सोमवार, 24 जुलाई 2017

व्योमवार्ता / सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तानियत को बदनाम करने की साजिश : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24 जुलाई 2017,सोमवार

सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तानियत को बदनाम करने की साजिश और जीआर वशिष्ठ व मोहम्मद जावेद जैसे पहुऱये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24 जुलाई 2017,सोमवार

कल फेसबुक  पर मित्र जी आर वशिष्ठ  की कहानी पढ़ कर उन्हे बधाई  देते हुये कहानी को अपनी डायरी  मे शेयर करने के लिये अनुमति  लिया था. दिन भर वो कहानी मन मे घुमड़ती रही, सावन के महीने मे जब बनारस और बाकी तीर्थों मे कॉवर यात्रा चल रही हो, गाहे बगाहे कॉवरियों के उडण्ड होने की खबरें आ रही हों,. वही दूसरी तरफ गोरक्षा  के नाम पर कथित गौभक्त एक ईमानदारी भरे प्रयास  को बदनाम करने के लिये  अपनी मनमानी  कर रहे है, काश्मीर मे पत्थरबाजी की घटनाओं मे स्थानीय जनता की  विशेषकर युवा वर्ग की बढ़ती भागीदारी, सोशल मीडिया पर एक दूसरे के प्रति जहर उगलते पोस्ट समाज के तानेबाने को  बिगाड़ने पर लगे हुये  है. ऐसे मे समाज मे एकदूसरे के प्रति बढ़ रहा अविश्वास  व उससे उभरती बेचैनी निश्चित  ही अच्छे  लक्षण नही है.  ऐसा जानबूझ  कर किया जा रहा है या सोची समझी साजिस के तहत, यह तो जॉच का विषय  है . क्योंकि योशल मीडिया के पोस्टो पर नजर डाले तो भाषाई तमीज व तहजीब तो दूर की बात इस बात की होड़ लगने लगी है कि किस निचले व छिछले स्तर तक जा कर एक दूसरे को हम कोस सकते है, पर हमारे सामने जीआर वशिष्ठ  जैसे उदाहरण  भी है जो कबीर के सामाजिक तानेबाने को शिद्दत  से कायम रखने के लिये मजबूती से खड़े है.
ऐसे मे आज हिन्दुस्तान  अखबार  मे साईबर संसार  स्तंभ मे मोहम्मद  जावेद की असली हिन्दुस्तानियत पोस्ट भी मिली जिसमे उन्होने बुधवार का वाकया बताते हुये कॉवरयात्रियो के विवेक व धार्मिक सद्भावना  की तारीफ करते हुये असली हिन्दुस्तानियत का जिक्र किया है.
हम इस बारे मे बेहद मुतमईन है कि हमारे हिन्दुस्तान  का धार्मिक तानाबाना बेहद मजबूत है जिसे हर भारतीय ने  अपने भावनाओं से सींचा है और हमारी यही भावना हमारी मूल भारतीयता है. बस इस भावना को तुष्टिकरण  की राजनीति  व क्षणिक स्वार्थी  कुत्साओं से दूूर रखने की जरूरत है,  हमे निश्चित  तौरसे सोशल मीडिया  पर वशिष्ठ और मोहम्मद जावेद जैसो ईमानदार  पहरूओं की पोस्ट बढ़ानी चाहिये क्योंकि यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है.
जयहिन्द जी आर वशिष्ठ जी और मोहम्मद  जावेद भाई आप के शानदार  पोस्ट के लिये.
#जय_हिन्द

रक्षाबंधन का त्यौहार आने वाला था। बाज़ार में रौनक थी। एक सात साल की बच्ची आरती अपने पिता की उंगली पकड़े चल रही थी। अचानक पास ही एक मिठाई की दुकान में गैस सिलेंडर में आग लग गयी और वो फट गया। लोगोँ को लगा कोई बम ब्लास्ट हुआ है। पूरे बाज़ार में भगदड़ मच गयी। आरती के हाथ से पिता की उंगली छूट गयी और कुछ ही पल में वो भीड़ में खो गयी।
शाम होते होते भीड़ कम हुई। पता चला कि दुकान की छत गिर गई लेकिन हादसे में किसी को चोट नही आई।
आरती सड़क के किनारे खड़ी रो रही थी। हिना ने बच्ची को रोते देखा तो समझ गई कि वो किसी के साथ आई होगी और भीड़ में बिछड़ गयी। हिना उसके पास आई और उसे चुप कराने लगी। उससे उसका पता पूछा, उससे जानना चाहा कि वो किसके साथ थी?, लेकिन आरती बस रोते ही जा रही थी। हिना ये सोचकर उसे घर ले चली कि पुलिस को बता देंगे शायद इसके घरवालों ने पुलिस में रिपोर्ट की हो।
घर पहुँचकर हिना ने दरवाज़ा खटखटाया। हिना के पति ज़फर ने दरवाज़ा खोला। हिना ने ज़फर को हादसे और आरती के बारे में बताया।
"कितनी प्यारी बच्ची है ना!" ज़फर ने हिना की तरफ देखते हुए कहा।
"बच्चियाँ प्यारी ही होती है स्वीटहार्ट।" हिना ने मुस्कुराते हुए कहा।
"तुम कुछ खाने के लिए बनाओ। बच्ची को भूख लगी होगी।" ज़फर ने हिना से कहा और हिना रसोई में चली गयी।
ज़फर ने अपने बेटे हैदर को आवाज़ लगाई।  हैदर बैठक में आ गया।
"हैदर तुम आरती के साथ खेलो, मैं नमाज़ पढ़के आता हूँ।" ज़फर ने हैदर को आरती के बारे में बताकर कहा और अपने कमरे में चला गया।
आरती अब चुप हो गयी थी और इस परिवार के व्यवहार से उसे अच्छा महसूस भी हो रहा था।
"तुम लोग मुस्लिम हो?" आरती ने उनके नाम और नमाज़ पढ़ने की बात सुनकर हैदर से पूछा।
"हाँ।" हैदर ने कहा।
"नही! तुम लोग मुस्लिम नही हो। तुम तो बहुत अच्छे हो। मेरे पापा कहते हैं कि मुस्लिम लोग बुरे होते हैं। वो आतंकवादी होते हैं।" आरती ने मासूमियत से कहा।
"नही। आतंकवादी लोग मुस्लिम नही होते। वो तो बस आतंकवादी होते हैं। मेरे अब्बू कहते हैं कि जिसके अंदर इंसानियत मर जाए वो मुस्लिम हो ही नही सकता।" हैदर ने शान्ति से जवाब दिया।
हिना और ज़फर को बच्चों की बातें सुनाई दे रही थीं। खाना बन चुका था। हिना ने बच्चों को खाना परोसा और मासूमों की ओर देखकर मुस्कुरा दी। ज़फर भी बैठक में आ गया। उसने आरती से उसके परिवार के बारे में पूछा। आरती ने बताया कि उसके पिता का नाम प्रेम है और वो सरकारी स्कूल में टीचर हैं। आरती ने प्रेम का फोन नम्बर ज़फर को बताया। ज़फर ने प्रेम को फोन करके आरती के बारे में बताया। अपने घर का पता बताकर प्रेम को बुलाया। थोड़ी देर बाद प्रेम ज़फर के घर आ गया। ज़फर ने हिना को प्रेम के लिए चाय बनाने को कहा।
प्रेम ने चाय के लिए मना किया तो ज़फर ने ने कहा "हम मुस्लिम होने से पहले हिन्दुस्तानी भी हैं साहब। चाय तो आपको पीनी ही पड़ेगी।"
इस बार प्रेम मना नही कर पाया।
कुछ देर बातें हुई।
अचानक ज़फर की नज़र हैदर की गुल्लक पर पड़ी। ज़फर ने गुल्लक उठाकर फोड़ दी और सिक्कों को उठाते हुए बोला "इनमें सोने की अशर्फियाँ नही दिख रही!"
प्रेम ने चौंककर पूछा "आपने इसमें सोने की अशर्फियाँ रखी थीं?"
"नही। इसमें तो सिक्के ही डाले गए थे।" ज़फर ने कहा।
"तो फिर सोने की अशर्फियाँ क्यों निकलेंगी?" प्रेम ने कहा।
ये सुनकर ज़फर ने कहना शुरू किया।
"प्रेम जी। ये बच्चे भी गुल्लक की ही तरह होते हैं। इनको जो सिखाया जाएगा वही तो सीखेंगे। हम सिक्के डालेंगे तो अशर्फियाँ क्योँ निकलने लगीं! कोई धर्म बुरा नही होता  लेकिन अगर उस धर्म के नाम पर जब कुछ लोग बुरा करते हैं तो बदनामी पूरे धर्म की ही होती है और फिर उस धर्म के लोगों का कर्तव्य बनता है कि उन बुरे लोगों के खिलाफ कदम उठाएं। हम चाहते हैं कि ज़ुर्म करने वालों को सजा मिले।
आतंकवादियों की बन्दूक से निकली गोली पूछकर नही लगती कि आप हिन्दू हैं या मुस्लिम। हमारा मज़हब और मैं तो कहता हूँ कोई भी मज़हब दूसरों को तकलीफ़ देना नही सिखाता तो फिर बेगुनाहों की हत्या करने वाले लोग किसी धर्म के कैसे हो सकते हैं?
भाई मेरे आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी होते हैं। और उनके हमलों में मरने वाला हमेशा हिंदुस्तानी होता है। फिर हम क्यों हिन्दू मुस्लिम के नाम पर सियासत करते फिरे? हम सब हिंदुस्तानी हैं ना।
आप और हम मिलकर कोशिश करेंगे ना।
इन लोगों का सफाया होगा। जल्द ही सब ठीक हो जायेगा भाई।"
प्रेम कुछ कह नही पाया। आरती को साथ लेकर चलने लगा। ज़फर उनको छोड़ने दरवाज़े तक आया। प्रेम जाने लगा तो पीछे से ज़फर ने उन्हें आवाज़ दी। प्रेम ने पीछे मुड़कर देखा।
"आपका नाम बहुत ख़ूबसूरत है भाई 'प्रेम'। और हाँ गुल्लक में अशर्फियाँ डालियेगा।" ज़फर ने मुस्कुराते हुए कहा।
प्रेम मुस्कुरा दिया और चलने लगा तो ज़फर ने फिर से आवाज़ देकर रोका और कहा "हिन्दू बहुत अच्छे होते हैं भाई और मुस्लिम भी बुरे नही होते।"
इस बार प्रेम की मुस्कुराहट पिछली बार से कुछ अधिक थी।
प्रेम आरती को अपने घर ले आया। घर पहुँचकर उसे अफ़सोस हुआ कि उसे ज़फर से अच्छे से बात करनी चाहिए थी, कितने अच्छे लोग हैं वो। लेकिन ज़फर और उसके परिवार से मिलने के बाद प्रेम का मुस्लिमों के प्रति नज़रिया धीरे धीरे बदलने लगा। उसे सच में लगने लगा कि सब लोग एक जैसे नही होते और वो अब बच्चों को सभी धर्मों का आदर करने की बातें सिखाने लगा।
एक दिन प्रेम टीवी देख रहा था कि अचानक उसका रिमोट न्यूज़ चैनल से आगे न बढ़ा। ब्रेकिंग न्यूज़: श्रीनगर में बस पर हमला करने आये तीन आतंकवादी सेना से मुठभेड़ में ढेर। बताया जा रहा है कि बस में  राजस्थान से तीन हिन्दू परिवारों के लोग कश्मीर घूमने आये थे। इस मुठभेड़ में लेफ्टिनेंट मोहम्मद ज़फर शहीद हो गए हैं। नाम सुनने से पहले प्रेम ने टीवी स्क्रीन पर दिखती ज़फर की तस्वीर से उसका चेहरा पहचान लिया था। ज़फर के सीने में तीन गोलियाँ लगी थी।
प्रेम का शरीर जैसे सुन्न हो गया हो। पलकें झपकने के अलावा बदन कोई हरकत नही कर रहा था। आँखों से आँसू बह रहे थे। एक हिंदुस्तानी के शहीद होने का दर्द महसूस हो रहा था। आरती ने पीछे से आकर पापा के कंधे पर हाथ रखा। प्रेम ने ख़ुद को सम्भाला। आरती ज़फर का चेहरा पहचान नही पायी थी।
उसने प्रेम की ओर देखकर कहा, "पापा मुस्लिम अच्छे होते हैं ना?"
"हाँ बेटा। एक सच्चा हिन्दुस्तानी कभी बुरा नही हो सकता।" प्रेम कहते हुए टीवी की तरफ बढ़ा और ज़फर की और देखकर सैल्यूट करते हुए कहा "जय हिन्द, जय हिन्द मेरे भाई।"
"जय हिन्द" पीछे से आरती की मासूम सी आवाज़ आई। प्रेम ने पीछे मुड़कर देखा। आरती अपना हाथ माथे से लगाए सैल्यूट कर रही थी। गुल्लक में सोने की अशर्फियों की खनखनाहट थी।
- जी आर वशिष्ठ
(बनारस, 24 जुलाई 2017, सोमवार)
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शनिवार, 22 जुलाई 2017

व्योमवार्ता / जियो मोबाइल आफर, एक नजरिया यह भी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22जुलाई 2017,शनिवार

जियो मोबाइल  आफर,  एक नजरिया  यह भी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22जुलाई 2017, शनिवार

      कल से मोबाइल  बाजार मे बड़ी चर्चा है मुकेश अंबानी की जियो मोबाइल  आफर की,  अंबानी ने 24 अगस्त से 1500रूपये मे 4जी मोबाइल  सेट उपलब्ध कराने की घोषणा  की है जो तीन साल तक एक्सचेंज बैक मनी  के साथ  मिलेगा,  साथ ही साथ यह टीवी के लिये डीटीएच मोडम व इंटरनेट फैसिलेटर के रूप मे भी उपयोग हो सकेगा. आम जनता इस आफर को ले कर बेहद उत्साहित  है उम्मीद  है कि अगस्त के आखिरी हफ्ते मे जियो फोन के लिये रिटेल मोबाइल  स्टोर्स पर फिर मारामारी देखने को मिलेगी. रिलायंस जियो के इस आफर को सभी अपने अपवे तरीके से देख रहे है पर यह तो तय है कि रिलांयस अपने पिछले इतिहास को दुहराते हुये  अपना बाजार स्थापित करने के लिये बाकी कंपनियो का बाजार बिगाड़ देगी. मेरे एक मित्र ने इस पूरे प्रकरण  पर एक उम्दा पोस्ट लिखा है जिसके संबंध मे सत्यता की गारंटी नही ली जा सकती परंतु यह मन को सुकून देने वाली व वास्तविक  जैसी ही है.  यदि ऐसा ही हुआ तो?
               मुकेश अम्बानी का Jio का फ्री फोन और Make in India (वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं) : जिन्हें लग रहा है कि रिलायंस ने ये फ्री फ़ोन अचानक लांच कर दिया उन्हें दोबारा सोचने की ज़रूरत पड़ेगी इस लेख को पढ़ने के बाद,
मोदी ने 3 साल पहले Make in India लांच किया, विदेश की 70+ मोबाइल कंपनियां भारत आयीं और अपनी फैक्टरियां लगाईं, जिस देश मे मोबाइल का स्क्रीन गार्ड, कवर और टेम्पर्ड ग्लास तक नही बनता था वहां अब मोबाइल बनने शुरू हो गए, manufacture होने शुरू हो गए (assemble नही manufacture), अब इन विदेशी कंपनियों ने भारत मे Made in India हैंडसेट बेचने शुरू कर दिए जिसमे xiaomi, gionee, oppo, vivo आदि शामिल हैं, लेकिन मोदी का ये सपना नही था, उन्हें तो कुछ और चाहिए था, मोदी को भारत की बादशाहत चाहिए थी विश्व बाजार में, तो जब सब ने अपनी अपनी फैक्ट्री लगा ली प्रोडक्शन चालू कर लिया तब उन्हें विदेशों में माल बेचने के लिए प्रोत्साहित किया गया, टैक्स में छूट दी गयी, नतीजा ये हुआ कि xiaomi जैसी कंपनी Made in India हैंडसेट को US और Europe में बेचने लगी, बेच तो पहले भी रही थी पर तब चीन में बना हैंडसेट बेचा जा रहा था और अब भारत मे बना, यानी चीन का व्यापार छीन कर भारत ने ले लिया, और ऐसा एक चीनी कंपनी से करवा लिया, चीन की बौखलाहट की वजह यही है, अब कल Jio का फ्री फ़ोन लांच हो गया यानी ऐसी 70+ कंपनियों की वाट लग गयी अब वे क्या करेंगी? ज़ाहिर है हजारों करोड़ के इन्वेस्टमेंट के बाद ये कंपनियां बंद तो करेंगी नही क्योंकि बंद करने में पूरा पैसा डूब जाएगा, अब इन कंपनियों के लिए भारत का बाजार तो खत्म हो गया ऐसे में अब ये सभी कंपनियां एक्सपोर्ट पर दिमाक लगाएंगी, यानी सभी विदेशी कंपनियां अब मोबाइल बनाएंगी भारत मे और बेचेंगी विदेश में, यही तो मोदी का सपना था, यही सही मायने में Make in India है, जहां भारतीयों को काम मिले, माल भारत मे बने और विदेशों में बेचा जाए, वैसे फ्री फ़ोन का कांसेप्ट Jio के साथ लांच होना था पर इसे एक साल तक रोके रखा गया, आप इतने समझदार है कि ये समझने की ज़रूरत नही कि क्यों रोका गया
(बनारस, 22जुलाई 2017, शनिवार)
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बुधवार, 19 जुलाई 2017

व्योमवार्ता / मेरी बेटी अब थोड़ी सी बड़ी हो गई है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 19 जुलाई 2017,बुधवार

मेरी बेटी अब थोड़ी सी बड़ी हो गई है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 19जुलाई 2017, बुधवार

अब मेरी बेटी थोड़ी सी,
       बड़ी हो गई है..
कुछ जिद्दी, कुछ नकचढ़ी
       हो गई है.
मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी
       हो गई है.
अब अपनी हर बात
     मनवाने लगी है..
हमको ही अब वो
      समझाने लगी है.
हर दिन नई नई फरमाइशें
      होती है.
लगता है कि फरमाइशों
      की झड़ी हो गई है.
मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो
       गई है.
अगर डाटता हूँ तो आखें
       दिखाती है..
खुद ही गुस्सा करके रूठ
      जाती है..
उसको मनाना बहुत
     मुश्किल होता है..
गुस्से में कभी पटाखा
     कभी फूलझड़ी हो गई है..
मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो
      गई है..
जब वो हँसती है तो मन
       को मोह लेती है..
घर के कोने कोने मे
    उसकी महक होती है..
कई बार उसके अजीब से
      सवाल भी होते हैं..
बस अब तो वो जादू की
      छड़ी हो गई है..
मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी
       हो गई है..
घर आते ही दिल उसी को
      पुकारता है..
सपने सारे अब उसी के
     संवारता है..
दुनियाँ में उसको अलग
     पहचान दिलानी है..
मेरे कदम से कदम
    मिलाकर वो खड़ी हो गई है
मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है .
(बनारस,19जुलाई 2017, बुधवार)
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सोमवार, 17 जुलाई 2017

व्योमवार्ता / निज भाषा उन्नति करै.... (इतिहास के पन्नों से) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17जुलाई 2017 सोमवार

निज भाषा उन्नति करै.... (इतिहास के पन्नों से) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17जुलाई 2017 सोमवार

         आज कल हम भारतीय मध्यवर्गीय परिवारो मे अपनी भाषा, अपनी संस्कृति,अपना संस्कार छोड़ कर पश्चिम की भौतिकवादी परिवेश के नकल करने की प्रवृत्ति बड़ी तेजी से बढ़ रही है, कुछेक मॉ बाप मुझसे जब यह कहते गर्व महसूस करते है कि उनके बच्चों को हिन्दी नही आती,या वे हिन्दी नही समझ पाते है तब मै स्वयं को अपनी मातृभाषा  व मातृभूमि  के प्रति अपराधबोध से पीड़ित पाता हूँ कि परिवर्तन की दिखावे वाली दिशाहीन ऑधी मे किस तरह दशाहीन हो रहे है हम.  दोष उन बच्चो का नही,  दोष तो हमारी पीढ़ी का है जो अपने आने वाले भविष्य को सच्चे जीवनमूल्यों ये बोध नही करा पा रहे है हम. आज फ्रांस मे एक भारतीय विद्वान का एक अनुभव पढ़ने को मिला जिसे इस उद्देश्य के साथ आप सब से बॉटने की ईच्छा हो रही है कि पता चले कि पश्चिम के देश अपनी यंस्कृति,  अपनी भाषा  व अपने परम्पराओं  को लेकर कितने सजग है वहीं उनका अनुकरण करते हम इस परिवेश मे स्वयं को कहॉ पाते है, यह विचारणीय है.
         इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे।
उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।
एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।
डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है।
आपके देश की कोई भाषा नहीं है?
डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक महक नहीं थी।
गृहस्वामिनी बोली डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते।
गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया "मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी।
फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था।
स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी।
एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।
बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?
मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुनाया किखुश हो कर साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार बार आग्रह करने पर वह बोली 'महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?'
साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा 'बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा 'महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।'
इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं 'लड़की' नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है।
साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती।
जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया।
मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।
यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। गृहस्वामिनी ने कहा 'डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ।
हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं...।'
हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई।
  क्या हम इस कहानी से कुछ सीख सकते हैं,  अवश्य सोचियेगा.
(बनारस, 17जुलाई 2017, सोमवार)
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शनिवार, 15 जुलाई 2017

व्योमवार्ता / और एक सॉझ : व्योमेश चित्रवंश की डायरी के कुछ पुराने पन्ने, 15 जुलाई 2017, शनिवार

और एक सॉझ : व्योमेश चित्रवंश की डायरी  के कुछ पुराने पन्ने, 15जुलाई 2017, शनिवार

और
एक और सॉझ ढल गयी
आहिस्ता आहिस्ता
आँखों मे उदास सपने लिये
कभी खुली आँखों में तो
कभी बंद पलकों में
पर सभी सपनों का रंग
फीका फीका एक जैसा
दर्द और पीड़ा से भरा
पर उस विवसता के पीछे
एक अकुलाहटऔर बेचैनी
कुछ करने की कुछ कर गुजरने की
पर मन ही सब कुछ नही होता
क्योंकि मन को तन का
वास्तविक बोध नही होता
कसमसाहट में बंद पलको के
कोरों मे सिमट आई नमी
बावजूद मानस केअन्तर से
उठती है आवाज
यह अंधेरा छँट रहा है
कल आने वाली सुबह के लिये.......
       -व्योमेश १४.०७.१३ रविवार
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शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

व्योमवार्ता/ दि ग्रेट गेम , कल क्या हो सकता है? :व्योमेश चित्रवंश की डायरी,12 जुलाई 2017,बुधवार

दि ग्रेट गेम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,  12 जुलाई 2017, बुधवार

आज सोशल मीडिया पर एक मित्र की पोस्ट पढ़ी. आज के वैश्विक माहौल को बड़े करीब से किये गये उनके इस पोस्ट मे आज के वैश्विक परिवेश मे देशो के बीच तनावपूर्ण संबंधो के कई पहलूओं पर चर्चा करते हुये इसे एक साजिश बताया गया है जो आने वाले समय मे पूरी दुनिया के आर्थिक,  सैनिक, भौगोलिक, सामाजिक,  राजनीतिक,  कूटनीतिक व सामंजस्यता  तथा निर्भरता  के ताने बाने को छिन्न भिन्न करते हुये नया इतिहास रच सकता है, मन मानस को डराने और विश्वास न करने की ईच्छा के बावजूद इस पोस्ट मे कुछ सवाल ऐसे है जो बेहद वाजिब होने के साथ साथ सोचने को विवश करते हैं.

          "तीसरा विश्वयुद्ध कैसे होगा और इसमें भारत और मोदी की क्या भूमिका होगी और ये मोदी देश को जलता छोड़कर बार-२ विदेश में काहे को जाता है जैसे सवालों का जवाब देता SAVE करके रखने योग्य वो लेख जो जिसने नहीं पढ़ा उसने '' कल क्या होने वाला है '' को आज ही जानने का अवसर खो देगा ..

--------- " The Great Game " --------

अगर आप इतिहास को गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि वर्तमान में विश्व की महाशक्तियों में एक उसी प्रकार की आपाधापी और लेनदेन का खेल चल रहा है जैसा कि 15वीं - 16वीं शताब्दी में यूरोपीय शक्तियों में उपनिवेशीकरण को लेकर विश्व की बंदरबांटको लेकर चला था । उपनिवेशीकरण ने औद्यौगिक क्रांति को सफल बनाकर पश्चिम को आर्थिक रूप से तो शक्तिशाली बना दिया परंतु औद्योगिक क्रांति और पूँजीवाद के फलस्वरूप ' बाजार और मांग ' की आवश्यकता ने एक ऐसे भस्मासुर को जन्म दिया जिसके कारण पृथ्वी के असीम संसाधन भी कम पड़ने लगे हैं । इस भस्मासुर का नाम है ' उपभोक्तावाद ' और ये एक ऐसा असुर भी है जिसकी भूख अगर शांत ना की जाये तो यह मानव सभ्यता को ही निगल लेगा और सबसे बुरी बात ये है कि इसके उदर में जितना भोजन डाला जाता है , इसकी भूख उतनी ही बढती जाती है जिसके कारण पृथ्वी के संसाधन चुकते जा रहे हैं और पृथ्वी एक गंभीर ' Ecological crisis ' से गुजर रही है जिसका नाम है ' Decline Carrying Capacity ' जिसे सरल शब्दों में कहूँ तो अपने अपने क्षेत्र ( देशों ) में जनसंख्या को जिंदा बनाये रखने के लिये आवश्यक संसाधनों की क्षमता में कमी ।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार रूस के पास ' साइबेरिया ' के रूप में अगले 150 सालों के लिये पर्याप्त खनिज संसाधन है और साथ ही उसने अंटार्कटिका पर अपना दावा ठोक दिया है जिसमें भारी मात्रा में खनिज संसाधन दबे हुए हैं ।

इसी तरह अमेरिका ने भी अगले 150 - 200 साल के लिये खनिजों और तेल का तो बंदोबस्त किया हुआ है और फिलहाल वह ' दूसरों के माल ' पर डाका डालकर एश कर रहा है ।

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शक्ति चीन ने भी तनिक बदले हुये रूप में यह पॉलिसी बना रखी है कि वह भारत जैसे बेवकूफ और कई भ्रष्ट देशों से भारी मात्रा में अयस्क खरीदकर खनिजों के सुरक्षित भंडार बना रहा है ।

अब रहा 'भोजन ' जिसके लिये अमेरिका बिल्कुल चिंतित नहीं क्योंकि उसके पास पर्याप्त से भी कई गुना भूमि व कृषि संसाधन हैं और ऑस्ट्रेलिया व कनाडा के रूप में विश्वस्त मित्र हैं और सच कहा जाये तो ये अमेरिका की परछांई हैं जिनके द्वारा अपार मात्रा में दूध ,मछली व मांस की आपूर्ति की गारंटी है ।
दूसरी तरफ रूस के लिये भोजन व गर्म पानी के बंदरगाह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है इसी कारण रूस यूक्रेन जिसे यूरोप का ' अन्न भंडार ' कहा जाता है , को किसी भी हालात में अपने शिकंजे में बनाये रखना चाहता है और " क्रीमिया विवाद " की जड़ यही है ।
चीन के सामने भी भोजन के लिये कृषिभूमि की कमी व समुद्र में कमजोरी मुख्य संकट है जिसके लिये उसने अजीब हल निकाला है । उसने एक ओर तो हिंद महासागर में " पर्ल स्ट्रिंग " का निर्माण शुरू किया है और दूसरी ओर अफ्रीका में हजारों एकड़ जमीन को लीज पर लेना शुरू किया है ताकि वहां वह व्यापारिक फसलों को उगा सके और खुद अपनी भूमि पर खाद्यान्न फसलों को ।

विशेषज्ञों की मानें तो पृथ्वी के संसाधन अब चुक रहे हैं जिसमें फिलहाल दो चीजें सबसे मुख्य हैं --

.............." पैट्रोल और पानी "...............

वर्तमान जंग पैट्रोल की है और भविष्य का संघर्ष पानी को लेकर होगा और इसमें दो धड़े होंगे --

----------- चीन v / s अमेरिका ---------

-अब इसमें शेष विश्व और भारत की क्या स्थिति है ? -विश्व राजनीति की शतरंज में महाशक्तियां अपने -क्या क्या मोहरे चल रहीं हैं ?
-भारत की स्थिति क्या है ?
-क्यों मोदी ताबड़तोड़ विदेश दौरे कर रहे हैं ?

*
संसाधनों की इस होड़ में हम कहाँ हैं ?
आपको बुरा लगेगा पर सत्य ये है कि कहीं नहीं ।

क्यों ?

क्योंकि आजादी के बाद के 15 साल हमने नेहरू की बेवकूफाना आदर्शवादी विदेशनीति की भेंट चढ़ा दिये और तिब्बत जैसे कीमती संसाधन को खो दिया वरना आज चारों ओर से भारत से घिरा नेपाल भारत का हिस्सा बन चुका होता और हिमालय के पूरे संसाधनों पर हमारा कब्जा होता । इसके बाद से शास्त्री जी के लघु शासनकाल को छोड़कर शेष समय सरकारें विशेषतः गांधी खानदान बिना भविष्य की ओर देखे सिर्फ " प्रशासन के लिये शासन " करते रहे जिसमें जनता सिर्फ चुनिंदा लोगों के लिये वोटों की संख्या और उनकी विलासिता के लिये ' उत्पादक ' मात्र थी ।
दूसरी ओर विशाल और बढती हुई जनसंख्या जिसके लिये इतने संसाधन जुटाना असंभव भी है खासतौर पर जब देश में बहुसंख्यकों के प्रति शत्रु मानसिकता रखने वाली 20 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या व एक छोटा पर बहुत प्रभावी कुटिल बिका हुआ देशद्रोही बुद्धिजीवी वर्ग हो जो राष्ट्रहित की प्रत्येक नीति में रोड़े अटकाता हो ।

भारत की स्थिति : तो कुल मिलाकर भारत इस
समय अभूतपूर्व खतरे का सामना कर रहा है ।

-- दक्षिण में हिंद महासागर की तरफ से भारत सुरक्षित है पर यह स्थिति दिएगो गर्सिया पर काबिज अमेरिका पर निर्भर है |
-- पश्चिम में पाकिस्तान
-- पूर्व में बांग्लादेश
-- उत्तर में स्वयं चीन

-- ' पांचवीं दिशा ' का खतरा सबसे भयानक है और भारत के अंदर ही मौजूद है । 20 करोड़ की भारत विरोधी सेना ।

-- कश्मीर में पूरी तरह बढ़त में , केरलमें निर्णायक ,

-- पूर्वोत्तर , असम व बंगाल में प्रबल स्थिति में ,

-- उत्तरप्रदेश और बिहार में वे कांटे की टक्कर देने की स्थिति में है ।
--शेष भारत में भी वे विभिन्न स्थानों पर परेशानी खड़ा करने की स्थिति में हैं ।

** केरल में तो वे " पॉपुलर फ्रंट " के नाम से वे सैन्य रूप भी ले चुके हैं ।

ये वामपंथी , ये अरुंधती टाइप के साहित्यकार , भांड टाइप के अभिनेता और महेश भट्ट जैसे एडेलफोगैमस लोग , बिंदी गैंग आदि सऊदी पैट्रो डॉलर्स और चीन के हाथों बिके हुये वे लोग हैं जो मोदी का रास्ता रोकने के लिये देशविरोधी घरेलू और विदेशी शक्तियों का ' हरावल दस्ता ' है ताकि मोदी की गति कम करके इस ' Great Game ' में पछाड़ जा सके ।

Now great game is near to start -----

भारत को छोड़कर शेष विश्व इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ खड़ा हो चुका है और अब वो मृतप्रायः है इस्लाम का संकुचन अरब देशों में पैट्रोल के खतम होते ही प्रारम्भ हो जायेगा ।

अब मारामारी शुरू होगी पानी के ऊपर और दुर्भाग्य से इसकी शुरूआत भारत से ही होगी क्योंकि चीन ना केवल ब्रह्मपुत्र नदी पर अपनी निर्णायक पकड़ बना चुका है बल्कि यह तक कहा जा रहा है कि हिमालय क्षेत्र के मौसम और ग्लेशियरों को प्रभावित करने की टेक्नोलॉजी विकसित कर चुका है ।
चीन की तीन कमजोरी हैं --

1--निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था
2--टेक्नोलॉजी
3--हिंद महासागर

पहली कमजोरी से निबटने के लिये चीन ने विदेशी मुद्रा का बड़ा भंडार और ट्रेजरी बॉन्ड खरीद रखे हैं जिसके जरिये वह अमेरिका के डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में दो दिन में कौड़ियों के भाव का कर सकता है परंतु भारत के संदर्भ में उसका कदम उल्टा बैठेगा और साथ ही भारत चीन के माल पर किसी भी ' बहाने ' से रोक लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था को गड्ढे में धकेल सकता है । इसलिये आर्थिक मोर्चे पर तो सभी पक्ष " रैगिंग वाली रेल " बने रहेंगे जिसमें झगड़ा बस इस बात का है कि " इंजन " कौन बनेगा और " पीछे वाला डिब्बा " कौन रहेगा ।
( मेहरबानी करके रैगिंग की रेल का मतलब ना पूछियेगा )

अब बात टेक्नोलॉजी की जिसमें चीन दिनरात एक किये हुए है पर मिसाइल और न्यूक्लियर टेक्नीक को छोड़कर वह पश्चिम के सामने कहीं नहीं टिकता विशेषतः सामरिक तकनीक के क्षेत्र में । इसीलिये चीन " पश्चिम की सामरिक तकनीक के गले की नस " अर्थात टेलीकम्यूनिकेशन को बर्बाद करने के लिये " सैटेलाइट किलर मिसाइल्स " का सफल परीक्षण कर चुका है जिसके जवाब में अमेरिका ने " नैनो सैटेलाइट " लॉन्च किये हैं ।यानि इस क्षेत्र में पश्चिम अभी भी भारी बढ़त में है परंतु चीन और पश्चिम दोनों ही जानते हैं कि टैक्नोलॉजी से चीन को रोका तो जा सकता है पर निर्णायक रूप से परास्त नहीं किया जा सकता ।

अब तीसरी कमजोरी ' हिंदमहासागर ' और उसमे भारत , अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का प्रभुत्व जिसके तोड़ के रूप में चीन ने " पर्ल स्ट्रिंग " विकसित की है जिसका एक सिरा पाकिस्तान स्थित ' ग्वादर बंदरगाह ' है तो दूसरा सिरा ' सेशेल्स ' में है । इसके बावजूद भारत अंडमान स्थित नौसैनिक अड्डे से पूरे हिंदमहासागर में चीन पर बढ़त में है और बाकी का काम मोदी ने ताबड़तोड़ विदेश दौरों और सफल कूटनीति से कर दिया । जरा याद कीजिये विदेश दौरों में देशों का क्रम और अबऑस्ट्रेलिया ,जापान , विएतनाम , भारत , दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के साथ एक हिंदमहासागरीय संगठन बनाने की कोशिश हो रही है जो चीन की ' पर्ल स्ट्रिंग ' का मुंहतोड़ जवाब होगी ।हालांकि ऑस्ट्रेलिया की झिझक के कारण इसका सैन्यस्वरूप विकसित नहीं हो पाया है ।

इस तरह चीन को घेरने के बावजूद अपनी " हान जातीयता " पर आधारित विशाल जनशक्ति के कारण पश्चिम उसपर निर्णायक विजय हासिल नहीं कर सकता । उसपर विजय पाने का एकमात्र तरीका जमीन के रास्ते से हमला करना ही है जिसके मात्र तीन रास्ते हैं ।
1- रूस द्वारा मध्य एशिया की ओर से
2- पाकिस्तान के रास्ते
3- भारत की ओर से

--अब आपको समझ आ गया होगा कि चीन रूस की खुशामद क्यों कर रहा है और क्यूँ अपनी पूर्वनीति के विपरीत सीरिया में रूस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ' एयर स्ट्राइक ' में भाग लेने को तैयार हो गया है । चीन का पूरा पूरा प्रयास रूस के साथ गठ बंधन करने का या कम से कम उसे ' न्यूट्रल ' रखने का होगा ताकि रूस की ओर से निश्चिंत हो सके ।
--पाकिस्तान की तरफ के रास्ते को चीन POK में सैन्य जमावड़ा करके और ग्वादर तक अबाध सैन्यसप्लाई की व्यवस्था द्वारा बंद कर चुका है । अगर सियाचिन पाकिस्तान के कब्जे में पहुंच गया तो चीन इस पूरे क्षेत्र को पूरी तरह " लॉक " कर देगा ।
--भारत के संदर्भ में दोनों पक्ष जानते हैं कि समझौता संभव नहीं क्योंकि ' तिब्बत की फांस ' दोनों के गले में अड़ी है । भारत को हतोत्साहित करने और सामरिक रूप से निर्णायक महत्वपूर्ण स्थानों को कब्जा करने हेतु ही वह अक्सर सीमा उल्लंघन करता रहता है ।

तो कुल मिलाकर ' भारत ' ही है जो चीन को रोकने के लिये पश्चिम का ' प्रभावी हथियार ' बन सकता है और यही कारण है कि पश्चिमी देशभारत में इतना ' इंट्रेस्ट ' दिखा रहे हैं ।
पश्चिम की इस विवशता को मोदी ने पकड़ लिया है इसीलिये संघर्ष से पूर्व 'अर्थववस्था और सैन्य टेक्नोलॉजी ' की दृष्टि से सक्षम बना देना चाहते हैं इसीलिये उनके दौरों में निरंतर दो बातें परिलक्षित हो रहीं हैं - आर्थिक निवेश और हथियारों की ताबड़तोड़ खरीदी के साथ सैन्य टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण ।
इसी तरह कूटनीतिक विदेश दौरों के द्वारा लामबंद करते हुए चीन विरोधी पूर्वी देशों का संगठित करने की कोशिश करते हुए चीन के ' पर्ल स्ट्रिंग ' को तोड़ दिया है जिससे चिढकर ही चीन ने नेपाल में मधेशियों के विरुद्ध माहौल खड़ाकर भारत के नेपाल में बढ़ते प्रभाव को रोका है और इसका असर मोदी पर इंग्लैंड दौरे के दौरान दिखाई दिया ।

भारत की तैयारियां --

1-- भारी मात्रा में निवेश को आमंत्रित करना ।
2-- आर्थिक मोर्चे पर सुदृढ़ता हासिल करना ।
( सेनायें भूखे पेट युद्ध नहीं कर सकतीं )
3-- नौसेना का आधुनिकीकरण
4-- वायुसेना को एशिया में सर्वश्रेष्ठ बनाना और उज़्बेकिस्तान में भारत के सैन्य हवाई ठिकाने को मजबूत बनाना
5-- अंतरमहाद्वीपीय तथा मल्टीपल वारहैड मिसाइलों का विकास व आणविक शस्त्रागारों का विकास ।
6-- बलूचिस्तान व अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को बढ़ाना ।
7-- इलैक्ट्रोनिक वार के लिए " काली 5000 " जैसी तकनीक का उन्नतीकरण ।
8-- अंतरिक्षीय संसाधनों के उपयोग की संभावनाओं के मुद्देनजर " मार्स मिशन " व अन्य " अंतरिक्ष कार्यक्रमों " का संचालन ।

पर इतनी तैयारियों के बावजूद अभी भी भारत बहुत पिछड़ा हुआ है और पश्चिमी शक्तियों के ऊपर निर्भर है और उसे निर्भर रहना पड़ेगा ।

अब कल्पना कीजिये कि भारत में किसी भी मुद्दे पर देशव्यापी दंगे शुरू हो जाते हैं और उसी समय पाकिस्तान भी अघोषित हमला शुरू कर देता जिसे समर्थन देते हुये चीन भी अपने दावे के अनुसार अरुणाचल पर कब्जा कर लेता है और लद्दाख में भी घुस जाता है । अब बताइये भारत क्या करेगा ?
भारत के पास ले देकर 11 लाख रेगुलर आर्मी और 32 लाख रिजर्व आर्मी है जबकि चीन की वास्तविक सैन्य संख्या हमारी कल्पना से परे है । और फिलहाल चीन अपने खरीदे हुए भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा और सऊदी फंड से प्रायोजित मुस्लिमों व ' सैक्यूलर राजनेताओं ' द्वारा भारत में ही भारत के विरुद्ध ' अप्रत्यक्ष युद्ध ' छेड़ चुका है और इसका अगला कदम होगा ' गृह युद्ध ' जिसका एक लघुरूप हम पश्चिमी उत्तरप्रदेश में देख चुके है । अगर ये गृहयुद्ध शुरू होता है और यकीन मानिये वो होगा ही ' और यह होगा संसाधनों ' के लिये परंतु ' धर्म ' के नाम पर होगा । इस स्थिति का फायदा उठाने से पाकिस्तान नहीं चूकेगा और ऐसी स्थिति में अगर चीन भी मैदान में उतरा तो अमेरिका व पश्चिम को भी हस्तक्षेप करना पड़ेगा और यह तीसरे विश्वयुद्ध की शुरूआत होगी

तो पूरा परिदृश्य क्या हो सकता है --

एक तरफ चीन + पाकिस्तान + अरब देश
दूसरी ओर अमेरिका + इजरायल +यूरोप +जापान

रूस संभवतः तटस्थ रहेगा लेकिन अगर वह चीन के साथ कोई गुट बनाता है , चाहे वह आर्थिक गुट ( शंघाई सहयोग संगठन ) या सैन्य गुट ( जिसकी शुरूआत सीरिया में दिख रही है ) तो चीन बहुत भारी पड़ेगा ।
इस परिस्थिति में भारत के सामने अमेरिका के सहयोग करने के अलावा कोई चारा नहीं और ना ही पश्चिम के पास भारत जैसी विशाल मानव शक्ति है और यही कारण है कि पश्चिमी शक्तियां आज मोदी की तारीफों के पुल बांध रही हैं , भारी निवेश कर रहीं हैं ( बुलेट ट्रेन में जापान की उदार शर्तों के बारे में पढ़िये ) और सैन्य तकनीक का हस्तांतरण कर रहीं हैं जबकि इजरायल द्वारा चीन को " अवाक्स राडार " देने से मना कर दिया जाता है ।

मोदी की कोशिश है कि इस स्थिति के आने से पूर्व ही भारत को पश्चिम की 'आर्थिक व सैन्य मजबूरी ' बना दिया जाये और मोदी की सारी व्याकुलता , बैचैनी और तूफानी विदेश दौरे उसी " महासंघर्ष " की तैयारी के लिये हैं ना कि ' तफ़रीह ' के लिये । मोदी की कोशिश चीन से त्रस्त वियतनाम , म्यामां , मंगोलिया , इंडोनेशिया , जापान आदि देशों के साथ मिलकर आक्रामक तरीके से घेरने की भी है और पहली बार भारत ने चीन को विएतनाम सागर जिसे चीन दक्षिण चीन सागर कहता है , में दबंगई से अंगूठा दिखाया है । ये है मोदी की विदेश दौरों की कूटनीति का परिणाम ।

तो मोदी के नादान और अधीर समर्थको , समझ गये ना कि मोदी विदेश दौरे पर दौरे क्यों कर रहे हैं ?

तो दोस्तो ---
- रामलला को कुछ दिन और तंबू में रह लेने दो
- कुछ दिन और गायमाता का दर्द बर्दाश्त कर लो
- कुछ दिन और समान संहिता का इंतजार कर लो
- कुछ दिन और कश्मीरी पंडितों की तकलीफ झेलो
- कुछ दिन और महंगी रोटी पैट्रोल से गुजारा करो

क्योंकि --

--पहले, भारत को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करना है
--दूसरा , भारत को सैन्य महाशक्ति बंन जाने दो
-- तीसरा , भारत को आंतरिक शत्रुओं से निबटने लायक क्षमता हासिल करने दो ।
-- चौथे , तुम खुद अपने आपको गृहयुद्ध की स्थिति में दोहरे आक्रमण का प्रतिरोध करने लायक तैयार कर लो

क्योंकि
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क्योंकि
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क्योंकि
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******** " Great Game " ******* "
(बनारस, 12जुलाई 2017,बुधवार)
http://chitravansh.blogspot.in