार लिया। रावण जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी कर्म से निन्दनीय था इसीलिए आज भी बुराई के प्रतीक के रूप में हर वर्ष पुतला दहन होता है। सन्त से जाति नहीं पूछना चाहिए और मन की हीन भावना दूर कर लेनी चाहिए।
सत्य को जानने के लिए वह सत्य की अनुभूति के लिए सन्तों की शरण लेनी चाहिए। मानव जीवन दुर्लभ ही नहीं क्षण भंगुर भी है। सन्त कबीर साहब ने इसी ओर संकेत किया है-

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की बात।
देखत ही छिप जायेगा, ज्यो तारा प्रभात।।

          गीता में सद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण कहते है- नियतं कुरू कर्म त्वं अर्थात् तू निर्धारित कर्म को कर। निर्धारित कर्म क्या है? यज्ञ करना। कौन सा यज्ञ करना? इन्द्रियों का दमन, मन का शमन और दैवी सम्पदा का अर्जन करना ताकि चित्त का निरोध हो और अन्त में निरोध किये हुए चित्त का भी विलय हो जाये और शाश्वत सनातन ब्रह्म में प्रवेश मिल जाये। सभी महापुरूष आत्मने मोक्षार्थ व जगत हिताय के निमित्त ही संसार में आते हैं। वे तप करके अपनी आत्मा को मोक्ष प्रदान करते हैं। आजीवन अपने विभिन्न लोकल्याणकारी कार्यो द्वारा जगत का हित भी करते हैं। सार रूप में यही हमारे सद् गुरू जी व आश्रम का परिचय है।
(इस कृपा के लिये गूरूजी के चरणों मे सादर प्रणाम करते हुये आह्लादित हूं -व्योमेश)

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

व्योमवार्ता/आज के दौर का नंगा सच

व्योमवार्ता/आज के दौर का नंगा सच : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

आज सोशल मीडिया पर एक सच्ची कहानी पढ़ी जो आज के दौर के सच को प्रतिबंबित करती है। हम सोचना पड़ेगा कि इस आपाधापी के जीवन मे भागदौड़ के दौर मे आखिर गड़बड़ी कहां हुई।

आखिर गड़बड़ कहाँ हुई ....???

एक बहुत ब्रिलियंट लड़का था। सारी जिंदगी फर्स्ट आया। साइंस में हमेशा 100% स्कोर किया। अब ऐसे लड़के आम तौर पर इंजिनियर बनने चले जाते हैं, सो उसका भी सिलेक्शन IIT चेन्नई में हो गया। वहां से B Tech किया और वहां से आगे पढने अमेरिका चला गया और यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफ़ोर्निया से MBA किया।
                             अब इतना पढने के बाद तो वहां अच्छी नौकरी मिल ही जाती है। उसने वहां भी हमेशा टॉप ही किया। वहीं नौकरी करने लगा. 5 बेडरूम का घर  उसके पास। शादी यहाँ चेन्नई की ही एक बेहद खूबसूरत लड़की से हुई।
एक आदमी और क्या मांग सकता है अपने जीवन में ? पढ़ लिख के इंजिनियर बन गए, अमेरिका में सेटल हो गए, मोटी तनख्वाह की नौकरी, बीवी बच्चे, सुख ही सुख।

लेकिन दुर्भाग्य वश आज से चार साल पहले उसने वहीं अमेरिका में, सपरिवार आत्महत्या कर ली. अपनी पत्नी और बच्चों को गोली मार कर खुद को भी गोली मार ली। What went wrong? आखिर ऐसा क्या हुआ, गड़बड़ कहाँ हुई।
ये कदम उठाने से पहले उसने बाकायदा अपनी wife से discuss किया, फिर एक लम्बा suicide नोट लिखा और उसमें बाकायदा अपने इस कदम को justify किया और यहाँ तक लिखा कि यही सबसे श्रेष्ठ रास्ता था इन परिस्थितयों में। उनके इस केस को और उस suicide नोट को California Institute of Clinical Psychology ने ‘What went wrong'? जानने के लिए study किया।

पहले कारण क्या था, suicide नोट से और मित्रों से पता किया। अमेरिका की आर्थिक मंदी में उसकी नौकरी चली गयी। बहुत दिन खाली बैठे रहे। नौकरियां ढूंढते रहे। फिर अपनी तनख्वाह कम करते गए और फिर भी जब नौकरी न मिली, मकान की किश्त जब टूट गयी, तो सड़क पर आने की नौबत आ गयी। कुछ दिन किसी पेट्रोल पम्प पर तेल भरा बताते हैं। साल भर ये सब बर्दाश्त किया और फिर पति पत्नी ने अंत में ख़ुदकुशी कर ली...
इस case study को ऐसे conclude किया है experts ने :

This man was programmed for success but he was not trained, how to handle failure. यह व्यक्ति सफलता के लिए तो तैयार था, पर इसे जीवन में ये नहीं सिखाया गया कि असफलता का सामना कैसे किया जाए।
अब उसके जीवन पर शुरू से नज़र डालते हैं। पढने में बहुत तेज़ था, हमेशा फर्स्ट ही आया। ऐसे बहुत से Parents को मैं जानता हूँ जो यही चाहते हैं कि बस उनका बच्चा हमेशा फर्स्ट ही आये, कोई गलती न हो उस से। गलती करना तो यूँ मानो कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया और इसके लिए वो सब कुछ करते हैं, हमेशा फर्स्ट आने के लिए। फिर ऐसे बच्चे चूंकि पढ़ाकू कुछ ज्यादा होते हैं सो खेल कूद, घूमना फिरना, लड़ाई झगडा, मार पीट, ऐसे पंगों का मौका कम मिलता है बेचारों को, 12th कर के निकले तो इंजीनियरिंग कॉलेज का बोझ लद गया बेचारे पर, वहां से निकले तो MBA और अभी पढ़ ही रहे थे की मोटी तनख्वाह की नौकरी। अब मोटी तनख्वाह तो बड़ी जिम्मेवारी, यानी बड़े बड़े targets।

कमबख्त ये दुनिया, बड़ी कठोर है और ये ज़िदगी, अलग से इम्तहान लेती है। आपकी कॉलेज की डिग्री और मार्कशीट से कोई मतलब नहीं उसे। वहां कितने नंबर लिए कोई फर्क नहीं पड़ता। ये ज़िदगी अपना अलग question paper सेट करती है। और सवाल, सब out ऑफ़ syllabus होते हैं, टेढ़े मेढ़े, ऊट पटाँग और रोज़ इम्तहान लेती है। कोई डेट sheet नहीं।
एक अंग्रेजी उपन्यास में एक किस्सा पढ़ा था। एक मेमना अपनी माँ से दूर निकल गया। आगे जा कर पहले तो भैंसों के झुण्ड से घिर गया। उनके पैरों तले कुचले जाने से बचा किसी तरह। अभी थोडा ही आगे बढ़ा था कि एक सियार उसकी तरफ झपटा। किसी तरह झाड़ियों में घुस के जान बचाई तो सामने से भेड़िये आते दिखे। बहुत देर वहीं झाड़ियों में दुबका रहा, किसी तरह माँ के पास वापस पहुंचा तो बोला, माँ, वहां तो बहुत खतरनाक जंगल है। Mom, there is a jungle out there।

इस खतरनाक जंगल में जिंदा बचे रहने की ट्रेनिंग बच्चों को अवश्य दीजिये।
बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार भी देना जरूरी है, हर परिस्थिति को ख़ुशी ख़ुशी धैर्य के साथ झेलने की क्षमता, और उससे उबरने का ज्ञान और विवेक बच्चों में होना ज़रूरी है।
बच्चे हमारे है, जान से प्यारे है।
(काशी, 3अगस्त 2021, मंगलवार)
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#व्योमेश_चित्रवंश_की_डायरी
#व्योमवार्ता

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/चकाचक बनारसी और सावन की बरसात

व्योमवार्ता/चकाचक बनारसी और सावन की बरसात

        आज सावन की पहली बारिस बनारस मे हुई तो तन मन मयूर हो गया।भीषण ऊमस से जूझते तबियत को बरसात की फुहार का सुख देने छत पर चला गया तो बरसात की बूंदों के टपटप मे रम्मन चाचा "चकाचक बनारसी" की याद आ गई। रम्मन चच्चा हमारे रिश्तेदार थे, फक्कड़ बनारसी, कबीर की तरह बेबाक, मिजाज से शानदार।
रम्मन चच्चा की याद आई तो उनकी कविता भी याद आ गई। जिन्हे उनको सुनने का सुख मिला है उनके होठ बरबस ही फड़क पड़ेगें चकाचक जी की इस कविता के बोल के साथ।

बदरी के बदरा पिछयउलेस,
सावन आयल काऽ।
खटिया चौथी टांग उठेउलस,
सावन आयल काऽ।

मेहराये के डर से माई लगल छिपावै अमहर,
भईया के बहका फुसला के भउजी भागल नइहर,
सांझै छनी सोहारी दादा तोड़ लियइलन कटहर,
बाऊ छनलन ललका दारू बनके बड़का खेतिहर,

बुढ़िया दादी कजरी गईलेस,
सावन आयल काऽ।

गुद्दड़ कऽ चौउथी मेहररूआ मेंहदी सुरूक लियाईल,
सास क ओकरे कानी अंगुरी सड़-सड़ के बस्साइल,
झिंगुरी के घर भुअरी बिल्ली तिसरे बार बियाइल,
रामभजन क नई पतोहिया झूलै के ललचाईल,

धनुई फिर गोदना गोदवउलेस
सावन आयल का।

चमरउटी कऽ उलटल पोखरी मचल हौऽ छूआछूत,
खेलत हौऽ धरमू पंडित कऽ बेवा धईलेस भूत,
ननकू के ननका के मुंह पर मकरी देहलस मूत,
छींकत हौऽ जमिदार कऽ बिटिया गईल खुले में सूत,

पटवारी के दमा सतउलेस,
सावन आयल काऽ।

सांझ के अहिराने में गड़गड़ गड़गड़ बजल नगाड़ा,
कलुआ गनगनाय के नचलेस लगल कि जइसे जाड़ा,
ओकरे साथे अन्हऊ पंडित नचलन तिरछा आड़ा,
लोटा लेके दउड़त हंउवन उखड़ल ओनकर नाड़ा,

उन्हें गांव भर दवा बतउलेस,
सावन आयल काऽ।

मुखिया के बखरी पर भर-भर चीलम उड़ल खमीरा,
उनके पिछवारे मेघा के लपक के धईलेस कीरा,
एक कोठरी में मुखियाइन के उठल कमर में पीरा,
लगत हौऽ राजा कजरी होई बाजल ढोल मजीरा,

पुरुवा भक दे गैस बुझउलेस,
सावन आयल काऽ।

बदरी के बदरा पिछयउलेस,
सावन आयल काऽ।
खटिया चौथी टांग उठेउलस,
सावन आयल काऽ।

#चकाचक_बनारसी जी की मशहूर कविता #सावन_आयल_का..

#व्योमवार्ता/ व्योमेश चित्रवंश की डायरी, काशी, 27 जुलाई 2021, मंगलवार
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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ वैश्विक खात्मे की ओर बढ़ता इंसान

वैश्विक खात्मे की ओर बढ़ रहा इंसान, 19 साल में नर्क हो जाएगी जिंदगी

    दुनिया को खत्म करने के लिए इंसान एकदम सही रास्ते पर चल रहा है. अब से मात्र 19 साल बाद यानी 2040 में इंसानों की जिंदगी नर्क हो जाएगी. ये दावा किया जा रहा है 1972 में बनाई गई एक रिपोर्ट का दोबारा विश्लेषण करने के बाद. क्योंकि इंसान लगातार अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों से भाग रहा है. आइए जानते हैं कि इस रिपोर्ट में इंसानों की जिंदगी को क्यों नर्क बनाने की बात कही गई है. ये क्यों कहा गया है कि इंसान वैश्विक खात्मे की ओर बढ़ रहा है.                    
              1972 में एक किताब छपी थी द लिमिट्स टू ग्रोथ (The Limits to Growth). इसमें मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि औद्योगिक सभ्यता हर कीमत पर लगातार आर्थिक विकास की ओर बढ़ती रही तो एक दिन सरकारें गिर जाएंगी. सहयोग खत्म हो जाएगा. इसकी वजह से भविष्य में 12 संभावित भयावह स्थितियां बन सकती हैं, जो किसी भी इंसान, समुदाय या देश और धरती के लिए फायदेमंद नहीं होंगी.
        इस रिपोर्ट में बताई गई 12 संभावित खतरनाक स्थितियों में से एक सबसे भयावह स्थिति ये थी कि साल 2040 तक दुनिया का आर्थिक विकास तेजी से होगा. यह अपने पीक पर रहेगा. उसके बाद एकदम तेजी से नीचे गिरेगा. इसके साथ ही वैश्विक आबादी कम होगी. खाना की कमी होगी. साथ ही प्राकृतिक संसाधनों की भारी किल्लत होगी. इसे बिजनेस ऐज यूजुअल (Business As Usual - BAU) सीनेरियो कहा गया।
इस वैश्विक गिरावट से इंसानों की नस्ल तो खत्म नहीं होगी, लेकिन बिना पैसे, बिना खाने और बिना प्राकृतिक संसाधनों के इनकी जिदंगी नर्क हो जाएगी. स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग पूरी दुनिया में गिर जाएगा. अब इस बात की पुष्टि और वर्तमान परिस्थितियों में क्या होगा भविष्य में यह जानने के लिए MIT की सस्टेनिबिलिटी और डायनेमिक सिस्टम एनालिसिस रिसर्चर गैरी हैरिंग्टन ने इस रिपोर्ट का आज के अनुसार फिर से विश्लेषण किया. जिसकी रिपोर्ट येल जर्नल ऑफ इंडस्ट्रियल इकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है. 
पिछले साल ही हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट हुई हैं. वो आज के रियल वर्ल्ड डेटा के साथ द लिमिट्स टू ग्रोथ (The Limits to Growth) का एनालिसिस कर रही हैं. इस एनालिसिस में गैरी ने 10 फैक्टर्स पर ध्यान दिया. जिनमें आबादी, प्रजनन दर, प्रदूषण स्तर, खाद्य उत्पादन और औद्योगिक आउटपुट प्रमुख हैं. उन्होंने देखा कि इस एनालिसिस के परिणाम बहुत हद तक 1972 में प्रस्तावित BAU सीनेरियो से मिलते-जुलते हैं. हालांकि, एक जगह रियायत मिलने की संभावना है.
गैरी ने बताया कि एक सीनेरियो उस रिपोर्ट  में बताई गई थी, जिसे कॉम्प्रिहेंसिव टेक्नोलॉजी (CT) कहा गया. यानी तकनीकी रूप से इतना ज्यादा विकास हो जाए कि प्रदूषण कम किया जा सके और खाद्य सामग्रियों का उत्पादन बढ़ाया जा सके. ताकि प्राकृतिक संसाधनों की कमी भी हो तो खाने की कमी न हो. लेकिन इससे बढ़ती हुई वैश्विक आबादी और व्यक्तिगत कल्याण की भावना को नुकसान पहुंचता है. 
     इसके पीछे वजह ये है कि जब प्राकृतिक संसाधनों की कमी होगी, तब आर्थिक विकास तेजी से नीचे की ओर गिरेगा. यानी आज के औद्योगिक सभ्यता का तेजी से पतन होगा. गैरी कहती है कि आज से करीब 10 साल बाद ही BAU और CT सीनेरियो के विकास में बाधा आने लगेगी. ये रुक जाएंगे. यानी लगातार विकास की कोई भी अवधारणा पूरी नहीं होगी. इससे इंसानों को नुकसान होने लगेगा. 
गैरी ने कहा फिलहाल अच्छी खबर ये है कि अब भी देर नहीं हुई है. इन दोनों परिस्थितियों से बचने के लिए इंसानी समाज को सही दिशा और दशा में काम करना होगा. इसका विकल्प है - स्टैबलाइज्ड वर्ल्ड सीनेरियो (Stablilized World Scenario) यानी स्थिर दुनिया परिस्थिति. इस स्थिति में आबादी, प्रदूषण, आर्थिक विकास तो बढ़ेंगे लेकिन प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे कम होंगे. इससे फायदा ये होगा कि जैसे ही प्राकृतिक संसाधनों की कमी दिखे, आप बाकी को रोक दें या सीमित कर दें. 
तकनीकी विकास के साथ स्टैबलाइज्ड वर्ल्ड सीनेरियो को चलाएं तो उससे वैश्विक समाज की प्राथमिकताएं बदलेंगी. गैरी ने कहा कि लोगों को अपने मूल्यों पर काम करना होगा. नीतियां बनानी होंगी. परिवार छोटे रखने होंगे. चाहतें और जरूरतें कम करनी होंगी. जन्म दर को नियंत्रित करना होगा. औद्योगिक आउटपुट को सीमित करना होगा, सेहत और शिक्षा को प्राथमिकता से चलाना होगा. इससे प्राकृतिक संसाधन सीमित तरीके से खर्च होंगे. तब धरती बचेगी, इससे इंसान और उसके देश बचेंगे.
स्टैबलाइज्ड वर्ल्ड सीनेरियो (Stablilized World Scenario) के ग्राफ को देखें तो इससे पता चलता है कि उस समय यानी 20 साल बाद भी वैश्विक आबादी के हिसाब से खाद्य सामग्री रहेगी. प्रदूषण कम होगा. प्राकृतिक संसाधनों की कमी स्थिर हो जाएगी. सामाजिक खात्मे को बचाया जा सकेगा. ये एक काल्पनिक परिस्थिति लगती है क्योंकि उस समय तक कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ चुकी होगी. लेकिन अगर इस सीनेरियो के हिसाब से चले तो वह भी कम होगा. 
गैरी ने बताया कि कैसे इंसान ने वैश्विक स्तर पर एकता दिखाई है. कोविड-19 के समय में जब वैक्सीन विकसित करने और उसे पूरी दुनिया में पहुंचाने की बात आई तो इंसानों ने एकता दिखाई. सामुदायिक और वैश्विक जिम्मेदारी निभाई है. इसी तरह अगर हर देश का इंसान जलवायु समस्या को एकसाथ मिलकर खत्म करने की कोशिश करे तो कुछ भी संभव है. हम अपना भविष्य किसी भी समय सुधार सकते हैं. 
गैरी हैरिंग्टन कहती हैं कि अभी देर नहीं हुई है. अगर इंसान अपनी आबादी, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और औद्योगिक विकास की रफ्तार को सीमित करे तो वह 20 साल बाद भी सुरक्षित रह सकता है. इसके लिए जरूरी है कि इंसानियत अपनी सीमा तय करें. या फिर किसी बिंदु पर पहुंच कर सीमा बना दें. ताकि मानव कल्याण की भावना धरती से खत्म न होने पाए.
(आजतक ब्लाग पर प्रकाशित एक लेख)
#व्योमवार्ता
काशी, 22जुलाई 2021, गुरूवार
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मंगलवार, 20 जुलाई 2021

व्योमवार्ता / धरती के भगवान (भाग-5)

धरती के भगवान (भाग-5)

पिछले दिनों बाबा #रामदेव ने एलोपैथ के कारोबार पर सवाल  क्या उठाया। देश के डाक्टर्स बिलबिला उठे। पर एक कटु सच्चाई सबके सामन आ गई।डाक्टरों के बौखलाहट से ये तो समझ मे आ गया कि बाबा रामदेव ने मधु मख्खी के छत्ते को पत्थर मारा है जो बहुत सोची समझी स्टाइल से भारत की #प्राकृतिक_चिकित्सा को आहिस्ता आहिस्ता खत्म कर रहे थे और उसमे काफी हद तक सफल भी थे।
हमारे बड़े भाई डाॅ०उमा शंकर सिंह जी डा. उमा शंकर सिंह  ने पूरे प्रकरण पर गहराई से विचार कर परिचित डाक्टरों के समक्ष कुछ सवाल उठाये पर किसी भी #डाक्टर ने इसका जबाब नही दिया। बल्क सच तो ये है कि धरती के भगवान कहे जाने वाले किसी डाक्टर के पास इन सवालों का जबाब है भी नही। यदि है तो वे देना नही चाहते। कुल मिला कर स्थिति जलेबी की तरह गोल गोल घूम वैसे हीह बन जाती है जो आपको बेहतरीन स्वाद के आड़ मे अनजानेन ही ढेर सारी चीनी खिला देती है। भाई उमा शंकर सिंह का #स्वैच्छिक_संगठनों मे कार्य करने व #ग्रामीण_स्वास्थ्य_शिक्षा पर कार्य करने का लंबा अनुभव रहा है। उनके उठाये सवाल हमें आधुनिक चिकित्सा पद्धति विशेषकर डाक्टरों के नीयत व कर्तव्य पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हैं।
वे सभी सवाल आज ज्यादा प्रासंगिक है जिन्हे अब जनता पूछना चाह रही है डाक्टरों से भी  और सरकार से भी कि...

1.#एलोपैथी की दवाई में #MRP की जगह #प्रोडक्शन_कॉस्ट बता दे तो बड़ी बड़ी #फार्मास्युटिकल कंपनीयाँ कितनी लूंट मचा रही है वो जनता को समझ आएगा ।

2.एक ही दवाई की बीस कंपनी के अलग दाम क्यों है?

3.डॉक्टरों को यूरोप की टूर कंपनी वाले क्यों देते हैं ?
डॉक्टरो के घर के AC, TV, Fridge और बहोत सारी बाते #pharma कंपनीयो की देन क्यों होती है..?

4.#जेनरिक दवाइयों को #सरकार को क्यों लाना पड़ा है?

5.कुछ मेडिकल स्टोर्स 20 से 30 % डिस्काउंट क्यों देते हैं? इतना #डिस्काउंट है तो कमाई कितनी है?

6.हॉस्पिटल्स के कमरे का किराया 3 हजार से 60 हजार एक दिन का क्यों है? भारत की 5 स्टार 7 स्टार होटल से भी इन #हॉस्पिटल्स का भाडा ज्यादा क्यों है?

7.#मेडिक्लेम आने के बाद 1996 से मेडिकल #ट्रीटमेंट इतनी महेंगी क्यों हुई?

8.बड़े दवाई के #डिस्ट्रीब्यूटर दस बीस करोड़ की प्रॉपर्टी गाजर मूली के जैसे क्यों खरीदते हैं?

9.जब भी कोई नया हॉस्पिटल तैयार होता है तो वहा की pharmacy वाला वाला दुकान Shops करोडों में कैसे बिकती है

10.केंद्र सरकार भी दवाई की ऊपर भाव क्यों नही बांध सकती है?

11.#लूट_का_लाइसेंस किसने दिया इन फार्मा कंपनियों को?

12.सभी बातों को साइंस से प्रमाणित किया जाना अच्छी बात है लेकिन विज्ञान में आज जो सही है वो कल गलत हो जाता है ऐसा क्यों है?

13.दूसरी #पारम्परिक_दवाईओ को जो आज तक हमारी दादीमाँ और वैध देते आये थे उसको नजरअंदाज करने के लिए #ब्रेनवॉश किस ने किया?

14.दूसरी सब चिकित्सा पद्धतियों को क्यों नजरअंदाज किया गया?

15.एलोपैथी की उम्र कितनी ? प्राचीन #आयुर्वेद कितना पुराना?,
महर्षि #चरक को किसने भुला दिया?

16.भारत मे मौसम अलग अलग है..उस हिसाब से हमारे खान पान है, सेंकडो मिठाई खाने के बाद हमारे बाप दादा 100 साल निकाल लेते थे।

17.#डायबिटीज में सुगर की मात्रा हर चार-पाच साल में नीचे लाने का पाप किसका है?याने जो चार साल पहले #sugar_patient नही था, वो अचानक से अब #Diabetes का रोगी हो गया।
🤔🤔
आप को क्या करना है वो आप को तय करना है। 🤔

*देश की जनता तक #सत्य पहुँचना जरूरी हैं। क्योंकि धरती के भगवान के मुखौटे मे छिपे इन मानवगिद्धों का असली रूप अब ऊजागर होना ही चाहिये।
#धरती_के_भगवान
#मानवगिद्ध

सोमवार, 12 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ धरती के भगवान-3

धरती के भगवान? (भाग-3)

        #एलोपैथी का तो जलवा है ही पर मौका पाते ही #होम्योपैथी वाले भी अपना जलवा दिखा देते है। #बनारस के #भोजूबीर मे विशाल मेगामार्ट के सामने तिराहे के पास एक होम्योपैथी डाक्टर थे #एमएचएमएस। हर मरीज से बातों बातों मे वे अपनी मास्टर डिग्री का जिक्र जरूर कर देते। पर उनके ईलाज के बाद सभी मरीजों की उनके बारे मे आम राय होती थी कि वे #तुक्का_पर_ईलाज करते है। लह गया तो लह गया वरना होम्योपैथी ज्ञान बघारने के लिये #मास्टर_डिग्री का नाम तो है ही।एक बार पत्नी को पीलिया होने पर मैने पत्नी को उन्हे दिखाया। ईलाज शुरू हुआ। शुरूआती परिणाम सकारात्मक भी निकले पर दस दिन बाद टेस्ट कराने पर #बेलीरूबीन काफी बढ़ा हुआ निकला। रिपोर्ट दिखाते समय मैने डाक्टर साहब से जानना चाहा कि सारे दवा परहेज के बावजूद ऐसा कैसे हो गया? ये किसी और बात का लक्षण तो नही?
       डाक्टर साहब ने बड़ा एेंठते हुये जबाब दिया," देखिये, मै इसे समझा नही पाऊगाॅ और आप यह समझ भी नही पायेगें।क्योंकि यह #डाक्टरी है आप की #वकालत नही।"
मेरे लिये ये बड़ी त्रासद स्थिति थी। सरेआम अपमानित महसूस करते हुये मैने कहा" डाक्टर साहब क्षमा किजियेगा। मुझे लगता है कि अगर आप मुझे समझा नही पायेगें तो मेरा ईलाज भी नही कर पायेगें। इसके पीछे के कारण को आप समझ भी नही पायेगें क्योंकि यह डाक्टरी नही #व्यवहारिक_बात है।" बहरहाल मै अपनी पत्नी का ईलाज एक दूसरे डाक्टर साहब से करवाना शुरू किया और आज भी हम लोगों के छोटे मोटे ईलाज के लिये लिये हमारे मोहल्ले के ही बीएचएमएस डाक्टर साहब सस्ता समझाने वाला ईलाज करते हैं। बाद मे वो एमएचएमएस डाक्टर साहब अन्यत्र कालोनी मे मकान  बनवा कर अपनी #क्लिनिक वहां स्थानान्तरित कर लिये। पर उनके पिता जी की होम्योपैथिक दवा की दुकान वही है। आज भी एमएचएमएस डाक्टर साहब की लिखी हुई पेटेण्ट दवाईयां आपको वहीं से ही लेनी पड़ेगी। भले ही आप की खुद की होम्योपैथी दुकान क्यों न हो?
इसे कहते है अपने साथ साथ अपने #परिवार का भी #रोजगार।
चलती दुकान का नाम है हूजूर।
#धरती_के_भगवान?
#मानवगिद्ध

रविवार, 11 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ धरती के भगवान-4

धरती के भगवान? (भाग-4)
     
         #कोविड_टीकाकरण के दूसरे डोज के लिये #वाराणसी के #नगरीय_सामुदायिक_स्वास्थ्य_केन्द्र_चौकाघाट जाना हुआ। पुराने जीटी रोड चौकाघाट से ढेलवरिया वाले पहुंच मार्ग पर एकदम रेलवे लाईन के बगल मे बना है यह स्वास्थ्य केन्द्र। पहले मात्र प्रसूति #चिकित्सालय के रूप मे स्थापित केन्द्र को लगभग दस साल पहले उच्चीकृत कर #यूसीएचसी बना कर सरकार ने ढेर सारे #चिकित्सा_विशेषज्ञों की नियुक्ति भी कर दिया। पेड़ पौधों के बीच बने अस्पताल मे गैरचिकित्सकीय एवं पैरा मेडिकल स्टाफ की अच्छी खासी फौज है।आजकल कोविड टीकाकरण के लाभार्थियों की भीड़ है बाकी समय पर #डिलीवरी_केसेज को छोड़ कर कोई नही दिखता। कारण डाक्टर साहब नही रहते। यहां दशको से भी अधिक समय से जमी हुई दो #एएनएम डिलीवरी केसेज को अपने ढंग से डील कर लेती है। यह डील तीन हजार तो कभी सौ दो सौ रूपये कम मे आराम से हो जाती है।
यूं तो यहां जनरलसर्जन, एनेस्थिसिया स्पेशलिस्ट, फीजिशियन, गायनोलाजिस्ट स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ,बालरोग विशेषज्ञ जैसे पदों पर कई नियुक्तियां है पर चिकित्सालय प्रभारी #डा०मनमोहन व फीजिशियन #डा०निशान्त_चौधरी को छोड़ कर बाकी डाक्टरों को मरीज तो क्या शायद अस्पताल ने भी कभी देखा हो? न आने वाले डाक्टरों का #काकस इतना मजबूत है कि उन्होने अपनी ओर उंगली न उठने के लिये #सीएमओ कार्यालय मे सेटिंग कर अस्पताल मे बैठने और मरीज देखने वाले डा० मनमोहन की  एडिशनल ड्यूटी #पोस्टमार्टम हाऊस मे तो डा०निशान्त की ड्यूटी #कोरोना_हास्पीटल मे लगवा दिया ताकि वे लोग भी अस्पताल पर न रह सकें।इन डाक्टरों मे कोई #मंत्री का रिश्तेदार है तो कोई #सचिव का खास।
       ऊपर से तुर्रा यह कि इन सभी डाक्टरों के #हस्ताक्षर उपस्थिति पंजिका पर ठीक दस बजे हो जाते है। #ड्यूटीरूम मे रखे #रजिस्टर पर डाक्टर साहब के गैरमौजूदगी मे उनके दस्तखत कैसे हो जाते है? इसका राज भी यहां दशकों से मालिकाना चला रही उन्ही दोनों एएनएम्स को ही पता है। अगर इन डाक्टरों के #सीयूजी मोबाईल फोन के #लोकेसन को अस्पताल के #रिकार्ड से मिलान कर लिया जाये तो धरती के इन कथित भगवानों की #मरीजों के प्रति निष्ठा व #चिकित्सा सेवा के प्रति #समर्पण का सच सामने आ जायेगा।
       टीका लगवाने के बाद चिकित्साकर्मियों को धन्यवाद देने के लिये वहीं बैठे एक स्थानीय व्यक्ति से मैने पूछा कि "इंचार्ज साहब, कब मिलेगें?" तो उसने बताया कि "भैया छक्के पंजे से दूर बेचारे बस इंचार्ज साहब और चौधरी साहब ही तो मिलते है यहां।बाकी का पता नही।"
मेरे कारण पूछने पर उसने बड़ी मासूमियत से बताया कि " पहले जो इंचार्ज साब थी वो बहुत बड़े नेता की बीबी थी, वे तो चार्ज लेने व देने भी अस्पताल पर नही आई थी।अभी के दो दो डाक्टर साहब एक ही परिवार के है। वे यहीं पाण्डेपुर मे अपना अस्पताल देखेगें कि यहां आयेगें? #सरकार अनायास का डेढ़ दो लाख रूपये दे ही रही है।"
        धरती के भगवान कहे जाने वाले सरकारी सेवारत #राजपत्रित_चिकित्सकों के अपने निजी नर्सिंगहोम, प्राईवेट क्लिनिक व आन काल विजिट से अंधाधुंध धन कमाने मे पूरे मनोयोग से    चिकित्सा सेवा देने वाले इन मानवगिद्धों के लिये क्या कोई और नाम सार्थक हो तो अवश्य सुझाईयेगा।
आखिर बड़े मेहनत से काफी पैसे खर्च कर डाक्टर बने है हूजूर।
अब पैसा नही लूटेगें तो कब लूटेगे?
#धरती_के_भगवान?
#मानवगिद्ध
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