शनिवार, 19 मार्च 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी 19 मार्च 2016

19 मार्च 2016, शनिवार
कल लिये गये संकल्प के हिसाब से जीवनचर्या बनाने का प्रयास प्रारंभ किया. सुबह भिगोई मेथी व उसके पानी से शुरूआत, फिर पूरे एक घण्टे योगाभ्यास व प्राणायाम, मजा आ गया, एक लंबे अरसे के पश्चात तन व मन प्रसन्न व प्रपुल्लित महसूस हुआ. कचहरी बार कौंसिल के आह्वान पर मौन विरोध व न्यायिक कार्यो से विरत रही, एक पखवाड़े के पश्चात कोटेश्वर महाबीर भी जाना हुआ.
टी२० के वर्ल्ड कप मे आज भारत पाक मैच है,रोमॉच बना हुआ है पाक के ११९ के टार्गेट को कोहली व घवन तेजी से पीछा कर रहे है,
वज्रासन मे दिन भर के कार्यक्रम का पुनरीक्षण करने के पश्चाच पुस्तक पढ़ने पर ज्यादा समय की जरूरत महसूस हो रही है.

व्योमेश चित्रवंश की डायरी 18.03.2016

18मार्च 2016, शुक्रवार
 कल दसियो दिन बाद ग्राउंड गया, तो रात मे जल्दी ही सो गया, सुबह उठने परताजगी के साथ मौसम व अखबार का जायजा लिया. थोड़ी देर धूप मे किताबे पढ़ने का सुख फिर कचहरी, उम्मीद के अनुरूप हड़ताल व शोक प्रस्ताव पर मिला जुला असर दिखा, एक लंबे अरसे के बाद गुरू जी के यहॉ जाना हुआ. ढेर सारी बाते व आत्मसंतोष का अपना एकअलग सुख है
.न्यास व सोसाइटी के लोग अपने अपने स्तर से अपने प्रयासो मे लगे हुये है. दो पुस्तको को पढ़ने की बड़ी बलवती ईच्छा है कुर्तलुन एन हैदर की आग का दरिया व भगवान सिंह का अपने अपने राम. नेट पर सर्च कर के दोनो पुस्तको को अपने आनलाईन परचेजिंग कार्ट मे सहेज लिया है पर अभी पहले की बिनपढ़ी पुस्तके ही शेष है, नेट के वजह से वो बिलंबित कार्यसूची मे शामिल हो गई है, इसे रोकना है.
कल से किताबे पढ़ने की सूची को प्राथमिकता देना होगा.

बुधवार, 16 मार्च 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी 16 मार्च 2016, बुघवार

 १६ मार्च २०१६, बुधवार
सुबह का मौसम साफ पर ठण्ड लिये हुये था, देर तक धूप मे बैठ अखबार और tough times never gone but tough people do it पढ़ता रहा. कड़ी धूप मे तेज हवा वातावरण को अपने ढंग से समायोजित करती रही.
कचहरी मे उम्मीद के अनुरूप प्रतापगढ़ मे कल हुये अधिवक्ता के हत्या के विरोध मे हड़ताल रही. छिटपुट कामो के बीच उपभोक्ता फोरम जाना पड़ा. वहॉ हड़ताल का कोई असर नही दिखा. नये पीठासीन अध्यक्ष के पदासीन होने के बाद  फोरम की कार्यपद्धति मे आमूलचूल परिवर्तन हुये है. जिनका असर अब दिखने लगा है.  परवेज मियॉ को जनवरी व फरवरी का एसीसी वाल्यूम १ बाइंडिग के लिये वापस किया, थोड़ी समय बिताने के पश्चात ३ बजे के आसपास घर वापसी पर अधूरी किताब को पढ़ना जारी रखा. दूबारा पढ़ने व गुनने मे समय लगना स्वाभाविक है, नेट पर बहुप्रतिक्षित दिनकर जी की संस्कृति के चार अध्याय दिखी तो उसे भी डाउनलोड किया, अगला क्रम संस्कृति को समर्पित.
देर शाम प्रदीप भाई आ गये. उनके साथ देर तक दुनिया जहॉ की बाते होती रही और इस अलस भरे मौसम का एक दिन और बीत गया.

मंगलवार, 15 मार्च 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी 15 मार्च 2016

15 मार्च 2016,  मंगलवार
सुबह कुछ थुंथ के साथ मौसम की शुरूआत हुई, फिर दिन भर मौसम साफ ही रहा और मन भी . कल के बजाय आज मन स्वस्थ व सामान्यतया सहज था.
आज प्रदूषण पर एक  विचार मन मे आया, हम रोज ब रोज रीफिल पेन का इस्तेमाल करते है और उपयोगपरान्त उन रीफिल्स को कूड़े मे फेंक देते है जो बाद मे प्रदूषण का एक बड़ा जरिया बनते है, यदि हम औसतन एक रीफिल एक हफ्ते मे खर्च कर फेंक देते है तो लगभग एक करोड़ रीफिल हर माह घूरे देश मे कूड़े पर जाता है जो अप्रयोज्य व बेकार होकर प्रदूषण बढ़ाने मे जिम्मेदार है, इस लिये हमे यूज एण्ड थ्रो रीफिल के बजाय बार बार उपयोगी होने वाले कलमो का प्रयोग करना होगा.
इसी क्रम मे हम आज से यह संकल्प लेते है कि आज से हम ऱीफिल पेन के बजाय फाउंटेन पेन व रियूजफूल कलमो का प्रयोग करेगे, उसी क्रम मे काफी दिनो से रखे अपने मित्रो से उपहार मे प्राप्त दो पार्कर कलमो को ठीक ठाक किया, लिखने का एक ऩया अनुभव लगा,
शाम डा० अरविन्द के यहॉ गुजरी पर फिर टी२० के मैच के चक्कर मे मंदिर नही जा पाये. हालॉकि मैच देखना बेकार ही रहा, न्यूजीलैण्ड ने हमे ४७ रनो से हरा दिया. पढ़ रहे tough times never gone but tough people do it से एक लाईन याद आयी every problem hold positive possibilities सच लगा खेल के लिये भी और जीवन के लिये भी......

सोमवार, 14 मार्च 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी १४ मार्च २०१६

१४ मार्च २०१६, सोमवार
आज सुबह से ही मौसम खराब था, मौसम के साथ मन भी अशान्त था, बेमौसम के बरसात व ओलावृष्टि से किसानो के साथ हुये अनयाय से प्रकृति के प्रति थोड़ी नाराजगी हुई, कचहरी पर भी बेमौसम के मार का असर दिखा, वही एक अधिवक्ता बंधु सूर्य नाथ यादव जी के असामयिक निधन से खिन्नता और बढ़ी, डॉ० अरविन्द भैया के आने से माहौल मे थोड़ी सी तब्दीली आयी़ बाद मे सूर्यभान भाई के साथ ले० कर्नल एस एम सिंह से मिलने यू पी कालेज गये तो वहॉ छात्रसंघ उद्घाटन के नाम पर चेहरा दिखाने छुटभैय्यो की भीड़ व नेताओ का जमावड़ा मिला. कभी कभी लगता है कि मायावती का शासन ही सही था जब कालेज विश्वविद्यालयो के परिसर मे छात्रसंघ बैन था और पढ़ाई का माहौल बना हुआ था पर आज?
एनसीसी कार्यालय मे कर्नल बहादुर सिंह से परिचय हुआ. जालंघर के निवासी सिख रेजीमेण्ट के कर्नल सिंह शानदार स्वभाव के लगे.
सूर्यभान को आज ही दिल्ली जाना है फिलवक्त शाम को टहलने का कार्यक्रम स्थगित. मौसम मे तब्दीली नही फिर भी बरसात बंद है. देश की राजनीति आरोपो प्रत्यारोपड़ जारी है. कनु की गणित की परीक्षा हो गई़ उसका भय समाप्त हुआ.
राबर्ट एच शूलर की tough times never gone,  एक बार फिर पढ़ रहा हँ, अच्छा

अहसास हो रहा है तो उसे पचाने के लिये.

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

विजय माल्या बेचारे......... - व्योमेश चित्रवंश


खबर तो दुःख की ही है…
उम्मीद बहुत कम है कि परम आदरणीय श्री विजय विट्ठल माल्या साहब शायद ही इस धरती पर लौटें, जहां हम भारतवासी रहते हैं…. भला कौन उनके योगदान को भुला सकता है ??? सच तो ये है कि देश के भटके युवाओं का सच्चा प्रतिनिधित्व कोई करता था तो वो थे अपने माल्या साहब… शराब, शबाब और ऐयाशी का इतना बड़ा पर्याय तो इस समय देश में कोई नहीं है… हर नए साल का “असली” स्वागत तो माल्या साहब ही करते थे… जब उनके कैलेंडरों पर अर्धनग्न मॉडल्स की धूम रहती थी… लोग कैलेण्डर पाना तो दूर उसकी एक झलक देखने को तरसते थे… “न्यूड कलाकारी” की जीती-जागती मिसाल हुआ करता था ये महान कैलेण्डर, अब इसे कौन छापेगा… सचमुच देश में उभरती इस कला पर बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पडेगा…
अब जिसको देखो हल्ला मचा रहा है कि माल्या साहब 91 हज़ार करोड़ का छूना लगाकर चले गए लेकिन उनका योगदान कोई याद नहीं रखना चाहता… इस कैलेण्डर में ही अच्छा-खासा पैसा लगता था लेकिन वो बिना प्रॉफिट के छपवाते थे… 250 से ज्यादा लग्जरी और विटेंज कारों से उनको कौन सा मुनाफ़ा हुआ… उसमे तो केवल करोड़ों रूपये उन्होंने खर्च ही किये होंगे…
क्या दुनिया की सबसे बड़ी शराब बनाने वाली कंपनी यूनाइटेड स्प्रिट्स के चेयरमैन के रूप में उन्होंने देश का मान नहीं बढाया, जब यह शराब कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बन गयी??? अमीर से लेकर गरीब तक जब परेशान होते थे तो माल्या साहब का सुनहरा पानी ही उन्हें सुकून देता था… न विश्वास हो तो लीवर की डाक्टर्स से पूछों, उनकी कमाई में माल्या साहब का एक बड़ा योगदान था… अरे ये सरकार भी लंबा टैक्स कमाती थी….
अब अखबार लिख रहे हैं कि हम आम जीवन में देखते हैं कि कोई आदमी महज़ 5-10 हज़ार रुपये का क़र्ज़ नहीं चुका पाए तो उसे बैंकें या तो पकड़ ले जाती हैं या फिर उसके घर बॉउंसर भेज देती हैं. लेकिन माल्या जैसे धन्ना सेठों के साथ रियायत करती हैं… बताइये गरीब तो इस देश पर बोझ ही हैं… कौन सा सरकार को टैक्स देते थे…. नेताजी लोगों को असली आनंद माल्या साहब ही करवाते थे… भला कौन नहीं होगा जो उनकी पार्टी में जाना नहीं पसंद करे….
कहीं पढ़ा कि 9 हज़ार करोड़ रुपये में 10 हजार रुपये प्रति शौचालय की लागत वाले 90 लाख शौचालय तैयार किए जा सकते थे. 200 बिस्तर वाले 45 नए अस्पताल खोले जा सकते थे. 9 हज़ार करोड़ रुपये में 2 लेन वाली 2 हजार किलोमीटर लंबी सड़क बिछाई जा सकती थी. महिला और बच्चों के कल्याण के लिए बजट की 90 फीसदी रकम 9 हज़ार करोड़ रुपये के ज़रिए जुटाई जा सकती थी. अब बताइये अगर वो ये सब करते तो कौन उन्हें जानता…. टीवी चैनलों को चटखारेदार खबर कहाँ से मिलती….  कोई कह रहा था कि दस दिन पहले डियाजियो से 515 करोड़ रुपये की डील करने और अपनी कंपनी के चेयरमैनशिप से इस्तीफा देने के बाद भी माल्या ने कहा था कि वह लंदन में बसना चाहते हैं, ताकि वह अपने बच्चों के और करीब रह सकें. तब पूरे देश को लगा कि माल्या बैंको का पैसा डुबोकर भागेंगे, लेकिन उन्हें रोकने वाली तमाम एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं.बताइये भला कि इन अफसरों के और कोई काम नहीं क्या जो माल्या के चक्कर में पड़कर अपनी नौकरी फंसाते.. अभी इनकी सरकार है और कभी उनकी सरकार होगी… सबके अच्छे दोस्त से थे माल्या साहब… माननीय सांसद थे…2002 पहली बार कर्नाटक से निर्दलीय चुने गयी… और तब मदद की थी कांग्रेस ने… आप लोगों को क्या है राज्यसभा में कांग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद की बात सुनकर चले आये माल्या की खिलाफत करने… मालूम भी है उस समय कांग्रेस कर्नाटक के प्रभारी थी गुलाम नबी आज़ाद… 2010 में माल्या साहब फिर राज्यसभा के लिए चुने गए और मदद की भाजपा और जेडीएस ने… अब ऐसा महान व्यक्ति अगर कर्ज के डर से चला गया तो ठीक ही न हुआ… और फिर माननीय सांसद थे… जब इस देश में हत्या और बलात्कार के आरोपी भी संसद में हैं तो इनपर केवल चंद हज़ार करोड़ कर्जा था… उन्हें तो आराम से जाने ही दिया जाना चाहिए था…. बताइये न.. फार्मूला वन से लेकर फ़ुटबाल तक… क्रिकेट में रॉयल चैलेंजेर से लेकर घुड़दौड़ तक हर तरह का मनोरंजन कराने की कोशिश करते थे अपने माल्या साहब… अब जब ललित मोदी क्रिकेट में मनोरंजन और चीयर गर्ल की सौगात देकर देश से भाग सकते हैं तो इन्होने तो काफी काम किया है, क्या बुरा हुआ जो ये निकल लिए…. चलिए छोडिये…. दुःख तो हुआ कि इतना महान व्यक्ति देश से चला गया लेकिन एक संतोष है कि विदेश में उनके पास 750 करोड़ रुपए का मोंटो कार्लो द्वीप, साउथ अफ्रीका में 12 हजार हैक्टेयर में फैला माबुला गेम लॉज, स्कॉटलैंड में महल, लंदन और मोंटो कार्लों में घर, मैनहेट्टन में प्रोपर्टी और न जाने क्या-क्या है… अलविदा माल्या साहब….
आपका ही एक बेचारा भारतवासी
डॉ० व्योमेश चित्रवंश, एडवोकेट



रविवार, 6 मार्च 2016

हमारे देश के कथित बुद्धिजीविता की बलिहारी -व्योमेश चित्रवंश 06/03/2016

हमरे देश के बुद्धिजीवीता की बलिहारी

कल एक खबर आई छोटी सी मगर महत्वपूर्ण। पर वह मीडिया चैनलो के कन्हैया प्रलाप और आजादी के अभिव्यक्ति मे कही दब गई। इस जरूरी सवाल के लिये कोई बरखा दत्त, कोई रवीश, कोई एनडीटीवी, आजतक, एबीवीपी आगे नही आया। उनके लिये यह महत्वपूर्ण नही कि देश के सम्मान व संप्रभुता पर ऑच कैसे उठी बल्कि उनके लिये यह महत्वपूर्ण रहा कि कैसे विदेशी मीडिया के सामने भारत को गरिया कर उसके न्याय व्यवस्था के चिथड़े उठा कर यहॉ के गरीबी व कथित असहिष्णुता का व्यर्थ प्रलाप फैलाया जा सके। एक आरोपी छात्र नेता ( वुड बी माननीय विधायक) के महिमामंडन मे उसके स्वागत के लिये अपने पत्रकारो तक को पलक पावड़े बिछाने वाली मीडिया से इस देश ने कभी यह नही पूछा कि क्या यह मीडिया प्रोटोकाल देश के लिये शहीद हुये नवजवान की नवविवाहिता पत्नी के लिये भी कभी देने की जरूरत समझी मीडिया ने? नहीं ना। क्योंकि उस रिपोर्टिग से भारत का स्याह पक्ष नही उजागर होगा और स्याह पक्ष नही उजागर होने पर मीडिया वर्ड, मीडिया इण्टरनेसनल , एमनेस्टी इण्टरनेसनल जैसे बड़े संगठन कोई भाव नही देगें। विदेसी दौरे बंद हो जायेगे, विदेशी शराबे व विदेशी उपहार नही मिलेगें। और तो और वह विदेशी मुलम्मा व विदेशी लाईफस्टाईल नही मिलेगी जिसमे कई कई पति पत्नियो को चुनने, रहने व साझा करने की व्यवस्था है।
        बहरहाल बात कल के खबर की। कल जेएनयू प्रकरण मे छात्रो के साथ हुये अत्याचार व उत्पीड़न ( जैसा उपरलिखित मीडिया वालो ने विश्व को बताया)  के आलोक मे भारत मे राजनीतिक व धार्मिक स्वतंत्रता की जॉच करने आ रही अमेरिकी टीम को भारत सरकार ने आने व इस तरह की जॉच की अनुमति नही दी। लेकिन हमारे देश के बुद्धिजीवी तो इसी बात से खुश हो के मनमयूर नृत्य करने लगे होगे कि उनका अपने देश को बेइज्जत करने का मकसद पूरा हुआ व उनकी पूछ एक बार फिर विदेशो मे बढ़ गई। उल्लेखनीय है कि हमारे देश के निजी मामले ( जहॉ सिर्फ विदेशी उपहार व भीख पर पलने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियो व विदेशी धन से चलने वाले सुपर मीडिया हाऊस को छोड़ कर) राजनीतिक व धार्मिक स्वतंत्रता पर किसी को कोई शिकायत नही है उसकी जॉच करने उस अमेरिका से जॉच दल आ रहा था जहॉ राष्ट्रपति के उम्मीदवार ट्रंप खुलेआम मुस्लिमो को अमेरिका मे प्रतिबंधित करने की बात कर रहे है, जहॉ चार दिन पहले गुरूद्वारे पर हमला हुआ था। जहॉ पिछले दो सालो से अश्वेतो पर हमले मे २५०% बढ़ोत्तरी हुई है। हमारे स्वर्णिम इतिहास के हजारो साल पैदा हुआ व मात्र २५० साल पहले आजाद हुआ अमेरिका विश्व के महानतम व बृहत्तम लोकतंत्र भारत मे राजनीतिक स्वतंत्रता की जॉच करना चाहता है जहॉ मात्र ७० साल के अपने संविधान मे तीन मुस्लिम , एक सिख , एक महिला राष्ट्रपति बने। जहॉ प्रधानमंत्री के रूप मे लौहमहिला इंदिरा गॉधी चुनी गई।राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राजनीति,न्यायपालिका, प्रशासन, विग्यान, उद्योग, फिल्म, साहित्य, शिक्षा,खेल, धर्म,सामाजिकसेवा तक एक अन्तहीन पंक्ति है हमारे देश मे अल्पसंख्यको के भागीदारी व योगदान की।
        वही अमेरिका भूल गया कि उसके लाख बुलावे पर हमारे भारत रत्न (बुद्धिजीवी नजरो मे सिर्फ एक मुसलमान) उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब अपने मॉ समान गंगा नदी के लिये अमेरिकी प्रस्ताव को ठुकरा दिये थे। हमारे (अल्पसंख्यक) वैग्यानिक होमी भाभा व कलाम साहब ने कम गुजारे मे ही अपने भारत मे रहना स्वीकार किया था। रतन टाटा व जेआरडी को हमेसा फक्र था कि वे हिन्दुस्तानी हैं।
पर यह बात हमारे कथित बुद्धिजीवियो व मीडिया पर्सनाल्टिज के समझ मे नही आती। वे तो यही सोच कर खुश होते है कि उनके देश की विश्वपटल पर बेईज्जती हो रही है और इसके लिये उनकी प्रशंसा की जा रही है।
सच कहें तो जब अपनी ही मुर्गी खराब हो तो पड़ोसी के मुर्गो को आप कब तक दोषी ठहरायेगें।

शनिवार, 5 मार्च 2016

शत्रुघ्न सिन्हा ने कन्हैया की तारीफ किया - व्योमेश चित्रवंश

ऐ सिनहा जी,
मन्तरी नही बने तो का देसदरोही बन जाईयेगा का?
बड़े दिनो से आपकी छटपटाहट तजबीज रहे हैं । सुना था कि आपकौ तो टिकसै नही मिलने वाला था वो तो सुकर मनाईये बनारस व यूपी के कायथ नेताओ का, ओनके प्रेसर मे आपको आपकी पाटी ने टिकस दे दिया। पर जीतने के बाद आप तो हरामखोरई पर ऊतर गये जी।
कहीं ऐसा होता है जी? अब आप हर उस बात का विरोध कर रहे है जो सिधे तौर पे कही जाती है। अगर आपकी पाटी कहेगी उत्तर तो आप बोलियेगा दक्खिन। वाह बिहारी बाबू, मतलब ई हो गया कि आप अपोजिसन के तरह खाली विरोध के लिये विरोध।
आप तो ऐइसे नही थे हो सिनहा जी। एही फेसबुक पर पढ़े थे कही दूई चार रोज पहिले, कि मोदी कहेगें कि निपटने के बाद हाथ सबुनिया लेना चहिये तो अपोजिसन बोलेगा कि नाही जी हम तो चाटेगें। अब आपो वही लोगन मे शामिल होय गये हैं। आप कन्हैया को सपोर्ट करे या कंस को , हम आम हिन्दुस्तानी पर कौनो असर नाही पड़ने वाला है। पर तकलीफ होती है कि आप जैसे पूर्व केन्द्रिय कैबिनेट मन्तरी को कभ्भो देश पर मरने वाले सैनिको पर तकलीफ नही हुई? आप को लखनऊ मे मरने वाले उस शोध छात्र के आत्महत्या पर नही तकलीफ हुई जिससे देश के विज्यान को ढेरो आशाये थी। आप नक्सली हमले मे मरने वाले उस नौजवान सैनिक के मृत्यु पर बोलना गवारा नही किये जिसकी शादी को महज ४ महीने बीते थे। फिलमो मे डायलाग मारते मारते आप भूल गये है शायद कि हर जगह मुँह नही बाना चहिये। कउन सा आप मे सुरखाब के पर लग गये है  कि आप को मन्तरी बनाया ही जाना चहिये।
देखिये सिनहा जी, आप अपनी ईज्जत अपने से धोय रहै हो। आप अपने लालच ओर चाह से बाहर निकल कर देस के बारे मे भी सोचिये। भाजपा को पीछे छोड़ने के चक्कर मे तो आप केतना पीछे चले गये इसका अन्दाजा आप से जियादा किसको होगा? बिहार चुनाव मे आपकी पारटी भाजपा ने तो आपको नही ही पूछा आप को आप वालो ने भी लालीपाप दिखा दिया अउर आपके वो नितिश भी आपको घास नही डाले।
हमे तो लगता है कि कहीं कन्हैया की आजादी का समर्थन करते हुये आपकी पारटी आपको ही न आजाद कर दे। क्योकि वह कब तक फालतू बोझा बने आपको ढोती रहेगी?
अउर सिनहा जी, तब तो बहुतै न बुरा होय जायेगा आपके साथ? क्योकि अब तो फिलमी लाईन मे आपको कोई पूछने वाला नही।
चेत जाईये न सिनहा जी।

गुरुवार, 3 मार्च 2016

नव वर्ष २०१६ के अभिनन्दन पर लिखा गया शुभकामना संदेश

बीत गया जीवन का एक और साल
आज कल की आपाधापी में ।
सोचा था बैठेगें कभी साथ साथ
बातें करेगे एक दूसरे से ढेरों
बॉटेगे सारे खट्टे मीठे अतीत
जो हम ने संग संग जिये थे।
सोच साकार नही हो सकी
समयऔर काम काज के बंधन मे
पर हमे मालूम है कि
बेमानी है , ये भौतिक दूरियॉ ।
मिलते है फिर नये साल में
आशा व संकल्प की थाती लेकर
हमें विश्वास है कि हम साथ है
हर पल मन मानस मे एक दूसरे के
और हमारी बेशकीमती पूँजी है
हमारी पवित्र शुभकामनायें ।
              - व्योमेश चित्रवंश

हॉ मै दक्षिणपंथी हूँ........ ( देशद्रोहियो को विपक्षी दलो के समर्थन पर ) व्योमेश चित्रवंश ०३/०३/२०१६

हॉ मै दक्षिणपंथी हूँ।

-क्योंकि मै अपने महत्वपूर्ण काम दाहिने हाथ से करता हूँ।
-क्योंकि मै अपने देश को बहुत प्यार करता हूँ।
-क्योंकि मै अपने देश का अपमान नही सह सकता।
- क्योंकि मै सिर्फ इसलिये किसी विचार या पक्ष की बुराई नही करता कि वह किसी एक पार्टी या दल विशेष का विचार है।
-क्योंकि मै अपने इतिहास बोध के प्रति सजग व प्रामाणिकता पर विश्वास करता हूँ।
-क्योंकि मैने अपने इस प्राचीनतम विश्वगुरू रहे भारतवर्ष के इतिहास को पश्चिमी चश्मे से देखने से इंकार करता हूँ।
-क्योंकि मैे अपने देश की बहुधर्मी बहुजातिय बहुसंस्कृति मे आस्था रखते हुये अतिविनम्रता के साथ उन ढेरो गपोड़ी, व विदेशी चाटुकारों व उनके चरणचुंबन करने वाले तथाकथित इतिहासकारो का अनुसरण अस्वीकार करता हूँ।
-क्योंकि मुझे अपने देश के संविधान, देश के संस्कृति, देश के लोगो से कोई शिकायत नही है।
-क्योंकि मुझे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के खिलाफ नारेबाजी नही पसंद है।
-क्योंकि मुझे अपने देश के न्यायव्यवस्था मे भरोसा है और मै उसके निर्णय का सम्मान करता हूँ।
- क्योंकि जब मेरे देश के खिलाड़ी जब दुनिया मे कही खेलते है तो मै उनके जीत के लिये दुआ करता हूँ।
क्योंकि जब मै अपने तिरंगे को कही लहराते हुये देखता हूँ तो खुद को गौरवान्वित व उर्जावान महसूस करता हूँ।
-क्योंकि जब कोई हरामजादा मेरे देश को गाली देता है तो मेरा मन उसका खून कर देने को करता है।
-क्योंकि मुझे अपने देश के खिलाफ एक भी शब्द सुनना अात्महत्या लगता है।
-क्योंकि मै अपने राष्टगीत राष्ट्रगान राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान बिना यह विचार किये करता हूँ कि वह किसी मजहब, किसी वर्ग किसी जाति से सम्बन्धित है बल्कि मेरे लिये वह सिर्फ व सिर्फ मेरे देश के है।
-क्योंकि मै ऐसे किसी भी मानवाधिकार, विधिक अधिकार या विशेषाधिकार को नही मानता जो मेरे देश के अभिमान, एकता, अखण्डता, सम्मान, सुरक्षा व संप्रुभता के आड़े आते है।
-क्योंकि मुझे नफरत है ऐसे लोगो से जो मेरे देश की माटी मे पल मेरे देश का अन्न खा कर विदेशी मीडिया व विदेशी भीखों के लिये मेरे देश की बुराई करते है।

     और अगर इन कारणो से मुझे आप दक्षिणपंथी मानते हो तो हमे खुद को दक्षिणपंथी कहने मे गर्व है ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

उनकी आजादी व हमारी सहिष्णुता ( जेएनयू प्रकरण पर 25.02.2016) - व्योमेश चित्रवंश

मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!! फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!! मैंने कहा तुम खून चूसोगे तो मैं मारूंगा.!! इसमें असहिष्णुता की क्या बात है.??? वो कहने लगे खून चूसना उनकी आज़ादी है.!! "आज़ादी" शब्द सुनते ही कई बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आये और बहस करने लगे.!! इसके बाद नारेबाजी शुरू हो गई., "कितने मच्छर मारोगे हर घर से मच्छर निकलेगा".???
बुद्धिजीवियों ने अख़बार में तपते तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख लिखना शुरू कर दिया.!! उनका कहना था कि मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे लेकिन खून चूस रहे थे ये कहाँ सिद्ध हुआ है.?? और अगर चूस भी रहे थे तो भी ये गलत तो हो सकता है लेकिन 'देहद्रोह' की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि ये "बच्चे" बहुत ही प्रगतिशील रहे हैं., किसी की भी देह पर बैठ जाना इनका 'सरोकार' रहा है.!!
मैंने कहा मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा बस.!!! तो कहने लगे ये "एक्सट्रीम देहप्रेम" है.! तुम कट्टरपंथी हो, डिबेट से भाग रहे हो.!!! मैंने कहा तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता.!!! इस पर उनका तर्क़ था कि भले ही यह गलत हो लेकिन फिर भी थोड़ा खून चूसने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती, लेकिन तुमने मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली.!! "फेयर ट्रायल" का मौका भी नहीं दिया.!!! इतने में ही कुछ राजनेता भी आ गए और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की 'बहार' का बेटा बताने लगे.!!
हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि लेकिन ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है, और तुरंत न सही बाद में बीमार और कमज़ोर होकर मौत हो जाती है.!! इस पर वो कहने लगे कि तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं इसलिए तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर अपने 'फासीवादी' फैसले को ठीक ठहरा रहे हो..!!! मैंने कहा ये साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है., मुझे इससे पहले अतीत में भी ये झेलना पड़ा है.!! साइंटिफिक शब्द उन्हें समझ नहीं आया.!!
तथ्य के जवाब में वो कहने लगे कि मैं इतिहास को मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूँ., जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिए..!!! इतने हंगामें के बाद उन्होंने मेरे ही सर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया.!!!
मेरे ख़िलाफ़ मेरे कान में घुसकर सारे मच्छर भिन्नाने लगे कि "लेके रहेंगे आज़ादी".!!!
मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था., उससे ज़्यादा जितना कि खून चूसे जाने पर हुआ था.!!!
आख़िरकार मुझे तुलसी बाबा याद आये: "सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती...."। और फिर मैंने काला हिट उठाया और मंडली से मार्च तक, बगीचे से नाले तक उनके हर सॉफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा.!!! एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत.!!
उसके बाद से न कोई बहस न कोई विवाद., न कोई आज़ादी न कोई बर्बादी., न कोई क्रांति न कोई सरोकार.!!! अब सब कुछ ठीक है.!! यही दुनिया की रीत है.!!!

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

जेएनयू प्रकरण पर बुद्धिजीवी प्रलाप -व्योमेश चित्रवंश

ऐ भाई।
पहले तो तुम ये तय करो कि तुम्हारी आस्था दरअसल है किसमें?
भारतीय संविधान व भारत राष्ट्र में
या
प्रो० गिलानी, कन्हैया,अफजल गुरू, उमर खालिद, हाफिज सईद,आई एसआइएस,अलकायदा वगैरह में?

क्योंकि अगर तुम यह कहते हो कि तुम्हे संविधान मे प्राप्त अभिव्यक्ति के मूल संवैधानिक अधिकारो का प्रयोग करने का पूरा हक है, तुम्हे भारतीय संविधान मे पूरा विश्वास है वगैरह वगैरह
तो
माफ करना
तुम झूठ बोलते हो।

क्योंकि
ये संवैधानिक अधिकार तुमने तब नही देखा
जब
इसी देश मे, इसी संविधान को मानने वाले काश्मीरी पंडित अपने घर से बेघर किये जा रहे थे।
जब
सीमा पार से आतंकी आकर हमारे देश के एअरबेस, हमारे शहरो, हमारे होटलो मे हमारे निर्दोष भाई बहनो को मार रहे थे।
जब
आरक्षण के नाम पर देश की प्रतिभायें अपने साथ हुये अन्याय से कुण्ठित हो कर खुद को आग के हवाले कर रही थी
जब
आम गरीब भारतीय रियाया के मेहनत की कमाई के अनुदान पर लगभग मुफ्त मे पढ़ाये जाने वाले मशहूर जेएनयू मे हमारे देश के टुकड़े कर देने की कामना वाले नारे लगाये जा रहे थे।
जब
देश के विकास नीधि का बंदरबॉट कर उन्हे घोटाला दर घोटाला मे तब्दील किया जा रहा था।
जब
माल्दा मुजफ्फरनगर मे आम नागरिको (धर्म से परे ) को मारा जा रहा था
जब
हिन्दुस्तान को बदनाम करने के लिये इसी संविधान व व्यवस्था के अन्तर्गत दिये हुये सम्मानो व पुरस्कारो को लौटाया जा रहा था।

तब अगर तुम्हे अपने आस्था व अधिकार की जानकारी नही थी तो अब भी तुम्हे अनजान बने रहना चाहिये।
क्योंकि
तुम्हारा यह नाटक मदारी के सॉप नेवले के लड़ाई वाले अंतहीन इंतजार की तरह सबके समझ मे आने लगा है। कम से कम तुम्हे मानवाधिकार, संवैधानिक अधिकार, देशभक्ति जैसे मुद्दे पर बोलने मे तो शर्म आनी चाहिये।
पर तुम तो बेशरम हो।
फिर
हमे तो इस देश के स्वाभिमान , सम्मान व संविधान से वास्तव मे प्यार है जिसके लिये हमे तुम्हारी तरह किसी विशेष मीडिया चैनल, किसी विशेष विद्वान किसी वैश्विक संगठन के प्रमाणपत्र की जरूरत नही।
जब भी
हमारे लिये सर्वोपरि हमारे देश के सम्मान, स्वाभिमान व संविधान पर ऑच आयेगी हम अपने को समर्पित कर के भी अपने स्तर व सामर्थ्य भर उसे बचाने का भरपूर प्रयास करेगें।
ये बात तुम अच्छी तरह समझ लो।

सुन रहे हो न तुम

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

यह शहर है ही कुछ अजीब सा........ (३) banaras / varanasi problem 10/02/2016


          वरूणापार इलाके का सबसे महत्वपूर्ण स्थान बनारस कचहरी है। बीसवीं सदी के शुरूआत मे जब बनारस कचहरी चौक से स्थानान्तरित हुई तो वरूणा के किनारे  खुलेपन की भरपूर संभावाओं को ध्यान मे रख यहॉ निर्मित हुई। लगभग ११५ सालों का बनारस कचहरी का शानदार इतिहास रहा है। १९४२ के धानापुर काण्ड के सुनवाई की गवाह रही लाल बिल्डिंग में बीसवी सदी के आखिर तक भदोही, चंदौली व बनारस  का न्यायाधिकार प्राप्त अदालते चलती थी। समय बीतने के साथ भदोही व चंदौली बनारस से अलग हो गये और लाल बिल्डिंग के अगल बगल दो पीली बारह कक्षीय न्यायालय भवन बने। गेट न०३ के पास बनारस बार एसोशियेसन भवन तो उसके सामने द्रुतगामी न्यायालय भवन (लोगबाग की भाषा मे मुरगी दड़बा बिल्डिंग) बनी। शहर की आबादी बढ़ने के साथ साथ वकीलो की तादाद भी बढ़ी और कचहरी परिसर मे टीन सेड भी बढ़ते गये। १९९५ के बाद उदारीकरण का असर कचहरी मे भी दिखने लगा। साइकिल का स्थान मोटर बाईकों ने ले लिया व स्कूटर के बजाय कारें कचहरी की शोभा बढ़ाने लगी। २००५ तक ये दौर आ गया कि कचहरी मे सामान्यतया चलने फिरने के लिये बाईको के बीच से बचा बचा कर निकलना पड़ता था।
इस बीच बनारस कचहरी ने आतंकी घटनाओं को भी झेला। साइकिल पर रखे झोले मे बम विस्फोट ने पूरे कचहरी को ही हिला कर रख दिया। भारी जान माल की क्षति ने कचहरी की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाये तो न्यायिक अधिकारियो को छोड़ कर बाकी सभी वाहनो को कचहरी परिसर मे प्रतिबंधित करते हुये प्रवेश निषेध कर दिया गया।लेकिन यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नही हो सकी। कुछ दिनो तक सख्ती के बाद कुछ विशेष लोगो के दबाव व मुँहदेखी से कचहरी परिसर मे  विशेष गाड़ियो व कर्मचारियो के बाईकों का आगमन सुलभ हो गया है ।
    बाईको के लिये संदेश रेस्टूरेंट के सामने के मैदान को  निर्धारित कराया गया पर अव्यवस्था के चलते वह भी नाकाफी ही रहा लिहाजा गाड़ियॉ कचहरी परिसर के बाहर सड़क पर खड़ी होने लगी। रातो रात सड़क किनारे इन अवैध वाहन स्टैण्डो के ठीकेदार पैदा हो गये। आज स्थिति यह है कि इन अवैध वाहनो की दुकादारी लगभग १५से २० हजार रूपये रोजाना है। यह  अवैध वसूली व वाहनस्टैण्ड कचहरी पुलिस चौकी के ठीक सामने कैण्ट पुलिस के नाको के नीचे हो रहा है। पता नही कैण्ट पुलिस व उच्चाधिकारियो को यह दिखता नही या वे देख कर भी समझना नही चाहते। आज कचहरी अपने चौतरफा जाम का दबाव झेलने को मजबूर है तो उसका एकमात्र कारण सड़क कब्जियाये ये अवैध वाहन स्टैण्ड है।
        दो साल पहले तत्कालीन डी एम प्रांजल यादव ने इस जाम को हटाने की पहल करते हुये कचहरी के पीछे जे पी मेहता कालेज के सामने से लेकर बनारस क्लब तक विशाल पार्किग स्टैण्ड बनवा कर  इन अवैध स्टैण्डो को हटा कर जाममुक्त कचहरी बनाने का प्रयास किया। स्टैण्ड तो बन गया पर अवैध कमाई के पैरोकारो ने ऐसा खुरपेंच चलाया कि वह आज विरान है और कचहरी जाम से हैरान है। इतना ही नही जाम के हिमायतिओ ने कचहरी की दीवार, रोडगेज, सड़क पर कब्जा करने के साथ साथ यात्रियो के लिये यात्री विश्रामालय व नगर बस स्टैण्ड को भी अपनी मनमाफिक व्यवस्था मे ढाल कर उसे भी वाहन स्टैण्ड बना डाला।
     यही तो बनारस है जहॉ पार्किग के लिये बनाये गये स्टैण्ड खाली पड़े हैं। चलने के लिये बनाये गये सड़क पर वाहन खड़े है। यात्री विश्रामालय मे मोटरसाइकिले पायी जाती है और इस सब की जिम्मेदारी कौन ले यह तो अफसरान लगायत पुलिस तक को नही पता है।
तभी तो यहॉ कबीर दास जी उल्टी बानी बोलते थे क्योकि ये शहर ही है कुछ अजीब सा.........


ये शहर है ही कुछ अजीब सा....... (२) banaras / varanasi 09/02/2016

अभी सिन्धोरा मार्ग की खुदाई पूरी भी नही हुई थी कि आज कचहरी पर गोलघर चौराहे पर भी खुदाई शुरू हो गयी। उधर महावीर मंदिर टकटकपुर बसही मार्ग पर खुदाई लगातार जारी है। जनता परेशान है, वह समझ नही पा रही है कि कार्य प्रगति पर है, कष्ट के लिये खेद है का बोर्ड दिखा कर ये खुदाई एजेन्सियॉ उसे वाकई कब तक कष्ट देती रहेगीं? कोई भगीरथ आम जनता के लिये भी कार्य पूर्ण होने का संदेश लेकर कब आयेगा?
      हम गैर तकनीकी आम जन आज तक कई बार कोशिस करने के बावजूद यह समझने मे असमर्थ रहे हैं कि जब एक ही सड़क पर सीवर, पानी व रेन ड्रेनेज के तीन काम होने है तो पूरी सड़क को एक बार न खोद कर तीन बार खोदने की क्या जरूरत है। मेरा अवचेतन मन मुझे चेताता है कि शहर के विकास के लिये पैसे दो-तीन जगह से आये है लिहाजा सड़क भी दो तीन बार खुद कर मरम्मत होना जरूरी है। अब ईश्वर जाने या खुदाई विभाग व एजेन्सियों के इंजीनियर । पर यह सच है कि हर बार खुदाई के दौरान इंजीनियर साहब के मकान की एक मंजिल बन जाती है। उनका लड़का की गाड़ी बदल जाती हैऔर उनकी पत्नी के हाथ के कंगन, कड़े व गले के चेन व हार की डिजाईन बदल जाती है। बदल तो हमारा शहर भी जाता है पर वह बदलाव प्रतिगामी व कष्टप्रद ही दिखता है।
    दूपहिया व चारपहिया जिस तरह बढ़ते जा रहे है सड़के उसी गति से सिकुड़ती जा रही है, बल्कि दुकानो के विस्तार मे खोती जा रही है।पहले सड़क के किनारे पटरियॉ होती थी, पटरियों के बाद चबूतरे और चबूतरे पर दुकान। पर अब न चबूतरे रहे न पटरियॉ, दुकान चल कर सड़क पर आ गई और दुकान के सामानो ने पटरी छेंक लिया। अब पटरी पर दुकान है तो खरीदार का सड़क पर रहना मजबूरी है। सड़क के राहगीर चूल्हे भाड़ मे जायें , उनकी बला से।
        यही स्थिति कमोबेस पूरे वरूणापार की है, शिवपुर के बाजार से गिलटबाजार होते हुये अर्दलीबाजार लगायत कचहरी तक, बसहीं से भोजूबीर पंचकोसी महावीर मंदिर पाण्डेपुर लगायत पहड़िया , खजूरी, हुकुलगंज पुलिसलाईन व लालपुर तक। हर कहीं दुकाने सड़क के सिर पर सवार है और सड़को का कोई माई बाप नही। जहॉ दुकाने नही है वहॉ अस्पताल व क्लिनिक है जिनके यहॉ आने वाले रोगियों व तीमारदारो की गाड़ियॉ आधी सड़क पर कब्जा की रहती है। कहने को अपने शहर मे एसपी ट्रैफिक व उनका पूरा अमला है पर सड़क को अतिक्रमण करने वाले दुकानो व अस्पतालो के मालिको डाक्टरो पर कभी चालान की कार्यवाही कभी हुई भी हो, हमे तो नही लगता।
        फिर भी शहर चल रहा है अपने मे अलमस्त अपने मे बेतरीब। किसी से कोई शिकायत नही, किसी से कोई शिकवा नही।
         क्योंकि यह शहर ही है कुछ अजीब सा.......

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

जनवरी २०१६ मे पठानकोट एअरबेस पर हुये आतंकी हमलो मे सैनिको के मृत्यु पर

आज रात मुझे फिर नींद नही आयी,
ऑखे डबडबाती रही ये सोच सोच कर,
मै तो रजाई मे था,सपनों के संग मगर,
सरहद पर बहा खून था मेरी नींद के लिए..!

ये शहर है कुछ अजीब सा...... banaras / varanasi 08/02/2016

कहते है बनारस आशुतोष अवढरदानी भगवान शंकर की नगरी है, यह मिथक भले हो पर आज का बनारस इसे पूरी तरह सिद्ध कर रहा है. विश्व मे अपने काम व नाम से डंका बबजाने वाले भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस बात को अच्छी तरह से जान गये हैं. अपने संसदीय क्षेत्र का नियमित दौरा करना भले ही मोदी ने अपने नियम मे शामिल कर लिया हो पर हम बनारसी है कि हम नही सुधरेगें के तर्ज पर कोई नियम मानने को तैयार नही. बात वरूणा पार से शुरू करें , पहले यह इलाका निछद्बदम और बहरी अलंग के लिये मसहूर हुआ करता था, लोग बाग दिव्य मे नहाने निपटने के लिये इधर फरचंगे मे आया करते थे, कुँयें बगीचो व पोखरो बावलियों वाले वरूणापार मे शनिवार की शाम व रविवार को दिन बनारसियो के भॉग बूटी व हाहा हीही से गुलजार रहने वाला यह इलाका शहरीकरण की चपेट मे आ कर कंक्रीट का जंगल तो बन गया पर शहर नही बन सका . यहॉ की सड़के आज भी कदाचित वैसे ही है जैसे कमोबेस आजादी के समय रही होगीं. पिछले बीस सालो से बार बार बनने को उजड़ रहा भोजूबीर सिन्धोरा मार्ग, कभी निछद्दम मे  पेड़ो की छाया मे इठलाती हुई पटरी, कुओं, मन्दिरो से सजी हुई और आज अतिक्रमण से बिलबिलाती हुई अपने अस्तित्व से जूझती पंचक्रोसी सड़क, हुकुलगंज रोड, शिवपुर रोड, सुअर बड़वा रोड रोज ही बन कर जी रही है और बनने के दोचार दिनो बाद ही मृतप्राय होकर पोस्टमार्टम का रस्ता देख रही है.  यहॉ के वासिन्दों सहित आमजन व सैलानीयों को मरती हुई सड़क भले दिख जाये पर बनाने वाले व मरम्मत करने वाले विभागो को ये नही दिखती, पता नही उनके आला अफसरानो के ऑखो पर चढ़े कमीसनखोरी  के चश्मे का असर है या इस शहर की नियति. कहना मुश्किल है. विश्वास न हो तो गिलट बाजार मे ऱाष्ट्रीय राजमार्ग ५६ वाराणसी लखनऊ मार्ग की बानगी ले.  कुछ लोग इसे एअरपोर्ट रोड तो कुछ वीआईपी रोड भी कहते है. जुमा जुमा २ महीने भी नही बीते जब अबे सिंजो के साथ मोदी जी यहॉ आये थे, सड़क ताजी ताजी बनी थी पर आज पूरी सड़क छर्री की खदान बनी हुई है,  राहगीर गिर रहे है, आमजन परेशान है , होता रहे़ आखिर शहर के सवसे ज्यादा डाक्टर भी तो इसी इलाके मे है.
बात विभाग की नही बात व्यवस्था की भी नही, बात इस शहर के तासीर की है, जैसे हमारे आराध्य महादेव शंकर स्वर्ण शिखर वाले मंदिर से लेकर मोहल्ले के वीरान चबूतरे पर भी समान भाव से संतुष्ट है वैसे ही इस शहर की आम जनता भी मोदी जी के आने पर काली पालिस व चमकदार सड़को से लेकर उधराती गिट्टायो व खुले गडढो वाले रस्तो मे भी समान भाव से जी रही है,
क्योकि इस बनारस शहर का मिजाज ही अजीब है.......

शनिवार, 22 अगस्त 2015

इस देश मे आम जनता के मूलभूत सेवाओं के प्रति किसी की जिम्मेदारी बनती है कि नही - व्योमेश चित्रवंश?

चिथरू चच्चा बड़े खुश हैं .
चच्चा को लगता है कि ई हाईकोर्ट के सच्चे डिसीजन से पूरे प्रदेश मे एजुकेशन का स्तर बदल जायेगा और टूटहवा मिडिल व जर्जरहवा प्राईमरी स्कूल से भी आईएएस कलेक्टर निकलेगें. औ जब डीएम कलेक्टर गॉव के हमारे इन स्कूलो से निकलेगें तो देश मे करान्ति आ जायेगी.
        औ ई जज कलेक्टर तसीलदार एमपी के लड़के जब सरकारी इस्कूल मे पढ़ेगे तो एजूकेसन मे ग्राण्टी तो होना ही है, आखिर रोज संझा को ई साहब लोग तो अपने लईका लोग से इस्कूल का प्रोगरेस तो पूछेगें ना?
       हमे चुप देख चच्चा ने पूछा " क्यो वकील साब, हम बिलकुल सही कह रहे हैं ना?"
     अब हम चच्चा के दिल को नही तोड़ना चाहते पर सवाल वहीं है जहॉ सन सत्तर मे था कि सरकारी अस्पतालो मे कितने सरकारी अफसरान ईलाज के लिये जाते है? सरकारी रासन के दुकान, सरकारी परिवहन प्रणाली, सरकारी व्यवस्था को कितने सरकारी हुक्मरान उपकृत करते है.
फिर यह तो बच्चो के भविष्य व संविधान प्रदत्त शिक्षा के मूल अधिकार की बात है.
आज तक कभी यह क्यो नही पूछा गया कि कितने डीएम अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अपने जिले के कितने प्राईमरी स्कूल, प्राथमिक अस्पताल, पीडीएस की दुकान, रोडवेज की बस , पावर हाउस, पानी टंकी , सफाई चौकी का निरीक्षण किये और इस संबंध मे उन्होने आज तक क्या किया?
        इस देश मे आम जनता के मूलभूत सेवाओं के प्रति किसी की जिम्मेदारी बनती है कि नही ?
वरना हम कब तक इस तरह के ख्याली पुलाव के चलते बात बात मे न्यायालय का मुँह निहारेगें जबकि फैसले के क्रियान्यवयन के लिये हमारे सूबे मे महान समाजवादी सरकार सत्तासीन है जो ईमानदार व नैतिकता के स्वरूप? यादव सिंह के खिलाफ जॉच के हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के लिये सुप्रीम कोर्ट मे जा कर आम जन की गाढ़ी कमाई के पैसों से जोरदार पैरवी करती है.....

बनारस की वास्तविक समस्या - व्योमेश चित्रवंश

माननीय प्रधान मंत्री जी,
प्रणाम,
विश्वास है कि आप का यह विदेश दौरा भी काफी सफल रहा होगा और आप के प्रयासों से भारत वर्ष की दुनिया मे और अच्छी साख बनी होगी. हमे भी बहुत अच्छा लगता है जब हमारा अपना सांसद प्रधानमंत्री के रूप मे विश्वपटल पर देश का नाम ऊँचा करता दिखता है पर प्रधानमंत्री जी हमारे अपने सांसद होने के नाते हमे भी आपसे ढेरों अपेक्षायें है, निश्चित ही आप के मन मे बनारस को ले कर एक सोच है और आप का प्रयास सराहनीय व प्रशंसनीय है. बावजूद इसके हम आप का ध्यान उन छोटे मुद्दो पर दिलाना चाहते हैं जो आपके ईमानदार प्रयासों मे पेदें मे छेद की तरह बनी हुई हैं और कहीं न कहीं उन्हे उनके पवित्र उद्देशयों से भटका रही हैं.
१- बनारस पर जनसंख्या का दबाव दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है पर यातायात व्यवस्था के नाम पर कुछ सड़के और उन पर चल रहे आटो रिक्सा, रिक्सा, प्राईवेट साधन दुपहिया व कारे है. कोई सरकारी व्यवस्था न होने से यातायात की बोझ से मारी सड़को व बेहाल आम जनता के पास जाम, झगड़ा व समय के नुकसान के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प शेष नही.
केन्द्र ने जे एन यू आर आर एम के नाम पर बनारस को १३० बसे दिया और ये नियमानुसार समयबद्ध ढंग से  चलने पर शहर के एक छोर से दूसरे छोर को जोड़ने के लिये पर्याप्त भी थी. इससे न सिर्फ सड़को पर वाहनो का बोझ कम होता बल्कि आम बनारसी के पैसे व समय की बचत होती पर इन बसों का कोई लाभ शहर को नही मिल सका. कारण? आटो यूनियन का रोडवेज के साथ भ्रष्ट काकस व शहर के यातायात व्यवस्था के प्रति ईच्छा शक्ति का अभाव. परिणामत: आज तक न तो बसें चली न ही सड़को पर बोझ कम हुआ. हॉ इन न चलने वाली बसों के लिये सुन्दर सुन्दर बस स्टाप जरूर बन गये जो गिलट बाजार बाईपास पर पुलिस चौकी, कचहरी पर फल की दुकान, कैण्ट पर जूते की दुकान, लहुराबीर पर सब्जी की दुकान व अन्य स्थानो पर विविध प्रयोगों मे आ रहे है. बसे जौनपुर इलाहाबाद चंदौली भदोही मिर्जापुर व अन्य रूटो पर चल रही है. शायद शासन ने अपनी नीति मे ऐसा ही कुछ बदलाव किया हो.
महोदय, हमे इन बदलावों से कोई शिकायत नही, हॉ ये सोच कर पीड़ा जरूर होती है कि यदि यातायात संबंधी यह कार्यक्रम ईमानदारी से लागू किया जाय तो अभी भी बनारस शहर को आराम से जीने की संभावनाओं से परिपूर्ण किया जा सकता है.
(दूसरे बिन्दु पर अगली बार)
उम्मीद है कि हम आम बनारसी की पीड़ा को समझते हुये आप कोई कार्ययोजना जरूर विकसित करेगें.
सादर,
आपके संसदीय क्षेत्र का एक आम नागरिक

मोदी जी का बनारस कार्यक्रम 16 july 2015

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
बन्दे मातरम,
आज आपका बनारस आने का कार्यक्रम है, कल रात से ही यहॉ बारिस हो रही है, पता नही आप का कार्यक्रम होगा भी या नही? पिछले २८ जून को भी ऐसा ही हुआ था. पता नही प्रकृति बनारस मे आपके कार्यक्रम मे बार बार बाधक क्यों बन रही है? ऐसे मे मौसम विभाग व प्रोटोकाल आपको क्या सलाह देते है इस पर पूरे बनारस की नजर है.
बहरहाल, मौसम के अनमने तेज रूख से जहॉ आपका कार्यक्रम दूसरी बार प्रभावित हो सकता है , वहीं हम उसके हल्के रूख से अकसर प्रभावित होने को मजबूर है, हल्की सी बारिस मे भी अकसर हमारे शहर की सड़कें हमारे पैरो के नीचे से खिसक जाती है, हमारे गली मोहल्ले ताल तलैय्या के रूप मे बदल जाते है जिससे बच्चो को अपना कागजी नौका बहाने के लिये दिन भर कहीं बाहर नही जाना पड़ता. बिजली विभाग वाले भी हम बनारसियों के सुरक्षा का कितना ख्याल रखते है इसका अंदाजा उनके द्वारा बारिस के आगाज के साथ ही लाईट काटने से लगाया जा सकता है. बिजली नही तो जलकल वाले भी यह सोच कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते है कि बारिस के पानी व ठण्ड हो चुके मौसम मे शायद शहर वालों को पानी की जरूरत ही नही. 
ये सब तो दो-चार बानगियॉ है प्रधानमंत्री जी, जिसको सहने समझने को आपका संसदीय क्षेत्र बनारस आदती हो चुका है पर अभी आपको इस की आदत नही. होगी भी कैसे? प्रशासन आपको इन समस्यायों के बारे मे बताना तो दूर महक भी नही लगने देगा. वे आपके आने जाने की व्यवस्था सड़क मार्ग से बनने ही नही देगे कि आपको पता न हो जाये कि बनारस मे बरसात मे सड़के जल परिवहन का काम भी कर सकती है. उनकी कोशिस रहेगी कि आपको न पता चले कि दिन मे चार बार स्नान करने वाले और सदा जलाभिषेक पाने वाले बाबा विश्वनाथ के शहरियों को बरसात मे पीने नहाने का पानी ही नही मिलता. ये सरकारी लम्बरदार कभी नही चाहेगें कि आप को ये पता चले कि बनारस के विकास के लिये आया धन कितने ईमानदारी? के साथ गंगा की धारा मे बहा कर उसे भी प्रदूषित कर दिया गया? किस तरह चौड़ी सड़को की फुटपाथो पर आरसीसी के स्लैब ढाल दिय गये? किस तरह कभी अपने प्राकृतिक ड्रैनेज सिस्टम, सुचारु सुव्यवस्थित जल प्रणाली,जलकुण्डो व सदानीरा वरूणा वअसि के बीच बसा गंगा के किनारे का यह शहर आज गंदगी, बरसाती दुर्व्यवस्था से त्राहि त्राहि करने को मजबूर है?
पर प्रधानमंत्री जी, आपको ये सब बाते नही पता चलने वाली, प्रोटोकाल के हिसाब से पता चलना भी नही चाहिये. आपके लिये ये छोटी मोटी बातें होगीं लेकिन आपके क्षेत्र के हम बनारसियों की बड़ी बड़ी समस्याये है. हमे आपके ईमानदारी भरे प्रयासो पर भी कोई शंका नही पर प्रधानमंत्री जी दिल्ली से बनारस तक आने मे मौसम का रूख बदल जाता है. लम्बे रस्तो को पार कर बनारस के घाटो तक पहुँचने तक मॉ गंगा का पानी काफी कुछ बह जाता है और काफी हद तक प्रदूषित भी. सवाल स्वच्छता अभियान चलाने तक नही उसे कहॉ और कब किस प्रकार चलाया जाय इस पर भी पुनरावलोकन करना होगा.
ईश्वर करें कि आपके आने से पहले मौसम खुल जाये और आपकी बनारस यात्रा पूर्ण हो. हमे भी इंतजार है अपने सांसद का जो बनारस के विकास के लिये कटिबद्ध है.
जयहिन्द.

फुटपाथ की सबसे ताजा दुर्दशा तो दोनो वरूणापुल है







         खोट हमारी योजनाओं मे नही हमारी नीयत मे है. जब लगभग दो दसक पहले चौकाघाट पुल का पुननिर्माण व कचहरी वाले नये वरूणापुल का नव निर्माण हुआ था तो सड़क के साथ साथ फुटपाथ भी बनाया गया था . समय के साथ इन फुटपाथों पर टेलीफोन व केबुल लाईने दौड़ने लगी और धीरे धीरे इन पर सब्जी वालो, मछली बेचने वालो, गमछा व हेलमेट बेचने वालो ने अपना कब्जा बना लिया. आज हालात यह है कि कभी पुल पर चलते हुये भीड़ भाड़ के कारण नियमतः आप फुटपाथ पर सीधे जा रहे है तो ये कब्जाधारी आपकी गलती को दो चार बाते सुनाते हुये सुधारने का माद्दा रखते है. फिर भी बात समझ मे नही आने पर दो चार ऊपर से पड़ जाये तो शुक्र मनाइये कि सस्ते मे छूट गये.
        ऐसा नही है कि प्रशासन व पुलिस को इस लापता फुटपाथ की खबर नही है क्योकि सिपाही लगायत आई जी जोन व बाबू लगायत कमिश्नर दिन भर इन्ही रस्तो से शहर जिला मुख्यालय बनारस क्लब व कचहरी कई बार आते जाते रहते है और पुलों पर लगी इन जबरन दुकानदारी को देख कर भी महटिया जाते है.
क्योंकि गाड़ियो से चलने वाले साहबान पैदल आम जनता के दुश्वारियों के बारे मे सोच कर नाहक क्यूँ परेसान हो?

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

मेरा ध्यान / व्योमेश की कवितायें



ध्यान
आत्मविलोकन, आत्मनिरीक्षण 
गहन श्वॉस अन्तरतम तक विश्रान्ति
एक सतत प्रक्रिया
और अद्वितीय अप्रतिम अनुभव
शांत शांति और परम शांति
मै प्रयास करता हूँ
शवासन नेत्र बंद त्रिकूट पर संक्रेन्द्रण
बस यहीं खो जाता है
इधर उधर फिसल जाता है मेरा स्व
कभी त्रिकूट पर तो कभी आग्या चक्र मे
या तो गहन अंधेरे मे ही डूबता जाता है
और गहन
नही दिखता उसे कहीं प्रकाश
उसे दिखता है बढ़ती मँहगाई
बच्चो के हर महीने बढ़ते स्कूली खर्चे
पूरे घर मे खिलखिलाती बेटी का बढ़ता कद
रात फिर बढ़ गयी पेट्रोल की कीमतें
मै घबरा कर ऑखे खोल लेता हूँ
और नासाग्र पर केन्द्रित होता हूँ
खुले नेत्रों से
पर खुली ऑखो से दुनिया दिखती है
दिखती है ढेर सारी फाईलें
उनमें से झॉकती तारीखे
बाहर सड़क पर चल रहा काम
शायद आज भी पूरा न हो सके
दिखती है कमरे मे बिजली नही
और चलता पंखा जलती बत्तियॉ
आज भी ईन्वर्टर डिस्चार्ज हो जायेगा ९ बजे
मै पुन: ऑखे बँद बंद कर लेता हूँ जल्दी से
भ्रामरी मुद्रा अपना लेता हूँ
ऑख बंद कान बंद और होठ भी बंद
मन को तेजी से उतारता हूँ
अंतस की गहराईयों मे
पर अंतस तक उतरने से पहले ही
आते है याद
मोबाईल पर आये ढेरो मैसेज एलर्ट
मेडिकल ईश्योरेन्स की लास्ट प्रिमियम डेट
डिस कनेक्शन रिचार्ज कराना है
गाड़ी ईश्योरेन्स रविवार को खत्म होगा
मकान टैक्स जमा करने पर छूट है इस महीने
एटीएम एकाउण्ट मे भी पैसे डलवाने है
और
मेरा ध्यान अन्तर्धान हो जाता है
मै वर्तमान मे लौट आता हूँ
वापस बिना किसी प्रयास व विलम्ब के
शायद मेरा आत्मनिरीक्षण यही है
और यही है मेरा सतत ध्यान.....
-व्योमेश १५.०७.१३ सोम

एक और सॉझ ढल गयी /व्योमेश की कवितायें

और
एक और सॉझ ढल गयी
आहिस्ता आहिस्ता
आँखों मे उदास सपने लिये
कभी खुली आँखों में तो
कभी बंद पलकों में
पर सभी सपनों का रंग
फीका फीका एक जैसा
दर्द और पीड़ा से भरा
पर उस विवसता के पीछे
एक अकुलाहटऔर बेचैनी
कुछ करने की कुछ कर गुजरने की
पर मन ही सब कुछ नही होता
क्योंकि मन को तन का
वास्तविक बोध नही होता
कसमसाहट में बंद पलको के
कोरों मे सिमट आई नमी
बावजूद मानस केअन्तर से
उठती है आवाज
यह अंधेरा छँट रहा है
कल आने वाली सुबह के लिये.......
-व्योमेश १४.०७.१३ रविवार

मेरा गॉव /व्योमेश की कवितायें

मेरा गॉव 
मुझे बुलाता है 
भेजता है ढेरों संदेशे
बारिस की पहली फुहारों से
माटी की सोंधी अलसाई गंधों में
नीम के कोमल छाल से बनें
सूखे सफेद मंजनों में
आम के फलों और जामुन के
साफ्ट ड्रिंक के खूशबू मे
मंदिर के प्रसाद मे मिले
तुलसी की दो चार पत्तियों में,

मेरा गॉव 
भेजता है संदेशे उलाहने के साथ 
शुरूआती बरसात से सज चुके
पथरी और दूब भरे मैदानों से
सिधरी,घोंघा, भूजी कोसली से
करेमू व सनई के सागों से
चिलबिल,टिकोरा, अमरूद की ढोढ़ी से
कबड्डी, सुटुर पटर के पढ़ाई से
पचैँया के दंगल बिरहा के बोलों से

मेरा गॉव
जगा देता है मुझको अपनी 
अनभूली यादों में
गरजते बादल और चमकती बिजलियों मे
टिपटिपाती बूँदों से भर आये 
धान रोपे खेतों मे
मेढकों सहित उफनाये ताल तलैयों मे

मेरा गॉव 
गुदगुदाता है मुझको
फागुन मे बिखरे रंगो मे
प्यार भरें गालियों और चुहलबाजियों मे
चैता फगुआ के संग 
होरहे की अधपकी बालियों मे
किलकती हँसी और झूले पर
बल खाती हँसती हुई कजरियों मे

मेरा गॉव
शिकायत करता है मुझसे
कैसे रहते हो तुम
इन भीड़ भरी सड़कों मे
एक दूसरे को नीचा दिखाने मे लगी
इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगो मे
बेमतलब ही भाग रहे लोगो मे
और एक दूसरे से जूझ रहे झूठो मे

मेरा गॉव
मनुहार करता है
आओ चलो फिर वहीं चलते है
खेत की मेड़ो पर बैठ 
ईख चूसेगें
पगडण्डियों पर चलते
चौधरी चच्चा के चने खायेगें
मछलियॉ मारेगें और 
पेड़ की फुनगियों पर
निशाना लगायेगें
यह तो पक्का है
अभी भी तुम ही जितोगे.

मेरा गॉव 
पकड़ लेता है मेरा हाथ
ठीक है वहॉ कुछ भी नही है
पर वहॉ तुम खिलखिलाओगे तो
माना वहं कारें नही है पर तुम 
मेरे बुलाने पर दौड़े आओगे तो
यहॉ है तुम्हारे पास वह सब कुछ
जिसकी जरूरत है शहर वालों को
पर नही है तुम्हारी मुस्कराहट
जो नाचती थी बेमतलब ही तुम्हारे होठो पर
बिना उसके तुम अधूरे से लगते हो
बिलकुल खाली खाली लूटे पिटे जैसे

मेरा गॉव 
बाहर बैठा है मुझे ले जाने को वापस
उसे इंतजार है मेरे साथ चलने का

और मै
छुपता फिर रहा हूँ
कि कहीं उससे सामना ना हो जाये..... 
-व्योमेश १५.०७.१३ सोमवार

शनिवार, 13 जुलाई 2013

अतिक्रमण के बोझ से पीड़ित पंचकोसी सड़क.......(शिवपुर से पाण्डेपुर तक)



पंचकोसी रोड तरना के पास शहर में प्रवेश करती है. 

-जमुना सेवा सदन से भारतीय शिशु मन्दिर तक सड़क का एक सिरा किसी न किसी तरह प्राईवेट सम्पत्ति के रूप मे उपयोग किया जा रहा है. अतिक्रमणकर्ता हास्पिटल से लगायत थाना शिवपुर ,गैस एजेन्सी विद्यालय मन्दिर के पुजारी तक है यह अलग बात है कि भीड़भाड़ वाली जगह न होने के कारण शिकायत कम ही लोगो को है.

- शिवपुर बाजार मे घुसते ही पंचकोसी की सड़क कही खो जाती है दुकानो के बाहर रखे सामानों के नीचे कहीं ढूढ़ना पड़ता है.

- लालजी कुँआ से लेकर बाईपास मोड़ तक बेचारी सड़क कहीं गली ते कहीं आँगन का बोध कराती है उस पर से ठेले वाले और बाईपास ठीके के मदिरा प्रेमी साल के ११ महीने इसका (दुर) उपयोग घर के पिछवाड़े की तरह करते हैं.

-बाईपास मोड़ (लोकनायक जय प्रकाश पार्क) के निकट पंचकोसी मार्ग का प्रयोग एक प्राईवेट नामी स्कूल के बसों के पार्किंग के लिये होता है.

- बाईपास मोड़ से यू पी कालेज के बीच पंचकोसी रोड की खूब बंदरबाट हुयी. गिलट बाजार यादव बस्ती तो अपने उत्तर २ से ४ फीट ही खिसकी परन्तु शिव मंदिर से पूरब बढ़ने पर राजर्षि नगर के वासिन्दों ने इसका उपयोग अपनी फूलवारी और बागवानी के लिये करना शुरू कर दिया है. नवरचना स्कूल से पूरब बढते हुये मकानों की बढ़ती नई बाउण्ड्रीयॉ अतिक्रमण की उपनिवेशिक परिभाषा बताती है.

-राजर्षि नगर कालोनी और भोजूबीर के बीच ही पूर्व सभासद के घर के पास ही हाल के वर्षों से एक नया मंन्दिर विकसित किया जा रहा है. पंचकोसी रोड के उत्तर के स्थान का अतिक्रमण कर के निर्मित हो रहा यह मन्दिर यातायात मे भले अवरोध वने पर अपने खास भक्तो को तो फ्री मे कीमती जमीन दिला ही देगा.

-भोजूबीर चौराहे पर आढ़तियों के ठेले और पूर्वी हिस्से मे बीयर शाप, चाट की दुकाने , आटो गैरेज और अवैध आटो स्टैण्ड के चलते हरदम लगता है जाम.

- जरा सा आगे बढते ही सत्ती माई ने किया कब्जा. - आठ साल पहले तक ग्रामदेवी सत्ती मॉ का ६*६ का चबूतरा सड़क के एक किनारे लोगो के लिये शक्तिदायी व पूजनीय था. रातोरात वह चबूतरा मंन्दिर मे कैसे और किसके द्वारा बदला ? यह विवेचना का विषय है, हॉ मन्दिर बनने का लाभ पड़ोसी गण को यह मिला कि उनके उपयोग के लिए काफी जमीने मिल गयी.

-डा० आर जे सिंह के ठीक सामने दूसरी पटरी पर शुरू होती है टैगोर टाऊन कालोनी. बड़े लोगों की कालोनी कही जाती है यह. कालोनी के उत्तरवासियों को ५० -६० फीट चौड़ी पंचकोसी सड़क बेमतलब लगी तो उन लोगों ने उसका (सही?) उपयोग अपने घरों की चाहरदिवारी मे मिला कर किया.
मजा यह है कि ये सभी लोग जिम्मेदार पढ़े लिखे कानून से वाकिफ लोग है जो बड़े सरकारी पदों पर है या सेवामुक्त है.

-कमोबेश भुवनेश्वर नगर की भी हालत ऐसी ही है.

- महाबीर मंन्दिर पर तो सड़क १२-१५ फीट भी बमुश्किल बच पाती है. मंगल व शनिवार को यहॉ जाम लगना स्वाभाविक पहचान बन चुका है. जबकि यहीं पर लोक लेखा समिति के अध्यक्ष व वाराणसी के सांसद डॉ०जोशी का घर है.
पहले यहॉ ऐसा नही था. महावीर जी का मन्दिर सड़क छोड़ कर लाल बरामदे से शुरू होता था तो सामने वाला कस्तूरबा विद्यालय भी अपने मुख्य भवन के गेट से. राजनेताओं के गुरूत्व के प्रभाववश मंन्दिर अपने स्थान से १० फीट आगे बढ़ा तो सामने विद्यालय भी बढ़ चला. इन दोनो के होड़ मे पिस के रह गयी सड़क. पास पड़ोस वाले भी लाभ मे रहे. परिणामत: आज ३ बैंक एटीएम , ३मिठाई की दुकानें, एक नर्सिग होम. ३ मोबाईल शाप स्थायी रूप से सड़क पर काबिज है. शेष बची सड़क पर फल ,मालाफूल और फुटकर दुकाने यातायात को दुरूह बनाने के लिये पर्याप्त हैं.

महावीर मंन्दिर से पूरब बढ़ने पर हालत अभी नियंत्रण मे है पर कब तक कहना मुश्किल है
क्योंकि इधर की खुली पंचक्रोसी रोड पर स्थानीय लोगों की निगाहे पड़ चुकी है. पागलखाना मोड़ के पहले एक ढाबे से यह शुरूआत कहॉ जा कर रूकेगी? दीनदयाल हास्पिटल की पटरी पर दो चार ढीहे और मन्दिर बना कर अतिक्रमण की कोशिसें जारी है.

बैंक कालोनी मोड़ से पाण्डेपुर तक भी अतिक्रमण के चलते सड़क दुबली दिखती है़

क्या प्रशासन अपनी ईच्छाशक्ति से पंचक्रोसी रोड को मुक्त करा सकेगा? यह यक्ष प्रश्न ज्यों का त्यों है..........

वरूणापार के अतिक्रम

कुछ दिन पहले वाराणसी पुलिस ने अपने फेसबुक पर अतिक्रमण से सम्बन्धित सूचनायें देने का आग्रह किया था. वरूणापार के अतिक्रमण पर हम भी कुछ जानकारी उपलब्ध करा रहे है इस उम्मीद के साथ कि बिना किसी भेदभाव व राजनीति के संभवत: ये स्थान मुक्त हो सकेगें.
- गिलट बाजार पुलिस चौकी - १०*१० में बने चौकी के बाहर पुलिस द्वारा लगभग आधी सड़क पर अतिक्रमण.

-भोजूबीर चौराहा - विशाल मेगामार्ट, स्पेंसर , ३ बड़े नर्सिंग होम, ६ डाक्टर , १ बेकर्स और टैम्पो स्टैण्ड के चलते हमेसा जाम.
जबकि विशाल और नर्सिंग होम के अपने पार्किंग होने के बावजूद उनका उपयोग नही.

-कचहरी गोलघर चौराहा- पुलिस चौकी कचहरी द्वारा आधे से अधिक चौराहे का अतिक्रमण.

- स्टेट बैंक मुख्य शाखा के सामने - दोनो पटरियों पर अवैध ठेले वाले, साइकिल स्टैण्ड वालों का अतिक्रमण.
नगर निगम का बस स्टैण्ड भी फल की दुकानों के गिरफ्त में

- वरूणापुल- जालान द्वारा कब्जा,अम्बेदकर मूर्ति के तीन तरफ स्टैण्ड.
शास्त्री घाट को भी स्टैण्ड बनाया जालान ने.

-अर्दली बाजार - पूरे मार्केट मे कही भी पार्किग नही. अवैध वेण्डरों और सड़कों पर पार्किग के चलते शाम को निकलने की स्थिति नही.

एल टी तिराहा- राजकीय पुस्तकालय के पूर्व पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारा पुस्तकालय भवन और सड़क को मिला कर कटरा. तीन बड़ी दुकानो द्वारा अतिक्रमण से सड़क हुई सकरी.

(पंचकोसी रोड के बारे मे कल....)

रविवार, 23 जून 2013

तालाब, पार्क नहीं यहां तो नदी पर हो गया है अतिक्रमण

तालाब, पार्क नहीं यहां तो नदी पर हो गया है अतिक्रमण





  • मोरवा नदी के करीब 300 मीटर क्षेत्र पर कर लिया गया है कब्जा, 
  • जिलाधिकारी आवास के बाउंड्री से होकर गुजरी है मोरवा नदी, 
  • करीब एक दशक पूर्व हुआ था डीएम आवास का निर्माण, 
  • कार्यदायी संस्था व इंजीनियरों के कार्य पर सवाल

तालाबो पर कब्जे की बात तो आपको अखबारों में पढ़ने को मिल जाती हो लेकिन किसी नदी पर कब्जे की बात शायद किसी ने सुनी हो ,लेकिन उत्तर प्रदेश के  भदोही में कुछ ऐसा ही वाकया  सामना आया है।  देश में अपने तरह का पहला मामला है जब नदी को ही अपनी चहारदीवारी के अन्दर कर लिया गया है, 1994 में भदोही को जिला बनने के बाद जनपद में जिलाधिकारी के लिए एक बड़े आवास  की जरूरत पड़ी मुख्यालय के बगल में ही इसका निर्माण कराया गया,  उसी के पास से प्रवाहित हो रही मोरवा नदी को जिला अधिकारी के अवास के अन्दर ले लिया गया हालांकि यह कार्यदायी संस्थायो ने लगभग 10 वर्ष पूर्व किया होगा तबसे से लेकर अब तक  15 से अधिक जिला अधिकारी उस आवास में रह चुके हैं लेकिन किसी का ध्यान  भी इस ओर नहीं गया  मोरवा नदी सरपतहां आदि गांव से होते हुए आगे जाकर वरूणा नदी में मिल गई है। सरपतहां तक तो मोरवा नदी स्वच्छंद रूप में गुजरी है। लेकिन आगे जाकर जिलाधिकारी आवास के चहारदीवारी में कैद कर ली गई है। करीब 300 मीटर से अधिक लंबा नदी का क्षेत्र डीएम आवास की चहारदीवारी में कैद है। चहारदीवारी से होते हुए हुए नदी बाहर निकलती है।
   भारतीय संविधान और केन्द्रीय रिवर बोर्ड अधिनियम कहता है कि किसी भी प्राकृतिक संपदा नदी, तालाब आदि पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। बावजूद जबकि कानून किसी भी नदी के क्षेत्र को किसी आवास के चहारदीवारी के अंदर नहीं मिलाया जा सकता है। जिस कार्य संस्था और इंजीनियरों की टीम ने आवास का निर्माण कराया, उन्होनें आखिरकार कानून का ख्याल क्यों नहीं रखा। यही नहीं अब तक कई जिलाधिकारी जिले में आए और गए। उनकी भी नजर आवासीय परिसर में कैद नदी पर नहीं पड़ी।
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    इसी  जनपद के उगापुर गांव के वाद पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से पुरे देश में तालाबो ,पोखरांे आदि के संरक्षण में तेजी आई इस निर्णय ने देश के तालाबो पोखरों को जल संरक्षण का आधार  माना उसे संरक्षित करने उसे बचाने  का आदेश सरकार को दिया ,इस निर्णय ने तालाब पोखरों पार्कों पर अवैध कब्जा हटाने का अधिकार भी दे दिया ,लेकिन इसी से लगभग आठ किलोमीटर दूर जनपद की प्रमुख नदी मोरवा पर ही कब्जा कर लिया गया , कब्जा भी जिसने किया उसी को सरकार ने इसके संरक्षण की  करने की जिम्मेदारी भी सौंप रखी थी
पिचले 10 वर्षों  से ज्यादा समय से यही स्थिति बनी रही किसी सरकारी संस्थान की नजर इस ओर नहीं गया न ही पर्यावरणविद को नदी जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनो पर नजर  रखने के लिए अनेक सरकारी संस्थाए काम  करती हैं, लेकिन किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई ये सरकारी कार्यप्रणाली का इससे अच्छा सबुत नहीं हो सकता है हालांकि कुछ लोग मानते है की मामला जिलाधिकारी आवास से जुड़ा हुआ है इसलिए किसी संगठन खबरनवीस , सरकारी अधिकारी की हिम्मत नहीं पड़ी हो , उप जिलाधिकारी ज्ञानपुर रत्नाकर मिश्रा का
 यहाँ बयांन  भी आपने आप पुष्टि करता है जब उनसे नदी कब्जे की बात पर वह इसे गलत बताते है लेकीन  जब जिलाधिकारी आवास की बात बताई गयी तो उनके बयान किस तरह से बदला गए  


जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुए चंद्रकांत पाण्डेय से

अभी हाल में ही जनपद में जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुए चंद्रकांत पाण्डेय से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया और कहा उन्हें आये एक-दो दिन ही हुए और इस मामले को  देखंेगे  नवागत जिलाधिकारी ने नदी अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई के प्रति अपनाने की बात दिखाई पड़ती है।


वरुण बचाओ अभियान के संयोजक व्योमेश इस-

 पर अपनी टिप्पणी दी की नदी, तालाब आदि के संरक्षण के लिए सरकारें व न्यायालय विशेष सख्ती बरत रही है। बावजूद इसके अतिक्रमण जारी है। तालाब व पार्कों पर तो अतिक्रमण व अवैध कब्जा की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। लेकिन किसी नदी पर कब्जा कर लिया गया हो, ऐसा मामला अभी तक सामने नहीं आया था।


           जनपद के ओमप्रकाश पाल का कहना है

कि इस आवास और इसकी जमीन अधिगृहित कर पूरे निर्माण के दौरान स्वीकृति के लिए तमाम रास्ते तय किए होंगे। तमाम वरिष्ठ अधिकारी और शासन के स्तर से  आवास के लिए नक्शा आदि की भी स्वीकृति ली गई होगी ऐसे में इस प्रकार नदी को कब्जे में लिया गया वो लचर सरकारी कार्य प्रणाली का सबसे बड़ा सबूत


सामाजिक सरोकारों से रूचि रखने वाले पर्यावरण मामलों के जानकर और अधिवक्ता संतोष गुप्ता-
 

का का कहना है नदी, तालाब सार्वजनिक संपत्ति है। इस पर किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकता है। इस पर कब्जा करने या इसे बाउंड्री में मिलाने का अधिकार किसी को नहीं है। भारतीय संविधान में इस बात का उल्लेख है कि किसी भी प्राकृतिक संपत्ति पर कोई भी व्यक्ति या संस्था कब्जा नहीं कर सकता है। राज्य सरकार को संपत्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। 133 सीपीआरसी में उल्लेख है कि जिलाधिकारी व मजिस्ट्रेट प्राकृतिक संपत्ति की सुरक्षा करें। अगर कब्जा व अतिक्रमण की जानकारी मिले तो कार्रवाई करें।




क्या कहते हैं एसडीएम

इस संबंध में उपजिलाधिकारी ज्ञानपुर रत्नाकर मिश्र से पूछा गया तो उन्होनें ने कहा किसी नदी, तालाब या जलाशय पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। उसे अपने बाउंड्री के अंदर नहीं मिलाया जा सकता है। लेकिन जिलाधिकारी आवास के बाउंड्री से होकर बुजरी मोरवा नदी के बारे में पूछने पर गोलमोल जवाब दिया। कहा कि बाउंड्री के अंदर नदी भले है, लेकिन उसके स्वरूप वही है। स्वरूप् से छेड़छाड़ नहीं हुआ है। इसलिए बाउंड्री के अंदर मिलाया जा सकता है।


वरुणा  नदी 

वरुणा  नदी भदोही जनपद की ३२ किलोमीटर लम्बाई  तय करती वाराणसी के छोर से इलाहबाद के सीमा तक सफर तय करती है  जनपद के 155 वर्ग किमी परिक्षेत्र में फैली है यह नदी वरुण और गंगा की सहायक नदी है मोरवा नदी कारी गांव से निकली है जो कसिदहां, नथईपुर,मूसी, जोगीपुर, सरपतहां आदि गांव से होते हुए आगे जाकर वरूणा नदी में मिल गई है।

क्या कहता है कानून

1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के तहत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संपदा नदी ,तालाब आदि का संरक्षण करे।
2. अनुच्छेद 48क के तहत राज्य का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संपदा की रक्षा करे।
3. 133 सीआरपीसी के तहत जिलाधिकारी व मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्रदान की गई है कि उन्हें सूचना मिले या वे निरीक्षण के दौरान किसी नदी, तालाब पर कब्जा है तो उसे तत्काल हटवाएं। डीएम व मजिस्ट्रेट को अतिक्रमण हटवाने का पूरा अधिकार है।
4. नदी के धारा या भूमि पर कोई ऐसा अवरोध नहीं लगाया जा सकता जिससे उसका उपयोग करने में जन सामान्य को परेशानी हो।
5. चहारदीवारी बनाकर किसी नदी के जल को अवरूद्ध नहीं किया जा सकता है।
6. नदी या तालाब का निजी तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


फोटो गूगल मैप कर रहा है पुष्टि 

ग्ूगल मैप में देखने में साफ-साफ पता चल रहा कि मोरवा नदी को लिाधिकारी आवास परिसर में कैद किया गया है। नदी आवास के बाउंड्री के अंदर से गुजरी है। स्थिति स्पष्ट हो सके, इसके लिए तस्वीर को ग्राफिक्स के जरिए स्पष्ट किया गया है। लाल रंग की दिख रही लाइन मोरवा नदी है। वहीं नीले रंग की लाइन जिलाधिकारी आवास की बाउंड्री है। ग्राफिक्स देखने के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि मोरवा नदी का कितना लंबा क्षेत्र जिलाधिकारी आवास के परिसर से गुजरा है।