मंगलवार, 24 जुलाई 2018

व्योमवार्ता/ एम्स मे आपरेशन की तारीख मिली 17जनवरी 2024, क्या हम चिकित्सा सेवा मे संवेदनशील नही हो सकते :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24जुलाई 2017, मंगलवार

व्योमवार्ता/ एम्स मे आपरेशन की तारीख मिली 17जनवरी 2024, क्या हम चिकित्सा सेवा मे संवेदनशील नही हो सकते :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24जुलाई 2017, मंगलवार

आज सुबह सुबह दैनिक जागरण के मुखपृष्ठ पर एक खबर पढ़ा कि काशी के अंकित को आपरेशन के लिये मिली 2024 की डेट. मै अंकित को नही जानता, आप भी नही जानते होगें. अंकित 13साल का बच्चा है, उसके दिल मे छेद है, शायद हर्ट का एक वाल्व भी खराब है,उसके पिता दौलतपुर के रहने वाले बेलदार है, बीएचयू द्वारा रेफर किये जाने के बाद जब वे हृदय के आपरेशन के लिये एम्स दिल्ली गये तो छह माह तक ओपीडी व जॉच कार्यवाही के बाद उसके आपरेशन के लिये तारीख दी गई 17जनवरी 2024. अंकित को अभी समय के प्रतीक्षा का अनुभव नही पर उसके पिता को है, वे हताश है साथ ही निराश भी, उन्हे नही मतलब कि सन 24 तक क्या होगा? पता नही गंगा साफ भी हो पायेगीं कि नही? पता नही बनारस स्मार्ट सिटी बन पायेगा कि नही, पता नही राहुल गांधी अविश्वास प्रस्ताव ले कर आने की स्थिति मे होगे या नही, उसे तो अपने बेटे अंकित की चिंता है,
कब इस देश मे हम मेडिकल ईमरजेंसी की बढ़ियॉ और त्वरित सुविधायें दे सकेगें यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शिक्षा, आवास ,रोजगार जैसे बाकी बुनियादी जरूरतें.
आज अंकित के बारे मे सोचते हुये दो साल पहले एक मित्र द्वारा बताई व देखी गयी एम्स की ही एक घटना याद आ गई, मन अभी तक सोच कर उदास हो जाता है.
एक बाप स्ट्रेचर पर तडपते हुए अपने बेटे को दिलासा दिला रहा था कि
"बेटा मैं हूँ न ,
सब ठीक हो जाएगा
बस तुम्हारी MRI होना बाकी है
फिर डॉक्टर तुम्हारा इलाज शुरू कर ,
वो बदकिस्मत बाप अपनी बात पूरी कर पाता उस से पहले ही स्ट्रेचर पर पड़े उसके बेटे को एक भयानक दौरा पड़ा
बात बीच में छोड़ कर वो उसकी पीठ पर थप्पी मारने लगा
अपने इक्लोते बेटे को यूँ तडपते हुए देख उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे।
6 फिट लम्बाई
लम्बा चोडा शरीर था उसका
लेकिन अपने बेटे की दुर्दशा देख उसका सारा पोरुष पिघल गया।
बच्चो की माफिक रोने लगा।
उसे उम्मीद थी कि जल्द उसके बेटे की MRI हो जायेगी।
फिर उसको हुई बिमारी का पता चल जाएगा
और उसका काम हो जाएगा।
होगा क्यों नहीं ?
देश के सबसे बड़े अस्पताल में जो आया था
सारी उम्मीद लेकर आया था।
लेकिन पिछले 1 घंटे से उसका नंबर न आया।
आता भी कैसे ?
अन्दर पहले से MRI करवाने वालो की भीड़ जो थी।
एक MRI में करीब आधा घंटा लगता है।
और 50 संवेदनहीन लोग उस से पहले लाइन लगा के बेठे थे।
और मशीन 24 घंटे चलती तब भी उसका नंबर शायद 2वे दिन आता।
देश का सबसे बड़ा अस्पताल !!
देश के नामी गिरामी विशेषज्ञों से लेस अस्पताल !!
क्या यही हमारी चिकित्सा व्यवस्थायें हैं आज हम 21वीं सदी में हैं
हमारी GDP की रफ़्तार सभी देशो को मात दे रही है।
हमने सबसे सस्ता मंगल यान अन्तरिक्ष में भेज दिया।
हर महीने हर सप्ताह हमारा इसरो नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।
हमें न्युक्लिर मिसाइल ग्रुप की सदस्यता मिलने वाली है।
हम तेजस जैसे हलके लड़ाकू विमान बना रहे हैं।
पंडूबियाँ बना रहे हैं।
लेकिन हमारे अस्पतालों में Xray मशीन नहीं हैं
MRI मशीन नहीं हैं।
होंगी भी कैसे ?
यहाँ MRI मशीन बनाने की तकनीक है ही नहीं
न ही उसके खराब होने पर उसे सुधारने की कोई तकनीक है।
आपको बता दूँ एक उम्दा गुणवत्ता की MRI मशीन करीब 1 करोड़ की आती है और ये चीन जापान कोरिया जैसे देशो से आयात की जाती हैं खराब होने पर या तो मशीन चाइना जायेगी या वहां से टीम यहाँ आएगी इसकी मरम्मत का खर्च लगभग लाखो में आएगा।
अब ये जानकर आपको अमृतानंद की अनुभूति होगी कि 3600 करोड़ की शिवाजी की मूर्ती और लगभग 2100 करोड़ की सरदार पटेल की मूर्ति क्रमश: मुंबई और गुजरात में बन रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है ये दोनों हमारे गौरव थे हैं सदा रहेंगे।इनका मोल इन पैसो से कहीं बढ़कर था।
लेकिन ये भी होते तो कहते कि"अस्पताल बनाओ जरुरी व्यवस्था उपलब्ध कराओ।
उनकी जरुरत की चीजे बनाओ।"
ज्यादा दूर न जाकर नजदीक आते हैं
मेट्रो के अगले चरण में कुल 4 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। और ये उक्त सभी प्रोजेक्ट अपनी अपनी जगह ठीक हैं। लेकिन प्राथमिकताए जैसे रोटी कपडा मकान स्वस्थ्य पीने का पानी ये तो पूरी हों। सबसे बड़े अस्पताल में कम से कम 10 MRI मशीन हो जाए तो किसका क्या बिगड़ जाएगा ?
मेक इन इंडिया के तहत यहाँ ऐसी जरुरत की चीजे बनने सुधरने लगेंगी तो किसका क्या बिगड़ जाएगा ?
लेकिन नहीं !!
हमें सबसे ज्यादा जरुरत अभी 36 राफेल लड़ाकू विमानों की है
जिनकी कीमत करीब 36000 करोड़ है
आखिर में वो बिलखता हुआ बाप स्ट्रेचर पे लेटे हुए अपने बच्चे को रोते हुए बाहर ले गया।
शायद हिम्मत टूट गयी थी उसकी
या उस बच्चे की साँसे !
लेकिन रोज मोत देखने वाले अस्पताल की संवेदनाये तो मर चुकी थी
उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि कोई मरे या जिए
आज दान की जरूरत मंदिरो से ज्यादा अस्पतालों को है ,
पर क्या हमारी प्राथमिकता मे अस्पताल और चिकित्सकीय सुविधाये क्या प्रथम सोपान पर ऱखे जायेगें ?
(बनारस, 24 जुलाई 2018, मंगलवार)
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गुरुवार, 12 जुलाई 2018

व्योमवार्ता / रोजगार चाहिये या सरकारी नौकरी??: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15अक्टूबर 2018,सोमवार

रोजगार चाहिये या सरकारी नौकरी??

देश मे कहीं भी चले जाओ , किसी भी सड़क पे ।
काम लगा है । पुरानी सड़क चौड़ी हो रही है , नई सड़क बन रही है , 2 Lane वाली 4 lane हो रही है । नए Expressway बनाये जा रहे हैं ।शहरों में flyover बन रहे हैं ।

शायद ही कोई रेलवे स्टेशन ऐसा होगा जहां काम न लगा हो । नई रेलवे लाइनें बिछ रही हैं । जो single Track थे उनको Double और Electrify किया जा रहा है ........ देश मे 4 तो नए DFC बोले तो Dedicated Freight Corridor बोले तो वो नई रेल लाइन बनाई जा रही हैं जिनपे सिर्फ मालगाड़ियां दौड़ेंगी ........
देश की जितनी भी Unmanned Railway Crossing बोले तो मानव रहित रेलवे फाटक थे उनके नीचे से अंडरपास बनाये जा रहे हैं ।
100 से ज़्यादा शहरों में तो स्मार्ट सिटी का ही निर्माण कार्य चल रहा है ।
नमामि गंगे में ही गंगा और उनकी सभी सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों में य्ये बड़े बड़े गहरे सीवर पाइप लाइन बिछा के Sewage Treatment Plant बनाये जा रहे हैं ........ बनारस का Sewage Treatment Plant बनारस से 30 Km दूर 30 एकड़ जमीन पे बनाया जा रहा है । पूरे बनारस शहर का Sewage वहां पाइप लाइन से जाएगा और ट्रीट हो के उस पानी को कृषि कार्यों में उपयोग होगा ....... ये सैकड़ों करोड़ का प्रोजेक्ट है और ऐसे ही Sewage Treatment Plants लगभग हर शहर कस्बे में बन रहे हैं ...........
भारत माला , सागर माला जैसे वृहद प्रोजेक्ट्स पे कार्य चल रहा है ।
Bullet Train प्रोजेक्ट पे काम चल रहा है ।
देश मे 1000 से ज़्यादा Airports और हवाई पट्टी अपग्रेड की जा रही हैं ।
देश मे 5 करोड़ शौचालय और 1 करोड़ मकान बन गए प्रधान मंत्री आवास योजना में ............. ये जो मैंने काम गिनाए ये देश मे समानांतर चल रहे कुल बिकास / निर्माण कार्यों का 1% भी नही है .......
गांव गिरांव में आ के देखिये , एक जेसीबी खाली नही है ......... सब किसी न किसी हाईवे निर्माण में लगी है ..........

अब मेरे को ये समझ नही आ रहा कि ये जो देश भर में इतना निर्माण कार्य चल रहा है ये बना कौन रहा है ? ये सब काम कर कौन रहा है ........ अलादीन का जिन्न या Santa Clause ?
कांग्रेसी और रविश कुमार रूपी मीडिया कहता है कि सरकार रोज़गार देने में विफल रही .......... आखिर ये सब निर्माण कार्य करने वाले कामगार जापान सिंगापुर से आये ?
सड़क पे काम मे लगी जेसीबी कौन चला रहा है ? अडानी या अम्बानी ?????

रोज़गार कहते किसे हैं ?
लोगों को रोजगार चाहिए या सरकारी नौकरी ???????
(बनारस,15अक्टूबर 2018, सोमवार)
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रविवार, 8 जुलाई 2018

व्योमवार्ता / कैप्टन विक्रम बत्रा का बलिदान दिवस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

कैप्टन विक्रम वर्मा का बलिदान  दिवस /व्योमवार्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,  07जुलाई 2018,
             मैं या तो जीत का भारतीय तिरंगा लहराकर लौटूँगा या उसमें लिपटा हुआ आऊँगा, पर इतना निश्चित है कि मैं आऊँगा जरूर।'
       कैप्टन बत्रा ने अपने साथी को यह कहकर किनारे धकेल दिया कि तुम्हें अपने परिवार की देखभाल करनी है और अपने सीने पर गोलियाँ झेल गए।
कैप्टन बत्रा आज ही के दिन अर्थात 7 जुलाई, 1999 को कारगिल युद्ध में अपने देश के लिए लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। बेहद कठिन चुनौतियों और दुर्गम इलाके के बावजूद, विक्रम ने असाधारण व्यक्तिगत वीरता तथा नेतृत्व का परिचय देते हुए पॉइंट 5140 और 4875 पर फिर से कब्जा जमाया।
हिमालय की बर्फीली चोटियों पर लड़ी गयी दहकती कारगिल जंग के नामी योद्धा और आज राष्ट्रभक्त युवाओं के हीरो बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा का आज अर्थात 7 जुलाई को बलिदान दिवस है।
इस परमवीर का जन्म 9 सितंबर 1974 को देवभूमि हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। कारगिल विजय के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा की जांबाजी के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे। हम सभी देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले उस हीरो की जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं को जानना चाहते हैं। 1997 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से नौकरी की कॉल आई लेकिन उन्होंने यह नौकरी छोड़ लेफ्टिनेंट की नौकरी को चुना। पालमपुर में जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म दिया। उन्होंने दोनों का नाम लव-कुश रखा. लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल।
विक्रम का एडमिशन पहले डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में करवाया। पर सेना छावनी में स्कूल होने से सेना के अनुशासन को देख और पिता से देश प्रेम की कहानियां सुनने पर विक्रम में स्कूल के समय से ही देश प्रेम जाग उठा। विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। जुलाई, 1996 में उन्होंने भारतीय सेना अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। दिसंबर 1997 में शिक्षा समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली।
उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। 1 जून, 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को कैप्टन बना दिया गया।
इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून, 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। कारगिल वॉर में 13 जेएके राइफल्‍स के ऑफिसर कैप्‍टन विक्रम बत्रा के साथियों की मानें तो कैप्‍टन बत्रा युद्ध मैदान में रणनीति का एक ऐसा योद्धा था जो अपने दुश्‍मनों को अपनी चाल से मात दे सकता था। यह कैप्‍टन बत्रा की अगुवाई में उनकी डेल्‍टा कंपनी ने कारगिल वॉर के समय प्‍वाइंट 5140, प्‍वाइंट 4750 और प्‍वाइंट 4875 को दुश्‍मन के कब्‍जे से छुड़ाने में अहम भूमिका अदा की थी।
बत्रा 7 जुलाई 1999 को इस मिशन के शुरुआती घंटों में दुश्मन के जवाबी हमले के दौरान घायल हुए एक अधिकारी को बचाने के प्रयास में भारतीय सेना की एक टुकड़ी का कमान संभाले हुए थे।
ऐसा कहा जाता है कि इस बचाव कार्य के दौरान उन्होंने घायल अधिकारी को सुरक्षित पोज़िशन पर धकेलते हुए यह कहा था कि "तुम्हारे बच्चे हैं, तुम एक तरफ हट जाओ"। कैप्टन बत्रा को अपने मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए तो जाना ही जाता है। साथ ही युद्ध के दौरान उनके द्वारा दिया गया नारा "ये दिल मांगे मोर" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 19 जून, 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने दुश्मन के नाक के नीचे से 5140 प्वाइंट पर क़ब्ज़ा कायम करने में सफल हुई थी। 5140 प्वाइंट पर क़ब्ज़ा करने के बाद कैप्टन बत्रा ने स्वेच्छा से अगले मिशन के रूप में 4875 प्वाइंट पर भी क़ब्ज़ा करने निर्णय लिया था।
यह प्वाइंट समुद्र स्तर से 17,000 फुट की उँचाई पर और 80 डिग्री सीधी खड़ी चोटी पर है। आज ही के दिन अर्थात सात जुलाई 1999 को प्‍वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्‍मनों को कैप्‍टन बत्रा ने मार गिराया लेकिन इसके साथ ही तड़के अपने घायल साथियों को इलाज़ के लिए ले जाते समय दुश्मन की एक गोली इस वीर को लगी और ये सदा सदा के लिए अमर हो गये ..बलिदान के उपरान्त इन्हें योद्धा के सर्वोच्च मेडल परमवीर चक्र दिया गया।
आज शौर्य की उस महान हुंकार को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन करते हुए भारतीय सेना के इस परमवीर की गौरवगाथा को सदा सदा के लिए गाते रहने का संकल्प कृतज्ञ राष्ट्र  लेता है।
      विक्रम बत्रा अमर रहें .. जय हिन्द की सेना।
(बनारस, 07जुलाई,2018, रविवार)
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रविवार, 1 जुलाई 2018

व्योमवार्ता /तू बन जा गली बनारस की....:व्योमेश चित्रवंश की डायरी

तू बन जा गली बनारस की..../ व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 जून 2018

आपने बनारस की गलियों के बारे मे बहुत सुना होगा, पर इन गलियों मे रहने का आनन्द वहीं जान सकता है जो इनमे सुबह शाम डोलने का आदी हो, तभी तो कहा गया है कि तू बन जा गली बनारस की मै सुबह शाम डोलू तुझमें,यह एक सूफियाना अंदाज ही नही बनारस का भूगोल भी है, इतिहास भी और बनारस का आध्यात्म भी।  आज बनारस की कुछ मशहूर गलियों से रूबरू होते हैं..

1. विश्वनाथ गली
काशी नगरी के हृदय में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर स्थित है। इस मंदिर के प्रांगण में स्वयं भगवान शंकर ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ऐसी मान्यता है कि विश्वनाथ जी के दर्शन से सभी द्वाद्वश ज्योर्तिलिंगों के दर्शन का फल मिलता है। विश्वनाथ जी के नाम पर ही इस गली का नाम विश्वनाथ गली पड़ा। यह काशी की सबसे प्रसिद्ध गली है। यह गली, ज्ञानवापी, चौक से शुरू होकर विश्वनाथ मंदिर होते हुये दशाश्वमेध घाट तक जाती है। विश्वनाथ गली व्यावसायिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस गली में कपड़े, श्रृंगार के सामान तथा लकड़ी के बने खिलौने मिलते हैं जो पूरे भारत वर्ष में प्रसिद्ध हैं।

2. कचौड़ी गली-
यह गली विश्वनाथ गली के ठीक पीछे स्थित है। इस गली की विशेषता यह है कि यहाँ पर स्थित अधिकांश दुकानें कचौड़ी की हैं। इसी कारण गली का नाम कचौड़ी गली पड़ा। यहाँ दुकानें सुबह से ही खुल जाती हैं तथा बारह बजे रात तक खुली रहती हैं। दुकानदारों में ऐसी मान्यता है कि उनके दुकानों पर भगवान शिव के गण स्वयं कचौड़ी तथा मिठाई खाने आते हैं। यहाँ पर कचौड़ी खाने वालों की भीड़ सुबह सात बजे से शुरू हो जाती है जो कि रात तक जारी रहती है। यह गली भी विश्वनाथ गली की ही तरह घाट के पास निकलती है। इस गली में कचौड़ी के अलावा पौराणिक किताबों, ग्रन्थों तथा बही खातों की दुकानें भी हैं।

3. खोवा गली-
जैसा की नाम से ही प्रतीत हो रहा है कि “खोवा गली” अर्थात् इस गली में खोवा की बहुत बड़ी मण्डी लगती है। खोवा की इतनी बड़ी मण्डी शायद ही भारत के किसी शहर में लगती हो। इसी कारण से इस गली का नाम खोवा गली पड़ गया।

4. ठठेरी (बाजार) गली-
यह गली चौक क्षेत्र में स्थित है। इस गली में पहले ठठेरा लोग रहते थे जो बर्तन इत्यादि का निर्माण किया करते थे। आज भी इस गली में पीतल के बर्तन बनते और बिकते हैं। पीतल के बर्तन व उससे बने सामानों का सबसे बड़ा बाजार इस गली में है। गली में अन्दर जाकर भारत के युग निर्माता तथा प्रसिद्ध कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का निवास तथा उससे कुछ दूरी पर अग्रसेन महाजनी पाठशाला है।

5. दालमण्डी गली-
यह गली काशी के दो महत्वपूर्ण बाजार चौक तथा नई सड़क को आपस में जोड़ती है। इस गली में कपड़े-जूते-चप्पल तथा इलेक्ट्रानिक्स की दुकानें तथा श्रृंगार की वस्तुएँ थोक में मिलती हैं। राजाओं-महाराजाओं के समय में इस गली में नृत्यांगनायें रहा करती थीं जिनके यहाँ नृत्य, संगीत का आनन्द लेने के लिये नगर के धन्ना सेठ जाया करते थे। लखनऊ की प्रसिद्ध नृत्यांगना उमराव-जान लखनऊ छोड़कर दालमण्डी में बस गयीं थीं, उनका अन्तिम समय यहीं व्यतीत हुआ। काशी में ही उनकी कब्र आज भी स्थित है।

6. नारियल (बाजार) गली-
यह गली चौक थाना के ठीक पीछे है जो दालमण्डी गली में आकर मिलती है। इस गली में नारियल, विवाह से सम्बन्धित सामान बिकते हैं। नारियल की बड़ी मण्डी होने के कारण इस गली का नाम नारियल बाजार पड़ा।

7. घुंघरानी गली-
यह गली दालमण्डी से निकली है तथा दालमण्डी और काशी के मुख्य बाजार बाँसफाटक को आपस में जोड़ती है। इस गली में भी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानें हैं।

8. गोविन्दपुरा गली-
यह गली चौक क्षेत्र में है तथा चौक मजार से पहले अवस्थित है। इसमें सोने-चाँदी के आभूषण, रत्न इत्यादि की दुकानें हैं। यह गली चौक, नारियल बाजार, रेशम कटरा को आपस में जोड़ती है।

9. रेशम कटरा गली-
यह गली गोविन्दपुरा गली की मुख्य शाखा है। इसमें भी सोने-चाँदी के आभूषण की दुकाने हैं। यहाँ सोने-चाँदी के आभूषणों का निर्माण किया जाता है।

10. विन्ध्यवासिनी गली-
इस गली को विन्ध्याचल की गली भी कहा जाता है। इस गली में विन्ध्याचल माता का मंदिर है जो मिर्जापुर में स्थित विन्ध्याचल मंदिर की प्रतिमा का प्रतिरूप है। इस कारण मंदिर को विन्ध्वासिनी मंदिर कहा जाता है जिसके नाम पर इस गली का नाम विन्ध्यवासिनी गली पड़ा। यह गली काशीपुरा क्षेत्र से शुरू होती है तथा रेशम कटरा में जाकर मिलती है।

11. कालभैरव गली-
यह गली विश्वेश्वरगंज क्षेत्र में है। यह भैरोनाथ चौराहा से आरम्भ होकर कालभैरव मंदिर तक फैली है। कालभैरव जी काशी के कोतवाल हैं जो भगवान शंकर के प्रधान सेनापति हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी में कोई व्यक्ति तभी निवास कर सकता है जब कालभैरव जी की अनुमति मिलती है। कालभैरव जी के नाम पर इस गली का नाम कालभैरव गली पड़ा। यहाँ स्थित मोहल्ले का नाम भैरवनाथ है।

12. भूतही इमिली की गली- यह गली मैदागिनी क्षेत्र में स्थित टाउनहाल मैदान के पीछे है। यह मालवीय मार्केट से आरम्भ होकर भैरोनाथ क्षेत्र तक जाती है। कहा जाता है कि इस गली में इमली का पेड़ था जिस पर भूत तथा चुड़ैल निवास करती थी जिसकी वजह से लोग इधर से गुजरने में डरते थे। परन्तु अब ऐसी कोई बात नहीं है। किन्तु पहले जो नाम था वही आज भी है।

13. सप्तसागर गली-
यह गली मैदागिन क्षेत्र में है तथा टाउनहाल मैदान के गेट के ठीक सामने से शुरू होती है तथा नखास की ओर निकलती है। इस गली में पूर्वांचल की सबसे बड़ी दवा मण्डी है।

14. आसभैरव गली-
यह गली नीचीबाग क्षेत्र में है। आस-भैरव के मन्दिर के नाम पर इस गली का नाम आसभैरव गली पड़ा। इस गली में सिक्खों का पवित्र गुरुद्वारा स्थित है।

15. कर्णघंटा गली-
यह गली कर्णघंटा क्षेत्र में पड़ती है। कर्णघंटा से शुरू होकर रेशम कटरा तक जाती है। यहीं पर विन्ध्यवासिनी गली भी आकर मिलती है। कर्णघंटा क्षेत्र में छपाई व कागज सम्बन्धित सभी सामानों का बहुत बड़ा मार्केट है।

16. गोला दीनानाथ गली-
गोला दीनानाथ गली में पूर्वांचल की सबसे बड़ी मसाले की मण्डी है। यह कबीरचौरा क्षेत्र में स्थित है। इस मण्डी में भगवान दीनानाथ का मन्दिर होने से इसका नाम गोला दीनानाथ पड़ा तथा इस मण्डी में आने वाली सभी गलियों को गोला दीनानाथ की गली के नाम से जाना जाता है। इस मण्डी के चारों तरफ गलियाँ हैं।

17. गोपाल मंदिर की गली-
यह गली बुलानाला क्षेत्र से प्रारम्भ होकर गोपाल मंदिर तक जाती है। इस मन्दिर में गोपाल जी की अष्टधातु निर्मित प्रतिमा है। ऐसी मान्यता है कि इस प्रतिमा की पूजा महारानी कुन्ती करती थीं। यह प्रतिमा महारानी कुन्ती द्वारा स्थापित की गई है। जन्माष्टमी के समय इस मन्दिर तथा गली को दुल्हन की भाँति सजाया जाता है।

18. पत्थर गली-
काशी में पत्थर की गली दो क्षेत्र में है। एक जतनबर की पत्थर गली तथा दूसरी चौक क्षेत्र की पत्थर गली। चौक क्षेत्र की पत्थर गली में सभी मकान पत्थर के थे, इसलिये उसका नाम पत्थर गली पड़ा तथा जतनबर की पत्थर गली में पत्थर का गेट बना था जिसके कारण उसका नाम पत्थर गली पड़ा। अब पत्थर का गेट नहीं है।

19. हनुमान गली-
यह गली हनुमान घाट से प्रारम्भ होकर अस्सी तथा गोदौलिया मार्ग को आपस में जोड़ती है। हनुमान घाट के निर्माण के साथ ही इस गली का निर्माण हुआ। हनुमान घाट के नाम पर गली का नाम हनुमान गली पड़ा।

20. तुलसी गली-
यह गली अस्सी क्षेत्र में पड़ती है। गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर इस गली का नाम तुलसी गली पड़ा। गोस्वामी तुलसीदास जी की मृत्यु इसी गली में हुई थी।

21. गुदड़ी गली-
इस गली में “बड़ा गुदड़ जी” तथा “छोटा गूदड़ जी” के नाम के दो प्रसिद्ध अखाड़े थे। इनका निर्माण अट्टारहवीं शताब्दीं में हा था। ये अखाड़े आज भी वहाँ पर अवस्थित है। इन्हीं अखाड़ों के नाम पर ही इसका नाम गुदड़ी गली पड़ा। यह गली तुलसी गली से ही निकली है।

22. शिवाला गली-
यह गली शिवाला घाट से आरम्भ होती है तथा शिवाला घाट को मुख्य मार्ग से जोड़ती है। शिवाला घाट के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम शिवाला पड़ गया तथा इस गली का नाम शिवाला गली पड़ा।

23. खिड़की गली-
यह गली खिड़की घाट से प्रारम्भ होती है। खिड़की घाट का निर्माण बैजनाथ मिश्र ने करवाया था। यह घाट लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। अतः गली भी उतनी ही पुरानी है।

24. जुआड़ी गली-
ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध जुआड़ी नन्द दास ने जुए की एक दिन की कमाई से इसे बनवाया था। इसलिये इस गली का नाम जुआड़ी गली पड़ा। यह गली अब विलुप्त हो चुकी है।

25. ढुंढीराज गली-
यह गली चौक क्षेत्र के ज्ञानवापी से आरम्भ होती है तथा दण्डपाणि भैरव मन्दिर तक जाती है। इस गली में गणेश जी का मन्दिर है जो गणनाथ विनायक के नाम से जाने जाते है।

26. संकठा गली-
यह गली संकठा घाट से आरम्भ होती है। गली में संकठा देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है जिसका निर्माण गोहनाबाई ने करवाया था। संकठा देवी नाम पर ही गली का नाम संकठा गली पड़ा तथा घाट का नाम संकठा घाट पड़ा। संकठा देवी के मन्दिर के बगल में ही कात्यायनी देवी का भी मन्दिर है। यह गली विश्वनाथ गली से आकर मिलती है।

27. पशुपतेश्वर गली-
यह गली चौक क्षेत्र से आरम्भ होकर रामघाट तक जाती है। इस गली में पशुपतेश्वर महादेव का मन्दिर है। उन्हीं के नाम पर इस गली का नाम पशुपतेश्वर गली पड़ा।

28. पंचगंगा गली-
पंचगंगा घाट के नाम पर इस गली का नाम पंचगंगा गली पड़ा। ऐसी मान्यता है कि पंचगंगा घाट पर पाँच नदियों का संगम होता है। गंगा, जमुना, सरस्वती के अलावा दो नदियाँ “सुकिरणा” जो भगवान सूर्य की प्रतिमा से निकलती है तथा “धूतपापा” जो घाट पर ही जमीन से निकली है। पाँच नदियों के संगम के कारण इस घाट का नाम पंचगंगा घाट पड़ा। ऐसा पुराणों में वर्णित है कि स्वयं तीर्थराज प्रयाग गंगा दशहरा के दिन अपने पाप धोने इसी घाट पर आते हैं। यही गली पंचगंगा घाट से आरम्भ होकर ब्रह्माघाट, दुर्गाघाट, राजमन्दिर, गायघाट, त्रिलोचन घाट, प्रहलाद घाट की गलियों को आपस में जोड़ती है। यह गली बहुत बड़ी तथा प्रसिद्ध है।

29. चौरस्ता गली-
यह गली गायघाट से प्रारम्भ होती है और त्रिलोचन घाट, तेलियानाला होते हुये चौखम्भा तक जाती है। चौखम्भा में बीबी हटिया की पतली गली में मिलती है।

30. नेपाली गली-
सुप्रसिद्ध नेपाली मन्दिर के नाम पर ही इस गली का नाम नेपाली गली पड़ा। यह विश्वनाथ गली तथा ललिता घाट को आपस में जोड़ती है। नेपाली मन्दिर के नाम पर ही इस मोहल्ले का नाम नेपाली खपड़ा पड़ा।

31. सिद्धमाता गली-
यह गली मैदागिन क्षेत्र के गोलघर में स्थित है। यह गोलघर को बुलानाला मुख्य मार्ग से जोड़ती है। इस गली में सिद्धमाता देवी का मन्दिर है।

32. कामेश्वर महादेव गली-
यह गली मच्छोदरी पर बिड़ला हॉस्पिटल के सामने से प्रारम्भ होती है जो कामेश्वर महादेव मन्दिर तक जाती है।

33. त्रिलोचन महादेव गली-
यह गली गायघाट से प्रारम्भ होकर त्रिलोचन महादेव मन्दिर तक जाती है तथा कामेश्वर महादेव गली से आपस में मिलती है।

34. पाटन दरवाजा गली-
यह गली गायघाट से शुरू होकर बद्री नारायण घाट तक जाती है।

35. भार्गव भूषण प्रेस वाली गली-
मच्छोदरी स्थित भार्गव भूषण प्रेस को मच्छोदरी मुख्य मार्ग से जोड़ती है। इसलिए इस गली को भार्गव भूषण प्रेस वाली गली कहते हैं।

36. लट्ट गली-
यह गली जतनबर में स्थित है तथा गणेश गली को आपस में जोड़ती है।

37. नइचाबेन गली-
यह गली कोयला बाजार से प्रारम्भ होकर बहेलिया टोला तक जाती है।

38. नचनी कुआँ गली-
यह गली भी कोयला बाजार से प्रारम्भ होकर भदऊ चुँगी तक जाती है।

39. चित्रघंटा गली-
यह गली चौक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर रानी कुआँ तक जाती है तथा इस गली में चित्रघंटा माता का मन्दिर स्थित है।

40. गढ़वासी टोला गली-
यह गली चौखम्भा से प्रारम्भ होकर संकठा की गली में जाकर मिलती है।

41. भारद्वाजी टोला गली-
यह गली प्रहलाद घाट से प्रारम्भ होकर भदऊ चुँगी तक जाती है।

42. हाथी गली-
यह गली बीबी हटिया की गली से प्रारम्भ होकर दादुल चौक होते हुए ब्रह्मा घाट तक जाती है।

43. कातरा गली-
यह गली राजमन्दिर क्षेत्र में पड़ती है। यह अत्यन्त छोटी गली है इस गली में केवल 4 से 5 मकान ही पड़ते हैं। यह गली एक तरफ से बन्द है।

44. चौखम्भा गली-
यह गली चौखम्भा क्षेत्र से शुरू होकर ठठेरी बाजार की गली में आकर मिलती है।

45. सुग्गा गली-
सुग्गा गली ठठेरी बाजार से प्रारम्भ होकर रानी कुआँ तक जाती है। इस गली पर सिन्नी टुल्लु का पहला कारखाना था।

46. गोला गली-
ठठेरी बाजार स्थित भारतेन्दु भवन के पीछे की गली।
(बनारस, 30जून 2018, शनिवार)
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