शनिवार, 24 जून 2017

दिल्ली दरबार - सत्य व्यास की एक बेहतरीन किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24 जून 2017, शनिवार


                          कल सुबह आनलाईन कूरियर से मंगवाई किताबों का बंडल आया,  बंडल मे कनू के लिये  मंगाई गई किताबो मे मैने सत्य व्यास की बहुप्रतिक्षित हालिया प्नकाशित  नई पुस्तक दिल्ली दरबार भी मंगाया था, पिछले बार की तरह किताब देखनी शुरू किया तो पूरी निपटा के ही फुरसत किये. जैसा मैने बनारस टाकीज की चर्चा करते हुये लिखा था कि सत्य व्यास हिन्दू विश्वविद्यालय मे मेरे जूनियर हुआ करते थे, यूनिवर्सिटी मे पढने के दौरान तो हम एक दूसरे से कोई खास रूबरू नही हो पाये पर बनारस टाकीज पढ़ते समय अपने इस छोटे भाई से अनजानी सी आभाषी आत्मीयता हो गई और सत्य का लिखा कहीं अपने आस पास अपनों पर बीता गुजरा लगने लगा, कभी हँसाते तो कभी गुदगुदाते सत्य अपनी कहानी के प्लाट मे पाठक को ऐसा बॉध लेते है कि वह खुद को पढ़ते हुये कहानी का हिस्सा महसूस करने लगता है.

      बहरहाल बात दिल्ली दरबार की,


             जैसा की व्यास बताते है - "कहानी इसी सदी के दूसरे दशक के पहले दो सालों की है। वह वक्त जब तकनीक इंसान से ज्यादा स्मार्ट होकर उसकी हथेलियों में आनी शुरू ही हुई थी। नई तकनीक ने नई तरकीबों को जन्म देना शुरू किया था।" आगे कहानी इन बातों को सही साबित भी करती है। उपन्यास की कहानी दो दोस्तों के बैचलर लाइफ की है। कहानी है एक ऐसे मनमौजी युवा की जो सिर्फ अपनी सुनता है। चतुर, आवारा, पागल, दीवाना कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन है बड़ा तेज। तकनीक से खेलता है और उसका पूरा इस्तेमाल करता हैं। प्रेमी है तो इसकी एक प्रेमिका भी है। यही प्रेम उसे आगे चलकर एक अच्छा इंसान बनाता है।

           कहानी के मुख्य पात्र हैं - राहुल मिश्रा उर्फ़ पंडित और मोहित सिंह उर्फ झाड़ी। सत्य व्यास की पात्रों से परिचय करने का अंदाज़ बड़ा ही लाज़वाब है। राहुल के बारे लेखक बताते हैं कि "राहुल मिश्रा पैदा ही प्रेम करने के लिए हुए हैं, ऐसा उनका खुद का कहना है। राजीव राय के बाद जो प्यार, इश्क़ और मुहब्बत में ठीक-ठाक अंतर बता सकते हैं।" ठीक इसके विपरीत मोहित एक सीधा-साधा लड़का है और पढ़ाई में राहुल से तेज है लेकिन चतुराई में नहीं। मोहित और राहुल बचपन से पक्के दोस्त हैं और साथ में पढ़े और बढ़े हैं। दोनों अपने शहर टाटानगर(जमशेदपुर) से ग्रेजुएशन करते हैं। मोहित जहाँ अपने कैरियर के बारे में सोचते रहता है वहीं राहुल लड़की के बारे में। लेखक कहते हैं - "दोस्त की सबसे बड़ी कीमत यही होती है कि यह सही गलत से परे होती है"। और कुछ ऐसी ही दोस्ती है इन दोनों के बीच। मोहित राहुल के हर अच्छे-बुरे काम में साथ देता है लेकिन उसे बहुत समझाता भी है। लेकिन राहुल माने तब तो। वह एक बार जो सोच लेता है उसे करता है।

"छोटे शहर के छोटे सपनों को विस्तार देते शहर का उनवान है दिल्ली।" ग्रेजुएशन के बाद दोनों एमबीए करने के लिए और मोहित सीडीएस की भी तैयारी के लिए दिल्ली जाते हैं। किराये के एक मकान में रहने लगते हैं और फिर शुरू होती है दिल्ली दरबार वाली कहानी। कहानी में कुछ और पात्र भी हैं। परिधि - राहुल की प्रेमिका और मकान मालिक की बेटी। परिधि एक सुन्दर, सुशिल और साधारण लड़की है जो राहुल से बहुत प्यार करने लगती है। बटुक शर्मा - मकान मालिक जो हमेशा इंग्लिश की बेज्जती करते रहते हैं और सुनने वाला खुद को हँसे बगैर रोक नहीं पता है। जैसे वो लिंक को लिंग बोलते हैं, बिलो जॉब को ब्लो जॉब और तेलंगाना को तेल लगाना इत्यादि। राहुल इन बातों पर खूब चुटकी लेते हैं और बटुक शर्मा भी राहुल की खिंचाई करने से नहीं चुकते। एक महिका रायजादा भी कहानी में है जो राहुल के कॉलेज की है जो बाद में कुछ दिन गर्लफ्रेंड भी बन जाती है। एक छोटू नाम का लड़का भी है जो राहुल और मोहित के यहां घर का काम करता है। ये बहुत बड़ा क्रिकेट प्रेमी मालूम होता है पर बाद में ये छोटू सबको आउट कर देता है अपनी गुगली से।

कहानी की शुरुआत राहुल मिश्रा के प्रेम-प्रसंगों से होता है और अंत में इन्हीं पर जाकर खत्म होता है। लेकिन कैसे? ये बड़ा ही मजेदार है और इसे और भी मजेदार बनाया है लेखक सत्य व्यास ने। पाठक को कैसे बांध कर रखते है ये चीज ये बखूबी जानते हैं। आप पढ़ते समय एक पेज भी छोड़ना पसंद नहीं करेंगे। हमेशा आपके मन में एक सस्पेंस रहेगा की आगे क्या होगा। बीच-बीच राहुल की कुछ मजेदार बातें आपको हँसाते रहेगी। जैसे- किताब खोलो और थर्मोडायनामिक्स से गरम रहो, थम्स-अप पीने को अंगूठा पिएगा कहना, आज मेरे और तेरे भाभी का इंटीग्रेशन होते-होते डिफरेंशियेशन हो गया इत्यादि। राहुल हमेशा मोहित को शायरी सुनाने कहता है फिर उस शायरी की चिर-हरण कर देता है। जैसे मोहित सुनाता है-
"तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो,
तुमको देखें की तुमसे बात करें।"
राहुल इस पर कहता है "इसलिए कहते हैं झाड़ी की तुम पगलंठ हो। भाग जाएगी, पक्का भाग जाएगी। मतलब या तो देखोगे या फिर बात करोगे। तीसरा काम सिलेबस में है ही नहीं क्या? सत्य ने कुछ लाइन्स ऐसी भी लिखी है जो चुपके से एक सच्चाई कह देती है। जैसे-
" प्रेम के कारण नहीं होते परिणाम होते हैं";
"बांधकर रखना भी तो कोई प्यार नहीं हुआ न",
जिंदगी एयर होस्टेज हो गई है जिसमें बिना चाहे मुस्कुराना पड़ता है",
प्रेम,पानी और प्रयास की अपनी ही जिद होती है और अपना ही रास्ता"

वाकई मजेदार है सत्य का दिल्ली दरबार, जहॉ दरबार के मौज मे हम पढ़ते पढ़ते खुद को भूल जाते है, लगता है सत्य कहीं खड़े बदमासी से मुस्कराते हुये याद दिला रहे हों कि यह है किस्सागोई,

किताब के बैक फ्लैप पर सत्य के बारे मे तफसील भी किसी किस्से से कम नही है, " अस्सी के दशक मे बूढ़े हुये. नब्बे के दशक मे जवान. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक मे बचपना गुजराऔर कहते है कि नई सदी के दूसरे दशक मे पैदा हुये है, अब जब पैदा ही हुये हैं तो खूब उत्पात मचा रहे है. चाहते है कि उन्हे कास्मोपालिटन कहा जाय. हालॉकि देश से बाहर बस भूटान गये है. पूछने पर बता नही पाते किकहॉ के है. उत्तर प्रदेश से जड़े जुड़ी है. 20 साल तक जब खुद को बिहारी कहने का सुख लिया तो अचानक ही बताया गया कि अब तुम झारखण्डी हो. उसमे भी खुश है. खुद जियो औरों को भी जीने दो के धर्म मे विश्वास करते है और एक साथ कई कई चीजें लिखते हैं."

सत्य व्यास व उनके लेखन शैली को न जानने वालो के लिये यह परिचय पहेली जैसा लगे पर यह सत्य की अपनी स्टाईल है, अल्हढ़, अलहदा, अजूबी और बेबाक. जो सत्य को सबसे अलग रख कर हमारे दिल के बड़ी करीब से होकर बेहद करीने से निकल जाती है, कभी सावन के फुहारो की तरह, कभी भादों के बौछारो की तरह, कभी बसंत के झोंको की तरह खभी जेठ के लू के थपेड़ो की तरह,  लेकिन हर एक का अपना महत्व , खाने मे नमक की तरह जरूरी कथानक का कसा हुआ प्लाट , जिसमे नमक की तरह न तो मात्र घटायी जा सकती है न ही बढ़ाई जा सकती है. सब कुछ बिलकुल परफेक्ट, समय की जरूरत के लिहाज से दिल्ली दरबार के राहुल मिश्रा की तरह, जो लाईन से उतरते उतरते एकदम सही ट्रैक पकड़ लेता है जैसे बेलाईन होना भी जिन्दगी का हिस्सा हो, 

अगर न जोहरा- जबीनों के दरमियॉ गुजरे

तो फिर ये कैसे कटे जिंदगी, कहॉ गुजरे

एक लफ्ज मे कहे तो "मार्वलस",  सत्य, कीप ईट अप.

(बनारस, 24जून 2017, शनिवार) http://chitravansh.blogspot.in


मंगलवार, 20 जून 2017

इतिहास का एक पहलू यह भी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2017

इतिहास का एक पहलू यह भी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2017

योगी आदित्यनाथ का यह बयान कुछ लोगों को बुरा लग रहा है कि ताजमहल हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। लोग इस बयान पर आपत्ति जताते हुए ताजमहल को प्रेम का प्रतीक बता रहे हैं। ताजमहल, और उसके पीछे के प्रेम की कहानी कुछ दिनों पहले भाई रामप्रकाश त्रिपाठी की वाल पर पढ़ी थी। इतिहास को विद्रुप कर हमे वामपंथियों द्वारा सच से परे जो कुछ परोसा गया है, उसकी एक बानगी भर है यह लेख.

मुगलों के हरम की औलाद को हरामजादा
कहा जाता है।

शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं जो उसे
उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी।
उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया।

उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट
की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य
हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को
बढ़ाता ही रहा।''
(अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)

कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली
का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था
और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी।

जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की
यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ
प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों
और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों
हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था।

यह नर पशु,यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित
और उत्साही था,कि हिन्दू महिलाओं का मीना
बाजार लगाया करता था,यहाँ तक कि अपने
महल में भी।

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर
ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि,
''महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार,
जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं
का, क्रय-विक्रय हुआ करता था,राज्य द्वारा बड़ी
संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था,और
नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में
उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान
के लिए ही थी।
(टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर-
फ्रान्कोइसबर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ,
औक्सफोर्ड १९३४)

**शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया
जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए।
८००० औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर
किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार
ही कहा जाएगा।आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे
कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं
बल्कि उसका असली नाम "अर्जुमंद-बानो-बेगम" था।

और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार
की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना
तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी ।

मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी।
इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले
3 शादियाँ कर रखी थी और,मुमताज से शादी करने
के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी
उस ने 3 शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के
मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना
से शादी कर ली थी।
जिसे उसने रखैल बना कर रखा हुआ था जिससे शादी
करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था।

अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और
शादियाँ क्यों की....?????

अब आप यह भी जान लो कि शाहजहाँ की सातों
बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत
बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी ।

उस से भी घिनौना तथ्य यह है कि शाहजहाँ से
शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की
नहीं थी बल्कि वो शादीशुदा थी और,उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम "शेर अफगान खान" था।शाहजहाँ ने शेर अफगान खान
की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।

गौर करने लायक बात यह भी है कि ३८ वर्षीय
मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से
नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान
अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी।

यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन
ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला।

**शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात
था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी
सगी बेटी जहाँआरा के साथ स्वयं सम्भोग करने
का दोषी कहा है।

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी
जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी।

इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में
लम्पट शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को
फंसाकर भोगना शुरू कर दिया था।

जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था
कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया।

बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में
चर्चा शुरू हुई,तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक
बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने
के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि - "माली को अपने द्वारा लगाये पेड़ का फल खाने का
हक़ है"।

(Francois Bernier wrote,
" Shah Jahan used to have regular sex
with his eldest daughter Jahan Ara.
To defend himself,Shah Jahan used to
say that,it was the privilege of a planter
to taste the fruit of the tree he had
planted.")

**इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक
को वह उसके पास फटकने नहीं देता था।
कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ
गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ नेतंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा
जला दिया।

**दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था
कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं
होगी।
इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं।
इसका परिणाम यह होता था कि मुग़लखानदान
की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए
अवैध तरीके से दरबारी,नौकर के साथ साथ,रिश्तेदार
यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।

**जहाँआरा अपने लम्पट बाप के लिए लड़कियाँ भी
फंसाकर लाती थी।
जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई
शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था।

**शाहजहाँ के राजज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण
लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे
से नशा करा बाप के हवाले कर दिया था जिससे शाहजहाँ
ने 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह
किया था।

बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के
बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की
सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों
अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

**शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ' 'वह तिमूर
(तैमूरलंग)का वंशज है जो भारत में तलवार और
अग्नि लाया था।
उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और
उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से इतना
प्रभावित था कि ''उसने अपना नाम तिमूरद्वितीय
रख लिया''।
(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया-
डॉ. के.एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).

**बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों
(हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी।

अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि,
''शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी
पर अधिकार करलिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं
का भीषण नरसंहार किया था ।

**भारत यात्रा पर आये देला वैले,इटली के एक धनी
व्यक्ति के अुनसार -शाहजहाँ की सेना ने भयानक
बर्बरता का परिचय कराया था।
हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित
धन को दे देने के लिए विवश किया गया,और अनेकों
उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग
किया गया।''
(कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड
इट्सनेबरहुड, पृष्ठ २५)

**हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को
एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है।

किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर
हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला
के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था

अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, 'बादशाहनामा' में लिखा था-'महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में
लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र,बनारस में
उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के
पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर
हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं।

इस्लाम पंथ के रक्षक,शहंशाह ने आदेश दिया कि
बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी
स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है,
उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए।

**इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि
जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर
दिया गया था।''
(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी,
अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII,
पृष्ठ ३६)

**हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करनेकी प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।
(मध्यकालीन भारत - हरीश्चंद्र वर्मा - पेज-१४१)

*''कश्मीर से लौटते समय १६३२ में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में
शादी कर ली है।
शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी
बना लिया गया।

प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया
कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका।

तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को
चुन लेने का विकल्प दिया गया।

जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया,उन सभी
पुरूषों का सर काट दिया गया।

लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात् मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और
रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।''
(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल :
आर.सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन,पृष्ठ३१२)

* १६५७ में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के
बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी रखैल जहाँआरा के
साथ आगरा के किले में बंद कर दिया।

परन्तु औरंगजेब मे एक आदर्श बेटे का भी फर्ज निभाया
और अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने
साथ ४० रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी।

दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी
सभी को उसने किले से बाहर निकाल दिया।

उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से
में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है।

जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।

***शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैन शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैनल के अनुसार अत्यधिक कमोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था।

** अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन
और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर
महानबताया जाता है...... ?????

क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर
सकता है....?????

क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमेंखाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही
करते हैं ??

दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए
गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर""तेजो महालय"" है....!

और जिसे प्रमाणित करने के लिए डा० सुब्रहमण्यम स्वामी आज भी सुप्रीम कोर्ट में सत्य की लड़ाई लड़
रहे हैं।

** असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण,
लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू
के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया।
और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।

( दैनिक जागरण  के विशेष संवाददाता श्री ओम प्रकाश  तिवारी के वॉल से साभार )
http://chitravansh.blogspot.in


शनिवार, 17 जून 2017

मातृ दिवस पर एक बच्ची की अभिव्यक्ति : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 जून 2017


मातृ दिवस पर एक बच्ची की अभिव्यक्ति : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 जून 2017

             वो, एक शहर के अंतररास्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बगीचे में बिना तेज धूप और गर्मी की परवाह किये, बड़ी लग्न से पेड़ पौधों की काट छाट में लगा था की तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज सुनाई दी, "गंगादास तुझे प्रधानाचार्या जी अभी तुरंत बुला रही है"। गंगादास को आखिरी पांच शब्दो में काफी तेजी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वजह से प्रधानाचार्या ने उसे तुरंत ही बुलाया है।
वो बहुत ही शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ किया और फिर द्रुत गति से प्रधानाचार्य के कार्यलय की ओर चल पढ़ा। उसे प्रधानाचार्य महोदय का कार्यालय की दूरी मीलो की दूरी लग रही थी जो खत्म होने का नाम नही ले रही थी। उसकी ह्र्दयगति बडी गई थी। वो सोच रहा था कि उससे क्या गलत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्य महोदया ने उसे तुरंत ही उनके कार्यालय में आने को कहा। वो एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था पता नही क्या गलती हो गयी वो इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्य के कार्यालय पहुचा "मैडम क्या मैं अंदर आ जाऊ, आपने मुझे बुलाया था"।
"हा, आओ अंदर आओ और ये देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी। "पढ़ो इसको" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
"मैं, मैं, मैडम! मैं तो इग्लिश पढ़ना नही जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया। "मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से बहुत ऋणी हूँ क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निशुल्क पढ़ने की अनुमति दी। मुझे कृपया एक और मौका दे मेरी कोई गलती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था कि उसे प्रधानाचार्या ने टोका "तुम बिना वजह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा की अध्यापिका को बुलाती हूँ।
वो पल जब तक उसकी बिटिया की अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। वो सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई गलती हो गयी, कही मैडम उसकी विद्यालय से निकाल तो नही रही। उसकी चिंता और बड़ गयी थी।
कक्षा अध्यापिका के पहुचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी।" अब ये मैडम इस पेपर जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हे सुनाएगी गौर से सुनो"।
कक्षा अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया "आज मातृ दिवस था और आज मैने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा, तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।" उसके बाद कक्षा अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गांव जहा शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी आभाव है। चिकित्सक के आभाव में कितनी ही माँ दम तोड़ देती है बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थी। उसने मुझे छुआ भी नही की वो चलबसी। मेरे पिता ही वो पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वो अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाकी की नजर में मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया पर मेरे दादा दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लाये ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वजह से मेरे दादा दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सबकुछ, जमीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और मेरे विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। वो मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी जरूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।
आज मुझे समझ आता है कि वो क्यो हर उस चीज को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना करदेते थे कि वो उन्हें पसंद नही है क्योंकि वो आखिरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग का महत्व पता चला।
मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखा। और मेरे विद्यालय ने उनको ये सबसे बड़ा पुरुस्कार दिया जो मुझे यहा पढ़ने की अनुमति मिली। वो दिन मेरे पिता की खुशी का कोई ठिकाना न था।
यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी है।
यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ है।
यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर है।
यदि संक्षेप में कहूँ की प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते है। और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ है।
आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामना दूंगी और कहूंगी की आप संसार के सबसे अच्छे पालक है। बहुत गर्व से कहूंगी की ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली है मेरे पिता है।
मैं जानती हूं कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊंगी क्योकि मूझे माँ पर लेख लिखना था पर मैने पिता पर लिखा, पर ये बहुत ही छोटी सी कीमत होगी जो उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद"। आखरी शब्द पढ़ते पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
इस शांति मैं केवल गंगादास के सिसकने की आवाज सुनाई दे रही थी। बगीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दो ने उस कमीज को पिता के आसुंओ से गीला कर दिया था। वो केवल हाथ जोड़ कर वहां खड़ा था। उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, पर इस बार उनकी आवाज काफी मिठास व सौम्य थी "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। ये लेख मेरे अबतक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े जोर शोर से मना रहे है। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। ये सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है, ये सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नही है एक पालक बनने के लिए। साथ ही ये अनुशंषा करना है उस विश्वाश का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमे गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमे गर्व है कि आप एक माली है और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बगीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा खुशबू दार बनाकर रखा जिसकी खुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेगे.
(बनारस, 14जून 2017, शुक्रवार)
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सोमवार, 5 जून 2017

बनारस के नागरिक होने की हमारी जिम्मेदारी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 5जून 2017

शहर मे उगे कंक्रीट के अव्यवस्थित जंगलो ने प्राकृतिक पेड़ पौधों को लील लिया है.
बनारस मे वाराणसी विनास ( सही पढ़ रहे है आप) प्राधिकरण व नरक निगम (पुन: सही पढ़ रहे है आप) के कृपा के चलते शहर मे एक तुलसी भी लगाने की जगह नही बची है. तालाब, पोखरों को तो छोड़े नाला, नजूल व सरकारी जमीन को कब्जा करा दिया इन दोन विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों ने. फिर फटाफट मकान नंबर भी एलाट कर बिजली, पानी,रासनकार्ड सब कुछ बनवा दिया, बदले मे लखनऊ दिल्ली गाजियाबाद नोयडा के पासकालोनियो मे अपनीआलीशान कोठी खड़ी कर ली. अनादिकाल से जिन्दा शहर बनारस  जीये चाहे मरे, इनके बला से.
अब पर्यावरण दिवस पर प्रचण्ड गर्मी मे 48 डिग्री तापमान पर शहर मे पेड़  लगाने की योजना है, योजना बन गई पर बनारस मे जमीन कहॉ है? कल रात देर तक दो तीन मित्रो से चर्चा होती रही कि गीनिजबुक मे प्लॉटेसन पर अखिलेशी रिकार्ड के तरह इस बार भी मामला हवा हवाई करने की मुकम्मल व्यवस्था कर ली है योगी के अफसरान ने.
चलिये प्लांटेसन के लिये हम जमीन का सुझाव देते है. वरूणा के किनारे दोनो तरफ जो गाद निकाली गई है उस पर सघन वृक्षारोपण किया जाये, गंगा वरूणा, नाद, अस्सी के पेटे को साफ कर उनसे तटबंध बनाये जाये व उन पर वृक्षारोपण हो. अर्दलीबाजार लगायत गोदौलिया लंका,  डीएलडब्लू गेट ककरमत्ता होते हुये मंडुआडीह स्टेशन से रथयात्रा तक. लहरतारा से मंडुआडीह बाजार लगायत ककरमत्ता तक और डीएलडब्लू गेट से चितईपुर चौराहा होते हुये अमरा बाईपास तक पेड़ लगाते हुये उसकी जिम्मेदारी पास के दुकानदारो को अर्थदण्ड के साथ सौंपा जाये.
इसी तरह शहर के अनुदानित विद्यालय परिसर मे भी सघन वृक्षारोपण कर के हम शहर के साथ अपना जीवन स्वस्थपूर्ण बना सकते है.
यह सूची समापन नही है, आप अपने सुझाव जोड़ते हुये इस पोस्ट को शेयर व फारवर्ड करे और बनारस शहर के जिम्मेदार नागरिक होने के साथ खुद के व परिजनो के बेहतरी के लिये आगे आयें.
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