रविवार, 27 सितंबर 2026

व्योमवार्ता/ काशी की नवरात्रि यात्रा : स्त्री चेतना से ब्रह्म चेतना तक.......

व्योमवार्ता/

काशी मे नवरात्रि यात्रा: स्त्री चेतना से ब्रह्म चेतना तक.......
                                                       *व्योमेश चित्रवंश
नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। देवी दुर्गा के सम्मान में नौ रातों और दस दिनों तक मनाया जाने वाला यह पर्व, शक्ति की उपासना का महापर्व है। हिंदू धर्म में इन नौ दिनों में देवी शक्ति के नौ रूपों की पूजा और उपवास किया जाता है। यह पर्व पूरे भारत और नेपाल में मनाया जाता है, पर काशी में इसका स्वरूप सबसे विलक्षण है। प्रायः माँ दुर्गा के नौ रूपों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़कर देखा जाता है, पर इसके पीछे जीवन-चक्र, प्रकृति और मानसिक चेतना के विकास का एक गहरा क्रम छिपा है। भारतीय दर्शन में माँ दुर्गा के नौ रूप केवल पूजनीय देवियाँ नहीं, वे नारी जीवन की अंतःचेतना के नौ चरण हैं। हर स्त्री अपने जीवन में इन नवदुर्गा रूपों से गुजरती है। कभी वह शैलपुत्री होती है, कभी कालरात्रि, और अंततः सिद्धिदात्री। ये नौ रूप केवल पौराणिक गाथाएँ नहीं,बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई शक्ति के जागने और पूर्णता तक पहुँचने का एकआध्यात्मिक रोडमैप हैं। दुर्गा,अजेय मातृ देवी का एक रूप ही नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा का एक स्पेक्ट्रम हैं जो नौ रूपों में व्यक्त होती है।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

यदि हम ध्यान से देखें, तो इन्हीं दिव्य गुणों को एक स्त्री के जीवन के विभिन्न चरणों में — बचपन से लेकर परिपक्वावस्था तक — प्रतिबिंबित होते हुए देख सकते हैं। यह हमारे पौराणिक मान्यताओं के पीछे छिपा वैज्ञानिक और सामाजिक सत्य है कि नवदुर्गा के ये नौ स्वरूप महिला के जीवन-विकास और उसकी चेतना के स्तरों से गहरे जुड़े हैं।
         वाराणसी में शारदीय नवरात्र में जहां एक ओर आकर्षक पूजा पंडाल सजाए जाते हैं और मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है वहीं, दूसरी ओर नौ देवियों की पूजा पाठ का क्रम पूरे नौ दिन चलता रहता है। काशी इकलौती ऐसी नगरी है जहां सभी नौ दुर्गा देवियों और नौ गौरियों का अलग अलग मंदिर है। शारदीय नवरात्रि मे स्थानीय मान्यताओं व परंपराओं के अनुसार नौ दुर्गा देवी के दर्शन व यात्रा का विधान है वहीं बासंतिक नवरात्रि मे नौ गौरियों का । दोनो नवरात्र के अलग अलग दिन इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। काशी के अंतर्गृही यात्रायों  के क्रम मे नवरात्रि मे नौ दुर्गा के दर्शन के उद्देश्य व महात्म्य से नवदुर्गा यात्रा का विशेष महत्व है। लगभग पूरे वाराणसी नगर के चारों दिशाओं को समेटने वाली यह नवदुर्गा यात्रा मानव जीवन के विकास और आध्यात्मिक चेतना के उत्थान का प्रतीक है—शैलपुत्री के रूप में 'जड़ और प्रकृति' से शुरू होकर सिद्धिदात्री के रूप में 'पूर्ण ज्ञान और मोक्ष' पर जाकर यह यात्रा समाप्त होती है। मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धालु इन नौ दिनों में रोज़ाना नियमपूर्वक सुबह-सुबह बनारस की गलियों और घाटों को लांघते हुए इन विग्रहों के सम्मुख शीश नवाता है, तो उसे न केवल पुण्यफल मिलता है, बल्कि वह बनारस के उस प्राचीन ताने-बाने को जी लेता है जो आधुनिक चकाचौंध से आज भी अछूता है। यह यात्रा अंतरात्मा को पवित्र कर जीवन को असीम सकारात्मकता से भर देती है। नवरात्रि के नौ दिनों के नौ देवियों के प्रति श्रद्धा व आस्था से प्रतिपदा से लेकर नवमी तक अलग अलग रूपों के दर्शन होते हैं। इन नौ देवी स्वरूपों मे मानव स्वभाव का द्योतक है।
नवरात्रि के प्रथम दिवस प्रतिपदा पर घटस्थापना के साथ ही नवदुर्गा यात्रा का प्रारंभ होती है। यह  प्रथम दिवस मां के शैलपुत्री स्वरूप को समर्पित है। शैलपुत्री को देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में प्रथम माना गया है। शैलपुत्री रूप जीवन के आरंभ,बाल्यावस्था और सरलता ,मासूमियत और प्रकृति से जुड़ी शुद्ध चेतना का प्रतीक है।'शैल' का अर्थ है हिमालय यानी दृढ़ता। जीवन या किसी भी विचार की शुरुआत में संकल्प और स्थिरता सबसे पहली आवश्यकता होती है। कथा है कि हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। कथा के अनुसार दक्षप्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। उसमें समस्त देवताओं को आमंत्रित किया किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया। सती यज्ञ में जाने के लिए आतुर हो उठीं। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण यज्ञ में जाने से मना किया लेकिन सती के आग्रह पर उन्होंने जाने की अनुमति दे दी। वहां जाने पर सती का अपमान हुआ। इससे दुखी होकर सती ने स्वयं को यज्ञाग्नि में भस्म कर लिया। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ को तहस नहस कर दिया। वही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। काशी खण्ड अध्याय 70 के अनुसार काशी में इनका स्थान शैलेश्वर टीला के निकट था। इसलिये इनका एक नाम शैलेश्वरी देवी भी है। वर्तमान मे शैलपुत्री देवी का मंदिर जैतपुरा थाना क्षेत्र के अलईपुर में वरूणा नदी के किनारे मढिया घाट पर मकान नंबर के 40/11 मे स्थित है। मंदिर मे देवी का विग्रह एवं दरबार है।
शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन अर्थात् द्वितीया तिथि पर देवी दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी के दर्शन पूजन का है।ब्रह्म का अर्थ तप है और चारिणी का अर्थ धर्म व सत्य का आचरण करने वाली, आश्रम में निवास करने वाली और पवित्र धार्मिक ज्ञान की खोज करने वाली स्त्री। । तप का आचरण करने वाली देवी के रूप में भगवती दुर्गा के द्वितीय स्वरूप का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। देवी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। देवी दुर्गा के तपस्विनी स्वरूप के दर्शन-पूजन से भक्तों और साधकों को अनंत शुभफल प्राप्त होते हैं। संन्यासियों के लिए इस स्वरूप की पूजा विशेष फलदायी है।ब्रह्मचारिणी विद्या और संयम की देवी है। देवी की यह अवस्था विद्यार्थी जीवन, ज्ञान की खोज, तपस्या और आत्म-अनुशासन को दर्शाती है देवी सफेद वस्त्र धारण करती हैं।काशीखण्ड के अध्याय 70 में वर्णित ब्रह्मेश्वर मंदिर के परिसर मे ब्रह्म देवी (ब्रह्मचारिणी देवी) है। चौखंबा क्षेत्र में स्थित देवी ब्रह्मचारिणी का मंदिर काल भैरवमंदिर के पीछे सब्जी मंडी से दाहिनी तरफ गली वर्तमान दुर्गा घाट के ऊपर मकान नंबर के 22/71 है। 
              शारदीय नवरात्र की तृतीया तिथि पर काशी में देवी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा होती है।इन्हे चित्रघण्टा देवी के नाम से भी जाना जाता है। चंद्रघंटा युवावस्था में प्रवेश और जीवन की चुनौतियों का सामना करने वाले साहस व शालीनता का प्रतीक है। देवी पुराण के अनुसार देवी के चंद्रघंटा स्वरूप का ध्यान करने से भक्त का इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है। शारदीय नवरात्र की तृतीया तिथि पर देवी के दर्शन से सद्गति की प्राप्ति होती है। देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र शुभोभित है इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा।देवी दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है, जिसका अर्थ है घंटी के आकार का अर्धचंद्र। चंद्रघंटा को चंडिका के नाम से भी जाना जाता है और वे वीरता और साहस की देवी हैं। यह मंदिर वाराणसी के मध्य  क्षेत्र चौक में मकान नंबर सीके 23/34 मे है। लिंंगपुराण के कथन ‘चंद्रघंटा च मध्यत:’ के अनुसार देवी चंद्रघंटा ही वाराणसी क्षेत्र के रक्षा करती हैं। देवी का मंदिर चौक थाने के निकट मजार के सामने वाली गली मे लक्खीचौतरा के सामने ऊपर गली में है।
                  नवरात्र में देवी दर्शन के क्रम में चतुर्थी तिथि पर देवी के कूष्मांडा स्वरूप का दर्शन-पूजन करने का विधान है। देवी की यह अवस्था नई ऊर्जा, रचनात्मकता और संसार या परिवार के सृजन-पोषण के दायित्व को दिखाती है। काशी खण्ड के अध्याय 71 में कुष्मांडा देवी के कथा और उनके द्वारा दुर्गासुर असुर से युद्ध और उसके संहार का वर्णन मिलता है।शारदीय नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर देवी के कुष्मांडा स्वरूप का दर्शन-पूजन करने से मनुष्य के समस्त पापों का क्षय हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि अपनी मंद मुस्कान  से पिंड से ब्रहमांड तक का सृजन  देवी ने कूष्मांडा स्वरूप में ही किया था। देवी के कुष्मांडा स्वरूप के   दर्शन पूजन करने रोग और शोक का हरण होता है साथ ही साथ यश और धन में भी अपेक्षित वृद्धि होती है।  काशी में देवी के प्रकट होने की कथा राजा सुबाहु से जुड़ी हुई है। काशी में देवी देवी कुष्मांडा का मंदिर दुर्गाकुंड इलाके में विशाल कुंड के निकट मकान नंबर बी 27/2 पर है। माना जाता है कि इस कुंड का सीधा संबंध मां गंगा से है। इसका जल कभी नहीं सूखता है।  इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी मे नाटौर (बंगाल) की रानी भवानी ने करवाया था बाद मे पेशवा बाजीराव द्वितीय ने मंदिर के चारो ओर बरामदें बनवाये।उत्तर भारतीय नागर शैली मे लाल और गेरूये पत्थरों से बना यह मंदिर तंत्र साधना के बीसा यंत्र पर आधारित है। बनारस मे इस मंदिर की महत्ता बड़ी दुर्गा के नाम से भी प्रसिद्ध है।
           शादरीय नवरात्र के पंचमी तिथि तिथि पर देवी दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप का दर्शन पूजन होता है। यह मातृत्व, स्नेह, ममता और अपनों की रक्षा करने वाले निःस्वार्थ प्रेम की अवस्था है। यह देवी पार्वती का ही मातृत्व रूप है जब उन्होंने कार्तिकेय को जन्म दिया था। स्कंद कार्तिकेय की माता होने के कारण ही देवी के इस स्वरूप को स्कंदमाता नाम मिला है। माँ स्कंदमाता सिंह (शेर) पर सवार होती हैं और कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं। माता की गोद में बाल कार्तिकेय होते हैं। ऊपरी दो हाथों में वे कमल का फूल थामती हैं और एक हाथ से अपने पुत्र को संभालती हैं तथा चौथा हाथ अभय मुद्रा में रहता है। देवी के इस स्वरूप की आराधना से जहां व्यक्ति की संपूर्ण सद्कामनाएं पूर्ण होती हैं वहीं उसके मोक्ष का मार्ग भी सुगम्य हो जाता है। काशी खंड, देवी पुराण और स्कंदपुराण में देवी के स्कंदमाता स्वरूप का विराट वर्णन किया गया है। काशी में स्कंदमाता का मंदिर जैतपुरा स्थित बागेश्वरी देवी मंदिर के नाम से मकान नंबर जे6/33 परिसर में है। 
शारदीय नवरात्र के छठे दिन षष्ठी तिथि को देवी के कात्यायनी स्वरूप की पूजा होती है।कात्यायनी दृढ़ता और न्याय की प्रतीक है । यह प्रौढ़ावस्था या मध्य-जीवन का वह रूप है जहाँ मनुष्य अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है और निर्भय बनता है। देवी दुर्गा के छठे स्वरूप का दर्शन साधकों को सद्गति प्रदान करने वाला कहा गया है। शारदीय नवरात्र में षष्ठी तिथि पर देवी के दर्शन पूजन का विशेष महात्म्य देवी पुराण और स्कंदपुराण में बताया गया है। स्कंद पुराण के काशीखण्ड के अध्याय 82 में कहा गया है कि भगवती के इस स्वरूप की महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन ने कठिन तपस्या करके भगवती परांबा से अपनी पुत्री के रूप में जन्म लेने का वरदान मांगा था। उनकी पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। कात्यायनी देवी को काशी मे विकटा देवी के नाम से भी जानते हैं। कात्यायनी देवी का मंदिर सिन्धिया घाट पर मकान नंबर सीके 7/158आत्मविश्वेश्वर मंदिर परिसर मे  है।
                     शारदीय नवरात्र में सप्तमी तिथि पर देवी के कालरात्रि स्वरूप के दर्शन पूजन का विधान है। इनके स्वरूप, स्वभाव और प्रभाव का आभास उनके नाम से ही हो जाता है। कालरात्रि जीवन के कठिन समय, क्रोध और भीतर के विकारों व अज्ञान को समाप्त करने वाली उग्र चेतना है।अंधकारमय परिस्थितियों का नाश करने वाली देवी अपने भक्त की  काल से भी रक्षा करती हैं।  देवी कालरात्रि के दर्शन पूजन नौ ग्रहों द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाएं दूर हो  जाती हैं। देवी कृष्णवर्ण की, प्रत्येक दिन के रात्रि भाग की देवी हैं। कालरात्रि सवरूप के उपासना करने से अष्ट सिद्धियां और नौ निधियों की प्राप्ति होती है। देवी कालरात्रि का मंदिर विश्वनाथ मंदिर के निकट अन्नपूर्णा गली के समानान्तर कालिका गली के मकान नंबर डी 8/3 में है।
               शारदीय नवरात्र की अष्टमी तिथि पर देवी दुर्गा के महागौरी का संबंध देवी गंगा से भी है। काशीवासी महागौरी के रूप को मॉं अन्नपूर्णा और मॉं भवानी के रूप मे देखते हैं।महागौरी शांति और पवित्रता की स्वरूप है। जो स्त्री जीवन के अनुभव के बाद आने वाली परिपक्वता, निर्मलता, क्षमाशीलता और आंतरिक शांति की अवस्था है। धर्म ग्रंथों में देवी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि इस स्वरूप के दर्शन मात्र से पूर्व संचित समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। देवी की साधना करने वालों को समस्त लौकिक एवं अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं। पति रूप में शिव को पाने के लिए कठोर तप से देवी कृष्णवर्ण की हो गई थीं तब शिव ने मां गंगा के जल से अभिषेक कर देवी की कांति लौटाई और वह महागौरी कहलाईं। काशी में देवी अन्नपूर्णा ही महागौरी का स्वरूप मे मंदिर श्री काशी विश्वनाथ धाम परिसर मे है।
       सिद्धिदात्री ज्ञान और पूर्णता प्राप्त जीवन के अंतिम चरण की वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति को ज्ञान, संतोष और पूर्णता की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के अंतिम दिन नवमी को पूजित देवी का यह स्वरूप समस्त प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाला है। इसी आधार पर देवी का नामकरण हुआ और उन्हें सिद्धिदात्रि कहा गया। हिमाचल के नंदा पर्वत पर देवी का मूल स्थान है। देवी की कृपा से उनका उपासक कठिन से कठिन कार्य भी सरलता पूर्वक संपादित कर लेता है। देवी की साधना से समस्त प्रकार की सद्कामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान शिव को भी सिद्धिदात्रि की कृपा से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त हुईं। काशी में देवी सिद्धिदात्रि के दो मंदिर माने जाते है। मैदागिन क्षेत्र में गोलघर क्षेत्र कालभैरो मंदिर के निकट सिद्धमाता गली में मकान नंबर के 60/29 मे देवी का मंदिर है। परंतु ज्यादा प्रचलित व प्रसिद्ध मंदिर सिद्धेश्वरी महाल के मकान सीके 7/124 में विद्यमान है। चौकके निकट स्थित इस मंदिर परिसर मे चंद्रकूप और चंद्रेश्वर महादेव भी है।
इस प्रकार काशी की नवदुर्गा यात्रा केवल नौ मंदिरों की परिक्रमा नहीं है, यह स्वयं के भीतर की यात्रा है। शारदीय नवरात्रि प्रतिपदा को वरुणा तट के शैलपुत्री से जो यात्रा शुरू होती है, वह जड़ता और प्रकृति से जुड़ी मासूम बालिका की चेतना है। दुर्गाघाट की ब्रह्मचारिणी में वह विद्या, संयम और तप बन जाती है, तो चौक की चंद्रघंटा में वही चेतना युवावस्था का साहस और शालीनता धारण करती है। दुर्गाकुंड की कूष्माण्डा सृजन की मुस्कान है, जैतपुरा की स्कंदमाता में वह ममता और वात्सल्य में बदल जाती है। काशी के हृदय में स्थित कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली दृढ़ न्याय-चेतना है, तो कालिका गली की कालरात्रि हमारे भीतर के अंधकार, भय और विकारों को भस्म करने वाली प्रचंड शक्ति। अन्नपूर्णा के रूप में विराजमान महागौरी वह परिपक्व शांति है जो तप के बाद मिलती है, और अंत में गोलघर की गली में स्थित सिद्धिदात्री — जहाँ यात्रा पूर्ण होती है — वह पूर्णता है, जहाँ स्त्री देह से आगे बढ़कर स्वयं सिद्धि बन जाती है।
इसीलिए काशी में कहा जाता है — नवरात्रि में नौ दिन तक जो साधक भोर में गंगा की हवा, घाटों की सीढ़ियों और गलियों की धूल को लांघते हुए इन नौ विग्रहों के सामने शीश झुकाता है, उसे केवल पुण्य नहीं मिलता, वह काशी के उस सनातन ताने-बाने को जी लेता है जो आज भी आधुनिक चकाचौंध से अछूता है। नवदुर्गा के ये नौ रूप पौराणिक कथाएँ मात्र नहीं, बल्कि हर स्त्री के जीवन का, हर मनुष्य की चेतना का विकास-क्रम हैं — नौ रातों में अपने भीतर सोई हुई शक्ति को जगाते हुये शैल से सिद्धि तक, जड़ से मोक्ष तक, देह से ब्रह्म तक की नवरात्रि यात्रा का यही वास्तविक अर्थ है।
काशी, 27सितंबर2026,रविवार
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