सोमवार, 12 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ धरती के भगवान-3

धरती के भगवान? (भाग-3)

        #एलोपैथी का तो जलवा है ही पर मौका पाते ही #होम्योपैथी वाले भी अपना जलवा दिखा देते है। #बनारस के #भोजूबीर मे विशाल मेगामार्ट के सामने तिराहे के पास एक होम्योपैथी डाक्टर थे #एमएचएमएस। हर मरीज से बातों बातों मे वे अपनी मास्टर डिग्री का जिक्र जरूर कर देते। पर उनके ईलाज के बाद सभी मरीजों की उनके बारे मे आम राय होती थी कि वे #तुक्का_पर_ईलाज करते है। लह गया तो लह गया वरना होम्योपैथी ज्ञान बघारने के लिये #मास्टर_डिग्री का नाम तो है ही।एक बार पत्नी को पीलिया होने पर मैने पत्नी को उन्हे दिखाया। ईलाज शुरू हुआ। शुरूआती परिणाम सकारात्मक भी निकले पर दस दिन बाद टेस्ट कराने पर #बेलीरूबीन काफी बढ़ा हुआ निकला। रिपोर्ट दिखाते समय मैने डाक्टर साहब से जानना चाहा कि सारे दवा परहेज के बावजूद ऐसा कैसे हो गया? ये किसी और बात का लक्षण तो नही?
       डाक्टर साहब ने बड़ा एेंठते हुये जबाब दिया," देखिये, मै इसे समझा नही पाऊगाॅ और आप यह समझ भी नही पायेगें।क्योंकि यह #डाक्टरी है आप की #वकालत नही।"
मेरे लिये ये बड़ी त्रासद स्थिति थी। सरेआम अपमानित महसूस करते हुये मैने कहा" डाक्टर साहब क्षमा किजियेगा। मुझे लगता है कि अगर आप मुझे समझा नही पायेगें तो मेरा ईलाज भी नही कर पायेगें। इसके पीछे के कारण को आप समझ भी नही पायेगें क्योंकि यह डाक्टरी नही #व्यवहारिक_बात है।" बहरहाल मै अपनी पत्नी का ईलाज एक दूसरे डाक्टर साहब से करवाना शुरू किया और आज भी हम लोगों के छोटे मोटे ईलाज के लिये लिये हमारे मोहल्ले के ही बीएचएमएस डाक्टर साहब सस्ता समझाने वाला ईलाज करते हैं। बाद मे वो एमएचएमएस डाक्टर साहब अन्यत्र कालोनी मे मकान  बनवा कर अपनी #क्लिनिक वहां स्थानान्तरित कर लिये। पर उनके पिता जी की होम्योपैथिक दवा की दुकान वही है। आज भी एमएचएमएस डाक्टर साहब की लिखी हुई पेटेण्ट दवाईयां आपको वहीं से ही लेनी पड़ेगी। भले ही आप की खुद की होम्योपैथी दुकान क्यों न हो?
इसे कहते है अपने साथ साथ अपने #परिवार का भी #रोजगार।
चलती दुकान का नाम है हूजूर।
#धरती_के_भगवान?
#मानवगिद्ध

रविवार, 11 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ धरती के भगवान-4

धरती के भगवान? (भाग-4)
     
         #कोविड_टीकाकरण के दूसरे डोज के लिये #वाराणसी के #नगरीय_सामुदायिक_स्वास्थ्य_केन्द्र_चौकाघाट जाना हुआ। पुराने जीटी रोड चौकाघाट से ढेलवरिया वाले पहुंच मार्ग पर एकदम रेलवे लाईन के बगल मे बना है यह स्वास्थ्य केन्द्र। पहले मात्र प्रसूति #चिकित्सालय के रूप मे स्थापित केन्द्र को लगभग दस साल पहले उच्चीकृत कर #यूसीएचसी बना कर सरकार ने ढेर सारे #चिकित्सा_विशेषज्ञों की नियुक्ति भी कर दिया। पेड़ पौधों के बीच बने अस्पताल मे गैरचिकित्सकीय एवं पैरा मेडिकल स्टाफ की अच्छी खासी फौज है।आजकल कोविड टीकाकरण के लाभार्थियों की भीड़ है बाकी समय पर #डिलीवरी_केसेज को छोड़ कर कोई नही दिखता। कारण डाक्टर साहब नही रहते। यहां दशको से भी अधिक समय से जमी हुई दो #एएनएम डिलीवरी केसेज को अपने ढंग से डील कर लेती है। यह डील तीन हजार तो कभी सौ दो सौ रूपये कम मे आराम से हो जाती है।
यूं तो यहां जनरलसर्जन, एनेस्थिसिया स्पेशलिस्ट, फीजिशियन, गायनोलाजिस्ट स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ,बालरोग विशेषज्ञ जैसे पदों पर कई नियुक्तियां है पर चिकित्सालय प्रभारी #डा०मनमोहन व फीजिशियन #डा०निशान्त_चौधरी को छोड़ कर बाकी डाक्टरों को मरीज तो क्या शायद अस्पताल ने भी कभी देखा हो? न आने वाले डाक्टरों का #काकस इतना मजबूत है कि उन्होने अपनी ओर उंगली न उठने के लिये #सीएमओ कार्यालय मे सेटिंग कर अस्पताल मे बैठने और मरीज देखने वाले डा० मनमोहन की  एडिशनल ड्यूटी #पोस्टमार्टम हाऊस मे तो डा०निशान्त की ड्यूटी #कोरोना_हास्पीटल मे लगवा दिया ताकि वे लोग भी अस्पताल पर न रह सकें।इन डाक्टरों मे कोई #मंत्री का रिश्तेदार है तो कोई #सचिव का खास।
       ऊपर से तुर्रा यह कि इन सभी डाक्टरों के #हस्ताक्षर उपस्थिति पंजिका पर ठीक दस बजे हो जाते है। #ड्यूटीरूम मे रखे #रजिस्टर पर डाक्टर साहब के गैरमौजूदगी मे उनके दस्तखत कैसे हो जाते है? इसका राज भी यहां दशकों से मालिकाना चला रही उन्ही दोनों एएनएम्स को ही पता है। अगर इन डाक्टरों के #सीयूजी मोबाईल फोन के #लोकेसन को अस्पताल के #रिकार्ड से मिलान कर लिया जाये तो धरती के इन कथित भगवानों की #मरीजों के प्रति निष्ठा व #चिकित्सा सेवा के प्रति #समर्पण का सच सामने आ जायेगा।
       टीका लगवाने के बाद चिकित्साकर्मियों को धन्यवाद देने के लिये वहीं बैठे एक स्थानीय व्यक्ति से मैने पूछा कि "इंचार्ज साहब, कब मिलेगें?" तो उसने बताया कि "भैया छक्के पंजे से दूर बेचारे बस इंचार्ज साहब और चौधरी साहब ही तो मिलते है यहां।बाकी का पता नही।"
मेरे कारण पूछने पर उसने बड़ी मासूमियत से बताया कि " पहले जो इंचार्ज साब थी वो बहुत बड़े नेता की बीबी थी, वे तो चार्ज लेने व देने भी अस्पताल पर नही आई थी।अभी के दो दो डाक्टर साहब एक ही परिवार के है। वे यहीं पाण्डेपुर मे अपना अस्पताल देखेगें कि यहां आयेगें? #सरकार अनायास का डेढ़ दो लाख रूपये दे ही रही है।"
        धरती के भगवान कहे जाने वाले सरकारी सेवारत #राजपत्रित_चिकित्सकों के अपने निजी नर्सिंगहोम, प्राईवेट क्लिनिक व आन काल विजिट से अंधाधुंध धन कमाने मे पूरे मनोयोग से    चिकित्सा सेवा देने वाले इन मानवगिद्धों के लिये क्या कोई और नाम सार्थक हो तो अवश्य सुझाईयेगा।
आखिर बड़े मेहनत से काफी पैसे खर्च कर डाक्टर बने है हूजूर।
अब पैसा नही लूटेगें तो कब लूटेगे?
#धरती_के_भगवान?
#मानवगिद्ध
#UCHC_choukaghat

व्योमवार्ता/धरती के भगवान -2

धरती के भगवान? (भाग-2)

        एक मित्र ने #बीएचयू के #मेडिसिन विभाग के एक पूर्व प्रोफेसर साहब के यहां का अनुभव साझा किया। #बनारस के #सुसुवाहीं मे क्लिनिक वाले प्रोफेसर साहब के यहां अलसुबह से मरीजों के नंबर लगने लगते हैं। नंबर लगने के साथ ही #परामर्श शुल्क जमा हो जाता है। यदि आप परामर्श शुल्क के साथ ही उतनी राशि की सुविधा शुल्क काउंटर पर पकड़ा दें तो आप का नंबर 1से 10, 15 के बीच आ जायेगा। मित्र डाक्टर साहब से पूर्व परिचित रहे हैं लिहाजा उन्होने इस बात को #डाक्टर साहेब से कहा तो उन्होने हंसते हुये कहा कि "अरे सब लड़के है इसी तरह दो चार रूपये एक्स्ट्रा पा जाते है।" अगली बार काउंटर वाले लड़के से मित्र ने यह बात पूछा तो उसने बताया कि "कुल पैसवा हमी थोड़े रख लेते हैं उसका भी तो सर को हिसाब देना पड़ जाता है। देखिये यह सीसी कैमरा वगैरह इसी लिये तो लगा है।"
यह भी डाक्टरी का एक #नया_चलन है। परामर्श का अलग और नंबर लगाने का अलग ।
मरीज की तो अपनी मजबूरी है उसे दिखाना ही है। नही तो उस दिन का पूरा समय गाड़ी घोड़ा का खर्चा नुकसान जायेगा इससे अच्छा है यहीं पैसा दे कर खाली हो जाओ।
मरीज की परेशानी का रास्ता तो तलाश रखा है इन मानवगिद्धों ने।
चलती दुकान का नाम है हूजूर।
#धरती_के_भगवान?
#मानवगिद्ध

व्योमवार्ता/ धरती के भगवान -1

धरती के भगवान? (भाग-1)

#बनारस के #वरूणापार के एक इण्डोक्राईन विशेषज्ञ के यहां नंबर मोबाईल से सुबह 7से 7.30बजे लगता है। मोबाईल ठीक 7 बजे खुलेगा और लगातार बिजी रहते हुये 7.29 पर स्विचआफ हो जायेगा।
मरीज परेशान हो पर उनके स्टाफ का क्या?
वे तो ये भी नही बताने की जहमत नही उठाते कि #डाक्टर साहब आज है ही नही।
चलती दुकान का नाम है हूजूर।
#धरती_के_भगवान?
#मानवगिद्ध?

व्योमवार्ता/ #धरतीके भगवान

धरती के भगवान?

     अभी #डाक्टर्स_डे बीते तीन चार दिन ही हुये।आज भी हमारे समाज मे ऐसे #डाक्टर है जिनके प्रति हम श्रद्धा व सम्मान से नतमस्तक हो जाते हैं। #कोरोना काल मे डाक्टर हमे भगवान के रूप मे दिखे। इसमें कोई संदेह नही कि डाक्टरों एवं #पैरा_मेडिकल स्टाफ सहित पुलिस, सुरक्षा बल, बैंककर्मी एवं अन्य फ्रण्टल सेवारत कर्मियों ने अपनी भूमिका बहुत ही अच्छे ढंग से निर्वहन किया परंतु #चिकित्साकर्मियों के सफेद चोंगे और उनके सहायकों दुकानदार, पीआरओ, अन्य रूपों मे बहुत सारे मानवगिद्ध भी नजर आये जो इस आपदा मे भी अपना #शैतानी_चेहरा और #धनपिपासा को दिखाने से बाज नही आये।
       सच तो ये है कि ऐसे मानवगिद्ध हमारे समाज मे पिछले 30 सालों से लगातार बढ़ रहे हैं  । यह #श्रृंखला ऐसे ही मानव गिद्धों पर है जिन्हे हम मजबूरीवस धरती के भगवान मानते हैं।
            आप सभी इस तरह के व्यक्तिगत अनुभवों से दो चार हो चुके है और हो रहे है। कृपया उन्हे व्यक्त कर इन मानवगिद्धों को भगवान के चोंगें से बाहर कर समाज को उनका #वास्तविक_चेहरा दिखाने मे सहायक बनें।
#धरती_के_भगवान ?
#मानवगिद्ध

व्योमवार्ता/ आर्य सनातनी ही भारत के मूल निवासी है़ंं

व्योमवार्ता/आर्य(सनातनी) ही भारत के मूल निवासी है/ व्योमेश चित्रवंश की डायरी 11जुलाई2021

     नये नये नेता बने एक मित्र कभी कभी हमसे #राजनीतिक_बहस करना चाहते हैं।आजकल के राजनीतिक गणित के जमाने के हिसाब से खुद को #नवबौद्ध कहते है। नेता है तो अब तक चल रहे सभी स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाना लाजमी है।सत्ता के विरोध मे है तो भारतीय जनता पार्टी के साथ साथ #भारतीय_संस्कृति, #भारतीय_इतिहास के विरोघ मे बोलना व #कम्यूनिष्ट_विचारधारा का समर्थन करना उनका राजनीतिक घर्म व कर्तव्य बन गया  है । कल बहस कर रहे थे कि केवल #आदिम_जनजातिया़ ही #भारतीय है बाकी सभी बाहरी है। #आर्य बाहर से आये। मै आज तक ये नही समझ पाया कि ये कथित नेता, नवबौद्ध , #धर्मांतरित_ईसाई, पांच सात पीढ़ी #इस्लाम बने कतिपय लोग कैसे यहां के आर्य #मूल_निवासियो़ से स्वयं  को पृथक कर किस #डीएनए_विश्लेषण के आधार पर  अपने को मूल #आदिम_भारतीय बताते हैं?
         बहरहाल इस तरह के  लोगों से मैं प्राय: सुना करता हूं कि आर्य बाहर से आये । पर ये लोग #रोमिलाथापर, #ईरफानहबीब, #मैक्समूलर के #स्वविरोधाभाषी व #भ्रामक सिद्धान्तो को भी स्पष्ट नही कर पाते। मैं आज उनसे एक बेहद व्यवहारिक बात पूछना चाहता हूँ।
                  #सिकंदर बाहर से आया, राजा #पुरु से युद्ध हुआ । #मुहम्मद_बिन_कासिम आया, राजा #दाहिर से युद्ध हुआ । मुहम्मद #गौरी आया, #पृथ्वीराज से युद्ध हुआ । #बाबर आया, #राणासांगा से युद्ध हुआ । #अकबर से #महाराणाप्रताप का युद्ध हुआ और अकबर से ही रानी #दुर्गावती का भी युद्ध हुआ । #औरंगजेब से #शिवाजी का युद्ध हुआ ।
  अब #अंग्रेजों पर आते हैं ।
अंग्रेजों से रानी #लक्ष्मीबाई का युद्ध हुआ । अंग्रेजों से #तात्याटोपे का युद्ध हुआ । अंग्रेजों से #नानासाहेब का युद्ध हुआ । उसके बाद बहुत से क्रांतिकारी हैं जो हमसब जानते होंगे ।
सवाल ये है कि
अगर आर्य बाहर से आये ! तो कौन सा #आर्य राजा या #हमलावर आया?
    किसी एक का नाम बता दीजिए, उससे जिसने युद्ध किया होगा उसका भी नाम बता दीजिए।
या फिर !
#झूठी_अफवाह, फैलाना बन्द करिए।
     #आर्यों को विदेशी बताना, अंग्रेजो और #वामपंथी_लेखको का षड्यंत्र था । आर्यों के विदेशी होने की झूठी बाते #NCERT की किताबों में इस देश की आर्य(हिंदू)जाति को बतायी जाती है, पढ़ाई जाती है और इस देश के युवा बिना सोचे समझे उसी को सच मान बैठते हैं ।
          इस देश में सैकड़ों ऐसी #खुदाई हो चुकी हैं जिनसे साफ हो चुका है कि आर्य #विदेशी नहीं, इसी देश के #मूल_निवासी हैं । #हड़प्पा और #मोहनजोदड़ो की श्रेष्ठ #सभ्यता भी आर्यो द्वारा ही बसाई गयी हैं । विश्वास ना हो तो #राखीगढ़ी में जो खुदाईयाँ हुई हैं,  उन्हे देखिये।उनसे साफ हो चुका है कि आर्य (सनातनी) भारत के ही मूलनिवासी हैं ।
#व्योमवार्ता
(काशी, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा, सं०२०७८वि० तदनुसार 11जुलाई 2021, रविवार)
http://chitravansh.blogspot.com

शुक्रवार, 18 जून 2021

मेरे लिये गौरव का क्षण / #यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती का विमोचन प्रख्यात चि्तक व विधानसभाध्यक्ष पं०हृदय नारायण दीक्षित जी के करकमलों से

मेरे लिये गौरव का क्षण
(व्योमेश चित्रवंश की डायरी,17जून2021)

आज नवगीत के उन्नायक सुप्रशिद्ध साहित्यकार डाॅ०शभुनाथ सिंह जी के १०५वीं जयन्ती पर आभाषी समारोह मे उत्तर प्रदेश के #विधानसभाध्यक्ष व चिंतक आदरणीय पं० हृदय नारायण दीक्षित जी के कर कमलों द्वारा मेरी कृति '#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती' का विमोचन होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उनके आशीर्वाद व प्रशंसात्मक प्रोत्साहन के लिये आह्लादित हूं।
बहुत बहुत आभार #डाॅ०_शंभुनाथसिंह_रिसर्च_फाऊण्डेशन के राजीव भैया Rajeev Kumar Singh  व रोली भाभी Rolee Singh , इस बरसात मे भी स्वयं प्रयास कर मेरा सपना सच करने के लिये।
आदरणीय गुरूवर डाॅ०राम सुधार सिंह सर Ramsudhar Singh का जिन्होने संक्षिप्त परिचय मे पूरी पुस्तक का भाव व्यक्त किया। फाऊण्डेशन की अध्यक्षा विजयश्री दीदी Vijayshree Singh , प्रशिद्ध नवगीतकार आदरणीय डाॅ०बुद्धिनाथ मिश्र जी, हिन्दुस्तानी अकादमी प्रयागराज के अध्यक्ष डाॅ उदय प्रताप सिंह व वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ० इंदीवर जी एवं सभी शुभेच्छुओं के प्रति आभार।
आप सब का स्नेह बना रहे🙏
(काशी,17 जून2021, गुरूवार)
http://chitravansh.blogspot.com

बुधवार, 9 जून 2021

अनुज मित्र राजीव आर्यावर्त द्वारा "यह सड़क मेरे गांव को नही जाती" पढ़ कर लिखी गई यह पाती

अनुज मित्र राजीव आर्यावर्त द्वारा "यह सड़क मेरे गांव को नही जाती" पढ़ कर लिखी गई यह पाती
बहुत बहुत आभार व स्नेह राजीव आर्यावर्त ।आपने किताब पढ़ते हुये मेरे मनोभावों को महसूस ही नही किया है वरन सच्चे रूप मे जिया है।

बड़े भैया व्योमेश चित्रवंश जी,
          आपको सादर सादर चरण स्पर्श तथा कोटि कोटि धन्यवाद जो आप अपनी किताब के माध्यम से मुझे और अपने पाठकों को आपने अपने अपने बचपन में जाने का मौका दिया है
     जैसा कि हम सब जानते हैं कि मनुष्य को अपना बचपन कभी नहीं भूलता है और ना ही उससे मधुर और कल्पनाशील कोई और याद होती है दूसरे शब्दों में अगर मैं कहूं तू मनुष्य पूरा जीवन अपने बचपन को ही जीता रहता है और व्योमेश भैया आपने अपने इस संस्मरण यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती है के माध्यम से मेरे जैसे पाठकों को बहुत ही आहिस्ता आहिस्ता उंगली पकड़कर उनके बचपन में ले जाती है और और उन दिनों को क्रमबद्ध ढंग से याद दिलाती है साथ ही साथ मन में यह कसक और कचोट पैदा करती है की हर एक भाव हर एक विचार अपने शब्दों के माध्यम से आप सभी को बताऊं लेकिन आप जानते ही हैं कि हर एक भाव हर एक विचार लोगों के साथ प्रकट कर पाना असंभव होता है मैं भी चाहता हूं कि मैं अपने हर एक विचार को उन बचपन की यादों को बताऊं लेकिन वह शब्द वह वाक्य मेरे पास शायद नहीं है ।परंतु आप कोटि कोटि  बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से हर घटना और हर पात्र का बहुत बहुत ही सुंदरता और सटीकता से वर्णन किया है और हर घटना को जो मेरे बचपन में या हम लोगों की उम्र के लोगों के बचपन में घटती थी चाहे वह पंपिंग सेट पर नहाना हो बचपन के खेल कूद जैसे हॉकी कबड्डी सरपट सुटूर आदि तमाम खेल और साथ ही साथ गांव में होने वाले तमाम त्योहारों, घटनाओं ,सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैवाहिक आयोजनों का भी आपने बहुत ही सटीक और सुंदर वर्णन किया है इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी। आपकी इस किताब को अब तक में है दो बार पढ़ चुका हूं और ऐसा लग रहा है कि जैसे अभी भी पूर्णरूपेण मन भरा नहीं है वैसे ही जैसे बहुत स्वादिष्ट भोजन करने पर पेट तो भर जाता है लेकिन  आत्मा अतृप्त रह जाती है अर्थात मन बार-बार  आपकी किताब पढ़ना चाहता है और आपकी किताब दो बार पढ़ने के बाद भी ऐसा लग रहा है की और पढ़ा जाए।
     इसके साथ ही आपकी किताब का शीर्षक "#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नहीं_जाती ''आज के मानव के मनोभाव को पूर्णरूपेण व्यक्त करती है इसके साथ ही वर्तमान ग्रामीण समाज और उसमें उसमें हुए आर्थिक ,सामाजिक, राजनैतिक ,पारिवारिक परिवर्तनों को भी बहुत ही बृहद रूप में हम लोगों के सामने रखती है यह किताब "यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती ''।
    आपकी किताब को पढ़कर इसके बारे में और समाज और देश के बारे में कहने के लिए तो मेरे पास बहुत कुछ है और शायद कई दिन इसमें लिखना पड़ जाए मुझे परंतु मैं अपने मित्रों भाइयों और शुभचिंतकों से यही अनुरोध करूंगा की आप सभी लोग भी इस किताब को एक बार अवश्य पढ़ें और एक बार फिर से अपने बचपन को और उन यादों को फिर से जिएं और उन यादों में भींग कर सराबोर हो जाएं।
   अंत में एक बात और कहूंगा व्योमेश भैया कि आज के 100-200 साल बाद जब हमारी पीढ़ी और तब की पीढ़ी के बीच में जब तुलना होगी तो उस समय की पीढ़ी अगर आपकी किताब को पढ़ेगी या आज की ही पीढ़ी पढ़ेगी तो अवश्य समझ जाएगी कि उसके पूर्वज जो गांव में रहते थे उनमें कितना अपनत्व, कितनी एकता ,कितनी समझ, परस्पर भाईचारा, प्रेम और लगाव और उच्च कोटि के संस्कार थे और आपकी किताब उसका जीवंत और मूल्यवान प्रमाण होगी व्योमेश भैया।
    पुनः राजर्षि के पावन धरा के सपूत व्योमेश चित्र वंश भैया के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन और अभिनंदन करते हुए इतनी उच्च कोटि की रचना के लिए आपको धन्यवाद करता हूं ताकि आप ऐसे ही नए नए विषयों पर अपनी कलम चलाते रहें और सभी राजर्षि के भाइयों मित्रों और भारत वासियों को आनंदित और प्रफुल्लित करते रहें।
   लेख में किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा।
                                                             #राजीव_आर्यावर्त
  भूतपूर्व छात्र
उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी
पुस्तक का नाम "यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती"
    लेखक श्री #व्योमेश चित्रवंश जी एडवोकेट वाराणसी कचहरी  ।
भूतपूर्व छात्र उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी

शनिवार, 5 जून 2021

पर्यावरण रक्षा के लिये सुंदर लाल बहुगुणा जी का मंत्र

व्योमवार्ता/पर्यावरण रक्षा के लिये सुंदर लाल बहुगुणा जी का मंत्र.....
(व्योमेश चित्रवंश की डायरी,5जून2021) 

   वह शायद बीसवीं सदी के आखिरी दशक का तीसरा या चौथा वर्ष रहा होगा। हम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र थे तब तक मेरे लिखे स्तंभ और समसामयिक लेख देश के कई समाचारपत्रों मे छपने लगे थे। मन मे आरक्षण आंदोलन की विफलता को ले कर एक निराशा थी तो दूसरी ओर समाज देश के लिये कुछ अलग करने की सुलगती चिन्गारी जैसी ईच्छा। बड़े भाई राजीव कुमार सिंह के स्नेहसंबंधों के चलते उनके बाबूजी के स्मृति मे बने स्वैच्छिक संगठन डाॅ० शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाऊण्डेशन से जुड़ाव हो चुका था वहीं उस समय के हमउम्र के साथी और  सामाजिक कार्यकर्ता डाँ०लेनिन जैसे मित्रों से सामाजिक सरोकारों पर चर्चायें होती रहती थी। उसी समय देश के जाने माने पर्यावरण कार्यकर्ता और हिमालय बचाओ आंदोलन के प्रमुख बाबा सुंदर लाल बहुगुणा जी का काशी आना हुआ। डा० लेनिन से वे पूर्व परिचित थे।सो डा० लेनिन के साथ ही हम भी उनसे मिलने गये संयोगवश काशी के सांस्कृतिकविद् और इन्टैक के नवनीत रमण भी बहुगुणा जी से मिलने आये थे।आठ दस लोग और थे जिनमे ज्यादातर हम लोगों के ही समवयस्क थे। चर्चा चल रही थी टिहरी बांध से लेकर उसके दुष्प्रभाव की, अविरल गंगाजल को बांधे जाने से गंगा जल के औषधीय गुणों के समाप्ति और प्रदूषण की। जो आज दिखने भी लगा है। बाबा के पास बताने के लिये बहुत कुछ था उनका विशाल अनुभव, संघर्ष, पीड़ा, पर्यावरणीय भविष्य को ले कर आशंकाये और सत्ता से संघर्ष मे असहाय होने की बेबसी। उनके मन की पीड़ा उनके वाणी के थरथराहट और आँखों मे बार बार छलकते आँसूओं मे रह रह बाहर आ जा रही थी। हम लोग समझ नही पा रहे थे कि हम जैसे लोग बाबा की पीड़ा को कैसे बाँट सकते है। तब नवनीत रमण ने बहुगुणा बाबा से पूछ ही लिया कि "बाबा हम लोग बनारस मे रह कर अपनी पढ़ाई लिखाई करते हुये आप का साथ कैसे दे सकते हैं?" और बहुगुणा बाबा ने जो आगे कहा वो मुझे आज तक रोमांचित कर जाता है। बहुगुणा जी ने हम लोगों से अपने आंदोलन मे शामिल होने को नही कहा। हमसे धरना प्रदर्शन जूलूस निकालने की अपेक्षा नही की बल्कि बहुगुणा जी ने बड़ी ही गंभीरता से कहा था कि
"बेटा,यहां किसी को साथ देने वाली बात ही नही है। खुद के लिये करने वाली बात है। आप जब किसी से कुछ मांगते हो तो उसे वापस करते हो न। ठीक उसी तरह हम प्रकृति देवता से जो लेते हैं उसे वापस करना हमारा धर्म है नही तो वह ऋण हम पर बना रहेगा।"
"परंतु कैसे बाबा? हम तो न उतने सक्षम है न ही हमारे पास जमीन जगह है कि कुछ कर सके?" हममें से किसी ने वास्तविक उत्सुकता जगाई थी।तब उन्होने बड़े शांत चित्त से एक सुझाव (मंत्र) दिया। हां, मै उनके उस सुझाव को मंत्र ही मानता हूं जो हम सब कर सकते है और समाज देश पर्यावरण को अपने स्तर से लाभ दे सकते हैं।
" एक मुट्ठी किसी भी वृक्ष के बीज ले लो और जहां कहीं तुम्हे खाली जगह दिखे उसमे बिखेर दो। प्रकृति देवता उन्हे अपने जरूरत से सहेज लेगें।अगर तुम्हारे एक मुट्ठी बीज से एक पौधा भी पनप कर वृक्ष बन गया तो तुम्हारा प्रयास सार्थक होगा।"
उसी वर्ष से हमने वृक्षारोपण प्रारंभ किया। आज अपने गांव से लेकर शहर तक अपने लगाये हुये लगभग तीन सौ से अधिक पेड़ो को देख कर सूकून मिलता है कि प्रकृति देवता के समस्त ऋणों मे थोड़ा सा ही हमने चुकाने का प्रयास तो किया है। गांव से लेकर आयर,पिण्ड्रा, लमही, सिगरा, लालपुर कालोनी, यू पी कालेज, कचहरी, मिंटहाऊस के पीछे कटिंग मेमोरियल प्राईमरी स्कूल, डगमगपुर कृषि फार्म, पाण्डेयपुर तालाब व पंचकोसी मार्ग पर लहलहाते पेड़ो को देख खुद को मिलने वाली खुशी को वास्तविक रूप से वही समझ सकता है जिसने कभी अपने लगाये हुये पेड़ के नीचे खड़े होकर उसकी छाया व हवा का सूकून महसूस किया हो। ऐसे मे साथ के मित्रों सहयोगियों अग्रजों का आभार आजीवन स्मरणीय रहेगा जिनमे राजीव भैया, सुधीर भाई, प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र के राजीव गोड़, ग्रीन सोसाईटी के जावेद, यू पी कालेज के डा० अरविन्द कुमार सिंह भैया, डा० कुलदीप सिंह, हमारी वरूणा अभियान के सूर्यभान सिंह पृथ्वीमित्र, जलप्रहरी फाउण्डेशन के सजल श्रीवास्तव जलप्रहरी और ढेर सारे नाम न याद रहे मित्रों के योगदान से ही यह संभव हो सका।
      बहुगुणा बाबा के मंत्र के अनुसार उसी साल से हर बरस बरसात के बाद जामुन और नीम के बीजों को इकट्ठा कर हाईवे किनारे पुलों पर रेलवे लाईन के किनारे खाली मैदानों और गंगा वरूणा के किनारों पर बिखेरने का संकल्प निर्वहन कर रहे हैं जिसमे गंगा वरूणा के किनारों पर सफलता नही दिखती पर अन्य स्थानों पर बढ़ रहे दो चार नीम व जामुन को देख लगता है कि वृक्षारोपण की मंत्र साधना पूर्णत: तो नही पर अत्यंत अल्प रूप मे ही सफल हो रही है।
       इस वर्ष सुंदर लाल बहुगुणा जी भी अपनी स्मृतियां छोड़ प्रकृति देवता के शरण मे चले गये उनके न रहने पर यह पहला पर्यावरण दिवस है। आज जामुन के बीजो को ईकट्ठा कर रिंगरोड पर बिखरने के लिये थैले मे भरते समय बार बार उनका यह मंत्र याद आ रहा है। अपने से एक मुट्ठी बीज बिखेर दो प्रकृति देवता उन्हे अपने हिसाब से सहेज लेगें। आज कोरोना के इस आपदा काल मे जब हम सब असहाय हो कर प्रकृति देवता पर सब कुछ छोड़ बैठे हैं तब प्राणवायु के सतत प्रवाह के लिये इस मंत्र का औचित्य और भी समझ मे आ रहा है। प्रकृति रक्षति रक्षित:।
(काशी,पर्यावरण दिवस 5जून 2021, शनिवार)
http://chitravansh.blogspot.com